कर्म सिद्धि: ज्ञान मार्ग से ही संभव कर्म सिद्धि: ज्ञान मार्ग से ही संभव
कर्म सिद्धि: ज्ञान मार्ग से ही संभव

कर्म कोई जब स्वयं लक्ष्य बन जाता है हर उलझन का हल तब मिल जाता है
निस्वार्थ हो भाव समष्टिहित चिन्तन वीराने में भी गुलशन खिल जाता है
अंतर्मन की दिव्य प्रेरणा की ज्योति यथार्थ तत्व का आत्मसात हो जाता है
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लक्ष्य निश्चित होते ही आपके कर्म
एक यात्रा का रूप ले लेते हैं और फिर आज नहीं तो कल आप अपने लक्ष्य पर पहुंच ही जाते हैं...
भगवान कृष्ण के अनुसार कर्म तीन प्रकार के होते हैं -
1. सात्विक कर्म (बिना किसी लगाव, निःस्वार्थ भाव के साथ सम्पन्न हो)। 2. राजसिक कर्म (स्वयं के लिए, लाभ
की इच्छा के साथ सम्पन्न हो)। 3. तामसिक कर्म (स्वार्थ हो, बर्बरता हो, दूसरों को नुकसान पहुंचाकर किया गया हो)।
कर्म सिद्धान्त का सीधा सादा अर्थ है 'आप जो भी बोते हैं उसे ही काटते हैं।' अर्थात् आपको वही मिलता है जिसके आप हकदार है। आपके द्वारा किया गया कर्म ही आपको पुनः फल के रूप में प्राप्त होता है। इसीलिये प्रत्येक व्यक्ति अपने
कर्मों और विचारों के लिए स्वयं ही जिम्मेदार होता है, उत्तरदायी होता है।
कर्म के द्वारा ही भाग्य का निर्माण संभव है, क्योंकि प्रत्येक मनुष्य स्वतंत्र होकर अपने भाग्य का निर्माण करता हैं। वेदों के अनुसार भी, यदि कोई अच्छा कर्म करता है, तो उसे अच्छाई प्राप्त होगी, अगर कोई बुराई करता है, तो उसे बुराई ही प्राप्त होगी। वास्तव में कर्म ही इस संसार में पूर्णतः निष्पक्ष है।
आपके जीवन में बिना किसी कारण के कोई कष्ट नहीं आता है और न ही बिना किसी कारण के खुशी आती है। सब कर्मों का फल ही है जो आपको पुनः प्राप्त होता है।
जिंदगी का आखिरी लक्ष्य ज्ञान है? आमतौर पर मनुष्य जीवन का अन्तिम लक्ष्य सुख को मानता है लेकिन अध्यात्म-दर्शन सुख को परिवर्तनशील स्थिति मानता है, जो आती है फिर चली जाती है मूल रूप से मानव जाति का अंतिम लक्ष्य ज्ञान का लाभ प्राप्त करना ही है।
सुख को यदि हम अपना मुख्य उद्देश्य मानने लगेंगे तो यह हमारी भूल होगी, सुख और दुख जीवन के रास्ते में आने वाले एक पड़ाव मात्र और लगातार एक दूसरे में परिवर्तित होने वाले वह कारक हैं, जो हमें जीवन के मूल लक्ष्य ज्ञान की समझ देते हैं सुख और दुख से हमें जो मिलता है, वही हमारे संस्कार में जुड़ता है और हमारे संस्कार ही हमारे चरित्र का निर्माण करते हैं हर व्यक्ति का व्यक्तित्व और उसका चरित्र सुख और दुख उसके अनुभवों से मिलकर बनता है। व्यक्तित्व का प्रभाव ही उसके कर्मों पर सर्वाधिक होता है।
सुख से भी शिक्षा मिलती है, लेकिन दुख से जो शिक्षा मिलती है वह सुख से भी ज्यादा महत्वपूर्ण होती है दुख और दरिद्रता ने मनुष्य को ज़्यादा सिखाया है। अतः यह तो सुस्पष्ट है कि कर्म तभी सार्थक होंगे जब वे ज्ञान युक्त होंगे। सवाल यह उठता है कि ज्ञान का स्रोत कहां है, ज्ञान बाहर से हासिल होता है या ज्ञान हमारे अंदर ही है?
मुख्य विचार जीवन का लक्ष्य: लेख के अनुसार, मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य केवल सुख पाना नहीं, बल्कि ज्ञान की प्राप्ति करना है। सुख और दुःख: सुख और दुःख जीवन के रास्ते के पड़ाव मात्र हैं। दुःख और दरिद्रता मनुष्य को सुख से अधिक सिखाती है और अनुभव मजबूत करती है। कर्म और चरित्र: हमारे अनुभव और संस्कार हमारे चरित्र का निर्माण करते हैं, और व्यक्तित्व का प्रभाव हमारे कर्मों पर सबसे अधिक होता है। निष्कर्ष: कर्म तभी सार्थक होते हैं जब वे ज्ञान से युक्त हों। अंत में यह सवाल उठाया गया है कि ज्ञान का स्रोत बाहर से मिलता है या हमारे अंदर ही है।
भाग्य भी बदल जाता है कर्मों से-
एक कहावत है 'समय से पहले और भाग्य से ज्यादा न कभी किसी को मिला है और न ही मिलेगा।' इसका मतलब यह नहीं कि हम सिर्फ भाग्य के भरोसे बैठे रहें, भाग्य भी तभी साथ देता है जब व्यक्ति कर्म करता है।
भगवान श्रीकृष्ण सतत् कर्म के सम्बन्ध में स्पष्ट वचन है-जीवन कर्म-प्रधान है, यह जीवन जिस तरह से चलता रहता है, उसकी इच्छाएं भी अनंत होती हैं। यह सोचना जरूरी है कि सकमर्मों द्वारा पुरुषार्थ कर ही लक्ष्य सिद्धि अर्थात् कामनाओं की पूर्णता संभव है।
इसके बावजूद एक प्रश्न मन में समान रूप से उत्पन्न होता है कि कर्म समान होने के बावजूद उसका फल सभी को अलग-अलग क्यों प्राप्त होता है? इसका उत्तर उन बीजों, विचारों, क्रियाओं में छुपा हुआ है जिनको आपने सम्पन्न किया है अर्थात् 'आप उन बीजों की जांच कीजिए, जो आप बो रहे हैं, कर्म का लक्ष्य स्पष्ट और सार्थक होना चाहिये।'
भाग्य को बदलने का एक ही मार्ग है श्रेष्ठ आशा, विश्वास के साथ श्रेष्ठ कर्म करना। जीवन में हिम्मत और विश्वास के साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता है। जीवन में सकारात्मकता जरूरी है, इसलिये छोटी से छोटी खुशी में भी आनन्द लेना और देना सीखें। Core Message of the Text Action Shapes Destiny: It explains that destiny only supports those who take action; waiting solely on fate does not yield results. The Power of Intent and Deeds: It references Lord Krishna's teachings, emphasizing that life is driven by action (karma-pradhan). Why Results Vary: It addresses why people doing similar work experience different outcomes—attributing it to the nature of the "seeds" (thoughts, intentions, and past actions) they sow. Path to Change: It concludes that the only way to change destiny is through positive action, hope, faith, and finding joy in everyday moments. 
जब शक्ति अनियन्त्रित हो जाती है तो वह तीव्र गति से ऊर्ध्वमुखी होती है और यह अनियन्त्रित शक्ति आज्ञा चक्र में, बुद्धि में, तूफान मचा देती है...
इसलिये अपनी शक्ति को नियन्त्रित भाव से ऊपर उठाना है।
इसीलिये गुरु आज्ञा चक्र पर स्पर्श कर शिष्य की शक्ति के स्पन्दन को समायोजित करते है, नियन्त्रित करते है...
बुद्धि, शक्ति, ज्ञान में सांमजस्य बैठाते हैं। साधक को, उसके मन में चल रहे तूफान को, एक विराम देते हैं, विश्राम देते हैं। जिससे उसकी यात्रा सहज हो सके ।
सद्गुरुदेव नन्द किशोर जी श्रीमाली
ज्ञान प्रदाता : सद्गुरुदेव
ज्ञान का मूल हर एक व्यक्ति में इस सृष्टि की शुरुआत से ही मौजूद है व्यक्ति अपने अंदर मौजूद उस ज्ञान का आविष्कार करता है, यानी ज्ञान के ऊपर जो धूल चढ़ी हुई है उसे हटाकर उसे उद्घाटित करता है और इस क्रिया में उसके सहयोगी होते है सद्गुरु। इस दुनिया में जिन भी नियमों या सिद्धांतों की खोज की गई वह पहले से ही मौजूद थे बस उन्हें ढूंढा गया, उन्हें सामने लाया गया है।
मनुष्य की चेतना जो आत्मा, मन और प्राण से मिलकर बनी है, उसमें वास्तविक ज्ञान मौजूद होता है। जगद्गुरु श्रीकृष्ण ने इस क्रिया को गीता के माध्यम से स्पष्ट किया है। जब अर्जुन के ज्ञान पर सांसारिक और स्वार्थपरक धूल जम गई तो जगद्गुरु श्रीकृष्ण ने गीता के उपदेश के माध्यम से उस धूल को हटा कर उसे कर्म क्षेत्र में एक निश्चित लक्ष्य का आबद्ध करते हुए आगे बढ़ने के लिये प्रेरित किया।
साधना : सतत् कर्म का मार्ग
जैसे जैसे व्यक्ति साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ता है, चेतना के अंदर मौजूद उस ज्ञान का अनावरण होने लगता है, आग माचिस की तीली में मौजूद होती है बस उस तीली को माचिस के रोगन से घिसना पड़ता है यह जो घर्षण है यही साधना है, इसी साधना से हम धीरे-धीरे अपने अंदर मौजूद ज्ञान की चिंगारी को भड़काने का काम करते हैं और लक्ष्य की ओर केन्द्रित होकर कर्म करने लगते है।
हमारे शरीर के अंदर भी लगातार कर्म होता रहता है सांसे चल रही है, यह सासों का कर्म है रक्त परिभ्रमण कर अपना कर्म करता है मस्तिष्क लगातार विचारों को पैदा करके अपना
कर्म करता है हर जगह हर समय कोई ना कोई कर्म होता रहता है कर्म ही शक्ति है, और यही शक्ति हमारे चरित्र पर प्रभाव डालती है।
सद्गुरु साधक में मौजूद शक्ति और ज्ञान को उद्घाटित करते है। जिससे साधक श्रेष्ठ लक्ष्य के साथ सही मार्ग से कर्म करते हुए अपने लक्ष्यों को पूर्ण कर देता है। सद्गुरु के अभाव में व्यक्ति लक्ष्य और उसकी प्राप्ति के लिये किये गये कर्म की दिशा भटक सकती है और व्यक्ति को कमों के लिये शक्ति भी कम प्राप्त होती है।
सद्गुरु के आश्रय में सम्पन्न किया गया कर्म, व्यक्ति की शक्ति को बढ़ाता है, व्यक्ति के आत्म-उत्थान में वृद्धि करता है। कर्म चाहे छोटा हो अथवा बड़ा हो, सभी प्रकार के कर्म महत्वपूर्ण हैं। सद्गुरुदेव साधक को बाहरी साधनों और आन्तरिक शक्ति के साथ लक्ष्य पूर्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिये प्रेरित करते है।

भौतिक जरूरतों के लिए हमें सांसारिक कर्म और आंतरिक उन्नति के लिए साधना, उपासना रूपी कर्म करते रहना चाहिए जो लोग शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करते हैं वे साधारण से साधारण कर्म में भी शांति महसूस करेंगे और जो जीवन के निचले तलों पर जी रहे हैं, वह बड़े से बड़े और महान से महान कार्य में भी अशांति महसूस करेंगे।
जगद्गुरु श्रीकृष्ण और सद्गुरु की प्रेरणा से साधक कर्म के वास्तविक स्वरूप को समझ जाते हैं और बिना किसी स्वार्थ के अपने कर्म के पथ पर आगे बढ़ने में अपने आप को सक्षम पाते हैं इसी तरह से किया गया कर्म ही वास्तविक धर्म है और इस प्रकार के कर्म से निश्चय ही लक्ष्य सिद्धि होती है।
कर्म क्षेत्र के मार्ग में आने वाली चुनौतियों तो स्वीकार करनी ही पड़ेगी...
क्योंकि चुनौती के द्वारा ही भय को समाप्त किया जा सकता है। चुनौती स्वीकार करेंगे तभी तो भय समाप्त होता है और सबसे बड़ी बात भय के साथ कर्म की पूर्णता संभव ही नहीं है...
तो मेरे प्रिय शिष्यों साधकों, हर स्थिति में चुनौती को स्वीकार तो करना ही है। अनमने मन से, भाव से कर्म करने पर सफलता नहीं मिल सकती है और पूर्णता भी नहीं मिल सकती है...
- सद्गुरुदेव नन्द किशोर जी श्रीमाली