Gurudev Dr. Narayan Dutt Shrimali

रोगमुक्ति - रुद्र प्रयोग

रोगमुक्ति - रुद्र प्रयोग

स्वस्थ देह से स्वस्थ मन और स्वस्थ मन से स्वास्थ चित्त यही तो जीवन है

सोमवार 08.08.22

रोगमुक्ति - रुद्र प्रयोग पर जानें रुद्र पूजा, मंत्र, संकल्प और विधि का सरल मार्गदर्शन। आध्यात्मिक साधना समझें, सही नियम अपनाएँ और श्रद्धा से प्रयोग करें।

रोगमुक्ति - रुद्र प्रयोग किसके लिए है और इसे कैसे किया जाता है? जानें रुद्राभिषेक, मंत्र और संकल्प की पूरी जानकारी। आध्यात्मिक उपाय समझें, फिर आगे बढ़ें। Disease Cure - Rudra विषय पर यह मार्गदर्शिका रुद्र साधना के अर्थ, लाभ और नियम समझाती है। सही विधि पढ़ें, सावधानी रखें और स्वास्थ्य सलाह के साथ इसका पालन करें।  

रोगमुक्ति - रुद्र प्रयोग

प्रयोग विधि

रोगनाश के लिए भगवान रुद्र की साधना सर्वोपरि है। उसके लिए विशिष्ट सामग्री का होना आवश्यक है, जिससे कि पूर्णरूप से साधना को सम्पन्न किया जा सके। इसमें प्रयुक्त होने वाली सामग्री है -

1. प्राण-प्रतिष्ठित एवं मंत्र सिद्ध ज्योतिर्मय शिव यंत्र, मधु रूपेण रुद्राक्ष एवं रोगनाशक गुटिका।

2. पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुँह करके बैठें।

3. सफेद या पीले आसन पर बैठें।

4. प्रातः 5 बजे से 8 बजे के मध्य इस प्रयोग को करें या फिर रात्रि 8.30 से 12.00 बजे के मध्य करें।

5. सोमवार को यह साधना करें। किसी भी सोमवार को इसे सम्पन्न कर सकते हैं।

6. अपने सामने बाजोट के ऊपर सफेद वस्त्र बिछाकर, किसी थाली में कुंकुंम से स्वस्तिक बनाकर शिव यंत्र को स्थापित कर दें व धूप दीप जला दें। फिर पूजन आरम्भ करें -

ध्यान-दोनों हाथ जोड़कर भगवान रुद्र से रोगनाश के लिए तथा सुख-सौभाग्य प्राप्ति के लिए प्रार्थना करें -

ध्याये नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारूचंद्रां वतंसं।

रत्नाकल्पोज्ज्वलांगं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम।।

पद्मासीनं समंतात् स्तुततममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं।

विश्वाद्यं विश्वबद्यं निखिलभय हरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्।।

आवाहन

ॐ उमामहेश्वराभ्यां नम: आवाहन समर्पयामि।।

आसन

देवता को बिठाने के लिए आसन के रूप में पुष्प रखें।

ॐ उमामहेश्वराभ्यां नम: आसनार्थे पुष्पं समर्पयामि।।

 

इस पृष्ठ में भगवान शिव और माता पार्वती (उमा-महेश्वर) की पूजा तथा शिव यंत्र साधना की विधि दी गई है। इसका संपूर्ण विवरण और मंत्र नीचे लिखे अनुसार हैं:

 

1. स्नान और पूजन (स्नानम्)

 

शिव यंत्र पर जल चढ़ाते हुए निम्न मंत्र बोलें:


ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः स्नानीयं जलं समर्पयामि।

इसके बाद गंध (चंदन या कुंकुम), अक्षत (चावल) और पुष्प (फूल) अर्पित करते हुए क्रमशः इन मंत्रों को बोलें:

  • ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः गंधं समर्पयामि।
  • ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः अक्षतान् समर्पयामि।
  • ॐ उमामहेश्वराभ्यां पुष्पाणि समर्पयामि।

2. नैवेद्य और भोग

 

नैवेद्य (प्रसाद) के ऊपर जल से प्रदक्षिणा करते (घुमाते) हुए रुद्र गायत्री मंत्र बोलें:


ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्।

इसके बाद भोग लगाते हुए यह मंत्र बोलें:


ॐ उमा महेश्वराभ्यां नमः नैवेद्यं निवेदयामि नाना ऋतुफलानि च समर्पयामि।

3. मुख्य रोग-मुक्ति साधना और मंत्र

 

भोग लगाने के बाद, एक छोटी चम्मच से शिव यंत्र पर लगातार जल चढ़ाते रहें और लगभग पाँच मिनट तक नीचे दिए गए मंत्र का उच्चारण (जाप) करें:


मंत्र: ॥ ॐ सर्वरोगहराय रुद्राय ह्रीं क्रीं फट् ॥

4. साधना के बाद की विधि और लाभ

  • जल का प्रयोग: शिव यंत्र पर चढ़ाए गए जल को किसी पात्र (बर्तन) में इकट्ठा कर लें। इस जल को रोगी के सिर पर तीन बार घुमाकर किसी पवित्र वृक्ष (जैसे पीपल या बरगद) की जड़ में चढ़ा दें।
  • यंत्र स्थापना की अवधि: शिव यंत्र को अपने पूजा कक्ष में सवा माह (45 दिन) तक स्थापित रखें।
  • विसर्जन: सवा महीने के बाद शिव यंत्र, गुटिका और मधुरूपाक्ष (रुद्राक्ष) को किसी पवित्र नदी में प्रवाहित कर दें या किसी शिव मंदिर में चढ़ा दें।
  • फल (लाभ): इस साधना को करने से साधक को सभी प्रकार के रोगों से मुक्ति मिलती है। यदि कोई स्वस्थ व्यक्ति इसे संपन्न करता है, तो उसे भविष्य में समस्त रोगों से सुरक्षा प्राप्त होती है।

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