चौर-गणपति
साधना काल में आपने अनुभव किया होगा कि यदा-कदा जम्हाई, आलस्य अथवा छींक आदि आती हैं। ऐसा चौर-गणाधिपों के कारण होता है। हमारे शरीर में जो कुण्डलिनी कमल है, अर्थात् जो-जो चक्र का स्थान है, वहां पर पचास गण देवताओं के ज्योतिस्वरूप जो मुनिगण हैं, वे जम्हाई लिया करते हैं और चक्र के कमलदलों में स्थित होकर हमारे द्वारा किये गये जप का तेज हर लेते हैं। इन्हें चौर गणाधिप भी कहा जाता है। जहां-जहां भी कोई जप-तप जैसा कार्य होता है, वहां ये गणाधिप उपस्थित रहते हैं। अतः इनकी तृप्ति एवं प्रसन्नता हेतु चौर मन्त्र का जप अवश्य ही करना चाहिए। इन मन्त्रों के बिना की गयी पूजा से दोष उत्पन्न होता है और साधक द्वारा किये गये जपादि कार्य निष्फल हो जाते हैं, क्योंकि जप के तेज को स्वयं गणपति हर लेते हैं। इसलिए इन मन्त्रों का जप करना आवश्यक है। नीचे चौर गणेश मन्त्रों का उल्लेख किया जा रहा है, जिनका जप शरीर के विभिन्न अंगों पर किया जाता है। प्रत्येक मन्त्र का दस-दस बार जप करते हुए उस स्थान पर ध्यान लगाना है, जिस स्थान का नाम मन्त्र के साथ उल्लिखित है।
1. हृदय पर-क्रों
2. दायें नेत्र पर-ह्रीं ह्रीं
3. बायें नेत्र पर- ह्रीं ह्रीं
4. दायें कान पर- ह्रीं ह्रीं
5. बायें कान पर- ह्रीं ह्रीं
6. दायीं नाक पर- हुंहुं
7. बायीं नाक पर- हुंहु
Listed Mantras in the Image:
यह जो आपने लिखा है, वह तंत्र शास्त्र और मंत्र विज्ञान में प्रयुक्त होने वाला एक अंग-न्यास या कर-न्यास (विशिष्ट मन्त्र-न्यास) की प्रक्रिया है। इसमें शरीर के अलग-अलग अंगों (जैसे हृदय, आंखें, कान, नाभि आदि) पर विशेष बीजाक्षरों (मंत्रों) का मानसिक या स्पर्श द्वारा स्थापन किया जाता है। तंत्र साधना, पूजा, या कवच पाठ से पहले शरीर को पवित्र, ऊर्जावान और सुरक्षित करने के लिए ऐसा न्यास किया जाता है। आपके द्वारा लिखे गए न्यास का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है: हृदय (Heart): क्रों (क्रौं) नेत्र (Eyes): ह्रीं ह्रीं (दोनों आँखों के लिए) कर्ण (Ears): ह्रीं ह्रीं (दोनों कानों के लिए) नासिका (Nostrils): हुं हुं / हुंहु (दोनों नासिका छिद्रों के लिए) मुख (Mouth): ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं नाभि (Navel): ऐं क्लीं गुह्य स्थान (Genitals): हसौः भ्रूमध्य (Third Eye / Between Eyebrows): हुं