Gurudev Dr. Narayan Dutt Shrimali

तिब्बत लामा योगिनी साधना दीक्षा | Tibet Lama Yogini Sadhana Initiation

तिब्बत लामा योगिनी साधना दीक्षा | Tibet Lama Yogini Sadhana Initiation

योगिनी : तिब्बत लामा योगिनी साधना दीक्षा

तिब्बत लामा योगिनी साधना दीक्षा | Tibet Lama Yogini Sadhana Initiation

प्रेमिका रूप में ही सिद्ध होती है

  भारतीय साधनात्मक साहित्य का एक विशद खंड केवल योगिनी साधना के प्रति ही समर्पित है।

- योगिनी के अद्भुत तेज को साधक के जीवन में उतारने हेतु अनेक कठिन और जटिल पद्धति योग स्वरूप पर प्रस्तुत है एक नवीन चिंतन, प्रामाणिकता एवं सपूर्णता के साथ—

जीवन में किसी विशिष्टता की कामना हो और योगिनी साधना का बल न लिया जाए, इससे बड़ा विरोधाभास हो ही नहीं सकता, क्योंकि योगिनी का तात्पर्य ही होता है, ऐसी विशिष्टता, जो न केवल साधना के क्षेत्र में वरन् साधक के संपूर्ण जीवन में गति पैदा कर दे। जीवन में कोई भी साधना की जाए उसका चतुर्दिक प्रभाव होता ही है।

कोई भी साधना एकांगी होती ही नहीं, यह हो सकता है, कि साधक किसी एक बिंदु विशेष पर ध्यान केंद्रित रखकर साधना संपन्न करने के कारण केवल उतने ही अर्थों में सीमित मान लें, किंतु जागरूक होकर देखने पर प्रत्येक साधना के विविधा पक्ष समझ में आते ही हैं, उदाहरण के लिए ‘अप्सरा साधना’ को लिया जा सकता है, जिसमें प्रायः साधक की दृष्टि में सफ़लता केवल एक ही बिंदु पर टिकी होती है, और वह यह, कि क्या अप्सरा प्रत्यक्ष हुई अथवा नहीं, फि़र इसी मापदंड पर निर्धारित कर लिया जाता है, कि साधना प्रामाणिक है अथवा नहीं ?जब कि अप्सरा साधना के तो विविध पक्ष है। जब एक साधक अप्सरा साधना संपन्न करता है, तो उसे यौवन, दैहिक सौंदर्य, पौरूष, सौंदर्य-बोध, जैसे अनेक गुण स्वतः प्राप्त होते ही हैं, और कालातंर में साधना की विशिष्ट दशा आ जाने पर साधक को अप्सरा का प्रत्यक्षीकरण भी संभव होता ही है।

इसी प्रकार ‘‘योगिनी साधना’’ भी जीवन की एक ऐसी साधना है, जिसमें साधक को विविध लाभ प्राप्त होते हैं, जिस प्रकार से अप्सरा, यक्षिणी, वश्यकंरी इत्यादि वर्ग होते हैं, उसी प्रकार योगिनी भी ऐसी ही एक वर्ग की विशिष्ट सौंदर्यमयी स्त्री ही है, जिसका सौंदर्य सर्वथा भिन्न होने के साथ ही साथ साधना की प्रखरता से भी भरा होता है, और जहां अप्सरा साधनाएं करने से व्यक्ति को ‘‘खेचरी शक्ति’’ आदि प्राप्त होती हैं, वहीं योगिनी को प्रेमिका के रूप में सिद्ध करने से उसे तांत्रिक क्रियाओं (मोहन, वशीकरण, स्तम्भन, उच्चाटन आदि) में सहायता मिलती है, क्योंकि योगिनी का संपूर्ण स्वरूप ही इस प्रकार का होता है, जो प्रेम व शक्ति का समन्वित स्वरूप कहा जाता है।

अप्सरा साधनाओं की अपेक्षा योगिनी साधना जीवन में अत्यधिक तीव्रता से सिद्ध होने वाली तथा अनुकूल फ़ल प्रदान करने वाली होती है। कई बार तो ऐसा होता है, कि साधना की पूर्णता के पूर्व ही योगिनी अपने संपूर्ण सौन्दर्य व प्रेम के साथ उपस्थित होकर एक प्रकार से साधक को अपने स्नेहपाश में बद्ध कर लेती है। यदि यह कहा जाए, कि तंत्र के क्षेत्र में योगिनी साधना का आश्रय लिए बिना पूर्णता प्राप्त की ही नहीं जा सकती, तो यह कोई अनुचित बात नहीं होगी। योगिनी साधना पूर्णता से केवल, और वर्ग की स्त्री से सर्वथा अलग हट कर इस रूप में मनोहर होती है, कि उनमें एक प्रकार की चुम्बकीयता और मादक गंध समायी होती हे, जिसके अकार्षण से साधक मुक्त हो ही नहीं पाता।

इसका कारण होता है, योगिनी वर्ग द्वारा पारद विज्ञान के क्षेत्र में पूर्ण सिद्धहस्त होना। पारद भक्षण व पारद-कल्प के द्वारा वे इसी प्रकार से सदैव चिरयौवनवती बनी रहती हैं। केवल शारीरिक सौंदर्य और अत्यंत आकर्षक भावभंगिमाएं ही नहीं, योगिनी अपने-आप में पूर्णरूप से साधिका के गुणों से भी सुसज्जित होती है, जिससे उसके अंदर एक अतिरिक्त अपनत्व, मृदुता, शीतलता और साधक से शीघ्र ही घुल-मिल जाने का गुण प्रचुर मात्रा में होता है। इस साधना के द्वारा वास्तव में साधक को ऐसा साहचर्य और मधुरता मिलती है, जिससे वह साधनाओं में तीव्रता से गतिशील हो सकता है।

तंत्र की कुछ अत्यंत उच्चकोटि की साधनाएं तो योगिनी के साहचर्य के बिना पूर्ण होती ही नहीं। तिब्बत के लामा जिस कारणवश प्रख्यात तांत्रिक एवं सिद्ध साधक हुए, उसके मूल में यही योगिनी साधना ही है, क्योंकि तिब्बत में लामा संप्रदाय के अंतर्गत ‘तंत्र दीक्षा’ केवल मात्र योगिनीयों को ही प्राप्त होती थी तथा उनके साहचर्य में रहकर ही कोई साधक तंत्र की साधनाएं संपन्न कर सकता था।

यह एक मिथ्या धारणा है, कि योगिनीयां क्रूर, वीभत्स एवं अत्यन्त तीव्र होती हैं। वस्तुस्थिति यह है, कि योगिनी एक अपूर्व व ऐसे निर्मल सौंदर्य की स्वामिनी होती है, जिसकी तुलना किसी भी वर्ग से की ही नहीं जा सकती, क्योंकि योगिनी अपने दैहिक सौंदर्य के साथ साथ आंतरिक रूप से भी इस प्रकार के गुण संपन्न एवं बुद्धिमता से परिपूर्ण होती है, जिससे उसे एक अनोखी आभा प्राप्त हो जाती है, तथा जो भी उसके साहचर्य में आता हे, वह भी एक अनोखे लावण्य से भर जाता है।

अत्यंत गौर वर्ण, दिप्-दिप् करता मुखमंडल, चुम्बकीय नेत्रें में लहराती करूणा, कोमलता और प्रेम की त्रिवेणी, सारे शरीर पर जैसे यौवन ही यौवन अठखेलियां कर रहा हो, और दूर से ही आती अत्यंत विशिष्ट गंध! सदैव बीस-बाईस की लगती आयु और मोहक सुडौलता से भरा कुछ लम्बाई लिए हुए पुष्ट शरीर, जो वास्तव में तेज का संग्रह ही होता है, और जब साधक को सिद्धि के उपरांत योगिनी प्रत्यक्ष होती है, आम स्त्री की भांति व्यवहार व वार्तालाप करती है, तो साधक एक क्षण के लिए अपने सौभाग्य पर विश्वास नहीं कर पाता, जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की होती थी।

योगिनी साधना को प्रचलित रूप से अलग हटकर समझने से साधक अपने जीवन में बहुत कुछ घटित कर सकता है, और तब वह जीवन के दोनों पक्ष अर्थात् भोग व मोक्ष एक साथ प्राप्त कर पाने का अधिकारी बन जाता है, क्योंकि तभी उसके अंदर उस तंत्रमयता का उद्भव होता है, जो जीवन के दोनों पक्षों को लेकर चलने की स्पष्ट धारणा रखती है। यद्यपि आज मोहन, वशीकरण आदि तांत्रिक क्रियाओं को हेय दृष्टि से देखा जाने लग गया है, लेकिन अपने मूल स्वरूप में ये क्रियाएं दूषित अथवा व्यभिचार युक्त कदापि नहीं है, जिसका प्रमाण दुर्गा सप्तशती जैसे प्रतिष्ठित ग्रंथ में मिलता है, और तंत्र के क्षेत्र में जाने के इच्छुक साधक को इन क्रियाओं में निष्णात होना ही होता है।

प्राचीनकाल में चौंसठ तंत्रों के अंतर्गत इसी कारणवश एक विशिष्ट तंत्र वीणाख्य योगिनी तंत्र रचा गया था। नव तंत्रों के अंतर्गत भी वर्तमान में योगिनी तंत्र एवं योगिनी ह्रदय नामक दो ग्रंथ प्रचलित है, किंतु योगिनी साधना की मूल भावना तो वीणाख्य योगिनी तंत्र में ही समाहित है। जिन अर्थों में योगिनी का वर्णन प्रस्तुत लेख में किया गया है, उसे तथा खेचरी शक्ति प्राप्त करने के लिए उच्चकोटि के साधक इसी पद्धति का अवलम्बन लेते रहे हैं।

इस साधना को किसी भी शुक्रवार को संपन्न किया जा सकता है। योगिनी का अपने स्वरूप में कोमल और शीघ्र फ़लप्रद होने के कारण योगिनी साधना में अधिक विधि-विधान की आवश्यकता नहीं रहती, केवल ‘‘योगिनी यंत्र’’ (मंत्र-सिद्ध एवं प्राण प्रतिष्ठा युक्त) तथा ‘‘योगिनी माला’’ ही इस साधना में पर्याप्त उपयोगी हैं। साधक रात्रि में पश्चिम की ओर मुख करके श्वेत आसन पर बैठ जाए और अपने सामने भी श्वेत वस्त्र बिछा ले। साधक स्वयं पैंट, कमीज छोड करके किसी भी प्रकार के धुले वस्त्र धारण कर सकता है। इस अवसर पर वह स्पष्ट रूप से अपनी मनोभावना व्यक्त करे, कि ‘‘ मैं योगिनी को प्रेमिका के रूप में सिद्ध करते हुए तंत्र के क्षेत्र में तीव्रता से आगे बढ़ने का इच्छुक हूं।’’ तदुपरान्त ‘‘योगिनी यंत्र’’ का सामान्य पूजन पुष्प की पंखुडियों, अक्षत आदि से कर ‘‘योगिनी माला’’ से निम्न मंत्र की एक माल मंत्र जप करें-

मंत्र

।। ऊँ ह्रौं योगिन्यै फ़ट्।।

इस साधना में अन्य विधि-विधान दीपक आदि की आवश्यकता नहीं है और जब तक पूर्ण सफ़लता न मिल जाए, तब तक प्रति शुक्रवार साधना करता रहें। पांच शुक्रवारों की साधना पूर्ण सफ़लतादायक और स्थाई मानी गई है। पांच शुक्रवार के बाद माला व यंत्र को नदी या तालाब में प्रवाहित कर दें। इस साधना की सफ़लता के रूप में प्राथमिक रूप से तीव्र सुगंध, प्रातः साधना स्थल पर पुष्प प्राप्ति आदि संकेत मिलते हैं, और धैर्य पूर्वक नियमित रूप से साधना करने पर साधक पूर्ण सफ़लता प्राप्त कर ही लेता है। यदि ‘‘योगिनी दीक्षा’ ग्रहण कर इस साधना को संपन्न किया जाए, तो साधक को भविष्य में ‘खेचरी विद्या’ की प्राप्ति भी होती है।

योगिनी साधना करना अपने आप में सौभाग्य है। जिस साधक को योगिनी की सिद्धि प्राप्त हो जाती है, उसके लिए भूत, भविष्य, वर्तमान का ज्ञान तो अत्यंत मामूली सी बात होती है, क्योंकि ऐसे सिद्ध साधक को योगिनी स्वयं अदृश्य रहते हुए भी दूसरे व्यक्ति से संबंधित विवरण और गोपनीय रहस्य स्पष्ट बता जाती है।

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