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श्रीलक्ष्मी स्तोत्रम् हिन्दी अर्थ सहित ![]()
( अगस्त्य ऋषिपत्नि लोपामुद्रा कृतम्)
लोपामुद्रा कृत श्री लक्ष्मी स्तोत्र एक अत्यंत प्रभावशाली स्तुति है, जिसे महर्षि अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा ने देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्ति हेतु रचा था। यह स्तोत्र 'लक्ष्मीनारायण संहिता' में वर्णित है और इसे नियमित रूप से श्रद्धा पूर्वक पाठ करने से धन, वैभव, सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
यह स्तोत्र ऐश्वर्य, सुख, संतान, विजय, और रोगनाश के लिए अति प्रभावशाली है।
श्री लक्ष्मी ध्यानम्
(> शान्तां पद्मासनस्थां शशिधवलवर्णां चतुर्भुजां लक्ष्मीम् ।
पद्मे पद्मदलायतेक्षणयुतां पद्मालया पद्मिनीम् ॥
हस्ते पद्मधनाऽक्षमाल्यधृतिमां हाराभरणभूषिताम् ।
विश्वेशीं विश्वजननीं भव्यरूपां नमाम्यहं श्रीयुताम् ॥
हिंदी अर्थ:
मैं उस देवी लक्ष्मी का ध्यान करता हूँ —
जो शान्त स्वरूपा हैं,
पद्मासन (कमलासन) पर विराजमान हैं,
जिनका वर्ण चन्द्रमा के समान उज्ज्वल है,
जिनकी चार भुजाएँ हैं,
जिनके नेत्र कमलदल के समान विशाल और कोमल हैं,
जो पद्मों की अधिष्ठात्री, पद्मिनी, और पद्मालया (कमलों में वास करने वाली) हैं,
जिनके हाथों में कमल, धन, अक्षमाला, और अभय-मुद्रा सुशोभित है,
जो मणियों, हारों और दिव्य आभूषणों से सुशोभित हैं,
जो सम्पूर्ण जगत की ईश्वरी और जननी हैं,
जो मंगलमयी, सौंदर्यमयी और कल्याणमयी हैं,
तथा श्री (समृद्धि) से युक्त हैं — उन्हें मैं श्रद्धापूर्वक नमन करता हूँ।
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पूर्व प्रणीका ॥
श्लोक 1
लोपामुद्रा श्रियः पादौ धृत्वानां सादरम्।
ववन्दे स्तवनं चक्रे तव लक्ष्मी सदा सति॥
हिन्दी अर्थ:
ऋषिका लोपामुद्रा ने अत्यन्त श्रद्धा और विनय से देवी लक्ष्मी के चरणों को ग्रहण किया और उन्हें प्रणाम करके यह स्तोत्र प्रस्तुत किया।
श्लोक 2
शृणु तत् स्तवनं येन स्तवकाः सुर्धनाश्रयः।
नैकसम्पत् समाकाराः त्वया आकर्षकयेक्षिताः॥
हिन्दी अर्थ:
हे माता! आप यह स्तोत्र सुनिए जिससे भक्तगण धन-संपत्ति के आश्रय बनते हैं। अनेक प्रकार की विभूतियाँ जिन्हें आप अपनी दृष्टि मात्र से प्रदान करती हैं, वही इस स्तुति से प्राप्त होती हैं।
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मूल पाठ प्रारंभ
मातर्नमामि कमले पद्माऽऽयतसुलोचने ।
श्रीविष्णुहृत्कमलस्थे विश्वमातर्नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥
हे कमलवासिनी माता लक्ष्मी! हे पद्मलोचने !
हे भगवान विष्णु के हृदय-कमल में स्थिता!
हे विश्वमाता! तुमको मेरा प्रणाम !
क्षीरसागरसत्पुत्रि पद्मगर्भाभसुन्दरि ।
लक्ष्मि प्रसीद सततं विश्वमातर्नमोऽस्तु ते ॥ २ ॥
हे क्षीरसागर की पवित्र पुत्री ! हे कमल की गर्भ से उत्पन्न सुन्दरी माॅं लक्ष्मी! आप प्रसन्न हों । हे विश्वमाता ! तुम्हें मेरा नमस्कार ।
महेन्द्रसदने त्वं श्रीः रुक्मिणी कृष्णभामिनी
चन्द्रे ज्योत्स्ना प्रभा सूर्ये विश्वमातर्नमोऽस्तु ते ॥ ३
हे माॅं ! तुम देवराज इन्द्र के महल की शोभा हो, तुम कृष्णप्रिया रुक्मिणी हो, तुम चन्द्रमा की ज्योत्स्ना और सूर्य की प्रभा हो, हे विश्वमाता ! तुम्हें प्रणाम ।
स्मितानने जगद्धात्रि शरण्ये सुखवर्धिनि ।
जातवेदसि दहने विश्वमातर्नमोऽस्तु ते ॥ ४ ॥
स्मितहास्यवदने माता ! हे संसार की धात्री ! हे शरण देने वाली, सुखों की वर्धिनी, अग्नि में निवास करने वाली, जगज्जननी ! तुमको मेरा प्रणाम।
ब्रह्माणि त्वं सर्जनाऽसि विष्णौ त्वं पोषिका सदा ।
शिवे संहारिका शक्तिर्विश्वमातर्नमोऽस्तु ते ॥ ५ ॥
हे माते ! सृष्टिकर्ता ब्रह्मा में तुम सृजन शक्ति हो, भगवान विष्णु में तुम पालन शक्ति हो, भगवान शिव में तुम संहार शक्ति हो, हे विश्वजननी ! तुमको मेरा प्रणाम ।
त्वया शूरो गुणी विज्ञो धन्यो मान्यः कुलीनकः ।
कलाशीलकलापाढ्यो विश्वमातर्नमोऽस्तु ते ॥६॥
हे विश्वमाता ! तुम्हारे कारण ही व्यक्ति वीर, गुणी, विद्वान, धन्य, मान्य और कुलीन होता है तथा कला, शील और ज्ञान से समृद्ध होता है । तुम्हें मेरा प्रणाम ।
त्वया गजस्तुरङ्गश्च स्त्रैणस्तृणं सरः सदः ।
देवो गृहं कणः श्रेष्ठा विश्वमातर्नमोऽस्तु ते ॥ ७ ॥
हे मात: ! तुम्हारे कारण ही हाथी, घोड़ा, स्त्रियाँ, घास, जलाशय, भवन, देवता, घर और कण भी श्रेष्ठ बनते हैं । हे विश्वमाता! तुमको नमस्कार है।
त्वया पक्षी पशुः शय्या रत्नं पृथ्वी नरो वधूः ।
श्रेष्ठाः शुद्धा महालक्ष्मि विश्वमातर्नमोऽस्तु ते ॥८॥
हे माॅं महालक्ष्मी! तुम्हारे कारण ही पक्षी, पशु, शय्या (बिस्तर), रत्न, पृथ्वी, मनुष्य और स्त्रियाँ श्रेष्ठ और पवित्र होते हैं । हे विश्वमाता! तुमको मेरा नमस्कार है।
लक्ष्मि श्री कमले पद्मे रमे पद्मोद्भवे सति
अब्धिजे विष्णुपत्नि त्वं प्रसीद सततं प्रिये ॥ ९ ॥
हे माॅं लक्ष्मी! श्री, कमला, पद्मा, रमा, पद्मजा, सती, समुद्रोद्भवा विष्णु-पत्नी ! तुम मुझपर सदा प्रसन्न रहो , प्रिय देवी माॅं ।
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फलश्रुति ॥
श्लोक 1
इति स्तुता प्रसन्ना च श्रीरुवाच पतिव्रतम्।
लोपामुद्रे मुने जने वां यत् हृतपकरणम्॥
अर्थ:
इस प्रकार स्तुति से प्रसन्न होकर लक्ष्मी देवी बोलीं —
हे पतिव्रता लोपामुद्रा! मैं जानती हूँ कि तुम्हारे जीवन में कौन-कौन सी वस्तुएं क्षीण हो गई हैं।
श्लोक 2
सुचेतनं दुनोत्येव काशीविश्लेषजोऽनलः।
युवां वाराणसीं प्राप्य सिद्धिं प्राप्यस्थ इप्सिताम्॥
अर्थ:
वाराणसी में अगस्त्य ऋषि (अग्नि स्वरूप) का कार्य अत्यंत शुभ होगा।
तुम दोनों वहाँ जाकर सिद्धि प्राप्त करोगे और अपनी इच्छाओं को पूर्ण करोगे।
श्लोक 3
ये पठिष्यन्ति मतस्तोत्रं तापदारिद्र्यनाशकम्।
इष्टसम्पत्प्रदं तेषां जयसंततिकारकम्॥
अर्थ:
जो भी व्यक्ति इस स्तोत्र का नित्य पाठ करेगा, उसकी दरिद्रता और क्लेश नष्ट हो जाएंगे।
उसे मनोवांछित सम्पत्ति, विजय और संतान की प्राप्ति होगी।
श्लोक 4
मम सान्निध्यदं बालग्रहादिव्याधिनाशनम्।
भविष्यति मम सारुप्यादिप्रमोक्षणं तथा॥
अर्थ:
इस स्तोत्र से मेरा सान्निध्य प्राप्त होगा।
बालग्रह आदि रोग-व्याधियाँ दूर होंगी,
और अंत में मोक्ष व मेरे स्वरूप से एकरूपता प्राप्त होगी।
॥ इति श्रीलक्ष्मीनारायण संहितायां लोपामुद्राकृतं श्रीलक्ष्मीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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नोट - (लोपामुद्राअगस्त्य ऋषि की पत्नी हैं
लोपामुद्रा एक बहुत विद्वान ऋषि थीं जो एक राजकुमारी थीं, जिन्होंने अगस्त्य से विवाह किया था। अगस्त्य स्वयं अग्नि देवता के अवतार थे, जो एक मनुष्य के रूप में पैदा हुए थे। लोपामुद्रा ने वेदों के साथ-साथ देवी की श्री विद्या पूजा में भी योगदान दिया है। विवाह के बाद लोपामुद्रा को अपने राजसी वैभव ऐश्वर्य की याद आती थी और वह आभूषण और धन चाहती थी। उन्होंने देवी लक्ष्मी को संबोधित करते हुए इस स्तोत्र द्वारा उनकी प्रार्थना की है, जिन्होंने उनकी इच्छाएं पूरी कीं। देवी ने इस स्तोत्र में वचन दिया किया है कि वह इस स्तोत्र का जाप करने वाले लोगों को समृद्धि की ओर ले जाएंगी।)
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