1. मन: मित्र या शत्रु? भगवद्गीता के एक श्लोक के माध्यम से बताया गया है कि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र और शत्रु है। 
2. मन की चंचलता और कठोपनिषद का रूपक मन की गति अत्यंत तीव्र है, जो क्षण भर में अतीत और भविष्य के बीच डोलती रहती है। कठोपनिषद में इसे एक सुंदर रूपक (metaphor) से समझाया गया है:
3. तंत्र और व्यवस्था (system) तंत्र का वास्तविक अर्थ 'व्यवस्था' है। लेख के अनुसार:
4. भगवान शिव और 'चन्द्रमौलीश्वर' स्वरूप भगवान शिव को तंत्र का अधिष्ठाता और 'महायोगी' माना गया है। उनके मस्तक पर चंद्रमा धारण करने का गहरा अर्थ है:
निष्कर्ष: यह लेख संदेश देता है कि आध्यात्मिक या सांसारिक सफलता के लिए मन को शांत, संतुलित और अनुशासित करना अनिवार्य है। धर्म ग्रंथों में मन की स्थिति को बहुत गहराई से समझाया गया है। भगवद् गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं
मन और तंत्र
आत्मनियंत्रण से विजय का शाश्वत मार्ग
मानव जीवन का सबसे सूक्ष्म, सबसे तीव्र और सबसे प्रभावशाली तत्व है- 'मन'। यही मन हमें ऊंचाइयों तक ले जाता है और यही मन हमें गहराइयों में भी गिरा सकता है। इसलिए भारतीय दर्शन में बार-बार यह कहा गया है 'मन के हारे हार है, मन के जीते जीत'। यह केवल एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन का परम सत्य है। किसी भी युद्ध की शुरुआत बाहर नहीं, बल्कि भीतर होती है। जब मन हार मान लेता है, तब शरीर और परिस्थितियां भी हार जाती हैं; और जब मन दृढ़ हो जाता है, तब असंभव भी संभव हो जाता है।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्युरात्मैव रिपुरात्मनः ।।
मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु है। यदि मन नियंत्रित है, तो वह हमारा सबसे बड़ा सहायक बन जाता है; और यदि अनियंत्रित है, तो वही हमारे पतन का कारण बनता है।
मन की गति संसार में सबसे अधिक तीव्र मानी गई है। एक क्षण में यह अतीत में पहुंच जाता है, दूसरे क्षण भविष्य की कल्पनाओं में खो जाता है। यह कभी स्थिर नहीं रहता, और यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती है। कठोपनिषद में मन को अश्व (घोड़े) के समान बताया गया है
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धि तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च।।
अर्थात शरीर रथ है, आत्मा रथी है, बुद्धि सारथी है और मन लगाम है। यदि लगाम (मन) सही दिशा में है, तो रथ सही मार्ग पर चलता है; अन्यथा वह भटक जाता है।
यही कारण है कि भारतीय तंत्र परंपरा में मन को नियंत्रित करना सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। तंत्र का वास्तविक अर्थ
है व्यवस्था (system)। रुद्रयामल तंत्र और अन्य तांत्रिक ग्रंथों में यह स्पष्ट कहा गया है कि कोई भी साधना तभी सफल होती है, जब साधक का मन स्थिर और नियंत्रित हो। तंत्र केवल रहस्यमय क्रियाओं का समूह नहीं है, बल्कि यह जीवन को व्यवस्थित करने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। और व्यवस्था तभी बन सकती है, जब मन शांत और संतुलित हो।
भगवान शिव को तंत्र का अधिष्ठाता माना गया है। वे केवल देवता नहीं, बल्कि योग और ध्यान के परम आचार्य हैं। उनका हर स्वरूप एक गहरा संदेश देता है, और उनमें से एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्वरूप है 'चन्द्रमोलिश्वर शिव', 'चन्द्र' का अर्थ है चंद्रमा, और 'मोलि' का अर्थ है मस्तक। अर्थात वह स्वरूप जिसमें शिव अपने मस्तक पर चंद्रमा धारण करते हैं।
चंद्रमा मन का प्रतीक है। ज्योतिष और शास्त्रों में चंद्रमा को मन का कारक माना गया है। जब शिव अपने मस्तक पर चंद्रमा धारण करते हैं, तो इसका अर्थ है कि उन्होंने अपने मन को पूर्ण रूप से नियंत्रित कर लिया है। यही कारण है कि वे 'महायोगी' कहलाते हैं। शिव पुराण में शिव के इस स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा गया है-
अर्थात वी पन्द्रशेखर (शिव) का साथ लेना है उसे मृत्यु भी नहीं दरा नाकती। मृत्यु देवर का भय के जी हमारे मन सन्निष्क को अस्थिर कर देती है, मृत्यु केवल जीवन की नहीं, बल्कि उद्देश्यों की, लक्ष्यों की, मूल्यों की, जीवन के रिश्तों की वे सभी सब समाधाने है तो जीवन की बस्थिर कर येते है और ऐसे समय लिय का सापक अस्थिर नहीं होता, वो किसी काल कोरी में खुद को कंद नहीं कर लेना बनिक पथार्थ में उनका सामना करता है।
शिव का यह स्वरूप हमें सिखाता है कि जीवन में किसी भी प्रकार की समस्या, अप या कठिनाई से पक्राने की आवश्यकता नहीं है। यदि मन नियंत्रित है, तो हर समस्या का समाधान समय है।
शिव ने समुद्र मंचन के समय निकले विषको आपने वंा में धारण कर लिया। यह केवल एक पौरासिक बना नहीं बल्कि एक गहरा प्रतीककारात्मकता, क्रोध, वेष, पीड़ा और जीवन की कदिन् शिव ने उस विष की रानौर में नहीं फैलने दिया बल्कि उसे अपने भीतर नियंकिर सजा यही आनिया का सर्वोच्च है।
नीवन में विष को कैसे संभालना है वह हमारे मन पर निर्भर करता है। यदि मन स्थिर है, तो यही विष हमें नह कर सकता है और यति मन स्थिर है, तो उस विष को भी अक्ति में परिवर्तित कर सकते हैं।
मन का निशा केवल आध्यात्मिक साधना के लिए नहीं, बल्कि दैनिक जीवन के लिए नमीलियन शिव का ध्यान और पृक्न मन को स्थिर करने का एक अत्यंत प्रभावी माध्यम है।
ततस्ततो निम्नैतदात्मन्येव व नवोर।।
जहां-जहां यह अंचल मन जाता है, वहां-वहां से उसे वटावन जामा में स्थिर करना चाहिए। यही साधना है, यही
जीवन में सफलता का एक ही मूल मंत्र 'मन पर नियमबमन निव्यक्ति अपने लक्ष्य परः कठिन सहना है, यह विचार निकलर प्रयास करता राखना है। यही निस्ता उसे सफल
नक्षत्र और मन
हम और उनकी निरंतर बनी स्थितियां मानय के अनुसार प्रत्येक और एक विशेष डायां का प्रतिनिधित्व करता है, नी समय-समय पर इमाने जीवन में विभिष परिस्थितियां उत्पण करता है। ये पर्निम्वतियां चाहे सुखद हो या यूनीतीपूर्ण सबसे पहले हमारे अन को प्रभावित करती हैं। मही केंतहां से स्थानी प्रतिक्रिया, निर्णय और जीवन की दिशा निर्धारित होती है।
जब की स्थिति प्रतिकृत होती है, नीजीवन में बाधा, असंतुस्त, तनाव और सलमानी है। ऐसे समय में व्यक्ति वा मनमा जाना है। वह गए चिंत और असमंजस में घिर जाता है।
यही मानसिक अस्थिरता वास्तविक नुकसान का कारण बनती है। वास्तव में, पटना जिनाना नुकसान नहीं करती, उससे अधिक प्रभाव हमारी मानसिक प्रतिक्रिया करनी है। यदि सन कमजोर दी, तो घोटी-सी समस्या भी बड़ी अनीत होती है और यदि मन मानको सेब करिनाई भी संभाली जा सकती है।
में मन के नियंत्रण का सर्वोच्च महत्य दिया गया है। यदि मन स्थिर और संतुलित हैनी ग्रहों के भी सीमित हो जाते हैं। परिस्थितियां मैंने ही बनी रहे, लेकिन व्यक्ति का आंतरिक संतुलन उसे है।थर बनाए रखना है। वह परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को बाल लेता है और सही निर्णय लेने में सक्षम होना है।
मानसिक स्थिरता, प्रियं और स्पष्टता का विकास होना है।
हर परिस्थिति में संतुलित गहने की अपना प्राप्त करना है। यह कि उसे बड़ी और नक्षत्र के प्रभाव से पूरी तरह मुल नहीं करती, लेकिन उनके नानात्मक प्रभाव को बाहुन सय नाथ कम कर देती है।
जीवन में घटनाएं मारली,किन उस घटनाओं पर वारी प्रतिक्रिया पूरी तरह हमारे डाथ में की है। मन को नियंकित कर लें तो कोई भी आग, कोई भी परिस्थति नहीं सकती।
संक्षेप में, यह लेख सिखाता है कि बाहरी परिस्थितियां हमारे वश में नहीं हैं, लेकिन मन की प्रतिक्रिया हमारे वश में है।