√•नाम में ही सब कुछ है। नाम के अतिरिक्त है ही क्या ?

अम् रोगे । आमयति-ते ।
न+ अम (आम) = नाम।
√•इसका अर्थ है-निरोगता/स्वास्थ्य ।
नाम के प्रभाव से व्यक्ति निरोग होता है।
√•भव रोग से ग्रसित लोगों के लिये एक मात्र सरल औषधि 'नाम' है। जहाँ नाम हैं, वहाँ स्वास्थ्य है। यह अद्भुत सत्य है। कहा गया है ...
"नाम जपत भव रोग नसाही ।"
(रा. च. मा. )
√•इसलिये नाम जप की पुष्ट परम्परा चली आ रही है। श्री विष्णु सहस्रनाम साक्षात् अमृत संत कबीर कहते हैं ...
"कविरा नाम हृदे धरे, भया पाप का नास।
मानो चिनगी आग की पड़ी पुरानी घास ॥"
√•नाम की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए कवि कहता है ...
"सुख के माथे सिल परो, जो नाम हृदय से जाय।
बलिहारी वा दुःख की, पल-पल राम रटाय ।।
"बिगरी जन्म अनेक की सुधरै अब ही आजु ।
होहि राम को नाम जपु तुलसी तजि कुसमाजु॥
राम नाम तिहुँ लोक में, सकल रहा भरपूर ।
जो जाने विहि निकट है, अनजाने तिहि दूर ।"
√•सभी विद्वानों ने समस्त शास्त्रों को देखने के पश्चात् निष्कर्ष रूप में भगवन्नाम को श्रेष्ठ बताया है...
"चारों हि वेद, पुरान अठारहों
चौंसठ तन्त्र के मन विचारे।"
√•तीन से साठ (३६०) महाव्रत संयम,
"मंगल यज्ञ पुरी पर सारे ||
योग वियोग प्रयोग उपासन,
मैं करिके सब यहि निरधारे।
तीनहुँ लोकन के सगरे फल,
मैं हरिनाम के ऊपर वारे ॥"
√•हर मनुष्य का हृदय 'रामटेक' है। हृदय में राम टिकते हैं। इस हृदयस्थ राम का भजन न किया गया तो जीवन के अन्त में पछतावा ही हाथ आता है। कवि कहता है ...
"तू कछु और विचारत है नर,
तेरो विचार धरयो ही रहो गो।
कोटि उपाय किये धन के हित,
भाग लिख्यौ तितनों हि लहै गो ।
भोर कि साँझ घरी पल माँह्य लो
काल अचानक आइ गहै गो ।
राम भज्यौ न कियौ न सुकृत् कछु
सुन्दर यो पछताई व गो ॥"
√•अपने प्रारंभिक विद्यार्थी जीवन में अन्त्याक्षरी के समय में यह दोहा कहा सुना करता था...
"राम नाम की लूट है, लूट सको तो लूट |
अन्त काल पछताओगे, जब प्राण जाये गा छूट ॥"
√•गोस्वामी जी कहते हैं ...
"राम भजे गति केहि नहि पाई।"
(उत्तरकाण्ड ।)
√•हमारे पूर्वजों ने कहा है -...
"राम राम कहु बारम्बारा ।
चक्र सुदर्शन है रखवारा ॥"
√•यह चक्र सुदर्शन विष्णु का अस्त्र है। राम कहने मात्र से विष्णु इस चक्र से भक्त की रक्षा करते हैं। यह चक्र अद्भुत है। इसमें १२ अरे हैं। १२ आकृतियाँ हैं। १२ प्रधियाँ हैं।
१. "द्वादशारं नहि तज्जराय वर्वर्ति चक्रं परि द्यामृतस्य ।"
(ऋग्वेद १ । १६४ । ११)
२. "द्वादशाकृति दिव आहु ।"
(ऋग्वेद १ । १६४ । १२)
३. "द्वादश प्रथयश्चक्रमेकं त्रीणि नभ्यानि क उ तच्चिकेत ।"
(अथर्ववेद १० । ८ । ४)
√•द्वादश अरों अथवा द्वादश आकृतियों अथवा द्वादश प्रधियों वाले इस चक्र को 'सुदर्शन चक्र' कहते हैं। यह भगवान् विष्णु का अस्त है। यह संतत घूमता रहता है। इसमें जो १२ अरें हैं, वे ही १२ लग्नें हैं। प्रत्येक अर की एक विशेष आकृति होती है। इनमें से कोई भेंड़ की तरह, कोई बैल की तरह, कोई ली पुरुष के जोड़े की आकार की तरह, कोई कर्कट कीड़े की तरह, कोई सिंह के समान कोई नावस्थ कन्या के समान, कोई तुला की तरह, कोई बिच्छू की तरह, कोई धन्वी अश्व की तरह, कोई मृगमुख मकर की तरह, कोई घटयुक्त पुरुष की तरह तो कोई युगल वर्तुल मछली की तरह है। ये १२ आकृतियाँ ही १२ राशियाँ हैं। इस चक्र की परिधि के १२ टुकड़े १२ महीने है। विष्णु का यह चक्र देखने में अद्भुत और सुन्दर है। इस लिये इसे सुदर्शन चक्र कहते हैं। विष्णु सहस्रनाम में इस चक्र की विशेषताओं का वर्णन है। यह एक रूप नहीं है। 'नैकरूपः।' यह बहुत बड़ा है। अतः 'बृहद्रूपः।' यह कांतिमान् है। 'शिपिविष्टः।' 'प्रकाशनः । ' 'ओजस्तेजोद्युतिधरः ।" यह प्रकाश एवं उष्णता से युक्त है। 'प्रकाशात्मा'। 'प्रतापनः। वस्तुतः यह चक्र अवर्ण्य है। यह चक्र हमारे भीतर है। प्राण वायु के द्वारा यह चक्र चलता रहता है। इडा पिंगला, सुषुम्ना नाड़ियाँ इसका प्रकटन करती रहती हैं। चर राशियों पिंगला के माध्यम से अचर राशियाँ इडा के माध्यम से तथा द्विस्वभाव राशियाँ सुषुम्ना के माध्यम से प्रकट होती हैं। इडा नाड़ी को चन्द्रस्वर कहते हैं। इसका प्रवाह बायाँ नासिका से होता है। यह स्थायी है, अचर है। पिंगला नाडी को सूर्यस्वर कहते हैं। इसका प्रवाह दायीं नासिका से होता है। यह यायी है, चर है। जब दोनों नासिका वा नासा छिद्रों से श्वाँस चलती है तो उसे सुषुम्ना कहते हैं। यह द्विस्वभाव है, नपुंसक है।
√•१, ४, ७, १० राशियाँ चर हैं। सूर्यस्वर से इनका ज्ञान होता है । २, ५, ८, ११ राशियाँ अचर हैं। चन्द्र स्वर से इनका बोध होता है। ३, ६, ९, १२ राशियों द्विस्वभाव हैं। सुषुम्ना से इन की प्रतीति होती है।
√•ये बारहों राशियाँ हमारे शरीर में नित्य विद्यमान हैं। ये प्राणरूप हैं। किसी के लग्नादि में सन्देह हो तो अपने प्राण से उसका सुनिवारण किया जा सकता है। ऐसा में करता हूँ। इस पद्धति द्वारा लिया निर्णय अकाट्य होता है।
√•सूर्य स्वर पुरुष है। पुरुष जाति क्रियाशील रहती है। चन्द्र स्वर स्त्री है। स्त्री जाति अक्रिय रहती है।
√•बैल से हल जोता जाता है, गाड़ी खींची जाती है, गाय से नहीं। भैंसा से भी गाड़ी खींची जाती है, भैंस से नहीं। पुरुष वर्ग बाहरी कार्यों में दक्ष होता है जब कि स्त्री वर्ग घर के भीतर के कार्यों में निपुण होता है। मैथुन कर्म में भी पुरुष वर्ग सक्रिया रहता है जब कि स्त्री वर्ग स्थिर एवं अक्रिय रह कर उस में भाग लेता है।
√• सुषुम्ना स्वर नपुंसक है, चराचर है। बाल और वृद्ध वर्ग के लोग इस श्रेणी में आते हैं। ये भीतर बाहर रह कर अपनी क्रियाक्रियता दिखातें हैं। सुषुम्ना स्वर यमल राशियों (३, ६, ९, १२) का द्योतक है। पंचम भाव में ये राशियाँ होती हैं तो जुड़वाँ बच्चे पैदा होते हैं। लग्न में ये राशियाँ होती हैं तो ऐसे जातक घर में और बाहर दोनों जगह रहना पसन्द करते हैं। केवल घर में अथवा घर के बाहर रहना इन्हें पसन्द नहीं।
√••प्रत्येक स्वर में पृथ्वी, जल, वायु एवं अग्नि तत्व होते हैं। आकाश तत्व का उदय होने पर मृत्युकाल उपस्थित होता है। ३ स्वर X ४ तत्व = १२ राशियाँ। इस प्रकार स्वर के माध्यम से ठीक-ठीक राशि वा लग्नोदय का ज्ञान होता है। स्वर प्राण है। प्राण ब्रह्म है। ब्रह्म का ज्ञान होने पर सब कुछ हस्तामलकवत जाना जाता है। वे महापुरुष धन्य हैं जिन्हें इसका सम्यक् ज्ञान है। तत्वज्ञाय नमः ।