अनुष्ठान एवं मंत्र-जप में आने वाली बाधाओं की शांति हेतु पारंपरिक पाठ Traditional recitation for pacifying obstacles during rituals and mantra chanting क्या आपके मंत्र-जप या अनुष्ठान में बार-बार विघ्न आ रहे हैं? कभी-कभी साधना, मंत्र-जप या किसी धार्मिक अनुष्ठान के दौरान ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं, जिनका कारण या समाधान तुरंत समझ में नहीं आता। ऐसी स्थिति में भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में शांतिपाठ को मन, वातावरण और साधना-कर्म में शांति एवं स्थिरता के लिए किया जाता है। पारंपरिक मान्यता के अनुसार: साधक इस शांतिपाठ को 1 बार या 11 बार श्रद्धा एवं एकाग्रता के साथ कर सकता है। इसका उद्देश्य साधना के दौरान उत्पन्न विघ्नों की शांति, मानसिक स्थिरता और अनुष्ठान में सकारात्मक वातावरण बनाए रखना है। पाठ करते समय • मन को शांत रखें • उच्चारण यथासंभव शुद्ध रखें • श्रद्धा एवं एकाग्रता बनाए रखें • अपनी गुरु-परंपरा और साधना-विधि का सम्मान करें Spiritual Practice | Mantra Sadhana | Shanti Path | Hindu Spirituality | Vedic Tradition

श्रद्धा-विधि के साथ मन्त्र-साधना या अनुष्ठान करने पर भी सफलता न मिले, तो उसे पुनः करना चाहिए। बार-बार करने पर भी यदि इच्छित सफलता प्राप्त न हो, तो निम्नलिखित सात उपायों में से कोई एक उपाय करना चाहिए। एक साथ ही सातों उपाय करना निषिद्ध है। यदि एक उपाय करने पर भी मन्त्र-सिद्धि न हो तो उससे अगला उपाय करना चाहिए इससे निश्चय ही सफलता प्राप्त हो सकेगी ।
पहला उपाय- भ्रामण इस क्रिया में भूर्जपत्र पर वायु बीज 'यं' तथा मन्त्र
का एक अक्षर फिर 'यं' तथा मन्त्र का दूसरा अक्षर- इस प्रकार पूरा मन्त्र 'यं' वायु-बीज से ग्रथित करे। भूर्जपत्र पर कर्पूर, कुंकुम, खस और चन्दन को मिलाकर उस लेप या स्याही से लिखे। जब मन्त्र पूरा लिख दिया जाय तो उसका षोडशोपचार से पूजन करे। ऐसा करके यदि मन्त्र अनुष्ठान किया जाय, तो निश्चय ही मन्त्र सिद्ध होता है।
दूसरा उपाय-रोधन: वाग् बीज 'ऐं' के द्वारा मन्त्र को सम्पुटित करके एक सहस्र मन्त्र जप किया जाय, तो मन्त्र-साधना में पूर्ण सफलता एवं सिद्धि मिलती है।
तीसरा उपाय वश्य: अलक्तक, रक्त चन्दन, कुट, धतूरे का बीज और मैनसिल इन पांचों चीजों को बराबर भाग में मिलाकर भोजपत्र पर मूल मन्त्र लिख-कर उसे गले में धारण करे तो सम्बन्धित साधना में सफलता मिलती है।.
चौथा उपाय पीडन अधरोत्तर योग से मन्त्र जप कर अधरोत्तर देवी की
पूजा करे। इसके पश्चात् अकवन के दूध से भूर्जपत्र पर मन्त्र लिखकर उसे बायें पैर के नीचे दवाकर मूल मन्त्र से १०८ आहुतियां दे तो निश्चय ही साधना में सफलता मिलती है।
पांचवां उपाय-पोषण भोजपत्र पर गाय के दूध से मन्त्र लिखकर उसे दाहिनी भुजा पर बांधे, तथा मूल मन्त्र के 'श्रीं' शब्द का सम्पुट देकर एक सहस्र मन्त्र जप करे, तो सम्बन्धित साधना में पूर्ण सफलता मिलती है।
छठा उपाय शोषण यज्ञ की भस्म से भोजपत्र पर मन्त्र लिखकर उसे बाहिनी भुजा पर बांधे तथा 'यं' बीज द्वारा मूल मन्त्र को सम्पुटित कर एक सहस्र जप करे तो साधना में निश्चय ही सफलता मिलती है। यह पृष्ठ हिंदी की किसी प्राचीन धार्मिक या तांत्रिक साधना पुस्तक से लिया गया है, जिसका शीर्षक 'मन्त्र-सिद्धि के उपाय' है। इसमें मंत्र-साधना या अनुष्ठान में सफलता न मिलने पर सात वैकल्पिक उपायों का वर्णन किया गया है। मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
यदि आप इस पुस्तक के नाम, किसी खास मन्त्र के अर्थ या किसी विशिष्ट उपाय के बारे में और विस्तार से जानना चाहते हैं, तो कृपया बताएँ।
सातवां उपाय वाहन मन्त्र के प्रत्येक अक्षर के साथ अग्नि बीज 'रं' का सम्पुट देकर एक सहस्र जप करे, साथ ही पलास-बीज के तेल से भोजपत्र पर मन्त्र सिखकर कंधे पर धारण करे तो निश्चय ही साधना में पूर्ण सफलता प्राप्त होती है।
शांतिपाठ
कभी-कभी अनुष्ठान में, या मन्त्र जप में कुछ ऐसी बाधाएं आ जाती है, जिनका निराकरण नहीं दिखाई देता। ऐसी स्थिति में साधक को निम्न शांतिपाठ एक बार या ग्यारह बार करना चाहिए। इससे निश्चय ही विष्न शान्त होते है, तथा अनुष्ठान-कार्य में बाधा नहीं आती ।
नश्यन्तु प्रेतकूष्माण्डा नश्यन्तु दूधका नराः । सायकानां शिवाः सम्तु आम्नाय परिपालिनाम् ॥१॥ जयन्ति मातरः सर्वा जयन्ति योगिनी गणाः । जयन्ति सिद्ध डाकिन्यो जयन्ति गुरु पंक्तयः ॥२॥ जयन्ति साथकाः सर्वे विशुद्धाः सापकाइच ये। समयाचार सम्पन्ना जयन्ति पूजका नराः ॥३॥ नन्वन्तु चाणिमासिद्धा नम्यन्तु कुलपालकाः। इन्द्राद्या देवता सर्वे सूप्यन्तु बास्तु देवतः ।॥४।
चन्द्रसूर्यादयो देवास्तुष्यन्तु मम भक्तितः । नक्षत्राणि पहाः मोगाः करणा राशयश्च ये ॥५॥
सर्व से सुणिनी मान्यु सर्पा नश्यन्तु पक्षिणः । पदावस्तुरगाश्चैव पर्वताः कन्दरा गुहाः ॥६॥ ऋषयो ब्राह्मणाः सर्व शान्ति फुर्वन्तु सर्वदा। स्तुता में विविताः सन्तु सिद्धास्तिष्ठन्तु पूजकाः ।।७।।
ये ये पापवियस्सुरूवणरतामन्निग्वकाः पूजने । बेदाचार विमर्व नेष्ट हृदया क्षारच ये साधकाः ॥ वृष्ट्वा चकमपूर्वमन्यहृदया ये कौलिकर सूचका स्ते ते माग्तु विनाशमत्र समये श्री भैरवस्याजया ॥८॥ द्वेष्टारः साधकानां च सदैवाम्नाय दूषकाः । डाकिनीनां मुखे यान्तु तृप्तास्तत्पिशितै स्तुताः ॥६॥
ये वा शक्तिपरायणाः शिवपरा ये वैष्णवाः साधवः । सर्वस्मादखिले सुराधिपमजं सेव्यं सुरै सन्ततम् ।। शक्तिं विष्णुधिया शिवं च सुधियाश्रीकृष्ण बुद्ध्या च ये सेवन्ते त्रिपुरं त्वभेदमतयो गच्छन्तु मोक्षन्तु ते ॥१०॥
शत्रवो नाशमायान्तु मम निन्दाकराश्च ये । द्वेष्टारः साधकानां च ते नश्यन्तु शिवाज्ञया ॥११॥ तत्परं पठेत् स्तोत्रमानन्दस्तोत्रमुत्तमम् । सर्वसिद्धि भवेत्तस्य सर्वलाभो प्रणाश्यति ॥ १२॥