Gurudev Dr. Narayan Dutt Shrimali

Death is certain Death is inevitable Everyone must die

Death is certain Death is inevitable Everyone must die

Death is certain  Death is inevitable Everyone must die

मैंने मृत्यु के विषय पर एक लेख साझा किया था। यह उसी लेख का अगला और अंतिम भाग है।

मृत्यु निश्चित है—यदि यह बात वास्तव में हमारे भीतर उतर जाए, तो जीवन को देखने का हमारा पूरा दृष्टिकोण बदल जाना चाहिए।

Death is certain  Death is inevitable Everyone must die

फिर प्रश्न यह नहीं रह जाता कि मृत्यु कब आएगी?

प्रश्न यह बन जाता है कि—

“जब तक मृत्यु नहीं आई है, तब तक मैं अपने जीवन को किस प्रकार जी रहा हूं?”

मृत्यु का स्मरण करने का अर्थ उदास हो जाना नहीं है। इसका अर्थ जीवन से भाग जाना भी नहीं है। इसका अर्थ संसार को छोड़ देना या अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाना भी नहीं है।

बल्कि मृत्यु का स्मरण हमें यह समझाने आता है कि जीवन सीमित है और इसलिए इसे व्यर्थ की बातों में नष्ट नहीं करना चाहिए।

जिस मनुष्य को भीतर से यह समझ आने लगती है कि समय सीमित है, वह धीरे-धीरे अपनी प्राथमिकताएं बदलने लगता है।

वह हर बात पर क्रोध नहीं करता।

हर विवाद को जीतना आवश्यक नहीं समझता।

हर अपमान का उत्तर देना जरूरी नहीं समझता।

हर व्यक्ति को अपनी बात समझाना आवश्यक नहीं समझता।

और हर उस व्यक्ति के पीछे भागना भी छोड़ देता है, जिसे उसकी कीमत समझ में नहीं आती।

क्योंकि धीरे-धीरे उसे समझ आने लगता है कि जीवन बहुत छोटा है और मनुष्य इस छोटे से जीवन को कितनी छोटी-छोटी बातों में खर्च कर देता है।

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किसी ने क्या कहा?

किसने मेरा सम्मान नहीं किया?

किसने मेरी बात नहीं मानी?

किसने मुझे पीछे छोड़ दिया?

किसने मेरे बारे में क्या सोच लिया?

किसने मेरी आलोचना कर दी?

किसने मुझे धोखा दिया?

इन्हीं प्रश्नों में उलझते-उलझते पता ही नहीं चलता कि जीवन का कितना बड़ा हिस्सा बीत गया।

मृत्यु का स्मरण प्राथमिकताएं बदल देता है

मृत्यु का स्मरण इन सभी बातों को छोटा कर देता है।

जिस दिन मनुष्य को यह स्पष्ट दिखाई देने लगता है कि एक दिन उसे सब कुछ छोड़कर जाना है, उस दिन बहुत सी चीजों को पकड़कर रखने की इच्छा अपने आप कम होने लगती है।

तब धन से घृणा नहीं होती, लेकिन धन जीवन का मालिक नहीं रहता।

संपत्ति से मोह कम होता है, लेकिन जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती।

संबंधों से दूरी नहीं बनती, बल्कि संबंधों की वास्तविक कीमत समझ में आने लगती है।

तब मनुष्य समझता है कि परिवार केवल जिम्मेदारी नहीं है—यह प्रेम व्यक्त करने का अवसर भी है।

किसी अपने से बात करनी है तो आज कर लो।

किसी से प्रेम है तो उसे बताने में देर मत करो।

किसी से गलती हुई है तो क्षमा मांगने में अहंकार को बीच में मत आने दो।

किसी ने दुख दिया है तो हर पीड़ा को जीवनभर अपने भीतर ढोते रहने की आवश्यकता नहीं है।

क्योंकि कौन जानता है कि अगली सुबह मिले या न मिले।

मृत्यु हमें डराने के लिए नहीं, जगाने के लिए आती है।

वह हमें बताती है कि जो समय हाथ में है, वही वास्तविक समय है।

जीवन का सबसे खतरनाक शब्द—“बाद में”

हम अक्सर कहते हैं—

“बाद में पूजा करेंगे।”

“बाद में ध्यान करेंगे।”

“बाद में परिवार के साथ बैठेंगे।”

“बाद में माता-पिता से बात करेंगे।”

“बाद में अपने मन को समझेंगे।”

“बाद में भगवान को याद करेंगे।”

“बाद में अपने जीवन को बदलेंगे।”

लेकिन जीवन के सबसे खतरनाक शब्दों में से एक है—

“बाद में।”

क्योंकि बहुत से लोगों का वह “बाद में” कभी आया ही नहीं।

इसलिए यदि आज किसी से प्रेम है, तो कह दो।

किसी को धन्यवाद कहना है, तो कह दो।

किसी से क्षमा मांगनी है, तो मांग लो।

किसी को क्षमा करना है, तो कर दो।

किसी की सहायता करनी है, तो आज कर दो।

भगवान को याद करना है, तो अभी कर लो।

साधना प्रारंभ करनी है, तो आज से कर लो।

अपने जीवन की कोई गलत दिशा बदलनी है, तो पहला कदम आज ही उठाओ।

कल का भरोसा करके आज को मत खोओ।

मृत्यु-स्मरण का अर्थ संसार छोड़ना नहीं है

लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि मनुष्य अपने कर्तव्यों से भागने लगे।

घर छोड़ दे।

काम छोड़ दे।

परिवार छोड़ दे।

धन कमाना छोड़ दे।

संसार से अपना संबंध समाप्त कर ले।

यह जागरण नहीं है।

वास्तविक जागरण तो यह है कि—

संसार में रहो, लेकिन संसार को अपने भीतर का स्वामी मत बनने दो।

अपना काम करो।

ईमानदारी से धन कमाओ।

परिवार संभालो।

अपने माता-पिता, बच्चों और जीवनसाथी के प्रति जिम्मेदारियां निभाओ।

समाज के प्रति अपना कर्तव्य निभाओ।

लेकिन साथ ही यह मत भूलो कि इनमें से कोई भी वस्तु हमेशा तुम्हारे साथ नहीं जाएगी।

तुम्हारे हाथ में धन है—उसका सदुपयोग करो।

तुम्हारे पास घर है—उसमें प्रेम और शांति पैदा करो।

तुम्हारे पास शरीर है—उसकी देखभाल करो।

तुम्हारे पास समय है—उसका सम्मान करो।

लेकिन इन चीजों को अपनी अंतिम पहचान मत बना लो।

क्योंकि—

घर तुम्हारा है, लेकिन हमेशा नहीं रहेगा।

धन तुम्हारा है, लेकिन हमेशा नहीं रहेगा।

पद तुम्हारा है, लेकिन हमेशा नहीं रहेगा।

यश तुम्हारा है, लेकिन हमेशा नहीं रहेगा।

और—

यह शरीर भी तुम्हारा है, लेकिन एक दिन इसे भी छोड़ना पड़ेगा।

तो फिर प्रश्न उठता है—

“वह क्या है जिसे तुम अपने भीतर लेकर चल रहे हो?”

यहीं से भीतर की यात्रा शुरू होती है।

यहीं से साधना का वास्तविक अर्थ समझ में आने लगता है।

साधना क्या है?

साधना केवल पूजा-पाठ की कुछ विधियों का नाम नहीं है।

साधना का एक अर्थ यह भी है कि मनुष्य अपने भीतर देखना प्रारंभ करे।

मैं कौन हूं?

मैं किसके पीछे भाग रहा हूं?

मुझे वास्तव में कितना चाहिए?

मेरे क्रोध का अंत कहां है?

मेरे अहंकार की सीमा क्या है?

मेरी इच्छाओं का कोई अंत है या नहीं?

और यदि एक दिन मुझे यह सब छोड़ना ही है, तो आज मैं किस चीज को लेकर इतना बेचैन हूं?

जब ऐसे प्रश्न भीतर उठने लगते हैं, तब जीवन में धीरे-धीरे विवेक का जन्म होता है।

मृत्यु का स्मरण मनुष्य को वैरागी बनाने के लिए नहीं, बल्कि विवेकी बनाने के लिए है।

वह सिखाता है कि संसार का उपयोग करो, लेकिन संसार में खो मत जाओ।

धन कमाओ, लेकिन धन के दास मत बनो।

संबंध निभाओ, लेकिन उनमें स्वार्थ मत खोजो।

सम्मान मिले तो विनम्र रहो।

अपमान मिले तो स्वयं को पहचानो।

सफलता मिले तो अहंकार से बचो।

असफलता मिले तो टूटो मत।

क्योंकि अंततः जीवन का मूल्य केवल इस बात से तय नहीं होता कि हमने कितना पाया।

कई बार जीवन का वास्तविक मूल्य इस बात से समझ में आता है कि हमने कितना प्रेम दिया, कितनों को सहारा दिया, कितनों को क्षमा किया और भीतर से कितना जागे।

मृत्यु हमें वर्तमान में लौटाती है

हममें से अधिकांश लोग या तो बीते हुए कल में रहते हैं या आने वाले कल की चिंता में।

कभी पुरानी घटनाओं का बोझ उठाते हैं।

कभी भविष्य की आशंकाओं में घिरे रहते हैं।

और इसी बीच जो वास्तव में हमारे पास है—वर्तमान—वह निकलता चला जाता है।

मृत्यु का स्मरण हमें वर्तमान में वापस लाता है।

वह कहता है—

आज की सांस को महसूस करो।

आज अपने परिवार के साथ बैठो।

आज अपने भीतर झांको।

आज भगवान को याद करो।

आज किसी दुखी व्यक्ति के काम आओ।

आज अपने मन का कोई बोझ हल्का करो।

क्योंकि जीवन किसी भविष्य के दिन का नाम नहीं है।

जीवन अभी है।

यह सांस अभी है।

यह क्षण अभी है।

और यही क्षण धीरे-धीरे हमारा पूरा जीवन बन रहा है।

जो सुधारना है, आज सुधारो

मृत्यु का स्मरण हमें यह भी सिखाता है कि जीवन को टालना नहीं चाहिए।

जिसे समझना है—आज समझो।

जिसे सुधारना है—आज सुधारो।

जिस आदत को छोड़ना है—आज से छोड़ना शुरू करो।

जिस व्यक्ति से बात करनी है—आज कर लो।

जिससे क्षमा मांगनी है—आज मांग लो।

जिसे क्षमा करना है—आज कर दो।

जिस सेवा को करना है—आज कर दो।

जिस साधना को प्रारंभ करना है—आज प्रारंभ कर दो।

और जिसे भगवान के चरणों में समर्पित करना है—आज ही समर्पित कर दो।

क्योंकि एक दिन शाम आएगी ही आएगी।

लेकिन उससे पहले हमें ऐसी सुबह जीनी है कि जब जीवन की शाम सामने खड़ी हो तो भीतर से यह आवाज न आए—

“जीवन मिला था, लेकिन मैं उसे जी ही नहीं पाया।”

सांसें मिली थीं, लेकिन मैंने उन्हें केवल चिंता में लगा दिया।

समय मिला था, लेकिन मैंने उसे अहंकार में खो दिया।

प्रेम मिला था, लेकिन मैंने उसे व्यक्त नहीं किया।

संबंध मिले थे, लेकिन मैंने उन्हें छोटी-छोटी बातों में तोड़ दिया।

अवसर मिले थे, लेकिन मैंने उन्हें “बाद में” के भरोसे छोड़ दिया।

भगवान का स्मरण करने का अवसर मिला था, लेकिन मैं संसार की भागदौड़ में ही उलझा रहा।

अंत में क्या साथ जाता है?

मृत्यु आएगी।

वह बहुत कुछ पीछे छोड़ जाएगी।

धन यहीं रह जाएगा।

घर यहीं रह जाएगा।

पद यहीं रह जाएगा।

नाम और प्रसिद्धि भी यहीं रह जाएगी।

शरीर भी एक दिन पंचतत्व में विलीन हो जाएगा।

लेकिन जब तक जीवन है, हमारे पास एक अमूल्य अवसर है—

अपने भीतर परिवर्तन करने का।

यदि जीवन में जागरूकता आ गई,

भगवान का स्मरण आ गया,

प्रेम आ गया,

क्षमा आ गई,

सेवा का भाव आ गया,

अहंकार थोड़ा कम हो गया,

और भीतर की यात्रा शुरू हो गई—

तो मृत्यु का स्मरण केवल छीनने वाली घटना नहीं रह जाता।

वह जीवन को उसकी वास्तविकता दिखाने वाला एक दर्पण बन जाता है।

वह हर दिन हमें याद दिलाता है—

जो करना है, उसे टालो मत।

जो कहना है, उसे कहो।

जो सुधारना है, उसे सुधारो।

जो छोड़ना है, उसे छोड़ो।

और जिसे भगवान को समर्पित करना है, उसे समर्पित कर दो।

इसलिए मृत्यु से यह मत पूछो—

“तुम कब आओगी?”

अपने आप से यह पूछो—

“जब तक तुम नहीं आई हो, तब तक मैं कैसे जी रहा हूं?”

मृत्यु के आने का समय हमारे हाथ में नहीं है।

लेकिन मृत्यु से पहले कैसे जीना है, इसका निर्णय अभी भी हमारे हाथ में है।

और शायद जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य यही है—

शाम निश्चित है, फिर भी हमारे पास अभी एक सुबह बाकी है।

इस सुबह को क्रोध में मत गंवाना।

इस सुबह को अहंकार में मत गंवाना।

इस सुबह को व्यर्थ के विवादों में मत गंवाना।

इस सुबह को दूसरों से अपनी तुलना करने में मत गंवाना।

इस सुबह को केवल धन और प्रतिष्ठा के पीछे भागते हुए मत गंवाना।

इस सुबह को जागरूक होकर जियो।

प्रेम से जियो।

सत्य के साथ जियो।

कर्तव्य के साथ जियो।

भगवान के स्मरण के साथ जियो।

और यदि संभव हो तो ऐसा जीवन जियो कि जब जीवन की अंतिम संध्या आए, तब भीतर से यह संतोष हो—

“मुझे जीवन मिला था और मैंने उसे केवल गुजारा नहीं, बल्कि उसे समझने और सार्थक बनाने का प्रयास किया।”

शेष सब भगवान शिव के अधीन है।

क्योंकि प्रारंभ से अंत तक,

अंत से अनंत तक,

सृष्टि से संहार तक,

श्वास से मौन तक,

जीवन से मृत्यु तक—

सब शिव हैं।

🙏 ॐ नमः शिवाय 🙏

जय भोलेनाथ 🙏
जय जगन्नाथ 🙏

आचार्य प्रताप नारायण

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