श्री निखिलेश्वरानंद कवचम्
(हाथ में जल लेकर नीचे लिखे हुए मंत्र को पढ़कर, जमीन पर छोड़ दें )
ॐ अस्य श्री निखिलेश्वरानंद कवचस्य श्री मुदगल ऋषिः अनुष्टुप छंदः
श्री गुरूदेवो निखिलेश्वरानंद परमात्मा देवता
“महोस्त्वं रूपं च” इति बीजम
“प्रबुद्धम निर्नित्यमिति” कीलकम
“अथौ नैत्रं पूर्ण” इति कवचम
श्री भगवतो निखिलेश्वरानंद प्रीत्यर्थं पाठे विनियोगः ।
(सामने दिये हुए अंग से प्रणाम करें)
श्री सर्वात्मने निखिलेश्वराय – अंगुष्ठाभ्यां नमः (दोनों अंगूठों को मिलाकर प्रणाम करें)
श्री मंत्रात्मने पूर्णेश्वराय - तर्जनीभ्यां नमः (दोनों तर्जनी उंगलियों को मिलाकर प्रणाम करें)
श्री तंत्रात्मने वागीश्वराय – मध्यमाभ्यां नमः (दोनों मध्यमा उंगलियों को मिलाकर प्रणाम करें)
श्री यंत्रात्मने योगीश्वराय – अनामिकाभ्यां नमः (दोनों अनामिका उंगलियों को मिलाकर प्रणाम करें)
श्री शिष्य प्राणात्मने सच्चिदानंद प्रियाय – करतल कर प्रष्ठाभ्यां नमः (दोनों हाथों के पृष्ठ भागों को मिलाकर प्रणाम करें, अगर ऐसे न कर पायें तो जैसे हाथ धोये जाते हैं, वैसे उपक्रम करें)
(सामने दिये हुए अंग को अपने दाहिने हाथ की उंगलियों से स्पर्श करें)
श्रीं शेश्वरः – ह्रदयाय नमः (अपने ह्रदय को स्पर्श करें)
ह्रीं शेश्वरः – शिरसे स्वाहा (अपने सिर को स्पर्श करें)
क्लीं शेश्वरः – शिखायै वषट (अपनी शिखा या चोटी वाले हिस्से को स्पर्श करें)
तप शेश्वरः – कवचाय हुम (दोनों भुजाओं को स्पर्श करें)
तापे शेश्वरः – नेत्रत्रयाय वौषट (दोनों नेत्रों और आज्ञा चक्र पर स्पर्श करें)
एकेश्वरः करतल कर पृष्ठाभ्यां अस्त्राय फट् (अपने सिर के ऊपर तीन बार चुटकी बजाते हुये, दाहिने हाथ की तर्जनी और मध्यमा उंगलियों से बायें हाथ पर ताली बजायें)
शिरः सिद्धेश्वरः पातु ललाटं च परात्परः ।
नेत्रे निखिलेश्वरानंद नासिका नरकान्तकः ।। 1 ।।
कर्णौ कालात्मकः पातु मुखं मंत्रेश्वरस्तथा ।
कंण्ठं रक्षतु वागीशः भुजौ च भुवनेश्वरः ।। 2 ।।
स्कन्धौ कामेश्वरः पातु ह्दयं ब्रह्मवर्चसः ।
नाभिं नारायणो रक्षेत् उरुं ऊर्जस्वलोsपिवै ।। 3 ।।
जानुनी सच्चिदानंदः पातु पादौ शिवात्मकः ।
गुह्यं लयात्मकः पायात् चित्तंचिंतापहारकः ।। 4 ।।
मदनेशः मनः पातु पृष्ठं पूर्णप्रदायकः ।
पूर्वं रक्षतु तंत्रेशः यंत्रेशः वारुणीं तथा ।। 5 ।।
उत्तरं श्रीधरः रक्षेत् दक्षिणं दक्षिणेश्वरः ।
पातालं पातु सर्वज्ञः ऊर्ध्वं में प्राण संज्ञकः ।। 6 ।।
कवचेनावृतो यस्तु यत्र कुत्रापित गच्छति ।
तत्र सर्वत्र लाभः स्यात् किंचिदत्र न संशयः ।। 7 ।।
यं यं चिंतयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितं ।
धनवान् बलवान् लोके जायते समुपासकः ।। 8 ।।
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगंधर्वराक्षसाः ।
नश्यन्ति सर्वविघ्नानि दर्शानात कवचावृतम् ।। 9 ।।
य इदं कवचं पुण्यं प्रातः पठति नित्यशः ।
सिद्धाश्रम पदारूणः ब्रह्मभावेन भूयते ।। 10 ।।
नीचे आपके मूल पाठ को अर्थ, प्रवाह, भाषा और आध्यात्मिक प्रस्तुति के स्तर पर परिष्कृत करके एक अधिक व्यवस्थित लेख के रूप में प्रस्तुत किया है। मंत्रों की मूल संरचना को यथासंभव बनाए रखा गया है और अंत में कवच के पारंपरिक आध्यात्मिक लाभ भी जोड़े गए हैं।
ॐ श्री गुरुदेवाय नमः।
श्री निखिलेश्वरानंद कवचम् को गुरु-तत्त्व की उपासना, साधक की आंतरिक शक्ति, आध्यात्मिक संरक्षण और साधना में एकाग्रता के भाव से किया जाने वाला कवच-पाठ माना जाता है। कवच-पाठ का मूल उद्देश्य साधक के भीतर श्रद्धा, आत्मविश्वास, अनुशासन और गुरु-चरणों के प्रति समर्पण की भावना को दृढ़ करना है।
नीचे विनियोग, कर न्यास, अंग न्यास तथा रक्षात्मक देह कवच का क्रम दिया गया है।
विधि: हाथ में थोड़ा जल लेकर विनियोग मंत्र का पाठ करें और पाठ पूर्ण होने के बाद जल को पृथ्वी पर छोड़ दें।
मंत्र:
ॐ अस्य श्री निखिलेश्वरानंद कवचस्य श्री मुदगल ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः।
श्री गुरुदेवो निखिलेश्वरानंद परमात्मा देवता।
“महोस्त्वं रूपं च” इति बीजम्।
“प्रबुद्धं निर्नित्यमिति” कीलकम्।
“अथौ नैत्रं पूर्ण” इति कवचम्।
श्री भगवतो निखिलेश्वरानंद प्रीत्यर्थं पाठे विनियोगः।
विनियोग का भाव यह है कि साधक अपने पाठ को किसी विशेष सांसारिक प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि श्रद्धा, गुरु-भक्ति और आध्यात्मिक कल्याण की भावना से समर्पित करता है।
कर न्यास में दोनों हाथों की उंगलियों के माध्यम से मंत्र-चेतना का स्मरण किया जाता है। प्रत्येक मंत्र के साथ संबंधित अंगुलियों को मिलाकर नमस्कार करें।
श्री सर्वात्मने निखिलेश्वराय — अंगुष्ठाभ्यां नमः।
दोनों अंगूठों को मिलाकर प्रणाम करें।
श्री मंत्रात्मने पूर्णेश्वराय — तर्जनीभ्यां नमः।
दोनों तर्जनी उंगलियों को मिलाकर प्रणाम करें।
श्री तंत्रात्मने वागीश्वराय — मध्यमाभ्यां नमः।
दोनों मध्यमा उंगलियों को मिलाकर प्रणाम करें।
श्री यंत्रात्मने योगीश्वराय — अनामिकाभ्यां नमः।
दोनों अनामिका उंगलियों को मिलाकर प्रणाम करें।
श्री शिष्य-प्राणात्मने सच्चिदानंद-प्रियाय — करतल-करपृष्ठाभ्यां नमः।
दोनों हाथों के करतल और पृष्ठ भाग का स्पर्श करें। यदि निर्धारित विधि से करना कठिन हो तो श्रद्धापूर्वक दोनों हाथों को आपस में स्पर्श कर सकते हैं।
अंग न्यास में दाहिने हाथ की उंगलियों से बताए गए अंगों का स्पर्श करते हुए मंत्र का उच्चारण किया जाता है।
श्रीं शेश्वरः — हृदयाय नमः।
हृदय का स्पर्श करें।
ह्रीं शेश्वरः — शिरसे स्वाहा।
सिर का स्पर्श करें।
क्लीं शेश्वरः — शिखायै वषट्।
शिखा अथवा सिर के ऊपरी भाग का स्पर्श करें।
तप शेश्वरः — कवचाय हुम्।
दोनों भुजाओं का स्पर्श करें।
तापे शेश्वरः — नेत्रत्रयाय वौषट्।
दोनों नेत्रों तथा आज्ञा चक्र के स्थान का स्पर्श करें।
एकेश्वरः — करतल-करपृष्ठाभ्यां अस्त्राय फट्।
अंत में हाथों के माध्यम से अस्त्र-रक्षा का भाव करते हुए निर्धारित न्यास पूर्ण करें।
नोट: मंत्रों के उच्चारण, पाठ-विधि और न्यास की परंपरा अलग-अलग गुरु-परंपराओं में भिन्न हो सकती है। इसलिए यदि यह कवच किसी विशेष गुरु या साधना-परंपरा से प्राप्त हुआ है, तो उसी परंपरा की विधि को प्राथमिकता देना उचित है।
शिरः सिद्धेश्वरः पातु ललाटं च परात्परः।
नेत्रे निखिलेश्वरानंद नासिका नरकान्तकः॥ १॥
भावार्थ: साधक के सिर, ललाट, नेत्र और नासिका की रक्षा दिव्य गुरु-तत्त्व करे तथा साधक के भीतर विवेक और जागरूकता बनी रहे।
कर्णौ कालात्मकः पातु मुखं मंत्रेश्वरस्तथा।
कण्ठं रक्षतु वागीशः भुजौ च भुवनेश्वरः॥ २॥
भावार्थ: कान, मुख, कंठ और भुजाओं की रक्षा का भाव रखते हुए साधक अपनी वाणी, श्रवण और कर्मों को सात्त्विक बनाने का संकल्प करता है।
स्कन्धौ कामेश्वरः पातु हृदयं ब्रह्मवर्चसः।
नाभिं नारायणो रक्षेत् उरुं ऊर्जस्वलोऽपि वै॥ ३॥
भावार्थ: हृदय में आध्यात्मिक तेज, नाभि में स्थिरता तथा शरीर में ऊर्जा और सामर्थ्य का भाव स्थापित किया जाता है।
जानुनी सच्चिदानंदः पातु पादौ शिवात्मकः।
गुह्यं लयात्मकः पायात् चित्तं चिंतापहारकः॥ ४॥
भावार्थ: साधक अपने शरीर, मन और चित्त को गुरु-तत्त्व के संरक्षण में समर्पित करता है तथा चिंता, भय और मानसिक अस्थिरता से ऊपर उठने का संकल्प करता है।
मदनेशः मनः पातु पृष्ठं पूर्णप्रदायकः।
पूर्वं रक्षतु तंत्रेशः यंत्रेशः वारुणीं तथा॥ ५॥
भावार्थ: मन की चंचलता पर नियंत्रण, पीछे से संरक्षण तथा विभिन्न दिशाओं में आध्यात्मिक सुरक्षा का भाव इस श्लोक में व्यक्त किया गया है।
उत्तरं श्रीधरः रक्षेत् दक्षिणं दक्षिणेश्वरः।
पातालं पातु सर्वज्ञः ऊर्ध्वं मे प्राणसंज्ञकः॥ ६॥
भावार्थ: उत्तर, दक्षिण, अधो दिशा और ऊर्ध्व दिशा सहित सभी ओर गुरु-तत्त्व की रक्षा का स्मरण किया जाता है।
कवचेनावृतो यस्तु यत्र कुत्रापि गच्छति।
तत्र सर्वत्र लाभः स्यात् किंचिदत्र न संशयः॥ ७॥
भावार्थ: जो साधक श्रद्धा और नियमपूर्वक कवच का आश्रय लेता है, उसके भीतर हर परिस्थिति में आत्मविश्वास, सजगता और सकारात्मक दृष्टि बनाए रखने की भावना विकसित होती है।
यं यं चिंतयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्।
धनवान् बलवान् लोके जायते समुपासकः॥ ८॥
भावार्थ: साधना का उद्देश्य केवल इच्छाओं की पूर्ति नहीं, बल्कि संकल्प-शक्ति, परिश्रम, आत्मविश्वास और जीवन में सकारात्मक दिशा को मजबूत करना भी है।
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगंधर्वराक्षसाः।
नश्यन्ति सर्वविघ्नानि दर्शनात् कवचावृतम्॥ ९॥
इस श्लोक में पारंपरिक रूप से विभिन्न प्रकार के भय, बाधाओं और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा का भाव व्यक्त किया गया है। इसे साधक के लिए आध्यात्मिक संरक्षण और निर्भयता के प्रतीकात्मक भाव के रूप में भी समझा जा सकता है।
य इदं कवचं पुण्यं प्रातः पठति नित्यशः।
सिद्धाश्रमपदारूढः ब्रह्मभावेन भूयते॥ १०॥
भावार्थ: जो साधक श्रद्धा और नियमितता के साथ प्रातःकाल कवच का पाठ करता है, उसके भीतर आध्यात्मिक अनुशासन, गुरु-भक्ति और उच्च चेतना की भावना विकसित होने का संकल्प मजबूत होता है।
परंपरागत साधना-दृष्टि से कवच-पाठ को निम्न भावनात्मक और आध्यात्मिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है:
नियमित पाठ साधक को गुरु-चरणों के प्रति श्रद्धा, समर्पण और कृतज्ञता का भाव बनाए रखने में सहायता करता है।
कवच का निरंतर स्मरण कठिन परिस्थितियों में मानसिक दृढ़ता और आत्मविश्वास का संकल्प विकसित कर सकता है।
मंत्र, न्यास और श्लोकों के क्रमबद्ध उच्चारण से साधक का ध्यान वर्तमान साधना पर केंद्रित करने का अभ्यास करता है।
कवच-पाठ को भय, चिंता और नकारात्मक विचारों से स्वयं को मानसिक रूप से अलग करने की आध्यात्मिक प्रक्रिया के रूप में अपनाया जा सकता है।
प्रतिदिन एक निश्चित समय पर पाठ करने से साधक के जीवन में नियमितता और आध्यात्मिक अनुशासन विकसित होता है।
कवच के श्लोक साधक को अपने उद्देश्य, संकल्प और आध्यात्मिक मार्ग के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देते हैं।
कवच का प्रमुख भाव अपने चारों ओर गुरु-तत्त्व और दिव्य चेतना के संरक्षण की अनुभूति करना है। इससे साधक में सुरक्षा और स्थिरता की भावना मजबूत हो सकती है।
कर न्यास और अंग न्यास के माध्यम से साधक अपने हाथों, वाणी, मन और शरीर को साधना के लिए समर्पित करने का संकल्प करता है।
श्रद्धापूर्वक किया गया नियमित पाठ साधक के लिए ध्यान, प्रार्थना और आत्मचिंतन का माध्यम बन सकता है।
कवच का अंतिम उद्देश्य केवल बाहरी सुरक्षा की कामना नहीं, बल्कि साधक को अपने भीतर स्थित चेतना, अनुशासन, विवेक और गुरु-तत्त्व की ओर उन्मुख करना भी है।
यदि कोई साधक इसे दैनिक आध्यात्मिक अभ्यास के रूप में करना चाहता है, तो सामान्य रूप से यह क्रम रखा जा सकता है:
स्नान या शुद्धि → शांत स्थान पर आसन → गुरु स्मरण → दीप/धूप → विनियोग → कर न्यास → अंग न्यास → श्री निखिलेश्वरानंद कवचम् का पाठ → गुरु प्रार्थना → समर्पण।
पाठ के समय जल्दबाजी न करें। मंत्रों का उच्चारण स्पष्ट रखें और मन को श्लोकों के अर्थ तथा गुरु-तत्त्व के चिंतन में लगाने का प्रयास करें।
कवच केवल शब्दों का पाठ नहीं, बल्कि श्रद्धा, संकल्प, आत्मअनुशासन और गुरु-समर्पण की साधना है।
जब साधक नियमित रूप से कवच का पाठ करता है, तो उसका उद्देश्य केवल बाहरी बाधाओं से सुरक्षा की कामना करना नहीं होना चाहिए। इसके साथ अपने विचारों को शुद्ध करना, वाणी को संयमित करना, कर्मों को सात्त्विक बनाना और जीवन में धर्म, साधना तथा सदाचार को स्थान देना भी आवश्यक है।
श्री निखिलेश्वरानंद कवचम् का पाठ गुरु-चरणों में श्रद्धा, साधना में स्थिरता और जीवन में सकारात्मक चेतना के लिए समर्पित किया जा सकता है।
ॐ श्री गुरुदेवाय नमः।
जय गुरुदेव।
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