Gurudev Dr. Narayan Dutt Shrimali

guru pranaschetna mantra गुरु प्राणश्चेतना मंत्र

guru pranaschetna mantra गुरु प्राणश्चेतना मंत्र

guru pranaschetna mantra


।। ऊँ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः।। ॐ गुं गुरुर्वै नमः ॐ परम गुरुर्वै नमः ॐ परम परात्पर गुरुर्वै नमः ॐ परम पारमेष्ठि गुरुर्वै नमः ॐ नारायण नमः ॐ निखिलेश्वराय नमः ॐ सच्चिदानंदाय नमः ॐ मम आत्मने नमः ॐ सर्व आत्मने नमः ॐ परमात्मने नमः ।। ऊँ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः।।

एक ऐसा मंत्र, एक ऐसी विद्या जिसके अभ्यास मात्र से साधक में गुरु तत्व का जागरण होने लगता है । गुरु की सत्ता से साधक की चेतना जुड़ने लग जाती है और वह गुरु से संबंधित उन तथ्यों और ज्ञान को प्राप्त करने लग जाता है जो किसी भी साधना से संभव है ही नहीं ।

 
 
 
मेरा अपना अनुभव ये रहा है कि अगर साधक इस मंत्र के मात्र 1008 पाठ संपन्न कर ले, तो साधक का चेतना स्तर इतना ऊपर उठ जाता है कि वह गुरु की सूक्ष्म उपस्थिति का भी आभास कर पाता है । जो श्रेष्ठ साधक हैं वह इस मंत्र का नित्य प्रतिदिन 11 या 21 बार तो अभ्यास करते ही हैं । इस मंत्र के प्रयोग से साधक को गुरु से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष मार्गदर्शन मिलता ही है ।

 
 
 
ये हमारे जीवन का सौभाग्य है कि गुरु प्रेरणा से इस अत्यंत दुर्लभ मंत्र को आज आप सबके लिए पोस्ट किया जा रहा है । ऋषियों के इस दुर्लभ और महत्वपूर्ण ज्ञान को हमें न सिर्फ अपने जीवन में स्थान देना चाहिये बल्कि अपने स्वजनों और बच्चों को भी इस मंत्रों का अभ्यास कराना चाहिए ।

 
 
 
गुरु प्राणश्चेतना मंत्र
 
 
 
।। ॐ पूर्वाह सतां सः श्रियै दीर्घो येताः वदाम्यै स रुद्रः स ब्रह्मः स विष्णवै स चैतन्य आदित्याय रुद्रः वृषभो पूर्णाह समस्तेः मूलाधारे तु सहस्त्रारे, सहस्त्रारे तु मूलाधारे समस्त रोम प्रतिरोम चैतन्य जाग्रय उत्तिष्ठ प्राणतः दीर्घतः एत्तन्य दीर्घाम भूः लोक, भुवः लोक, स्वः लोक, मह लोक, जन लोक, तप लोक, सत्यम लोक, मम शरीरे सप्त लोक जाग्रय उत्तिष्ठ चैतन्य कुण्डलिनी सहस्त्रार जाग्रय ब्रह्म स्वरूप दर्शय दर्शय जाग्रय जाग्रय चैतन्य चैतन्य त्वं ज्ञान दृष्टिः दिव्य दृष्टिः चैतन्य दृष्टिः पूर्ण दृष्टिः ब्रह्मांड दृष्टिः लोक दृष्टिः अभिर्विह्रदये दृष्टिः त्वं पूर्ण ब्रह्म दृष्टिः प्राप्त्यर्थम, सर्वलोक गमनार्थे, सर्व लोक दर्शय, सर्व ज्ञान स्थापय, सर्व चैतन्य स्थापय, सर्वप्राण, अपान, उत्थान, स्वपान, देहपान, जठराग्नि, दावाग्नि, वड वाग्नि, सत्याग्नि, प्रणवाग्नि, ब्रह्माग्नि, इन्द्राग्नि, अकस्माताग्नि, समस्तअग्निः, मम शरीरे, सर्व पाप रोग दुःख दारिद्रय कष्टः पीडा नाशय – नाशय सर्व सुख सौभाग्य चैतन्य जाग्रय, ब्रह्मस्वरूपं स्वामी परमहंस निखिलेश्वरानंद शिष्यत्वं, स-गौरव, स-प्राण, स-चैतन्य, स-व्याघ्रतः, स-दीप्यतः, स-चंन्द्रोम, स-आदित्याय, समस्त ब्रह्मांडे विचरणे जाग्रय, समस्त ब्रह्मांडे दर्शय जाग्रय, त्वं गुरूत्वं, त्वं ब्रह्मा, त्वं विष्णु, त्वं शिवोहं, त्वं सूर्य, त्वं इन्द्र, त्वं वरुण, त्वं यक्षः, त्वं यमः, त्वं ब्रह्मांडो, ब्रह्मांडोत्वं मम शरीरे पूर्णत्व चैतन्य जाग्रय उत्तिष्ठ उत्तिष्ठ पूर्णत्व जाग्रय पूर्णत्व जाग्रय पूर्णत्व जाग्रयामि ।।

 
 
 
चूंकि, मंत्र बड़ा है और अत्यंत ही प्रभावशाली है तो प्रतिदिन मात्र 11 या 21 बार इसका अभ्यास पर्याप्त रहता है । जो, साधक नये हैं उनको इसका 1, 3, 5 या 7 बार से प्रारंभ करना चाहिए ।

 

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