Angarak Ashtottara Shat Naam Stotram

महीसुतो महाभागो मङ्गलो मङ्गलप्रदः ।
महावीरो महाशूरो महाबलपराक्रमः ॥ 1 ॥
महारौद्रो महाभद्रो माननीयो दयाकरः ।
मानदोऽमर्षणः क्रूरस्तापपापविवर्जितः ॥ 2 ॥
सुप्रतीपः सुताम्राक्षः सुब्रह्मण्यः सुखप्रदः ।
वक्रस्तम्भादिगमनो वरेण्यो वरदः सुखी ॥ 3 ॥
वीरभद्रो विरूपाक्षो विदूरस्थो विभावसुः ।
नक्षत्रचक्रसञ्चारी क्षत्रपः क्षात्रवर्जितः ॥ 4 ॥
क्षयवृद्धिविनिर्मुक्तः क्षमायुक्तो विचक्षणः ।
अक्षीणफलदः चक्षुर्गोचरः शुभलक्षणः ॥ 5 ॥
वीतरागो वीतभयो विज्वरो विश्वकारणः ।
नक्षत्रराशिसञ्चारो नानाभयनिकृन्तनः ॥ 6 ॥
कमनीयो दयासारः कनत्कनकभूषणः ।
भयघ्नो भव्यफलदो भक्ताभयवरप्रदः ॥ 7 ॥
शत्रुहन्ता शमोपेतः शरणागतपोषकः ।
साहसः सद्गुणाऽध्यक्षः साधुः समरदुर्जयः ॥ 8 ॥
दुष्टदूरः शिष्टपूज्यः सर्वकष्टनिवारकः ।
दुश्चेष्टवारको दुःखभञ्जनो दुर्धरो हरिः ॥ 9 ॥
दुःस्वप्नहन्ता दुर्धर्षो दुष्टगर्वविमोचकः ।
भरद्वाजकुलोद्भूतो भूसुतो भव्यभूषणः ॥ 10 ॥
रक्ताम्बरो रक्तवपुर्भक्तपालनतत्परः ।
चतुर्भुजो गदाधारी मेषवाहोऽमिताशनः ॥ 11 ॥
शक्तिशूलधरः शक्तः शस्त्रविद्याविशारदः ।
तार्किकस्तामसाधारस्तपस्वी ताम्रलोचनः ॥ 12 ॥
तप्तकाञ्चनसङ्काशो रक्तकिञ्जल्कसन्निभः ।
गोत्राधिदेवो गोमध्यचरो गुणविभूषणः ॥ 13 ॥
असृगङ्गारकोऽवन्तीदेशाधीशो जनार्दनः ।
सूर्ययाम्यप्रदेशस्थो यौवनो याम्यदिङ्मुखः ॥ 14 ॥
त्रिकोणमण्डलगतस्त्रिदशाधिपसन्नुतः ।
शुचिः शुचिकरः शूरो शुचिवश्यः शुभावहः ॥ 15 ॥
मेषवृश्चिकराशीशो मेधावी मितभाषणः ।
सुखप्रदः सुरूपाक्षः सर्वाभीष्टफलप्रदः ॥ 16 ॥
इति श्री अङ्गारकाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ।
क्या मंगल सिर्फ “उग्र ग्रह” हैं… या फिर वे जीवन के भीतर सोई हुई शक्ति, साहस, अनुशासन और विजय के दिव्य अधिष्ठाता भी हैं?
जब हम “अङ्गारक अष्टोत्तर शत नाम स्तोत्रम्” पढ़ते हैं, तब एक अत्यंत अद्भुत सत्य सामने आता है-
श्री मंगल देव केवल अग्नि, संघर्ष या कठोरता के प्रतीक नहीं हैं; वे “मङ्गलप्रदः”, “दयाकरः”, “भक्ताभयवरप्रदः” और “सर्वकष्टनिवारकः” भी हैं।
अर्थात् जहाँ अव्यवस्था है, वहाँ व्यवस्था; जहाँ भय है, वहाँ साहस; जहाँ दुर्बलता है, वहाँ तेज; और जहाँ निराशा है, वहाँ आगे बढ़ने की अदम्य शक्ति-यही मंगल तत्त्व का दिव्य रहस्य है।
“सुप्रतीपः सुताम्राक्षः सुब्रह्मण्यः सुखप्रदः ।
वक्रस्तम्भादिगमनो वरेण्यो वरदः सुखी ॥”
यह श्लोक मंगल देव के उस सौम्य, संरक्षक और वरदायी रूप को सामने लाता है जो केवल कर्म-ऊर्जा ही नहीं देता, बल्कि दिशा भी देता है।
जीवन में केवल शक्ति पर्याप्त नहीं होती-शक्ति के साथ संयम, निर्णय के साथ विवेक, और परिश्रम के साथ दिव्य संरक्षण भी चाहिए। यही इस स्तोत्र की आंतरिक आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक सुंदरता है।
वैदिक दृष्टि से मंगल साहस, पराक्रम, भूमि, रक्षा, सक्रियता, संकल्प और निर्णायकता के कारक माने गए हैं।
और यदि इसे सूक्ष्म मनोविज्ञान की भाषा में समझें, तो यह स्तोत्र हमारे भीतर की बिखरी हुई ऊर्जा को केंद्रित करने, भय को कर्म में बदलने, और अस्थिरता को संकल्प में रूपांतरित करने का भाव-जागरण करता है।
यही कारण है कि मंगल उपासना केवल ग्रह-शांति नहीं, बल्कि व्यक्तित्व-शक्ति का साधन भी मानी गई है।
जो साधक नियमित श्रद्धा से श्री मंगल देव का स्मरण करते हैं, उनके भीतर आत्मबल, निर्णय-शक्ति, रक्षण-भाव और संघर्ष से उबरने की क्षमता विकसित होती है।
इस स्तोत्र में मंगल देव का उग्र नहीं, संतुलित, करुणामय, तेजस्वी और कल्याणकारी स्वरूप झलकता है-और यही इसकी सबसे बड़ी दिव्यता है।
यदि आप चाहें, तो मंगलवार के दिन स्नान के पश्चात् दीप प्रज्वलित करके, लाल पुष्प अर्पित कर, श्रद्धा से इस स्तोत्र का पाठ करें।
कभी-कभी जीवन बदलने के लिए बहुत बड़े उपाय नहीं, बल्कि सही भाव से किया गया एक शास्त्रोक्त स्मरण ही पर्याप्त होता है।
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