गुरुपूजन की साबर पद्धति का विकास ही इसलिए हुआ था ताकि लोगों को संस्कृत जैसी कठिन भाषा का साधनात्मक क्षेत्र में प्रयोग न करना पड़े। गुरु गोरखनाथ के समय साबर पद्धति का विकास अपने चरम तक हुआ है । कारण भी था, क्योंकि साबर मंत्र बोलचाल की भाषा में ही लिखे गये हैं । भले ही इन शब्दों का तार्किक अर्थ न निकलता हो, लेकिन ये होते बहुत ही प्रभावशाली हैं ।
गुरुपूजन चाहे जिस भी विधि से किया जाए, सबका प्रभाव एक समान ही होता है । परंतु प्रत्येक साधक या साधिका की अपनी एक मनोभूमि होती है और उसी के अनुसार वह विधि का चयन करता है । इसी क्रम में इस पद्धति को भी सबके समक्ष रखा जा रहा है ताकि इस बात का अहसास किया जा सके कि सदगुरुदेव ने एक ही कार्य को कितने अलग अलग तरीके से करना सिखाया है ।
ये साबर गुरु पूजन है और ये विशिष्ट इसलिए भी है क्योकि इस साधना में हमारे सदगुरुदेव, दादागुरुदेव तथा सिद्धाश्रम, नवनाथों और, योगियों का पूजन हो जाता है जो कि सोने पर सुहागा है ।
मानसिक स्मरण सर्व प्रथम सुबह (या जिस भी समय पूजन करना हो) अपने परम पूज्य सदगुरुदेव का मानसिक स्मरण करें-
देह रक्षा:- इस मंत्र को 7 बार पढ़कर जल अभिमंत्रित करें और उस जल से अपने चारों ओर एक गोल घेरा खींच दें –
रक्षामंत्र: – ॐ नमो आदेश गुरु को, वज्र वज्री वज्र किवाड़, वज्री में बाँधा दसों द्वार को घाले, उलट वेद वाही को खात, पहली चौकी गणपति की, दूजी चौकी हनुमंत जी की, तीजी चौकी भैरों की, चौथी चौकी राय की,
रक्षा करने को श्रीनृसिंहदेव जी आवे, शब्द साँचा पिण्ड काचा फुरो मंत्र ईश्वरी वाचा, सत्य नाथ आदेश गुरु का।।
पंचोपचार पूजन अब सदगुरुदेव का विधिवत पंचोपचार पूजन करें-
आसनः पर कुछ पुष्प चढ़ाते हुए श्री गुरु चरणेभ्यो नमः आसनं समर्पयामि।
स्नान-जल चढ़ाते हुए श्री गुरु चरणेभ्यो नमः स्नानं समर्पयामि।
गंध-चंदन चढ़ाएं श्री गुरु चरणेभ्यो नमः गंधं समर्पयामि।
अक्षत–श्री गुरु चरणेभ्यो नमः अक्षतान् समर्पयामि।
पुष्प–श्री गुरु चरणेभ्यो नमः पुष्प मालां समर्पयामि नमः।
पाद (चरण) पूजन- निम्न मंत्रों से सद्गुरुदेव के चरणों मे चावल चढ़ाएं –
नैवेद्य श्री गुरु चरणेभ्यो नमः नैवेद्यं निवेदयामि।
नीराजन (आरती) श्री गुरु चरणेभ्यो नमः नीराजनं समर्पयामि।
मूल मंत्र अब निम्न मूल मंत्र की 21 बार जप करें। ये मंत्र अत्यधिक चैतन्य और उष्ण (गर्म) है अतः इसे 21-बार पढ़ना ही बहुत है, अधिक पढ़ने की कोशिश न करें।
।। टारन भ्रम अघन की सेना, सतगुरु मुकुति पदारथ देना ठाकत द्रुगदा निरमल करणम,डार सुधामुख आपदा हरणम ढ़ावत द्वैव हन्हेरी मन की, णासत गुरु भ्रमता सब मन की या कीरीया को सोऊ पिछाना, अद्वैत अखंड आपको माना रम रहया सब मे पुरुष अलेखम, आद अपार अनाद अभेखम डा डा मिति आतम दरसाना, प्रकट के ज्ञान जो तब माना लवलीन भये आदम पद ऐसे, ज्यूं जल जले भेद कहूं कैसे वासुदेव बिन और कोन, नानक ओम सोऽहं आतम सोऽहं ।।
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