Gurudev Dr. Narayan Dutt Shrimali

ऐश्वर्य महालक्ष्मी साधना: जीवन में पूर्ण समृद्धि और सफलता का रहस्य

ऐश्वर्य महालक्ष्मी साधना: जीवन में पूर्ण समृद्धि और सफलता का रहस्य

*ॐ नमो आदेश गुरु जी को, ॐ क्रीं कालिके, ॐ भं भैरवाय, ॐ हं हनुमते*,

 *जल खोलूँ जलवायु खोलूँ, खोलूँ जल के तीर, जंतर खोलूँ मंतर खोलूँ*,*जादू टोना तंतर खोलूँ*, 

*घर खोलूँ बाहर खोलूँ*, *धरती आकाश पाताल खोलूँ*, 

*जाल जंजाल मायाजाल खोलूँ, पितर खोलूँ*, *सात पीढ़ी को बंधन खोलूँ*, 

*कुलदेवी देव खोलूँ*, 

*बुद्धि बल बंधा शरीर खोलूँ, व्यापार पर लगा बंधन खोलूँ*, *10 दिशा का लक्ष्मी लगा बंधन खोलूँ*, *लगी लगाई चली चलाई विद्या खोलूँ*, 

*धन लाभ पर लगे बंधन खोल*,

*भाग्य सौभाग्य पर लगे बंधन खोलू*,

*सारी साधनाओं के बंधन खोलू*,

*सातों चक्रों के बंधन खोलू*,*सारी सिद्धियां शक्तियां के बंधन खोलूँ,समृद्धि ऐश्वर्या विलासता के बंधन खोलूँ दिव्यदृष्टि के सभी बंधन खोलूँ ,इतना बंधन ना खुले गोरक्षनाथ नाथ की दुहाई*, 

*दिन दूना रात चौगुना होवे न होवे तो*, 

*शिव की जटा टूटे*, *तीसरे नेत्र से ज्वाला फूटे*, *सभी बंधन खाक होवें, महाकाली, वीर भैरव*, *बजरंगी हनुमान रक्षा करें*, *सतनाम आदेश गुरु जी को*, *करो मंत्र का शब्द साँचा ।। दुहाई शंकर पार्वती की*



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ऐश्वर्य महालक्ष्मी साधना: जीवन में पूर्ण समृद्धि और सफलता का रहस्य

Vishnu Aishwarya Mahalakshmi Sadhana

ऐश्वर्य महालक्ष्मी साधना: जीवन में पूर्ण समृद्धि और सफलता का रहस्य

शास्त्रों में यह स्पष्ट कहा गया है कि केवल मंत्र जप करने से या श्री सूक्त के हजारों पाठ करने मात्र से लक्ष्मी की प्राप्ति नहीं होती। पूर्ण अनुकूलता और समृद्धि तब प्राप्त होती है, जब सही मुहूर्त में मंत्र प्रयोग के साथ-साथ लक्ष्मी के बिम्ब का हृदय और चित्त पर अंकन किया जाए।

सैकड़ों लोग रात-भर मंत्र जप करते हैं, फिर भी उन्हें सफलता नहीं मिलती क्योंकि वे उस विशेष क्रिया से अनभिज्ञ होते हैं जिससे लक्ष्मी का बिम्ब हृदय में स्थापित होता है। यदि बिना एकाग्रता के जप किया भी जाए और कुछ धन प्राप्त हो जाए, तो वह व्यर्थ खर्च हो जाता है।

वास्तविक समृद्धि (पूर्णता) क्या है? 

Vishnu Aishwarya Mahalakshmi Sadhana

पूर्ण समृद्धि का अर्थ केवल धन का होना नहीं है, बल्कि यह एक निश्चिंतता की अवस्था है। यदि धन हो, परन्तु संतान न हो, या शरीर इतना बीमार हो कि आप खा-पी न सकें, तो वह धन व्यर्थ है। धन, पत्नी, पुत्र, वाहन, आरोग्य, शांति, सौभाग्य और ऐश्वर्य—इन सबके समन्वय से जो बिम्ब बनता है, उसे ही 'पूर्णता' या 'वास्तविक लक्ष्मी' कहते हैं। जो साधक विशेष समय में ऐसी लक्ष्मी के बिम्ब को हृदय में अंकित कर लेता है, वही जीवन में पूर्णतः सम्पन्न होता है।

साधना का विज्ञान: तार और स्विच का रहस्य

संसार में लक्ष्मी ही एकमात्र ऐसी शक्ति हैं जिनकी साधना देवता, दानव और मनुष्य (सभी धर्मों और सम्प्रदायों के लोग) समान रूप से करते हैं। लक्ष्मी को हृदय पर अंकित करने के लिए चार बीजाक्षरों का विधान है।

इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है: एक पंखे को चलाने के लिए निर्धारित स्विच दबाना पड़ता है। हालांकि स्विच और पंखे के बीच दीवार के अंदर छिपा तार दिखाई नहीं देता, फिर भी स्विच दबाते ही पंखा चलने लगता है। ठीक इसी प्रकार, जब आप सही बीजाक्षर (मंत्र) का उच्चारण करते हैं, तो आपका सीधा सम्पर्क उस ब्रह्मांडीय लक्ष्मी तरंग से जुड़ जाता है। बीच का माध्यम भले ही अदृश्य हो, परन्तु मंत्र रूपी स्विच दबते ही जीवन में पूर्णता रूपी हवा आने लगती है।

साधना के नियम और सावधानियां

विष्णु पुराण के अनुसार, लक्ष्मी का हृदय पर अंकन करने के लिए कुछ विशेष नियमों का पालन आवश्यक है:

  • निद्रा का त्याग: साधक जब तक इस प्रयोग को पूरा न कर ले, तब तक उसे निद्रा नहीं लेनी चाहिए। निद्रा अपने-आप में अपूर्णता है, और अपूर्णता से पूर्णता प्राप्त नहीं की जा सकती।

  • स्थिर लग्न (सिंह लग्न): दीपावली की रात्रि को कुछ समय के लिए 'सिंह लग्न' आता है, जिसे स्थिर लग्न माना जाता है। इसी समय पूजन करने से लक्ष्मी का बिम्ब हृदय पर स्थायी रूप से अंकित होता है।

  • चित्त की एकाग्रता: यदि टेलीविजन के पर्दे पर धूल जमा हो, तो चित्र स्पष्ट नहीं दिखता। इसी प्रकार, यदि हृदय में छल-कपट या चंचलता है, तो बिम्ब नहीं बनेगा। उस समय मन रूपी स्क्रीन बिल्कुल साफ होनी चाहिए।

प्रयोग और जप विधि

इस अद्वितीय और गोपनीय प्रयोग के लिए माला, अबीर, कुमकुम या बहुत अधिक कर्मकांड की आवश्यकता नहीं है। इसकी विधि अत्यंत सरल और अचूक है:

  1. तैयारी: सिंह लग्न प्रारम्भ होने से ठीक 10 मिनट पूर्व हाथ-पैर धोकर और शुद्ध वस्त्र (धोती) पहनकर बैठ जाएं।

  2. दिशा और आसन: उत्तर दिशा की ओर मुख करके शुद्धता के साथ बैठें।

  3. दीपक की स्थापना: अपने सामने तेल का एक दीपक प्रज्वलित करें।

  4. दृष्टि की स्थिरता: अपनी दृष्टि को केवल उस दीपक की लौ पर एकाग्र करें। किसी चित्र, मूर्ति या अन्य विचारों पर ध्यान न दें। जब दृष्टि एक ही बिंदु पर स्थिर होगी, तो मन में कोई दूसरा विचार नहीं आएगा।

  5. ध्वनि उच्चारण: सबसे पहले तीन बार "ॐ" की ध्वनि का उच्चारण करें। इससे अंदर का चित्त बिल्कुल स्वच्छ हो जाएगा।

  6. बीज मंत्र का निरंतर जप: इसके बाद बिना पलक झपकाए (यदि अत्यंत आवश्यक हो तभी झपकाएं) और शरीर को बिल्कुल स्थिर रखते हुए निम्नलिखित बीज मंत्र का लगातार उच्चारण करें:

    ।। श्रीं ह्रीं ह्रीं श्रीं ॐ ।।

जप के दौरान आंखों की पुतलियां और शरीर का कोई भी अंग हिलना नहीं चाहिए। ब्रह्मा जी ने देवराज इन्द्र से कहा था कि जिस प्रकार एक विशालकाय हाथी को नियंत्रित करने के लिए किसी बड़े बांस की नहीं, बल्कि 6-7 इंच के छोटे से अंकुश की आवश्यकता होती है; ठीक उसी प्रकार, यह छोटा सा मंत्र लक्ष्मी के बिम्ब को पूर्णतः अंकित करने में सक्षम है।

यह प्रयोग केवल एक व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि पूरे परिवार (माता-पिता, भाई-बहन, रिश्तेदार) के जीवन में अनुकूलता और पूर्णता लाने का एक अद्वितीय मार्ग है। सही विधि, एकाग्रता और स्थिर दृष्टि से की गई यह साधना जीवन की समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने का सामर्थ्य रखती है।

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ऐश्वर्य महालक्ष्मी साधना: ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जुड़ने का गहन रहस्य

पूर्व में दी गई विधि के अतिरिक्त, इस साधना के कुछ अत्यंत गूढ़ दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक पहलू भी हैं जिन्हें समझना एक साधक के लिए नितांत आवश्यक है। यह केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि स्वयं के चित्त को ब्रह्मांडीय तरंगों (Cosmic Frequencies) के साथ ट्यून करने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है।

लक्ष्मी की सार्वभौमिकता: एक मात्र ऐसी शक्ति जिसे सब पूजते हैं

शास्त्रों और पुराणों के अनुसार, संसार में लक्ष्मी ही एकमात्र ऐसी शक्ति हैं जिनकी उपासना बिना किसी भेदभाव के हर युग और हर सम्प्रदाय में की गई है।

  • शिव की साधना यदि द्रविड़ों ने की, तो आर्यों ने नहीं की। विष्णु की उपासना आर्यों ने की, तो द्रविड़ों ने उससे दूरी बनाई।

  • परन्तु लक्ष्मी की साधना देव, दानव, मनुष्य, जैन, बौद्ध, मुस्लिम—संसार का प्रत्येक व्यक्ति और वर्ग करता है।

  • स्वयं भगवान विष्णु, ब्रह्मा और शिव ने भी लक्ष्मी की साधना की है, क्योंकि जीवन की समस्त अपूर्णताओं और अभावों को समाप्त करने का सामर्थ्य केवल महालक्ष्मी में ही है। वह केवल धन नहीं, बल्कि सृजन और पूर्णता की मूल शक्ति हैं।

चित्त की एकाग्रता और त्राटक का रहस्य (टेलीविजन का उदाहरण)

इस साधना में दीपक की लौ पर दृष्टि स्थिर रखना (जिसे योग में 'त्राटक' कहा जाता है) सबसे महत्वपूर्ण अंग है। ऋषि-मुनियों ने इसे एक बहुत ही सटीक और व्यावहारिक उदाहरण से समझाया है:

  • स्थिरता का महत्व: यदि आप कोई चित्र टेलीविजन की स्क्रीन पर देखना चाहते हैं, तो उस टेलीविजन सेट का स्थिर होना अनिवार्य है। यदि टीवी हिलता रहेगा, तो चित्र कभी स्पष्ट नहीं दिखेगा। ठीक इसी प्रकार, मंत्र जप के समय यदि आपके शरीर का कोई अंग हिल रहा है, दृष्टि चंचल है, या आप बार-बार पलकें झपका रहे हैं, तो पांच करोड़ जप करने पर भी कोई लाभ नहीं होगा।

  • शून्य विचार अवस्था: जब आप केवल एक बिंदु (दीपक की लौ) पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो आस-पास की कोई वस्तु (माला, व्यक्ति, दीवार) दिखाई नहीं देती। जब दृष्टि भटकती नहीं, तो हृदय पटल पर कोई अन्य चित्र या विचार नहीं बनता। इसी विचार-शून्य और एकाग्र अवस्था में लक्ष्मी का बिम्ब सीधे आपके हृदय में अंकित होता है।

छलावा और आडंबर से मुक्ति

अक्सर लोग मानते हैं कि साधना के लिए बहुत सारी सामग्री—अबीर, मौली, कुमकुम, विशिष्ट चित्र या भव्य मूर्तियों की आवश्यकता होती है। लेकिन शास्त्रों का तर्क है कि यदि यह सब इतना ही अनिवार्य होता, तो हिमालय की कंदराओं में एकांत साधना करने वाले योगी इसे कहां से लाते? वास्तविक साधना बाहरी आडंबरों की मोहताज नहीं है। इसके लिए केवल तीन चीजें चाहिए:

  1. दृढ़ संकल्प (बिना पलक झपकाए बैठने की क्षमता)

  2. स्थिर दृष्टि (दीपक की लौ पर)

  3. सही मंत्र (।। श्रीं ह्रीं ह्रीं श्रीं ॐ ।।)

गुरु का प्रत्यक्ष अनुभव और प्रामाणिकता

यह कोई सामान्य या किताबी प्रयोग नहीं है। यह एक अत्यंत गोपनीय और अद्वितीय मंत्र है, जिसका अनुष्ठान स्वयं सिद्ध साधक और गुरुजन प्रत्येक वर्ष करते हैं। जिस प्रकार सूर्य आकार में छोटा दिखने पर भी पूरे ब्रह्मांड को रोशन करता है, उसी प्रकार यह छोटा सा बीज मंत्र साधक के जीवन के हर अंधकार को मिटा सकता है।

जब कोई साधक इस प्रयोग को पूर्ण समर्पण के साथ संपन्न करता है, तो इसका शुभ प्रभाव केवल उस तक सीमित नहीं रहता; बल्कि उसके माता-पिता, भाई-बहन, सगे-संबंधियों और पूरे परिवार को इसकी सकारात्मक ऊर्जा और अनुकूलता प्राप्त होती है। जीवन की समस्त इच्छाओं की पूर्ति और वास्तविक निश्चिंतता की प्राप्ति ही इस साधना का अंतिम और सर्वोच्च फल है।

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तन्त्रात्मकं जगदिदं कमनीयकान्तं, सन्दूषितं परमिदं निजस्वार्थ लुब्धैः।सौम्येन तन्त्रविधिन! परमार्थ चिन्त्यं, तन्त्रेश्वरंच निखिलं सततं प्रणम्यम्।।

आज का विचार नीतिशास्त्र में कहा गया है कि— "उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः। न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।।"

अर्थात, व्यक्ति के मेहनत करने से ही उसके काम पूरे होते हैं, सिर्फ इच्छा करने से नहीं। यदि सिंह सोया रहे, तो सोते हुए सिंह के मुँह में मृग स्वयं प्रवेश नहीं करता। भूख मिटाने के लिए उसे आलस्य त्याग कर शिकार करना ही पड़ता है। उसी प्रकार, अपने कार्यों को सिद्ध करने के लिए सही दिशा में निरंतर प्रयास करना आवश्यक है। प्रायः लोग बिना मेहनत के ही सब कुछ पा लेना चाहते हैं, जो कि संभव नहीं है।

यदि निरंतर प्रयास करने पर भी असफलता मिले, तो इसका अर्थ भाग्य का खराब होना नहीं है, बल्कि यह समझना चाहिए कि सफलता का प्रयास अनमने मन से हुआ है। जीवन में शुभ कर्म ही शुभ परिणाम देते हैं और अशुभ कर्म हमेशा अशुभ परिणाम लाते हैं— जैसे बबूल बोने पर बबूल ही प्राप्त होता है और आम बोने पर आम।

ऋषि चिंतन: उन्नति की ओर बढ़िएमंत्र: ।। श्रीं ।। ॐ निखिलं ॐकार निखिलं

गुरुवाणी 'चलो मेरे साथ बढ़ाते कदम, अमृत प्रवाह हो हर कदम।' जय निखिलं जय निखिलं ॐ जय निखिलं जय निखिलं ॐ

श्रीसूक्त (ऋग्वेद)

ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह।।

तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्। यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्।।

अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदिनीम्। श्रियं देवीमुप ह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम्।।

कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्। पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोप ह्वये श्रियम्।।

चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्। तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे।।

आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः। तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः।।

उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह। प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे।।

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्। अभूतिम समृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्।।

गंधद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्। ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप ह्वये श्रियम्।। 

मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः।। 

कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम।श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्।। 

आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीतवसमे गृहे।। नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले।। 

आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम्। चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह।।

आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्। सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह।।

तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्। यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम्।।

यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्य मन्वहम्। सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत।।

पद्मानने पद्म ऊरू पद्माक्षी पद्मसम्भवे। तन्मे भजसि पद्माक्षी येन सौख्यं लभाम्यहम्।।

अश्वदायी गोदायी धनदायि महाधने। धनं मे जुषतां देवि सर्वकामांश्च देहि मे।।

पुत्रपौत्र धनं धान्यं हस्त्यश्वाश्वतरी रथम्। प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु मे।।

धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसुः। धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरुणो धनमश्विना।।

वैनतेय सोमं पिब सोमं पिबतु वृत्रहा। सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिन:।।

न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः। भवन्तिकृतपुण्यानांभक्तानां श्रीसूक्तंजापिनाम्।।

सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुक गन्धमाल्यशोभे। भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवन भूतिकरिप्रसीद मह्यम्।।

विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियाम्। विष्णोः प्रियसखींम् देवीं नमाम्यच्युत वल्लभाम्।।

महालक्ष्मी च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमही तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्।।

आनन्दः कर्दमः श्रीदश्चिक्लीत इति विश्रुताः।ऋषयः श्रियः पुत्राश्च श्रीर्देवीर्देवता मताः।। 

ऋण रोगादि दारिद्र्य पाप क्षुदपमृत्यवः।भय शोक मनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा।। 

श्रीवर्चस्यमायुष्यमारोग्यमा विधाच्छोभमानं महीयते।धनं धान्यं पशुं बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सरं दीर्घमायुः।।

 

गुरु का संदेश "कहत गुरु सुनो मेरे शिष्य— 'हंसा उड़हूं गगन की ओर।' बढ़ाओ अपने पंखों की ताकत, खोल दो अपने मन के बंधन। तुम्हें अद्वितीय बनना है।"

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