Gurusewa the Kevlm Mission

हमारे लिए और मेरे सभी शिष्यों के लिए इतना समय नहीं है के वह आने वाला समय का इन्तजार करे,उसे जो कुछ करना है,जल्दी से जल्दी करना है
क्योकि भीड़ में घिरे रह कर घिसी-पिटी जिंदगी जीना कायरता की जिंदगी है,रगड़ खाते हुए मर जाना कायरता की मौत है.....
जियो तो शोले बन कर जियो,चाहे तुम थोड़े समय के ही सही ,पर अंगार की तरह चमक कर जियो,की तुम्हारे प्रकाश में मानवता अपनी आँख खोल सके...
तुम्हारे अंगार प्रकाश प्रकाश में उसे रास्ता दिखाई दे सके,उसका अँधियारा दूर हो सके,उसे नै चेतना मिल सके,और भटकते हुए जंगल में से मानवता ,वापस पगडण्डी पर खड़ी हो सके....
तुम जवान हो और जवानी सिसकते हुए नहीं बिताई जाती,जो खड़ा खड़ा जवानी बिता देता है,वो तो कायरो से भी गया बिता कायर है,जवानी का मतलब तो सृजन है.....
जवानी का मतलब तो चुनौती है,जवानी का मतलब तो काल की छाती पर पाँव रखने की क्रिया है,और मैंने तुम्हे जवानी दी है,अपनी धड़कन दी है,अपनी चेतना दी है.......
मैंने तुम्हे ढोंग और ढकोसला नहीं सिखाया है,मैं तो तुम्हे दो टूक शब्दों में कहता हूँ,की समय काम बचा है,और इतिहास बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रहा है.....
और कम से कम इस समय वह सब कुछ प्राप्त कर लो जो मेरे पास है,मैं अपने दोनों हाथो से लुटाने के लिए,अपने आप को देने के लिए,तुम्हारे प्राणो में समां जाने के लिए तैयार हूँ,पर तुम आगे तो बढ़ो,पर तुम इस बात का अहसास तो करो,और यह अहसास तुम्हारी पूरी जिंदगी संवार देगा....
तुम्हे कुछ करना नहीं है,न माला,न मन्त्र,न पालथी मर कर बैठना है,न तोते की तरह बोलना है,तुम्हे तो प्रेममय बनना है,और आगे बढ़ कर तेज़ी के साथ मेरे
शरीर के साथ ,मेरे शरीर में,मुझ में,मेरे प्राणो में,विलीन हो जाना है,जैसे नदी समुद्र में विलीन हो जाती है,जैसे बूँद बादलो में विलीन हो जाती है,जैसे शब्द अंतरिक्ष में विलीन हो जाते है.....
और यह मिटा देने की क्रिया है,जब तुम अपने आप को मिटा दोगे तो मैं उसी स्थान पर तुम्हे एक नया रूप दूंगा,एक नया नाम दूंगा,तुम्हारा एक नया सृजन करूँगा.......
तुम्हे मानव से "महामानव" और "इतिहास पुरुष" बनाने की युक्ति करूँगा,जिससे की आने वाली पीढीको तुम्हारा मार्ग-दर्शन प्राप्त हो सके
अँधियारा छत सके,रौशनी बिखर सके,मैं "सुगंध का झोका हूँ" मुझे अपने शरीर में रचा-पचा लेना,तुम्हे तो केवल मेरी और देखना है,मेरी आत्मा के पास,
तुम्हे तो केवल साक्षीभूत होना है,बाकी सब कुछ मैं अपने आप कर लूंगा,तुम्हारे जीवन का मैं जिम्मेवार हूँ,मैंने तुमसे पिछले किसी जीवन में वायदा किया है
और उस वायदे को पूरा करने का समय आ गया है,तुम्हे पूर्णता देनी है,और मैं इस वायदे को निश्चित ही निभाउंगा,और तुम्हे इतिहास का अद्वितीव पुरुष बना दूंगा,यह पक्का वायदा है,आवशकता बस इतनी ही है,तुम मेरे तरफ देखो,मुझ पर विश्वास करो,मुझ में एकाकार हो सको....

और अब कम समय बचा है..पहली ही बहुत देर हो चुकी है,अब एक क्षण भी गंवाना ठीक नहीं,मैं तुम्हे अपने दोनों हाथ फैलाए,अपने सीने से भींच लेने कोअपने प्राणो में उतार लेने की लिए,अपना अंश बना लेने के लिए तैयार खड़ा हूँ,और अब तुमको आन पड़ेगा,लोहा होते हुए भी पारस से स्पर्श कर कुंदन बन दमक जाओ,यह आवश्यक है.


प्रेम ही एक ऐसा शब्द है जिसके सामने पूरा का पूरा ब्रमाण्ड बोना पड़ जाता है।
मन्त्र तंत्र साधना कोई देवी देवता कोई योग विज्ञान,वेद पुराण ज्ञान में इतना साहस नहीं है कि वो सामने आकर भी खड़े भी हो सके। 
उस प्रेम की एक मुस्कराहट ही सब पर भारी है, वो प्रेम सदगुरुदेव और शिष्य का है आत्मा और परमात्मा का है प्रेमी और प्रेमिका है।
प्रेम हँसता गाता नाचता झूमता आनंद में मगन बे-परवा उस नदी की तरह आगे बढ़ता ही जाता है, इसी लिए प्रेम सर्वोच्च शिखर पर बैठा है जहाँ कोई कोई पहुंच पाता है। लाखों में एक-दो ही होते है जो प्रेम माय हो जाते है, विधाता तो सब की तकदीर लिखता है और उनका कोई क्या मुकाबला करेगा जिनका भाग्य ही ''इश्क़'' ने लिख दिया, वो अनमोल है। क्योंकि वह प्रेम वासना से दूर है ?

मैं अपने शिष्यों को उत्तराधिकार में धन-दौलत-जमींन-जायदाद भले ही न दू.......
पर अपनी चेतना ,अपनी स्वतंत्रता और अपनी तेजस्विता ....उत्तराधिकार में जरूर देना चाहता हूँ.....
मैं उनमे स प्राणता और जीवंतता भरना चाहता हूँ...उन्हें आफ़ताब बनाना चाहता हूँ...ताकि वो सूर्य की तरह पूरी पृथ्वी के अँधेरे को दूर कर सके......
और उत्तराधिकार में प्रहार करने की कला सीखना चाहता हूँ की ढोंगियों ...पाखण्डिओ...और आलोचकों पर "व्रज" की तरह प्रहार कर सके......
और चुनौतियों का जबाब दे सके...और फुफकारती आँखों को नोंच कर फेंक सके....
और सबसे बड़ी पूंजी देना चाहता हूँ....""प्रेम""...की वे दग्ध हृदयो पर फुहार बन कर बरस सके....
जलते हुए दिलो का मरहम बन सके....बिखलते हुए आंसू की हंसी बन सके...छटपटाते हुए प्राणो की संजीवनी बन सके....
मेरी करुणा....मेरा स्नेह....मेरी आत्मीयता और सबसे बड़ा मेरा "प्रेम" ही मैं उत्तराधिकार के रूप में अपने शिष्यों को देना चाहता हूँ....

डॉ: नारायण दत्त श्रीमाली



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