Gurudev Dr. Narayan Dutt Shrimali

Anant Chaturdashi Sadhana

Anant Chaturdashi Sadhana

लक्ष्मी प्राप्ति के लिए अचूक प्रयोग
'ॐ श्रीं अनन्ताय नमः' इस मंत्र का जप करते हुए २१ कमलगट्टे के बीजों से यदि अनन्त चतुदर्शी ८ सितम्बर ६५ के दिन हवन किया जाय, तो स्थायी लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

provides a ritual ("प्रयोग") to attain lasting wealth ("स्थायी लक्ष्मी की प्राप्ति") by chanting the mantra "ॐ श्रीं अनन्ताय नमः" and performing a Havan using 21 lotus seeds ("कमलगट्टे के बीज") on Anant Chaturdashi (anant chaturdashi). Here are the key details from the clipping: Mantra: 'ॐ श्रीं अनन्ताय नमः' (Om Shreem Anantaya Namah) Material: २१ कमलगट्टे के बीज (21 lotus seeds) Occasion/Date Mentioned in text: अनन्त चतुर्दशी ८ सितम्बर ६५ (Anant Chaturdashi - note that the year/date digits appear misprinted or stylized as "८ सितम्बर ६५") Goal: स्थायी लक्ष्मी की प्राप्ति (Attaining permanent wealth/prosperity)  

यह सामग्री धार्मिक परंपरा और आस्था के संदर्भ में अधिक स्पष्ट, सम्मानजनक और SEO-friendly रूप में इस तरह प्रस्तुत की जा सकती है:

लक्ष्मी प्राप्ति के अचूक प्रयोग: अनंत चतुर्दशी पर विशेष हवन साधना

भारतीय सनातन परंपरा में अनंत चतुर्दशी का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। इस दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा, व्रत, मंत्र-जप और हवन करने की परंपरा है। धन-समृद्धि और स्थिर लक्ष्मी की कामना से इस अवसर पर विशेष साधना भी की जाती है।

इन्हीं पारंपरिक प्रयोगों में एक सरल प्रयोग कमलगट्टे और “ॐ श्रीं अनन्ताय नमः” मंत्र से संबंधित बताया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रद्धा और विधिपूर्वक किया गया यह प्रयोग साधक के जीवन में समृद्धि, सकारात्मकता और आर्थिक स्थिरता की कामना के लिए किया जाता है।

लक्ष्मी प्राप्ति का विशेष मंत्र

मंत्र:
ॐ श्रीं अनन्ताय नमः॥

इस मंत्र में “श्रीं” को लक्ष्मी-तत्व से संबंधित बीज मंत्र माना जाता है, जबकि “अनन्ताय नमः” भगवान के अनंत स्वरूप के प्रति समर्पण का भाव व्यक्त करता है।

मंत्र का जाप करते समय मन को शांत रखें और अपनी सामर्थ्य के अनुसार श्रद्धापूर्वक संकल्प करें।

21 कमलगट्टे से हवन प्रयोग

अनंत चतुर्दशी के अवसर पर परंपरागत रूप से 21 कमलगट्टे लेकर हवन में आहुति देने का प्रयोग बताया जाता है।

सरल विधि

  1. प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

  2. पूजा स्थान को साफ करके भगवान विष्णु/अनंत स्वरूप का स्मरण करें।

  3. दीपक और धूप प्रज्वलित करें।

  4. अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजा और संकल्प करें।

  5. हवन कुंड में विधिपूर्वक अग्नि प्रज्वलित करें।

  6. 21 कमलगट्टों को तैयार रखें।

  7. प्रत्येक आहुति के साथ “ॐ श्रीं अनन्ताय नमः” मंत्र का उच्चारण करें।

  8. सभी आहुतियां श्रद्धा एवं एकाग्रता के साथ अर्पित करें।

  9. अंत में भगवान से परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और सद्बुद्धि की प्रार्थना करें।

हवन करते समय अग्नि-सुरक्षा और स्थानीय धार्मिक विधि का ध्यान रखना चाहिए। विस्तृत वैदिक अनुष्ठान के लिए योग्य आचार्य की देखरेख लेना उचित है।

इस प्रयोग के बताए जाने वाले लाभ

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस प्रकार की साधना का उद्देश्य केवल धन प्राप्ति नहीं, बल्कि जीवन में समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा की कामना भी है। श्रद्धालु इस प्रयोग से निम्न लाभों की कामना करते हैं:

  • धन-समृद्धि और लक्ष्मी कृपा की कामना

  • आर्थिक जीवन में स्थिरता के लिए प्रार्थना

  • परिवार में सुख, शांति और सौहार्द

  • कार्यों में आने वाली बाधाओं से मुक्ति की कामना

  • व्यापार और रोजगार में उन्नति के लिए संकल्प

  • सकारात्मक सोच और आत्मविश्वास को बढ़ाने का आध्यात्मिक प्रयास

  • घर में सुख-समृद्धि और शुभ वातावरण की कामना

  • भगवान अनंत के प्रति श्रद्धा एवं भक्ति की वृद्धि

  • जीवन में स्थिरता, संतुलन और सद्बुद्धि की प्रार्थना

इन लाभों को धार्मिक आस्था और परंपरागत मान्यता के रूप में समझना चाहिए; इन्हें निश्चित आर्थिक परिणाम की गारंटी के रूप में नहीं लेना चाहिए।

अनंत चतुर्दशी का महत्व

अनंत चतुर्दशी भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। “अनंत” का अर्थ है जिसका कोई अंत नहीं—इसलिए भक्त इस दिन जीवन में स्थायी सुख, संरक्षण, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की प्रार्थना करते हैं।

पुरानी तिथि के संबंध में महत्वपूर्ण सूचना

पुराने धार्मिक क्लिपिंग या प्रकाशित सामग्री में दी गई कोई विशिष्ट तारीख उस समय के पंचांग के अनुसार हो सकती है। इसलिए उस पुरानी तारीख को वर्तमान वर्ष की तिथि न मानें।

अनंत चतुर्दशी की पूजा और हवन के लिए प्रत्येक वर्ष स्थानीय पंचांग के अनुसार तिथि निर्धारित करें।
वर्तमान या आगामी वर्ष के अनुष्ठान के लिए संबंधित वर्ष का पंचांग देखकर सही तिथि और पूजा का समय निश्चित करना उचित है।

साधना में भावना का महत्व

सनातन परंपरा में किसी भी मंत्र, पूजा या हवन का महत्व केवल बाहरी सामग्री से नहीं, बल्कि श्रद्धा, संकल्प, संयम और सद्भावना से भी जुड़ा माना जाता है। इसलिए इस प्रयोग को करते समय धन के साथ-साथ परिवार के कल्याण, धर्मसम्मत कर्म, सद्बुद्धि और समाज के प्रति सकारात्मक भावना का संकल्प लेना अधिक सार्थक माना जा सकता है।

ॐ श्रीं अनन्ताय नमः॥

भगवान अनंत की कृपा से सभी के जीवन में सुख, शांति, सद्बुद्धि और समृद्धि बनी रहे।

 

गुरु पूजन (पंचोपचार पूजन विधि)

 

पंचोपचार विधि 

विशिष्ट साधनाओं की श्रेणी में आप सबने अब तक तीन महत्वपूर्ण साधनायें संपन्न की हैं - 

विजय सिद्धि माला का निर्माण - इस माला से किसी भी प्रकार की साधना को संपन्न किया जा सकता है । 

आसन सिद्धि - इस आसन पर बैठकर साधना करने पर सफलता निश्चय ही कदम चूमती है ।  

प्राण प्रतिष्ठा करना - बिना प्राण प्रतिष्ठा की हुयी तस्वीर या मूर्ति के समक्ष साधना करने से सफलता नहीं मिलती ।  

मेरे विचार से, जो लोग आध्यात्मिक जगत का अनुभव और उसमें सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, उनके लिए ये तीन साधनायें तो बहुत ही आवश्यक हैं । आप सभी लोग निश्चय ही साधुवाद के पात्र हैं ।  


जो लोग इन साधनाओं को अभी तक किसी कारणवश नहीं कर पाये हैं, उनको भी हमारी तरफ से शुभकामनायें ताकि आने वाले समय में वो इस कार्य को संपन्न कर सकें । यहां ध्यान देने वाला तथ्य ये हैं कि ये साधनायें आपके जीवन भर काम आती हैं । एक बार करने के पश्चात इन क्रियाओं को बार - बार नहीं करना पड़ता है । साथ ही, इस विजय माला और आसन की शक्ति हर साधना के बाद स्वयं ही बढ़ती रहती है ।  


अब सवाल आता है कि अब आगे क्या करना चाहिए?  


इसका जवाब ये है कि हमें अपने गुरु से आज्ञा लेकर ही साधना जगत में उतरना चाहिए और, उनकी बतायी हुयी साधना को ही अपने जीवन का आधार बनाना चाहिए ।  


पर उनका क्या जिनके जीवन में अभी तक गुरु आये ही नहीं? या, गुरु तो हैं पर जीवन में सफलता नहीं मिल रही । या जो अपने जीवन में श्रेष्ठ गुरु की प्राप्ति करना चाहते हैं ।  


उन सभी के लिए, जो जीवन में सबसे प्रथम और आवश्यक सूत्र है वह है, गुरु पूजन ।  


गुरु पूजन अर्थात एक ऐसी साधना जिसमें सभी साधनाओं का समावेश होता है । जिस साधना के माध्यम से जीवन में सब कुछ प्राप्त हो सकता है, उसी का नाम गुरु पूजन है । कहा भी गया है - 


।। गुरुर्बह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः गुरुः साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः ।। 


अर्थात, ब्रह्मा, विष्णु, महेश ये सब गुरु के ही रुप हैं । गुरु ही साक्षात परब्रह्म हैं, ऐसे श्री गुरुदेव को मैं प्रणाम करता हूं ।  


लेकिन मात्र शब्दों से ही इन अनुभूति को प्राप्त किया जा सकता, तो शायद लोग हजारों साल से इस लाइन को हर पूजन में रटते आ रहे हैं पर, इसका अनुभव कोई - कोई ही कर पाता है ।  


पर सच ये भी है कि अनुभूति हर व्यक्ति जो साधना क्षेत्र में प्रयासरत है, करना ही चाहता है । पर कभी - कभी प्रारब्धवश, कभी - कभी उचित मार्गदर्शन न मिलने की वजह से अनुभव प्राप्ति में देर हो जाती है । पर आप विश्वास करें, यह कार्य उतना भी कठिन नहीं है, जितना समझा जाता है ।  


सदगुरुदेव इस बात को बहुत ही रोचक उदाहरण से समझाते थे । मान लीजिए कि आप जीवन में अरबपति बनना चाहते हैं तो कैसे बनेंगे । मेहनत करने से बन पाते तो एक मजदूर से ज्यादा मेहनत तो आप कर नहीं सकते । जो मेहनत आपने अब तक की है, उससे तो बनने से रहे । और, आपको अंदाजा भी हो गया होगा कि आगे बन सकते हैं कि नहीं ।  


पर अगर कोई अरबपति व्यक्ति आपको गोद ले ले, तो आप एक क्षण में ही अरबपति बन सकते हैं । पर उसके लिए अरबपति व्यक्ति आपको गोद ले, ये शर्त तो रहेगी ही ।  


अब आध्यात्मिक क्षेत्र की बात करें तो उसके अधिष्ठाता गुरु होते हैं । कहा भी गया है कि - 


।। तीन लोक नौ खंड गुरु से बड़ा न कोय  ।। 


संसार की समस्त सिद्धियां गुरु के हस्तगत होती हैं और गुरु कृपा के बिना जीवन में कोई भी सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती । तो अगर आपको संसार की समस्त सिद्धियां चाहिए तो आपको बस इतना करना है कि आप गुरु के हो जाइये, अपने आपको गुरु के चरणों में समर्पित कर दीजिए, गुरु तो आपके स्वयं ही हो जायेंगे । वो तो पहले से ही बाहें फैलाये आपका इंतजार कर रहे हैं कि कब मेरा शिष्य मेरी पुकार सुनेगा और कब वो उसका हाथ थामकर इस भंवर रुपी संसार से बाहर निकालें । और, जब गुरु आपके हो गये तो जो गुरु का है, वो भी आपका ही होगा न । एक शिष्य भी पुत्र के समान ही होता है और, गुरु अपने पुत्र को देने में कभी संकोच नहीं करते ।  


जितना आसान ये सुनने में है, उससे भी आसान ये करने में है । पर जन्म-जन्मांतरों से हमारी कर्मों की धूल हमारी आत्मा पर पड़ी रहती है। जिस कारण से हम गुरु को पहचानने में भूल कर बैठते हैं और गुरु को एक सामान्य सा शरीर समझ बैठते हैं । और जब तक समझ आती है, तब तक बहुत देर हो जाती है । ये हो सकता है कि पूर्व जन्मों के कर्मों के फलस्वरुप व्यक्ति इस जीवन में बिना गुरु के भी साधनात्मक सफलता प्राप्त कर ले । लेकिन एक जगह पर आकर आगे बढ़ पाना संभव नहीं हो पाता । वहां से आगे गुरु स्वयं हाथ पकड़कर ही ले जा सकते हैं । बिना गुरु के आगे जा पाना संभव ही नहीं होता ।  


खैर, ये सब बहुत आगे की बातें हैं । वहां तक पहुंचकर इतनी समझ तो आ ही जाती है कि अब तो गुरुजी के पैरों को पकड़े रखना है । आध्यात्मिक शक्तियां तो दोधारी तलवार की तरह होती हैं । अगर गुरु हाथ न पकड़े रहें तो शक्ति का मद (अहंकार) साधक को अंधा कर सकता है । इसलिए भी जीवन में गुरु का होना अति आवश्यक है क्योंकि गुरु ही ये सिखाते हैं कि शक्ति के साथ कैसे सहज रहा जा सकता है ।  


और, इस सबकी शुरुआत होती है, गुरु पूजन से । बिना गुरु पूजन किये, बिना गुरु आराधना किये, बिना गुरु को प्रसन्न किये आप साधना में सफलता की बात तो भूल ही जाइये ।  


गुरु पूजन कई प्रकार से किया जा सकता है । शास्त्रोक्त विधियां हैं, तांत्रिक विधियां है, वैदिक तरीके हैं, साबर गुरु पूजन भी है और मानसिक गुरु पूजन भी होता है । तरीका कोई भी हो, प्रभाव सबका एक समान ही होता है । ये तो बस मन का भाव है कि हम इस तरीके से करना चाहते हैं या दूसरे तरीके से । यहां पर आज हम सबसे सरल विधि, पंचोपचार विधि से गुरु पूजन करना सीखेंगे । इसी पंचोपचार गुरु पूजन को आप मानसिक तरीके से भी कर सकते हैं । मानसिक अर्थात एक आसन पर बैठकर शांत मुद्रा में बैठकर, मन ही मन गुरु पूजन करना ।  


गुरु पूजन 

किसी भी साधना में बैठने से पूर्व गुरु पूजन और गणेश जी के पूजन की संक्षिप्त विधि – 


पवित्रीकरणः अपने उलटे हाथ की हथेली में थोड़ा सा जल लेकर निम्न मंत्र बोलते हुए जल अपने चारों ओर छिड़कें – 

।। ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोSपि वा यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं सः वाह्याभ्यंतरः शुचि ।। 


आचमनः आंतरिक तत्वों की शुद्धि के लिए यह प्रक्रिया अत्यंत ही आवश्यक है । सीधे हाथ में जल लेकर चार बार यह मंत्र पढ़ें और उस अभिमंत्रित जल को स्वयं पी लें । 


ॐ आत्मतत्वं शोधयामि नमः 


ॐ विद्यातत्वं शोधयामि नमः 


ॐ शिवतत्वं शोधयामि नमः 


इसके बाद दिग्बंधन का स्थान आता है । दसों दिशाओं में से विघ्न आपकी साधना में बाधा न डालें, इसके लिए अपने हाथ में जल या अक्षत लेकर निम्न मंत्र पढ़ते हुये दसों दिशाओं में बिखेर दें – 


ॐ अपसर्पंतु ये भूता ये भूताः भूमि संस्थिता ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यंतु शिवाज्ञा । 

अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचाः सर्वतो दिशम सर्वेषाम विरोधेन पूजाकर्म समारंभे ।। 


संकल्पः हाथ में जल लेकर संकल्प करें कि हे गुरुदेव महाराज, मैं ... (अमुक नाम) मेरे पिता/पति का नाम ...(अमुक) है और.... अमुक स्थान का निवासी .... अमुक गोत्र उत्पन्न आपकी शरणागति में हूं । मैं ... अमुक साधना... अमुक कार्य के लिए .... 21 दिन की साधना का संकल्प लेता हूं । आप मुझे इस साधना को करने की आज्ञा प्रदान करें और मुझे वह साहस और शक्ति प्रदान करें जिससे मैं इस साधना को संपन्न कर सकूं । आप मुझे अपनी कृपा दृष्टि प्रदान करें जिससे मैं अपने अभीष्ट मनोरथ में पूर्ण सफलता प्राप्त कर सकूं । 

इतना कहकर जल को जमीन पर छोड़ दें । 


इसके बाद निम्न मंत्र से सभी देवताओं को नमस्कार करें - 


।। श्रीमन् महागणाधिपतये नमः लक्ष्मी नारायणाभ्यां नमः उमा महेश्वराभ्यां नमः शची पुरंदराभ्यां नमः मातृ पितृ चरण कमलेभ्यो नमः इष्ट देवताभ्यो नमः कुल देवताभ्यो नमः ग्राम देवताभ्यो नमः स्थान देवताभ्यो नमः वास्तु देवताभ्यो नमः वाणी हिरण्यगर्भाभ्यां नमः शची पुरंदराभ्यां नमः सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः सर्वेभ्यो ऋषिभ्यो नमः ।। 


गणपति पूजनः 


।। ॐ सुमखश्चैकदंतश्च कपिलो गज कर्णकः  


लंबोदरश्चविकटो विघ्ननाशो विनायकः  


धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचंद्रो गजाननः  


द्वादशै तानि नामानि यः पठेच्छ्रणुयादपि  


विद्यारंभे विवाहे च प्रवेश निर्गमे तथा  


संग्रामे संकटेचैव विघ्नस्तस्य न जायते ।। 


जब भी कोई व्यक्ति किसी संकट में होता है तब उसे संकट नाशन श्री गणेश स्तोत्र का भी पाठ करना चाहिए - 


संकटनाशन श्री गणेश स्तोत्र 


प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् । भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायु कामार्थसिद्धये ।। 


प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् । तृतीयं कृष्णपिंगाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ।। 


लम्बोदरं पंचमं च षष्ठं विकटमेव च । सप्तमं विघ्नराजं च धूम्रवर्णं तथाष्टकम् ।। 


नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् । एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ।। 


द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नर । न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरो प्रभु ।। 


विद्यार्थी लभते विद्या धनार्थी लभते धनम् । पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम् ।। 

 

जपेद् गणपतिस्तोत्रं षडभिर्मासेः फलं लभेत् । संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः ।। 


अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखत्वा यः समर्पयेत । तस्य विद्यां भवेत् सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ।।  


आपकी साधना का पूर्ण फल आपको प्राप्त हो और आपकी साधना पूर्ण रूप से कवचित हो, इसके लिए आप निखिलेश्वरानंद कवच का एक पाठ अवश्य करें । कवच पहले ही ब्लॉग पर पोस्ट किया जा चुका है । यहां भी लिंक दे दी गयी है ।  


इसके बाद सदगुरुदेव से संबंधित कोई श्लोक या गुरु पूजन से संबंधित किसी भी श्लोक का उच्चारण करें – 


गुरु ध्यान 


।। गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः गुरुः साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः 


ध्यान मूलं गुरुर्मूर्ति पूजा मूलं गुरुः पदम मंत्र मूलं गुरुर्वाक्य मोक्ष मूलं गुरुः कृपा 


मूकं करोति वाचालं पंगु लंघयते गिरिं यत्कृपा त्वमं वंदे परमानंद माधवम 


गुरु कृपा ही केवलं गुरु कृपा ही केवलं गुरु कृपा ही केवलं गुरु कृपा ही केवलं 


श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः ध्यानं समर्पयामि । 


इसके बाद पंचोपचार से गुरुपूजन करें । पंचोपचार मतलब गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य (भोग पदार्थ अर्पण) । 


गुरु पूजनः 


श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः आवाहनं समर्पयामि । (मानसिक रूप से अपने गुरु का आह्वान करें) 


श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः आसनं समर्पयामि । (आसन के लिए एक फूल अर्पित करें) 


श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः पाद्यं समर्पयामि । (श्री चरणों में जल अर्पित करें) 


श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः अर्घ्यं समर्पयामि । (हाथों में जल अर्पित करें) 


श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः कुंकुमं तिलकं च समर्पयामि । (तिलक और अक्षत चढ़ायें) 


श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः धूपं दीपं च दर्शयामि । (धूप और दीप प्रज्वलित करें) 


श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः नैवेद्यं निवेदयामि । (नैवेद्य प्रसाद अर्पित करें) 


श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः नमस्कारं करोमि । (श्री गुरुदेव को पूजन उपरांत प्रणाम करें) 


पूजन करने के बाद गुरु मंत्र की कम से कम 4 माला अवश्य जप करनी चाहिए । अगर आपने अभी तक विजय माला सिद्ध नहीं की है तो आप सामान्य स्फटिक माला या रुद्राक्ष की माला से भी जप कर सकते हैं । माला की सामान्य प्राण प्रतिष्ठा का विधान अलग से पोस्ट कर दिया जाएगा ।  


।। ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः ।। 


और एक माला चेतना मंत्र की अवश्य करनी चाहिए - 


।। ॐ ह्रीं मम् प्राण देह रोम प्रतिरोम चैतन्य जाग्रय ह्रीं ॐ नमः ।। 


पूजन और मंत्र जप के उपरांत क्षमा प्रार्थना अवश्य करें - 


आवाहनं न जानामि न जानामि तवार्चनम पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर 


मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे  


यदक्षरं पदं भ्रष्टं मात्रा हीनं च यद भवेद तत्सर्वं क्षम्यतां देव क्षमस्व परमेश्वर 


गुह्यातिगुह्य गोप्ता त्वं गृहाणास्मत कृतं जपत सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादातमहेश्वरः 


बस, यही है गुरु पूजन की दैनिक विधि । संक्षिप्त है और आसानी से समझ में आने वाली है और इसको करने में अधिक से अधिक आधा घंटा लगता है । और, जो व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में प्रतिदिन गुरु पूजन करते हैं, उनके जीवन से नकारात्मकता कोसों दूर रहती है । यही लोग समाज को एक दिशा दिखा पाने में सक्षम हो पाते हैं और जीवन में आगे चलकर गुरु की पूर्ण कृपा प्राप्त करते हैं ।  


गुरु मंत्र का महत्व क्या है और चेतना मंत्र क्यों जप करना चाहिए, इसके ऊपर अगर एक पूरा ग्रंथ भी लिख दिया जाए तो भी कम है । पर फिर भी संक्षिप्त में, आने वाली पोस्टों में सदगुरुदेव द्वारा वर्णित तथ्य तो अवश्य ही रखे जायेंगे ।

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