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कुण्डलिनी जागरण ही मनुष्य जीवन का हेतु है, शव से शिव बनने की प्रक्रिया है, बिना कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत किए पूर्णता प्राप्ति सम्भव ही नहीं।
समस्त ब्रह्माण्ड जिस शाश्वत निखिल तत्व से गतिशील है, उसी गुरुत्व शक्ति की यह साधना है, जिसके प्रभाव से कुण्डलिनी शक्ति का जागरण होने की क्रिया में त्वरा आ जाती है— और फि़र गुरु की अणिमा, महिमा, लघिमा आदि अष्टादश सिद्धियां साधक को स्वतः ही प्राप्त हो जाती हैं।

शिष्य के जीवन में यदि कोई होता है, तो मात्र गुरु ही होते हैं। गुरु साधना की एक स्थिति होती है, जब शिष्य की दृष्टि में देवी-देवताओं का कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता, उसका मस्तक यदि कहीं झुकता है, तो माता-पिता, इष्ट और गुरु चरणों के अलावा अन्य कहीं भी नहीं झुकता है— और इससे भी ऊपर जब शिष्य के लिए इष्ट और गुरु में भी विभेद समाप्त हो जाता है, तब वह गुरु की शक्ति स्वरूप साधना करने का अधिकारी हो जाता है, क्येांकि उसके मानस में तो यह स्पष्ट होता है कि समस्त देवी-देवताओं की यदि कहीं उपस्थिति है, तो साक्षात् गुरुदेव में है। फि़र उन्हें छोड़कर अन्य कहीं भटकने से क्या लाभ?
यहां जब शक्ति शब्द का उल्लेख किया गया है, तो उसका अर्थ कोई दुर्गा या जगदम्बा से नहीं है, अपितु शक्ति से तात्पर्य तो उस शाश्वत निखिल तत्व से है, उस गुरुत्व शक्ति से है, जिससे समस्त ब्रह्माण्ड गतिशील है, जिसके फ़लस्वरूप दिन और रात होती है, ऋतुएं बदलती हैं, जन्म और मृत्यु होती है— और वह शक्ति जिसके पुंजीभूत होने से अनेक देवी-देवताओं का प्रादुर्भाव हुआ है। वह गुरुत्व शक्ति अदृश्य रूप में प्रत्येक जीव, प्रत्येक प्राणी में सुप्तावस्था में रहती है, जिसे कुण्डलिनी कहते हैं।
शरीर संरचना के अनुसार मानव मस्तिष्क तीन भागों में विभक्त है – मुख्य मस्तिष्क, लघु मस्तिष्क एवं अध: लघु मस्तिष्क। इन तीनों में ही ‘अध: लघु मस्तिष्क’ जिसे वैज्ञानिक भाषा में Medulla Oblongota कहते है, अति रहस्यमय है। उसका आकार अण्डे के समान होता है, जिसके भीतर कोई द्रव्य भरा होता है। इसमें सूक्ष्मतम ज्ञान तन्तुओं का एक समूह होता है, जो अपने स्थान पर गोलाकार छल्ले की तरह एक हजार बार घूमा हुआ होता है – इसी को योग भाषा में सहस्त्रार’ की संज्ञा दी जाती है। प्रायः मनुष्यों में ज्ञानश्चेतना मूलाधार के स्तर तक ही होती है। योग साधनाओं द्वारा इस शक्ति को मूलाधार से उठा कर सहस्त्रार में ब्रह्म अर्थात् गुरु तत्व से मिलन करा देना ही जीवन की पूर्णता है और योग सिद्धियों का सार है।
कुण्डलिनी शक्ति ही जीवन की मूल शक्ति है, जिसके जाग्रत होने पर ही उसकी अनन्त की ओर की यात्रा का प्रारम्भ होता है। मूलाधार से सहस्त्रार की इस यात्रा में जो शक्ति मूल रूप से सहायक होती है, वह गुरु की शक्ति ही होती है। इस साधना द्वारा कुण्डलिनी की क्रिया में त्वरिता आ जाती है।
यह विद्वान साधकों से छिपा नहीं है, कि कुण्डलिनी जागरण ही मनुष्य जीवन का हेतु है, शव से शिव बनने की प्रक्रिया है। बिना कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत किए पूर्णता प्राप्ति सम्भव ही नहीं। यह साधना उस कुण्डलिनी शक्ति के जागरण की आधार भूत साधना है। जब साधक गुरु की शक्ति रूप में आराधना करता है, तो सद्गुरु उसी रूप में साधक के शरीर में बीज रूप में स्थापित हो जाते है, और फि़र शनैः-शनैः जैसे-जैसे साधक साधनाओं को सम्पन्न करता जाता है, शक्ति का यह बीज उसके अन्दर विकसित होता जाता है। और यही शक्ति बीज फि़र एक एक कर सातों चक्रों को भेदता जाता है।
इसी दौरान साधक को अनेकों सिद्धियों की प्राप्ति होती रहती है। इन सिद्धियों को शास़्त्रों में अष्टादश सिद्धियों के नाम से जाना जाता है –
1 अणिमा 2 महिमा 3 लघिमा 4 प्राप्ति 5 प्रकाट्य 6 ईशित्व 7 वशित्व 8 कामावसायिता 9 शुद्ध स्वरूप की प्राप्ति 10 दूर श्रवण 11 दूरदर्शन 12 मनोजव 13 स्वेच्छा-वपु, 14 परकाया प्रवेश 15 इच्छित मृत्यु 16 देवक्रीड़ा दर्शन, 17 संकल्प सिद्धि, 18 प्रभुत्व।
अणिमा, महिमा सिद्धियों का सम्बन्ध शरीर से होता है, अतः इन सिद्धियों का स्वामी अपनी इच्छा के अनुरूप सूक्ष्म या विराट् रूप धारण करता है। लघिमा सिद्धि प्राप्त होने पर व्यक्ति कोई भी रूप धारण कर सकता है, आकाश की तरह फ़ैल सकता है, एक स्थान पर रहते हुए दूसरे स्थान पर जा सकता है, अदृश्य होने की सिद्धि भी मिल जाती है। साधक अपने एक रूप को अनेक रूपों में प्रकट कर सकता है।
प्राप्ति नामक सिद्धि से साधक को किसी भी स्थान से मनोवांछित वस्तु मांग लेने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। प्रकाट्य द्वारा साधक को अंतरिक्ष में विचरण करने वाले देवी, देवता, यक्ष, किन्नर, गंधार्व आदि के दर्शन होने लगते है। ईशिता की शक्ति से साधक किसी भी प्रकार का शरीर धारण कर सकता है।
वशिता द्वारा साधक को तुरीयावस्था प्राप्त होती है, और उसकी समस्त विषयो में आसक्ति समाप्त हो जाती है। इसी प्रकार आगे की सिद्धियां प्राप्त करता हुआ साधक गुरु के शक्ति स्वरूप की साधना करते-करते अंत में गुरु की समस्त शक्तियों का स्वामी बन जाता है। फि़र अलग-अलग सिद्धियों के लिए उसे अलग-अलग साधनाएं करने की आवश्यकता नहीं होती है।
शक्ति मूल रूप में नारी स्वरूपा कही गई हैं। गुरुदेव के इस स्वरूप की साधना करने से साधक को स्वतः ही उसकी करुणा और वात्सल्यता प्राप्त हो जाती है। फि़र उसके सामने शिष्य जीवन की कठिन और कड़ी परीक्षा ,कसौटियां नहीं रहती, वह तो एक शिशु की तरह इस साधना के द्वारा गुरु को मात् रूप में देखता हुआ गुरु चरणों में निमग्न हो जाता है और गुरुदेव भी करुणा के वशीभूत अपने शिष्य को गोद में उठाकर अत्यन्त मधुरता से सब कुछ प्रदान करते रहते है और शिशुवत शिष्य को पता भी नहीं चल पाता कि वह बड़ा हो गया है और उसके अन्दर विशेष शक्तियों एवं सिद्धियों का स्थापन हो गया है।
गुरुदेव के मातृत्व स्वरूप की इस साधना द्वारा साधक में मातृत्व गुणों का विकास होना कोई आश्चर्य वाली बात नहीं है। शिष्य के अन्दर फि़र व्यक्तिगत चिन्तन नहीं रह जाता, वह अपने कल्याण से ऊपर विश्व चिन्तन से आपूरित हो जाता है, परोपकार की भावना उसमें व्याप्त हो जाती है और देवत्व के यही तो लक्षण होते हैं। निश्चय ही इस साधना के द्वारा वह देवत्व का स्तर प्राप्त कर लेता है, सिद्धियां तो स्वतः ही उसमें निहित हो जाती है। उसके लिए उसे अलग से प्रयाय नहीं करना पड़ता, क्योंकि समस्त सिद्धियों की प्रदाता मातृ स्वरूप में, पूर्ण क्रुणामयी रूप में गुरुदेव उसके अन्दर ही तो विराज रहे होते है, एक अविनाशी शक्ति बीज बनकर।
इस साधना द्वारा साधक के अन्दर जिस गुरुत्व शक्ति के बीज का स्थापन होता है, वही साधक को जीवन पर्यन्त गतिशील भी करता है। जिस प्रकार अग्नि तीव्र होने पर ऊपर उठती है, उसी प्रकार साधक के भीतर शक्ति तत्व का विकास होने पर वह अपने जीवन में ऊपर उठता ही जाता है। परन्तु गुरुदेव की यह शक्ति भी उसी साधक को प्राप्त होती है, जो अपने दुर्भाग्य पर, अपनी दीनता पर, अपने आपको हीन नहीं समझता है, वरन् स्वाभिमान का सागर उसके अन्दर लहरा रहा होता है और यह तभी संभव है जब गुरु में शिष्य की पूर्ण आस्था एवं अटल विश्वास हो।
इस साधना को करना प्रत्येक शिष्य का सौभाग्य है। इस साधना को किसी भी शुक्रवार को सम्पन्न किया जा सकता है। इसमें गुरु मंत्र सिद्ध कुण्डलिनी जागरण यंत्र, गोमती चक्र, शक्ति माला आवश्यक है।
साधना विधि:- साधक को चाहिए कि वह प्रातः काल उठकर स्नान आदि से निवृत होकर पीली धोती व गुरु चादर धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुख कर बैठे। सामने गुरु चित्र का स्थापन कर संक्षिप्त पूजन करें, फि़र कुण्डलिनी जागरण यंत्र को अक्षत के आसन पर स्थापित करें। यंत्र के बगल में गोमती चक्र को रखें। फि़र गुरुदेव के कुण्डलिनी स्वरूप का धयान करें –
सिन्दूररर्णव विग्रहां त्रिनयनां माणिक्य मौलिस्फ़ुरटा,
तारानायक शेखरं स्मितमुखौनमापीन वक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यां मणिरत्नं पूर्णचषकं रक्तोत्पलं बिभ्रतीं,
सौम्यां रत्नघटस्थ सव्यचरणां ध्यायेत् परामम्बिकाम्।।
श्री जगदम्बायै नमः ध्यानं समर्पयामि।
जिनके शरीर का वर्ण सिन्दूर के समान लाल हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जिनके शिरोभाग में माणिक्य जटित मुकुट सुशोभित हो रहा हैं, जो मंद-मंद मुस्करा रहे हैं, जो अपने दोनों हाथों में मणिमय पात्र तथा रक्त कमल धारण किए हैं, जिनका स्वरूप सौम्य हैं, जिनके चरण रत्नयुक्त धाड़े पर स्थित हैं, गुरुदेव के ऐसे कुण्डलिनी स्वरूप का मैं ध्यान करता हूं।
इसके बाद मंत्रोचारण करते हुए क्रमशः पुष्प अर्पित करें। पाद्य हेतु जल, अर्घ्य हेतु दो आचमनी जल, स्नान कुंकुंम, चन्दन, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्पांजलि आदि अर्पित करें।
ॐ हृीं एतत् पाद्यं समर्पयामि नमः।
ॐ हृीं एतत् अर्घ्य समर्पयामि नमः।
ॐ हृीं इदमाचनीयं समर्पयामि नमः।
ॐ हृीं इदं स्नानं समर्पयामि नमः।
ॐ हृीं एतं गन्धं समर्पयामि नमः।
ॐ हृीं इदं सचन्दनं समर्पयामि नमः।
ॐ हृीं एतं धूपं आघ्रापयामि नमः।
ॐ हृीं एतं दीपं दर्शयामि नमः।
ॐ हृीं इदं नैवेद्यं निवेदयामि नमः।
ॐ हृीं एतं पुष्पांजलिं समर्पयामि नमः।
इसके बाद निम्न मंत्र की शक्ति माला से 5 माला नित्य 21 दिन तक करें –
इसके बाद गुह्यति गुह्य गोप्त्री त्वं गृहाणास्मत् कृतं जपं, सिद्धि र्भवतु मे देवी त्वत् प्रसादान् महेश्वरी’ मंत्र बोलते हुए एक आचमनी जल छोड़ते हुए जप का समर्पण करें।
साधना समाप्ति के बाद समस्त सामग्री को जल में विसर्जित करें। यदि संभव हो तो साधना के बाद नित्य एक माह तक इस मंत्र का नित्य पांच मिनट जप करें।
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