"मैं कई वर्षों से साधना कर रहा हूँ, पर आज तक एक छोटा सा अनुभव भी नहीं हुआ..."
यह शिकायत आज के लगभग हर दूसरे साधक की जुबान पर है। लोग वर्षों तक माला फेरते हैं, आसन बदलते हैं, अनुष्ठान करते हैं, फिर भी हाथ खाली रह जाते हैं। लेकिन इस शिकायत के पीछे ईमानदारी कम और आत्म-वंचना अधिक है। इस विलाप में आत्म-निरीक्षण का सर्वथा अभाव है। साधक यह तो देखता है कि उसने कितने जप किए, पर यह कभी नहीं देखता कि जप करते समय उसकी चेतना का स्तर क्या था।
तंत्र और अध्यात्म के मार्ग में सफलता केवल 'क्रिया' से नहीं, बल्कि 'पात्रता' और 'समर्पण' से मिलती है। आइए, साधना में होने वाली इस विफलता के मूल कारणों और उनके शास्त्रीय रहस्यों का गहराई से विश्लेषण करें।
1. पात्र दोष बनाम गुरु दोष: ऊर्जा के ग्रहण का विज्ञान
परम पूज्य गुरुदेव डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली जी (स्वामी निखिलेश्वरानंद) का यह वचन प्रत्येक साधक के लिए एक दर्पण के समान है:
"मैं तुममें सिद्धि के बीज डालने का निरंतर प्रयास करता हूँ, पर तुम्हारे भीतर के धोखे, कपट, व्यभिचार और षड्-रिपुओं के कारण वह बीज तुम्हारी चेतना में स्थापित हुए बिना वापस मेरे पास लौट आता है। उनके पास अनंत तपो-राशि है। आप कितना भी ले जाएं, वह घटती नहीं। समस्या गुरु में नहीं, तुम्हारे पात्र में है।"
समुद्र सामने लहरा रहा है, साक्षात् पतित-पावनी गंगा सामने प्रवाहित हो रही है, परंतु यदि आपके हाथ में छेद वाला बर्तन (फूटा हुआ घड़ा) है, तो आप उससे कितना जल भर पाएंगे? पात्र की मरम्मत किए बिना समुद्र की गहराई या गंगा की पवित्रता पर संदेह करना मूर्खता की पराकाष्ठा है।
तात्विक विस्तार (षड्-रिपु और अंतःकरण की शुद्धि): भारतीय साधना पद्धति में मन के छह शत्रुओं को 'षड्-रिपु' कहा गया है-काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद (अहंकार), और मत्सर (ईर्ष्या)। जब कोई सद्गुरु दीक्षा या शक्तिपात के माध्यम से अपनी तपो-ऊर्जा शिष्य में प्रवाहित करता है, तो उस उच्च-आवृत्ति (High-Frequency) वाली आध्यात्मिक ऊर्जा को धारण करने के लिए शिष्य के मूलाधार और स्वाधिष्ठान चक्र में स्थिरता तथा अंतःकरण में पवित्रता होनी आवश्यक है।
यदि मन में कपट है, तो ऊर्जा ग्रंथियों में अवरुद्ध हो जाती है।
यदि आचरण में व्यभिचार (इंद्रियों का असंयम) है, तो प्राण-ऊर्जा ऊर्ध्वगामी (ऊपर उठने) होने के बजाय अधोगामी होकर नष्ट हो जाती है।
बिना यम और नियम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान) का पालन किए सिद्धि की कामना करना, बिना नींव के महल खड़ा करने जैसा है। आज के साधक को न आचार-विचार की शुद्धि चाहिए, न नियम-संयम; उसे बस क्षण भर में चमत्कार चाहिए।
2. तारा सिद्धि का रहस्य: अहंकारयुक्त तपस्या नहीं, अनन्य गुरु-निष्ठा
तंत्र के क्षेत्र में महाविद्या तारा की साधना अत्यंत उग्र और शीघ्र फलदायी मानी गई है, परंतु इसका मूल सूत्र 'तप' से अधिक 'समर्पण' में छिपा है।
यहाँ पूज्य स्वामी निखिलेश्वरानंद गुरुदेव के साधनात्मक जीवन का प्रसंग एक महान पाठ है। तारा सिद्धि के लिए निरंतर कठोर प्रयासों के बाद भी जब अपेक्षित सफलता नहीं मिली, तब दिल्ली स्थित गुरु निवास पर कुछ अनुभवी संन्यासियों ने उन्हें एक अमोघ सूत्र दिया-"अलग से देवी को मत खोजो, अपने गुरु में ही तारा को देखो।" जिस क्षण उनकी दृष्टि बदली और उन्होंने गुरु-तत्व में ही इष्ट-तत्व का विलय कर दिया, उसी क्षण उन्हें भगवती तारा की सिद्धि प्राप्त हो गई।
पौराणिक एवं तांत्रिक प्रमाण: शास्त्रों में महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र का उदाहरण आता है। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने हजारों वर्षों तक वैदिक रीति से कठोर तपस्या की, किंतु भगवती तारा प्रसन्न नहीं हुईं। अंततः जब उन्होंने 'चीनाचार' (तांत्रिक रहस्य मार्ग) और गुरु-कृपा के सूत्र को अपनाया, तब उन्हें सिद्धि मिली। वहीं विश्वामित्र तंत्र के इस सूक्ष्म रहस्य के ज्ञाता थे, इसलिए अल्पकाल में ही सिद्धि के अधिकारी बन गए।
"ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम्। मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा॥"
रहस्य क्या है? - गुरु ही प्रत्यक्ष देवता हैं। देवी-देवता सूक्ष्म जगत में हैं, हमारी चर्म-चक्षुओं से परे हैं। लेकिन सद्गुरु उस परम तत्व का साकार, जीवंत और स्पंदित रूप हैं। महर्षि वशिष्ठ ने प्रारंभ में अपने 'तपोबल' पर भरोसा किया, जिसमें सूक्ष्म रूप से 'मैं तप कर रहा हूँ' का कर्ता-भाव (अहंकार) जुड़ा होता है। जबकि तंत्र मार्ग कहता है कि अपने 'मैं' को गुरु के चरणों में शून्य कर दो। आज का साधक अपने जप की संख्या और अपने अहंकार पर भरोसा कर रहा है, गुरु की कृपा पर नहीं।
3. आधुनिक साधक के लक्षण: 'घुंघची' (रत्ती) जैसा दोहरा चरित्र
आज के समय में यदि सौभाग्य से कोई समर्थ गुरु मिल भी जाए, तो साधक को उस दिव्य सान्निध्य का लाभ उठाना नहीं आता। आज के साधकों में तीन प्रमुख दोष देखे जाते हैं:
सामने विनय, पीछे गुरु-निंदा (घुंघची वृत्ति): 'घुंघची' (गुंजा या रत्ती का बीज) बाहर से अत्यंत सुंदर और लाल दिखाई देती है, परंतु उसका मुंह काला होता है और भीतर भीषण विष भरा होता है। आज के कई साधक गुरु के सामने तो साष्टांग दंडवत करते हैं, मीठे वचन बोलते हैं, परंतु आश्रम या गुरु-कक्ष से बाहर निकलते ही गुरु के कार्यों, उनकी जीवनशैली या उनके निर्णयों की आलोचना करने लगते हैं। शास्त्रों में 'गुरु-निंदा' को आध्यात्मिक आत्महत्या कहा गया है। जिस जीभ से गुरु की निंदा की जाए, उस जीभ से जपा गया करोड़ों मंत्र भी निष्फल हो जाता है।
गुरुओं की शॉपिंग (आध्यात्मिक भटकाव): आज का साधक एक कुएं को सौ फीट खोदने के बजाय, दस जगह दस-दस फीट गड्ढे खोदता है और फिर शिकायत करता है कि पानी नहीं निकला। कभी इस आश्रम में, कभी उस बाबा के पास, तो कभी किसी तांत्रिक के पास-यहाँ-वहाँ भटककर वे हर जगह से भिन्न-भिन्न और कई बार दूषित/नकारात्मक ऊर्जाएं (प्रारब्ध का कल्मष) बटोर लाते हैं। जब विभिन्न परंपराओं और असंयमित लोगों की ऊर्जाओं का टकराव सूक्ष्म शरीर में होता है, तो साधक का प्रभामंडल (Aura) खंडित हो जाता है। ऐसे दूषित अंतःकरण में कोई भी बीज-मंत्र अंकुरित नहीं हो सकता।
अधैर्य और मिथ्या प्रलाप: थोड़ा सा ज्ञान होते ही या दो-चार दिन ध्यान में बैठते ही आज के साधक स्वयं को कोई सिद्ध पुरुष, देवदूत या अवतारी आत्मा घोषित करने लगते हैं। सोशल मीडिया पर अपनी साधना का ढिंढोरा पीटते हैं (जबकि तंत्र का प्रथम नियम है-'गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नतः' अर्थात् साधना को पूर्णतः गुप्त रखें)। यदि उन्हें 40 दिन के विधिवत पुरश्चरण का निर्देश दिया जाए, तो वे चौथे दिन ही परिणाम मांगने लगते हैं।
4. गुरु सान्निध्य की मर्यादा: भरे हुए घड़े में अमृत कैसे समाएगा?
उपनिषदों और स्मृतियों का स्पष्ट निर्देश है-"रिक्तपाणिर्न पश्येत् तु राजानं देवताम गुरुम्" (राजा, देवता और गुरु के पास कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए)।
यहाँ 'खाली हाथ न जाने' का स्थूल अर्थ है कि श्रद्धास्वरूप फल, पुष्प, समिधा या दक्षिणा लेकर जाएं, जो आपके समर्पण का प्रतीक है। परंतु इसका आध्यात्मिक और गूढ़ अर्थ कहीं अधिक गहरा है-"जब भी गुरु के पास जाओ, भरे हुए हाथ और खाली मन (निर्मल चित्त) के साथ जाओ।"
यदि आपका घड़ा पहले से ही आपके अहंकार, आपकी सांसारिक होशियारी, आपके किताबी ज्ञान और आपके कुतर्कों के गंदे पानी से लबालब भरा हुआ है, तो गुरु रूपी मेघ उसमें ज्ञान और सिद्धि का अमृत कैसे डालेंगे?
तर्क और स्पष्टीकरण की बीमारी: आज का शिष्य गुरु की सुनने नहीं जाता, बल्कि गुरु को अपनी विद्वत्ता सुनाने जाता है। गुरु कोई निर्देश दें, तो तुरंत अपना तर्क और स्पष्टीकरण (Justification) प्रस्तुत करता है। एक ही प्रश्न को घुमा-फिराकर बार-बार पूछना, गुरु की परीक्षा लेना और अंततः आलस्यवश कोई साधना न करना-यह गुरु की ऊर्जा और समय का घोर अपमान है।
अति सर्वत्र वर्जयेत्: गुरु के साथ अति प्रश्न करना, अति चतुराई दिखाना, और मानवीय धरातल पर अति घनिष्ठता (Over-familiarity) बढ़ाने का प्रयास करना-ये तीनों ही शिष्य के पतन का कारण बनते हैं। जब शिष्य गुरु को एक साधारण मनुष्य समझकर उनके साथ व्यवहार करने लगता है, तो वह उनकी दिव्यता से कट जाता है।
पर्व काल और साधना समय का अज्ञान: नवरात्रि, ग्रहण काल या महाशिवरात्रि जैसे महापर्वों पर समर्थ गुरु स्वयं जगत-कल्याण और शिष्यों के उत्थान के लिए गहन तपश्चर्या व सूक्ष्म साधनाओं में लीन रहते हैं। उस संवेदनशील समय में साधक को मौन रहकर अधिक से अधिक जप करना चाहिए ताकि वह गुरु की तपो-ऊर्जा से जुड़ सके। किंतु आज के साधक में इतनी सामान्य समझ भी नहीं है; वह ऐसे समय में भी अपनी सांसारिक इच्छाओं और समस्याओं की लंबी सूची लेकर गुरु की एकाग्रता भंग करने पहुँच जाता है। मंत्र साधना पीछे छूट जाती है और कामनाओं की फेहरिस्त आगे आ जाती है।
स्मरण रहे, गुरु का समय और ऊर्जा व्यर्थ करना अपने हाथों से अपने पाप की गठरी बाँधने जैसा है। इसे शास्त्रों में 'गुरु-दूषण' कहा गया है, जो साधक के आध्यात्मिक पतन का सबसे बड़ा कारण बनता है।
निष्कर्ष: सिद्धि का राजमार्ग
साधना में अनुभव या सिद्धि न मिलने का कारण मंत्र की शक्ति में कमी नहीं है, और न ही गुरु की सामर्थ्य में कोई अभाव है। मंत्र तो आज भी उतने ही चैतन्य हैं और गुरु-तत्व आज भी उतना ही समर्थ है। वास्तविक अवरोध आपके अपने भीतर है-आपके पात्र में छिपा कपट, आपकी वाणी में बसी गुरु-निंदा, आपका अधैर्य और आपके मन का असंयम।
यदि आप वास्तव में साधना के पथ पर दिव्य अनुभव और सिद्धि चाहते हैं, तो इन तीन सूत्रों को जीवन में उतार लें:
पात्र को साफ करें: यम-नियम, सदाचार और सत्यनिष्ठा से अपने अंतःकरण की मलिनता को धो डालें।
मन को खाली करें: गुरु के समक्ष जाते समय अपनी बुद्धि, तर्क और अहंकार की चप्पलें बाहर ही उतार कर जाएं। बालक के समान निर्मल और जिज्ञासु बनें।
गुरु में ही देवता का दर्शन करें: मंत्र के अक्षरों में, इष्ट के विग्रह में और अपने श्वास-प्रश्वास में केवल गुरु-तत्व की अनुभूति करें।
जिस दिन आपका पात्र शुद्ध हो जाएगा और समर्पण पूर्ण हो जाएगा, उस दिन आपको सिद्धि मांगनी नहीं पड़ेगी-गुरु की कृपा का महासागर स्वयं आपके भीतर उतर आएगा और बिना माँगे ही सब कुछ प्राप्त हो जाएगा।
॥ जय गुरुदेव ॥

हमने पात्रता और समर्पण के सिद्धांत को समझा; अब हम तंत्र-शास्त्र के उन सूक्ष्म नियमों, कर्म-विज्ञान और आंतरिक बाधाओं का विश्लेषण करेंगे, जिनके बिना वर्षों की साधना भी केवल एक शारीरिक व्यायाम बनकर रह जाती है।
अधिकांश साधक कहते हैं, "मैंने सवा लाख जप पूरा कर लिया, फिर भी कुछ नहीं हुआ।" यहाँ यह समझना आवश्यक है कि तंत्र में माला के मनकों की गिनती का महत्व केवल मन को बांधने के लिए है, सिद्धि केवल 'मंत्र-चैतन्य' से मिलती है।
शास्त्रों में जप के चार स्तर बताए गए हैं:
वैखरी जप: बोलकर किया जाने वाला जप (सबसे साधारण प्रभाव)।
उपांशु जप: जिसमें केवल होंठ हिलते हैं, आवाज बाहर नहीं आती (वैखरी से सौ गुना अधिक फलदायी)।
मानसिक जप: जो केवल मन और कल्पना में चलता है, जीभ और होंठ शांत रहते हैं (हजार गुना अधिक शक्तिशाली)।
अजपा जप (प्राण जप): जब मंत्र साधक की श्वास-प्रश्वास और धड़कन के साथ एकाकार हो जाता है।
कहाँ चूकता है आज का साधक? आज का साधक हाथ में माला तो घुमा रहा है, पर उसका मन व्यापार, परिवार, शत्रुओं या भविष्य की चिंताओं में भटक रहा है। इसे शास्त्र में 'मृत-जप' कहा गया है। कुलार्णव तंत्र स्पष्ट कहता है कि जब तक साधक के प्राण, मन और गुरु के दिए मंत्र में 'एकरसता' (Synchronization) नहीं आती, तब तक मंत्र के अक्षर केवल ध्वनि मात्र हैं। जब गुरु के प्रति अटूट प्रेम से हृदय द्रवित होता है, तब उसी भाव की अग्नि से मंत्र जाग्रत (चित्तीकृत) होता है।
कई बार साधक शिकायत करते हैं-"जब से मैंने अमुक साधना शुरू की है, मेरे जीवन में परेशानियाँ और बढ़ गई हैं। क्या मंत्र उल्टा पड़ गया?"
यहीं पर अज्ञानी साधक डरकर साधना छोड़ देता है या गुरु को दोष देने लगता है। जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। इसे 'प्रारब्ध-रेचन' (Karmic Detoxification) कहते हैं।
घाव की सफाई का उदाहरण: जब किसी पुराने, पके हुए घाव पर औषधि लगाई जाती है, तो प्रारंभ में जलन होती है और भीतर जमा मवाद (Pus) बाहर निकलता है। मवाद का बाहर निकलना बीमारी का बढ़ना नहीं, बल्कि ठीक होने की प्रक्रिया है।
जन्म-जन्मांतर का मैल: हमारे सूक्ष्म शरीर और चित्त पर अनंत जन्मों के पाप, वासनाएं और प्रारब्ध की परतें जमी हुई हैं। जब आप सद्गुरु द्वारा प्रदत्त किसी उच्च कोटि के तांत्रिक या वैदिक मंत्र का जप शुरू करते हैं, तो वह मंत्र भीतर जाकर उन जमी हुई गंदगियों को कुरेदकर बाहर निकालता है ताकि आपका पात्र शुद्ध हो सके।
इस प्रक्रिया में कुछ समय के लिए मानसिक उद्वेग, आर्थिक अड़चन या शारीरिक कष्ट आ सकते हैं। जो साधक इस समय धैर्य रखकर गुरु के चरणों को पकड़े रहता है, उसका कई जन्मों का भयंकर प्रारब्ध कुछ ही महीनों में कट जाता है और इसके तुरंत बाद दिव्य अनुभवों के द्वार खुल जाते हैं। परंतु कमजोर निष्ठा वाला साधक इसी मोड़ पर मैदान छोड़कर भाग जाता है।
सांसारिक अहंकार (धन, पद, रूप का घमंड) तो आसानी से दिखाई दे जाता है, लेकिन साधकों का पतन करने वाला सबसे खतरनाक शत्रु है-'सात्विक या आध्यात्मिक अहंकार'।
"मैं ब्रह्ममुहूर्त में उठता हूँ, मैं चार घंटे आसन पर बैठता हूँ, मैं लहसुन-प्याज नहीं खाता, बाकी सब लोग तो अज्ञानी और भोगी हैं"-यह भाव जैसे ही मन में आता है, साधक के चारों ओर अहंकार की एक अभेद्य दीवार खड़ी हो जाती है।
जब साधक अपनी साधना का श्रेय स्वयं लेने लगता है, तो गुरु-कृपा का प्रवाह वहीं रुक जाता है।
परम पूज्य श्रीमाली जी सदैव कहते थे कि साधक को ऐसा होना चाहिए कि यदि उसे त्रिलोक की सिद्धि भी मिल जाए, तो भी वह समाज में एक सामान्य, विनम्र मनुष्य की भांति ही रहे। अपनी साधना को पचाना सीखो। जो साधक थोड़ा सा प्रकाश दिखने पर या थोड़ी सी पूर्वाभास (Intuition) की शक्ति आने पर स्वयं को 'भगवान' या 'सिद्ध' समझने लगता है, प्रकृति उसे तुरंत नीचे गिरा देती है।
आज के 99% साधक गुरु के पास या साधना के पथ पर 'व्यापारी' बनकर आते हैं।
"गुरुजी, मैं यह अनुष्ठान करूँगा, तो मेरा यह काम तो हो जाएगा न?"
"मैंने गुरु दीक्षा ले ली, फिर भी मेरा मुकदमा क्यों नहीं सुलझा?"
यह भक्ति या साधना नहीं, बल्कि विशुद्ध सौदेबाजी (Bargaining) है। आप दस माला मंत्र जपकर परमात्मा और गुरु को रिश्वत देना चाहते हैं कि वे आपके सांसारिक काम पूरे कर दें।
तंत्र का वास्तविक उद्देश्य: तंत्र कोई जादू-टोना या केवल भौतिक इच्छाएं पूरी करने की मशीन नहीं है। 'तनोति त्रायति इति तंत्रः'-जो चेतना का विस्तार करे और बंधनों से मुक्त करे, वह तंत्र है। महाविद्याओं की साधना का उद्देश्य आपको एक क्षुद्र भिखारी से उठाकर 'शिव-स्वरूप' बनाना है। जब आप गुरु से केवल सांसारिक कंकड़-पत्थर मांगते हैं, तो गुरु को दुख होता है क्योंकि वे तो आपको पारस मणि देने बैठे हैं। जब साधक अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं की सूची को जलाकर केवल 'गुरु-प्रसन्नता' के लिए साधना करता है, तब प्रकृति स्वयं उसकी दासी बनकर उसके सारे सांसारिक कार्य स्वतः पूर्ण कर देती है।
यदि आप वास्तव में चाहते हैं कि आपकी साधना फलीभूत हो और गुरु की तपो-ऊर्जा आपके भीतर प्रवाहित हो, तो आज ही स्वयं से ये सात प्रश्न पूछें और अपने जीवन में इन्हें लागू करें:
वाणी का संयम (मौन की साधना): क्या आप अनावश्यक प्रलाप, परनिंदा और विशेषकर अन्य साधकों या गुरु की चर्चा करने से बचते हैं? बिना वाणी के संयम के मंत्र में तेज नहीं आता।
दृष्टि और आहार की शुद्धि: आप अपनी आँखों और कानों से दिन भर क्या ग्रहण कर रहे हैं? यदि दिन में घंटों मोबाइल पर अश्लीलता, हिंसा और व्यर्थ के विवाद देख रहे हैं, तो रात्रि में एक घंटे की साधना में एकाग्रता कैसे आएगी?
गोपनीयता का व्रत: अपने आसन, अपनी माला, अपने गुरु-मंत्र और साधना में होने वाले सूक्ष्म अनुभवों को कभी किसी के साथ (यहाँ तक कि परिवार या मित्रों के साथ भी) साझा न करें। अनुभव बताना ऊर्जा के घड़े में छेद करने जैसा है।
आज्ञापालन में तत्परता: गुरु ने जो कहा, उसमें 'क्यों' और 'कैसे' का तर्क लगाए बिना उसे अक्षरशः करना। शिष्य का दिमाग गुरु के चरणों में होता है, कंधों के ऊपर नहीं।
ब्रह्मचर्य और प्राण-संरक्षण: केवल शारीरिक ही नहीं, मानसिक ब्रह्मचर्य का पालन। जिस साधक का वीर्य (ऊर्जा/ओज) सुरक्षित नहीं है, वह उच्च कोटि की महाविद्याओं या उग्र तांत्रिक साधनाओं के तेज को सहन नहीं कर सकता।
निरंतरता (सातत्य): चार दिन जोश में दस घंटे जप करना और फिर दस दिन तक आसन को प्रणाम भी न करना-यह साधना नहीं है। भले ही नित्य पाँच माला करें, पर समय, स्थान और संख्या का नियम कभी न टूटे।
अहं का विसर्जन: आसन से उठते समय प्रतिदिन यह भाव रखें-"हे गुरुदेव! न मैं जप करना जानता हूँ, न ध्यान। यह शरीर भी आपका है, यह वाणी भी आपकी है और यह मंत्र भी आपका है। मैंने जो कुछ भी टूटा-फूटा जप किया, वह आपके चरणों में समर्पित है।"
साधना कोई बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि भीतर की एक मौन क्रांति है। जब तक आप 'साधक' का चोला पहनकर अपने भीतर के चोर, कपटी और अहंकारी मनुष्य को बचाए रखेंगे, तब तक करोड़ों मंत्र जपने पर भी अन्धकार ही हाथ लगेगा।
जिस क्षण आप अपनी होशियारी छोड़कर, अपने दोषों को स्वीकार कर, निष्कपट भाव से गुरु के चरणों में टूटकर बिखर जाएंगे-उसी क्षण गुरु की कृपा आपको समेट लेगी। तब आपको अनुभवों के पीछे भागना नहीं पड़ेगा, स्वयं सिद्धियाँ आपके द्वार पर हाथ जोड़कर खड़ी होंगी।
पात्र बनो, पवित्र बनो, और गुरुमय हो जाओ-यही सिद्धि का एकमात्र सनातन रहस्य है।
॥ स्वामी निखिलेश्वरानंद जय गुरुदेव ॥