इंतहा भी इश्क़ है ।
दर्द ही दर्द है इश्क़ मे ... और कुछ भी नहीं ,
मन बांवरा सा रहता है ,
वस्ल हो तो जी दुखता है कि फिर बिछड़ना होगा ...
हिज्र हो तो जी जलता है कि विसाल कब होगा ।
आधा चाँद कम लगता है , पूरा चाँद कम होने लगता है ...
शीशा और रिश्ता एक सा होता है ...
शीशा गलती से टूट जाता है , और रिश्ता ...
गलतफहमियों से .... !!