ॐ ह्लीं आं बगलामुखी अमुकस्य गतिं स्तम्भय बुद्धिं स्तम्भय वाक्यां स्तम्भय आं ह्लीं ॐ
ये हे ३१ अक्षरी वगला मंत्र
om hlim ang baglmukhi amukasya gating stambhay budhing stambhay bakyang stambhay ang hlim hoom
बगला शाबर "पीत पीतेवशरी पीताम्बरा "-- ॐ नमो पीत पीतेशवरी पीताम्बरा महा बगलामुखी माता जाग्रय जाग्रय शत्रु स्तम्भनी, शत्रु मर्दिनी महा विद्या महामाया काल विनाशनी पर विद्या भक्षणि सर्व जगत वशिकरणी मम सर्व मनोवांछित साधय साधय मम सर्व कुरू कुरू गुरूगोरखनाथ आज्ञा पयती हुम् फट्
भगवती बगलामुखी अनन्त रूपात्मिका भी हैं—वे कृष्णा, कपर्दिनी, कृत्या, कलहा, कलिनाशिनी, बुद्धिरूपा, बुद्धभार्या, बौद्धपाखण्डखण्डिनी, सर्वावतारस्वरूपा, कल्किरूपा, कलिहरा, कलिदुर्गार्तिनाशिनी, कोटिसूर्यप्रतीकाशा, कोटिकन्दर्पकेवला, कठिना, काली, कलाकैवल्यदायिनी, केशवी, केशवाराध्या, किशोरी, रुद्रा, रुद्रमूर्ति, रुद्राणी, रुद्रदेवता, नक्षत्ररूपा, नक्षत्रा, नागिनी, नागजननी, नागराजनागेश्वरी, नागकन्या, नागात्मजा, नागाधिराजतनया (पार्वती), नीरदा, पीता, श्यामा, रक्ता, नीला, घना, श्वेता, सौभाग्यदायिनी, सौम्या, सुभगा, स्तम्भिनी, मोहिनी, यक्षिणी, सिद्धेशा, सिद्धिरूपिणी, लंकापतिध्वंसकरा, महारावणहारिणी, परमेश्वरी, पराणुरूपा, वरदा, वरदानपरायणा, वसुदा, ब्रह्मरूपा, पीतवसना, पीतभूषणभूषिता, पीतपुष्पप्रिया, पीतहरा और पीतस्वरूपिणी हैं'
श्री बगला प्राकट्य
शिव के सम्मुख पार्वती, धर कर बोली माथ ।
बगला की उत्पत्ति की, कथा सुनाओ नाथ ! ।।
।। शिव उवाच ।।
कृत-युग के पहिले भुतल पर, वात-क्षोभ-हिन्दोल उठा ।
ध्रुव तारा हिल गया अचानक, जड़-चेतन भू डोल उठा ।।
प्रकृति पुरातन की शाखा के, नखत नीड़-सम टूट गए ।
सूरज-चन्दा की किस्मत को, तम-चर आकर लूट गए ।।
प्रलय-काल का दृश्य चतुर्दिक, दीख पड़ा जगती-तल में ।
डूब गए हिम-गिरि-सम पर्वत, महा-सागरों के जल में ।।
महाऽऽकाश के महा-उदर में, तत्त्व सभी लय होते थे ।
इन्द्रादिक सुर काँप-काँप कर, भय-विह्वल हो रोते थे ।।
करुणा से भर गए विष्णु भी, चिन्तन में लव-लीन हुए ।
तप करते वर्षों तक, नारायण अति क्षीण हुए ।।
सौराष्ट्र देश में निकट सरोवर, त्रिपुर-सुन्दरी प्रकट हुईं ।
मातृ-शक्ति को देख विष्णु की, आँखें श्रद्धा-विनत हुईं ।।
‘मा भैः’ कहकर त्रिपुरा ने, बगला का तब अवतार लिया ।
करुणा – पूरित नयना ने, जड़ – चेतन का उद्धार किया ।।
पीताम्बर-धारिणी माया की, यह विख्यात कहानी है ।
स्तम्भन-शक्ति-स्वरुपा बगला माता, स्वयं भवानी है ।।
मंगलवार चतुर्दशी, ‘वीर-रात्रि’ विख्यात ।
कुल-नक्षत्र मकार में, प्रकटीं बगला मात ।
भगवती बगला की मानस पूजा
(१) श्रीपीताम्बरायै नमः लं पृथिव्यात्मकं गन्धं परिकल्पयामि ।
(२) श्रीपीताम्बरायै नमः हं आकाशात्मकं पुष्पं परिकल्पयामि । (३) श्रीपीताम्बरायै नमः यं वाय्वात्मकं धूपं परिकल्पयामि । (४) श्रीपीताम्बरायै नमः रं तेजसात्मकं दीपं परिकल्पयामि । (५) श्रीपीताम्बरायै नमः वं अमृतात्मकं नैवेद्यं परिकल्पयामि । (६) श्रीपीताम्बरायै नमः सं सर्वात्मकं मन्त्रपुष्पं परिकल्पयामि ।
इसके बाद 'योनिमुद्रा' से प्रणाम करके यदि पञ्जरस्तोत्र का पाठ कर लिया जाय अत्युत्तम रहेगा
माँ बगलामुखी का साधन विवेक संपन्न बुद्धि वाला
संयतमनवाला होता है उसकी इन्द्रियां भी उसके नियंत्रण (वश) में रहती हैं। बगलामुखी अपने साधक को स्थिरता प्रदान करती है , आप अपने साधक को स्थिर सुख प्रदान करती हैं आप अपने साधक को स्थिर लक्ष्मी प्रदान करती हैं आप अपने साधक को मन एवं बुद्धि की स्थिरता प्रदान करती हैं इसी स्थिति के द्वारा साधक में सम्यक स्थिरता आती है इससे ही साधक में सम्यक ज्ञान का उदय होता है इसी ज्ञान के कारण आपका साधक परम अवस्था को प्राप्त होता है
॥ ब्रह्मास्त्र शक्ति की महिमा |
बगला भोग एवं मोक्ष प्रदान करती है। योग साधना ज्ञान के अलावा साधक के भौतिक हितों की रक्षा करती है। यह विद्या स्वविद्या को जागृत करती है, परविद्या का स्तम्भन करती है। परकीर्ति का स्तम्भन कर स्वकीर्ति की वृद्धि करती है। परमन्त्र, परतन्त्र, परकृत्या का छेदन कर स्वविद्या की रक्षा करती है। शत्रु का संहार कर विजय प्रदान करती है। परानुष्ठान को विध्वंस कर प्राकृत आपदाओं से रक्षा करती है। दूसरों को भ्रम में डालकर शत्रु की बुद्धि को शिथिल करती है। षट्कर्मों की सिद्धि प्रदान करती है।
स्वविद्यारक्षिणी विद्या स्वमन्त्रफलदायिका । स्वकीर्तिरक्षिणी विद्या शत्रुसंहारकारिका ॥१॥
परविद्या छेदिनी च परमन्त्रविदारिणी । परमन्त्रप्रयोगेषु सदाविध्वंसकारिका ॥२॥ परानुष्ठानहारिणी परकीर्तिविनाशिनी । पराऽआपन्नाशकृद् विद्या परेशां भ्रमकारिणी ॥३॥ ये या विजयमिच्छन्ति ये वा जन्तुक्षयं कलौ । ये वा क्रूरमृगेभ्यश्च जयमिच्छन्ति मानवाः ॥४॥ इच्छन्ति शांतिकर्माणि वश्यं सम्मोहनादिकम । विद्वेषोच्चाटनं पुत्र तेनोपास्यस्त्वयं मनु
माँ बगलामुखी का साधन विवेक संपन्न बुद्धि वाला
संयतमनवाला होता है उसकी इन्द्रियां भी उसके नियंत्रण (वश) में रहती हैं। बगलामुखी अपने साधक को स्थिरता प्रदान करती है , आप अपने साधक को स्थिर सुख प्रदान करती हैं आप अपने साधक को स्थिर लक्ष्मी प्रदान करती हैं आप अपने साधक को मन एवं बुद्धि की स्थिरता प्रदान करती हैं इसी स्थिति के द्वारा साधक में सम्यक स्थिरता आती है इससे ही साधक में सम्यक ज्ञान का उदय होता है इसी ज्ञान के कारण आपका साधक परम अवस्था को प्राप्त होता है