अध्यात्मिक चिकित्सा से उपचार Adhyatmik Chikitsa se upchar
मंत्र तंत्र यन्त्र विज्ञानं विश्वविधालय कॉपी राईट
अध्यात्मिक चिकित्सा से उपचार
भारत या सभी देशो में करोड़ो लोग बिमारिओ से परेसान हो के कस्ट पाते है . एलोपेथ में इलाज तो है पर पूरी तरह से नहीं संभव है | है पर प्राम्भिक स्टेज पर तो उपचार एलोपेथ में विमरियाओ का रोक थम कर पाते है पूरी तरह से नहीं |
बीमारियों के कारण
चिन्ता, क्रोध, लोभ, उत्तेजना और तनाव शरीर के अंगों एवं नाड़ियो मे हलचल पैदा करते देते हैं, जिससे रक्त धमनियों मे कई प्रकार के विकार उत्पन्न हो जाते हैं। शारीरिक रोग इन्ही विकृतियों के परिणाम हैं। शारीरिक रोग मानसिक रोगों से प्रभावित होते है। अध्यात्मिक चिकित्सा से बीमारी के कारण को जड़ मूल से नष्ट करती हैं, स्वास्थ्य स्तर को उठाती है, बीमारी के लक्षणों को दबाती नहीं हैं। अध्यात्मिक चिकित्सा के द्वारा मानसिक भावनाओं का संतुलन होता है और शारीरिक तनाव, बैचेनी व दर्द से १००% छुटकारा मिलता जाता हैं।
अध्यात्मिक चिकित्सा से किसी भी प्रकार का गठिया, दमा, कैंसर, रक्तचाप, पक्षाघात, अल्सर, एसिडिटी, पथरी, बवासीर, मधुमेह, अनिद्रा, मोटापा, गुर्दे के रोग, आंखों के रोग , स्त्री रोग, बाँझपन, शक्तिन्यूनता और पागलपन तक दूर करने मे समर्थ १००% है।
अध्यात्मिक विमरिया में इलाज
जेसे ग्रहों की दशा सही न होने से होने वाले नुकसान
भुत ,प्रेत ,जिन्न , से उपरी बंधा से होने वाले नुकसान
साधना में सफलता न मिलना
घर में हमेशा कलह रहना
पति पत्नी में मतभेद का होना
इच्छा पूर्ति
दुर्घटना से मृत्यु योग
अकाल मृत्यु योग
मृत्यु योग
तंत्र बांधा से ग्रषित होना
घर में अशांति होना ,मन न लगाना
बच्चो की बुरी आदत से परेसान होना
बच्चो का स्टडी में मन न लगाना
घर में सकारात्मक उर्जा न होना
प्रेम में धोखा खा कर आत्मविश्वास का खोना
बिज़नस में होने वाले नुकसान से परेसान हो के आत्मविश्वास का खोना
शारीरिक रोग इन्ही विकृतियों के परिणाम हैं । शारीरिक रोग मानसिक रोगों से प्रभावित होते है । अत्याधिक चिंता , निराशा , आत्म ग्लानी , उदासीनता , जरुरत से ज्यादा खुश दिखना , बहुत बोलना या एक दम चुप रहना , संदेह करना , आत्महत्या के प्रयास बीमारी के लक्षण है । बीमारी एक दिन मे अचानक नहीं आती हैं । हम पहले कि वर्ष तक अपने अंदर अपनी गलत आदतों से , आहार - विहार की भूलो से बीमारी को तयार करते रहते है । तब बीमारी चिह्नों { symptoms} के रूप मे प्रकट हो कर हमे बताती है कि शरीर मे बैचेनी { dis - ease } हैं ।
मंत्र तंत्र यन्त्र विज्ञानं विश्वविधालय में साधको को उर्जा का विनमय प्रयोग समझा कर साधना अगर साधक करता है तो साधक के सभी चक्र या शक्तिकेन्द्र स्व गतिशील हो जाते हैं। उसे किसी अतिरिक्त विधि की आवश्यकता नहीं पड़ती। चक्रों के सम्बन्ध में यहाँ एक बात जान लेना चाहिए| गुरु के अनुसार साधना करने पर ही उसे सफलता के साथ खुद भी समर्थ बन पता है |
नोट : ये मेरा व्यकिगत अनुभव है कि कई स्थानों से चिकित्सा से निराश रोगी ही अध्यात्मिक चिकित्सा मंत्र तंत्र उपचारक के पास आते हैं इसलिये रोगी को अध्यात्मिक चिकित्सा मंत्र तंत्र से तुरंत पूरा लाभ नहीं होता है और रोग ठीक होने मे ज्यादा समय लेता हैं । दूसरा कारण ये है की अध्यात्मिक उर्जा पर विस्वास का न होना भी पाया जाता है | बिना श्रधा और विस्वास के इलाज संभव नहीं है ?
हम से परामर्श के लिए संपर्क कर सकते है उपचार १००% संभव है
बात करने का समय रविवार सुबह १० बजे रात ८ बजे तक :
9313444700