प्रिय गुरु भाइयों, आज मैं आप लोगों के साथ अपने जीवन का एक अनमोल अनुभव बांटना चाहता हूँ.
बात अक्टूबर २००१ की है| जैसा की मैंने अपने पिछले लेख में बताया की मुझे अप्सरा साधना करने की बहुत ललक थी | अगर गुरु साधना के बाद मुझे कोई और साधना अच्छी लगती थी तो वो कामख्या साधना और अप्सरा साधना ही है| वैसे भी सदगुरुदेव ने खुद ही कहा है की महाविद्या साधना से भी महतवपूर्ण कोई साधना है तो वो है अप्सरा साधना |
मैंने बहुत प्रयासों के बाद आखिरकार मन बना लिया अप्सरा साधना करने का | जब अप्सरा साधना करने की बात आई तो सबसे पहला प्रशन था की कौन सी अप्सरा साधना करनी है| मैंने तो ३५ अप्सरा सधानायों का संकलन किया था | तो मैंने सोचा अगर किसी अप्सरा को अपनी प्रेमिका बनाना है तो क्यों नहीं उर्वशी अप्सरा को ही बनाया जाय, क्योंकि वो अप्सरायों में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है| तो इस प्रशन का तो हल मिल गया | अब उर्वशी साधना की ही कितनी विधि है, तो फिर दूसरा प्रशन मेरे सामने आया की किस विधि से मैं करूं मेरी उर्वशी की उपासना |
यूँ तो लोग हमेशा सरल साधना मांगते हैं पर फिर मैंने सोचा की अगर अपनी उर्वशी को रिझाना है तो मैं सबसे कठिन विधि से ही साधना करूंगा, ताकि उसे भी पता चले की मैं उससे कितना प्रेम करता हूँ और उसे प्राप्त करना चाहता हूँ | तो मैंने मेरे प्रिय सदगुरुदेव भगवान् की किताब " अप्सरा साधना " से विश्वामित्र प्रणित उर्वशी अप्सरा साधना करने की ठानी | यह साधना " उर्वशी के साथ तीन दिन वाली लेख के अंत में सदगुरुदेव जी ने लिखा है |
अब मैं कुछ ऐसा करना चाहता था जिससे मुझे साधना में पूर्ण सफलता प्राप्त हो ही| साथ ही जबसे मैंने उर्वशी साधना करने का मानस बनाया तभी से मैं ऐसा व्यवहार करने लगा जैसे की उर्वशी मुझे सिद्ध हो ही चुकी है | ऐसा मानस साधना के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है, जबकि हम में से अधिकतर ये सोचते हैं की साधना सिद्ध होगी भी की नहीं | तो मैंने एक क्रम निर्धारित किया पूर्ण सफलता के लिए| और मैं ये सब सिर्फ जैसा मेरा मन सदगुरुदेव की प्रेरणा से कह रहा था वैसा ही कर रहा था | तो मैंने सर्व प्रथम ब्रह्माण्ड गुरु साधना किया २१ दिनों तक और हर दिन सदगुरुदेव की गुरु पादुका पूजन करता था पूर्ण विधि विधान के साथ षोडशओपचार पूजन | इसके बाद मैंने गुरु मन्त्र का सवा लाख अनुष्ठान किया, इस संकल्प के साथ की मुझे इस उर्वशी साधना में पूर्ण सिद्धि मिले और मैं अप्सरा को देख सकूं | फिर मैंने मानस में सोचा की मुझे महाविद्या की भी आशीर्वाद चाहिए तो मैंने भुवनेश्वरी साधना करने की सोची | मैं इतना सब कुछ इस लिए कर रहा था क्योंकि मुझे भी सधानायों में बहुत साधकों की तरह अनुभूति बहुत कम होती थी या बिलकुल नहीं होती थी | इस लिए मैं १९८७ से लेकर तब तक की सारी मंत्र तंत्र यन्त्र पत्रिका घंटों तक देखता रहता था की कोई तो ऐसी विधि मिले जिससे मुझे पूर्णता प्राप्त हो | एक बार यूंही पढ़ते पढ़ते आखं लग गयी और तब मुझे सदगुरुदेव ने एक बात कही और मैं जाग गया, फिर मुझे मेरा मार्ग दिखने लगा | उन्होंने मुझे क्या कहा ये बहुत ही व्यक्तिगत है और यहाँ अगर बतायूं तो लोग सोचेंगे ये मेरा दम्भ है | खैर मेरे पास भुवनेश्वरी साधना की सामग्री नहीं थी और नवरात्रि पास ही था मैं सोचा नवरात्रि में मैं भुवनेश्वरी साधना कर लूँगा | पर अब सामग्री मंगाने का समय बहुत कम था खैर मैंने आर्डर दे डाली | फिर मैंने गुरुदेव का एक लेख पढ़ा जिसमें कहा था की स्वामी विवेकानंद को भी बहुत साधना करने के बाद अनुभूति नहीं होती थी तो उन्होंने रामकृष्ण परमहंस जी से चैतन्य सिद्धि दीक्षा प्राप्त किया था और चैतन्य सिद्धि साधना संपन्न किया | तो मैंने भी उस साधना की सामग्री आर्डर दे डाली |
अब नवरात्रि प्रारंभ हो गया था, प्रतिपदा था सुबह था, सोचा था की आज से भुवनेश्वरी साधना करूंगा पर यन्त्र माला नहीं आया था तो थोडा मायूस हो गया था | दोपहर का समय था, खाना खा रहा था तभी मेरा दरवाज़ा खटखटाया| मैंने दरवाज़ा खोला तो एक व्यक्ति खड़ा था हाथ में सामग्री का बॉक्स ले कर. उसके पास न कोई वाहन था, न कोई झोला या दूसरी सामग्री, मुझे उन्होंने बॉक्स पकड़ा कर कहा की ये आपके लिए है, मैंने कहा की आपको तो वि पि पि के पैसे देने होंगे, रुकिय मैं लाता हूँ तो उन्होंने कहा की नहीं इसके पैसे मिल चुके हैं, और फिर मैंने बहुत आश्चर्य के साथ देखा, क्योंकि इससे पहले मैं कितने सामग्री मंगा चूका था जोधपुर से पर वे VPP से आते थे जिसकी सूचना पोस्टमैन हमारे घर पर दे कर जाता था और हम दुसरे दिन पोस्ट ऑफिस जा कर पैसे दे कर VPP ले लेते थे | पर ऐसा पहली बार हुआ था, और उस बॉक्स में एक बार कोड था जिससे पता चलता था की ये कूरियर के ज़रिये भेज गया है | खैर मैं बेहद प्रशन हो गया और उस व्यकि को कुछ टिप दे दिया जो उसने सहर्ष ले ले लिया | आज जब मैं पलट कर उस पल, उस दिन को देखता हूँ तो लगता है की वो सद्गुर्देव ही थे अन्यथा जो उस दिन हवा उसे समझना संभव नहीं है | मैंने अब दूगुने उत्साह के साथ तो पहले भुवनेश्वरी साधना की और फिर " चैतन्य सिद्धि साधना " सम्पन्न किया | इस साधना के फलस्वरूप मुझे सदगुरुदेव ने आकाशवाणी के माध्यम से उर्वशी साधना करने की आज्ञा और सिद्धि प्राप्त करने का रहष्य और आशीर्वाद प्रदान कर दिया, और आगे की साधना में भी आकाशवाणी के माध्यम से ही मुझे मार्ग दर्शन प्रदान करते रहे |
आप सभी के लिए मैं उस " चैतन्य सिद्धि साधना " की विधि यहाँ लिख रहा हूँ जिससे मेरा जीवन पलट गया |
चैतन्य सिद्धि ( महाकाल संहिता )
आश्विन त्रयोदशी को गुरु सिद्धि दिवस होता है | यह साधना इस दिवस को की जानी चाहिए या फिर आप इसे २१ तारिक को कर सकते हैं या फिर पूर्णिमा को | इसके लिए गुरु सिद्धि दिवस को साधक सुबह स्नान कर के अपने पूजा स्थान में बैठ जाय और सामने लकड़ी के बाजोट पर गणपति की स्थापना कर दे और संक्षिप्त गणपति पूजन करे |
इसके बाद सामने एक दूसरा लकड़ी का बाजोट बिछा कर उस पर ताम्र पत्र पर अंकित " गुरु चैतन्य यन्त्र " स्थापन करे, यह यन्त्र महाकाल संहिता के अनुसार तीन प्रकार के गुणों से विभूषित हो | महाकाल संहिता के अनुसार संसार का सर्व श्रेष्ठ " गुरु चैतन्य यन्त्र " होता है जो ताम्र पत्र में अंकित होता है | ताम्र पत्र पर अंकित होने का विधान इस लिए बताया है की उसमें प्राण तत्त्व का आवाहन किया जाता है और जब साधक उस ताम्र पत्र में गुरु प्रगटीकरण की भावना दे , तो उसे स्नान करा सके और अपनी अन्य भावना अनुसार पूजा कर सके |
फिर यह यन्त्र योगिनी तंत्र के अनुसार मंत्र सिद्ध प्राण प्रठिस्तित हो | तीसरा इस यन्त्र की विसेषता यह है , की यह साधक के नाम से अभिषित और ऐद्ध हो, जिससे की साधक के प्राणों के साथ उसका संपर्क हो सके |
साधना में इस यन्त्र को लकड़ी के बाजोट पर पीला वस्त्र बिछा कर उस पर गुलाब के फूलों पर स्थापित करे भव्यता के साथ | फिर उसकी पूजा " ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः ||" मंत्र का उच्चारण करते हुवे , जल , ढूध . दही , घी , शहद , शक्कर और पुनः जल से स्नान करा कर पोंछ कर उसी बाजोट पर स्थापित कर दे | और फिर उपरोक्त मंत्र का उच्चारण करते हुवे केसर का तिलक करें और पुष्प समर्पित करते हुवे पुष्प हार पहनाये और सुध घी का दीपक जलाए |
उसके बाद योगिनी तंत्र में दिए हुए निम्न गुरु महात्म्य का पांच बार पाठ करें |
श्री गुरु महात्म्य
आदि नाथो महादेवी ! महा-काली हि यः स्मृतः | गुरु: स एव देवेशि ! स्रव मन्त्रे धुना पर:|| शैवे शाक्ते वैशनवे च , गाणपत्ये तथैन्दवे | महा - शैवे चं सौरे च, स गुरु नात्र सशय: || मंत्र देवता स एव स्याननापरः परमेश्वरी | मंत्र प्रदान काले हि, मानुषो नग-नंदिनी: || अधिष्ठानं भवेत् तस्य , महा-कालस्य शांकरी | देवी ! ह्यमानुशी चेय, गुरुता नात्र सशय:|| मंत्र दाता शिरः पध्मे: यद ध्यानं कुरुते गुरु: | तद ध्यान कुरुते देवी ! शिष्योपि शीष पंकजे || अतएव महेशा नि ! एक एव गुरु: स्मृत: | अधिष्ठान भवेत् तस्यामानुशस्य महेश्वरी | महात्म्यं कीर्तित येव सर्व शास्त्रेषु शान्करि||
इसके बाद साधक गुरु " दिव्या माला " से वही बैठे बैठे पहले गुरु मंत्र की एक माला और फिर गुरु चैतन्य मंत्र का जप करे | इस दिन २१ माला मंत्र करना है | यन्त्र पर त्राटक करते हुए पूर्ण भावना के साथ यः अत्यंत दुर्लभ मंत्र का जप करना है |
इसके बाद साधक वो माला धारण कर ले और गुरु आरती करें | अदितव्य चैतन्य माला को पूजा स्थान पर नित्य धुप दीप दीखाएं|
उसके बाद किसी भी दिन जा कर सदगुरुदेव के सदेह आशीर्वाद प्राप्त करें | मेरे अनुभव के अनुशर यदि इस साधना को गुरु पादुका पूजन और ब्रह्मंडा गुरु साधना के साथ समलित कर लिया जाये तो और भी अच्छा है और बहुत जल्द ही सरे अनुभूतियाँ मिलने लगती है !
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