Gurudev Dr. Narayan Dutt Shrimali

कुल देवता और कुलदेवी

कुल देवता और कुलदेवी

कुलदेवता-कुलदेवी साधना
आज भारत के बहुत सारे परिवारों को अपने कुलदेवी देवता के बारे में जानकारी नहीं है। इसके कारण वे अपने कुलदेवी-देवता की पूजा साधना नहीं सम्पन्न कर पा रहे है। परिणाम स्वरूप ऐसे लोगों के जीवन में एक नकारात्मकता का भाव बढ़ता ही जा रहा है।
हरेक जीव पूर्व संचित कर्मों के प्रारब्ध स्वरूप अगला जन्म धारण करता है और नए कर्मों से आगे की यात्रा करता है। कर्म करने के लिए मनुष्य स्वतंत्र है। पर एक शक्ति है जो जीव को सद्कर्म करने और आगे की यात्रा सफल बनाने के लिए हमेशा मार्ग दिखाकर सही रास्ते पर रखती है, वो है कुलदेवी ओर इष्टदेव।
प्रत्येक हिन्दू परिवार किसी न किसी देवी, देवता या ऋषि के वंशज से संबंधित है। उसके गोत्र से यह पता चलता है कि वह किस वंश से संबधित है। मान लीजिए किसी व्यक्ति का गोत्र भारद्वाज है तो वह भारद्वाज ऋषि की संतान है। इस प्रकार हमें भारद्वाज गोत्र के लोग सभी जाति और समाज में
मिल जाएंगे। इसके अलावा किसी कुल के पूर्वजों के खानदान के वरिष्ठों ने अपने लिए उपयुक्त कुल देवता अथवा कुलदेवी का चुनाव कर उन्हें पूजित करना शुरू किया और उसके लिए एक निश्चित स्थान पर एक मंदिर बनवाया जिससे एक आध्यात्मिक और पारलौकिक शक्ति से उनका कुल जुड़ा रहे और वहां से उसकी रक्षा होती रहे।
किसी भी कुल में आत्मा उस कुल के देवी देवता की अनुमति के बाद ही जन्म ले सकती है और उनकी सदैव कृपा रहती है। जिस ऋषि गोत्र के पूर्वजों ने वंशवृद्धि और उन्नति के लिए जिस पारलौकिक शक्ति को पूजा हो, वो पीढ़ी दर पीढ़ी उनके रक्त में सदैव वास करती है।
कुल देवता और कुलदेवी सभी के अलग-अलग क्यों होते हैं?
इसका उत्तर यह है कि कुल अलग है, तो स्वाभाविक है कि कुलदेवी-देवता भी अलग-अलग ही होंगे। हजारों वर्षों से

 

 

प्रातः अथवा रात्रि में स्नान कर पूर्व की ओर मुख कर
अपने सामने गुरु चित्र रख कर सद्‌गुरु का संक्षिप्त पूजन सम्पन्न करें। फिर दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प करें, कि मैं अपने कुल देवता और कुल देवी को प्रसन्न करने के लिए इस साधना को सम्पन्न कर रहा हूं और उनकी कृपा प्राप्त करने की प्रार्थना कर रहा हूं जिससे वे मुझे जीवन में हर प्रकार की सफलता एवं समृद्धि प्रदान करें तथा विपत्तियों से मेरी रक्षा करें। इस भाव को मन में धारण कर निम्न संकल्प का उच्चारण करें

 

ॐ अद्य अमुक गोत्रीयः (अपना गौत्र बोलें), अमुक शर्माऽहं (नाम बोलें) स्व कुलदेवता प्रीत्यर्थ सकल मनोकामना पूर्ति निमित्तं कुलदेवता साधनां सम्पत्स्ये।
जल को भूमि पर छोड़ दें, फिर कुलदेवता यंत्र को जल से धोकर पोछ दें और किसी पात्र में पुष्प का आसन देकर स्थापित करें। फिर यंत्र पर कुंकुम, अक्षत व नैवेद्य चढ़ाएं।
'कुलदेवी भैषज' को मौली से लपेट कर यंत्र के मध्य भाग में स्थापित करें, फिर निम्न मंत्र को पांच बार बोलते हुए भैषज पर कुंकुम से पांच बिन्दियां लगाएं -
ॐ एतोस्मानं श्री खण्डचन्दनं समर्पयामि ॐ कुल देवतायै नमः ।
इसके बाद 'प्रत्यक्ष सिद्धि माला' से निम्न मंत्र की 5 माला पन्द्रह दिन तक नित्य करें -
कुल देवता मंत्र ।।ॐ ह्रीं कुल देवतायै मनोवांछितं साधय साधय फट् ।।

 

अंतिम दिन यंत्र के समक्ष घर का बना हुआ नैवेद्य अर्पित करें। साधना समाप्ति पर समस्त सामग्री को नैवेद्य के साथ किसी कपड़े में लपेट कर सरोवर, नदी अथवा मन्दिर में अर्पित कर दें। शीघ्र ही साधना के परिणाम सामने आते हैं, एवं साधक को अपने कुल देवता और कुल देवी के दर्शन होते हैं और उनकी कृपा प्राप्त होती है।


प्राण प्रतिष्ठा न्यौछावर 1480/-

Guru Sadhana News Update
Blogs Update