◆ श्री सुदर्शन महाचक्र कवच व श्री सुदर्शन महाचक्र साधना◆

सुदर्शन महाचक्र कवच किसी भी प्रकार की बाधा, अला-बला, भूत, भूतिनी, यक्षिणी, प्रेतिनी या अन्य किसी भी तरह की ओपरी विपत्ति में श्री सुदर्शन कवच रक्षा करता ही है/ यह अद्वितीय तांत्रिक शक्ति से युक्त है यह सुदर्शन चक्र की भांति इसके धारणकर्ता/पाठक की रक्षा करता ही है ...
इसके अलावा
जिसके जन्म कुंडली में चर, स्थिर और द्विस्वभाव लग्न में उत्पन्न लोगो के लिए क्रमशः ११,९ और ७वा स्थान और उनके स्वामी बाधक होते है और ये अपनी दशा काल में बहुत ही प्रबल होते है ये अचानक बाधा उत्पन्न करके जीवन में परेशानी पैदा कर देते है इसके निवारण/शांति हेतु सुदर्शन कवच का प्रयोग किया जाता है
ॐ अस्य श्री सुदर्शन कवच माला मंत्रस्य श्री लक्ष्मी नृसिंह: परमात्मा देवता क्षां बीजं ह्रीं शक्ति मम कार्य सिध्यर्थे जपे विनयोग:/
करण्यास हृदयादि न्यास
ॐ क्षां अन्गुष्ठाभ्याम नम: हृदयाय नम:
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्याम नम: शिरसे स्वाहा
ॐ श्रीं मध्यमाभ्याम नम: शिखाए वषट
ॐ सहस्रार अनामिकभ्याम नम: कवचाय हुम
ॐ हुं फट कनिष्ठिकाभ्याम नम: नेत्रत्रयाय वौषट
ॐ स्वाहा करतल-कर प्र्ष्ठाभ्याम नम: अस्त्राय फट
ध्यानं :- उपसमाहे नृसिंह आख्यम ब्रह्म वेदांत गोचरम / भूयो-लालित संसाराच्चेद हेतुं जगत गुरुम //
पंचोपचार पूजनं :
लं पृथ्वी तत्वात्मकम गंधंम समर्पयामि
हं आकाश तत्वात्मकम पुष्पं समर्पयामि
यं वायु तत्वात्मकम धूपं समर्पयामि
रं अग्नि तत्वात्मकम दीपं समर्पयामि
वं जल तत्वात्मकम नैवेद्यं समर्पयामि
सं सर्व तत्वात्मकम ताम्बूलं समर्पयामि
ॐ सुदर्शने नम:/ ॐ आं ह्रीं क्रों नमो भगवते प्रलय काल महा ज्वाला घोर वीर सुदर्शन नृसिंहआय ॐ महा चक्र राजाय महा बले सहस्रकोटिसूर्यप्रकाशाय सहस्रशीर्षआय सहस्रअक्षाय सहस्रपादाय संकर्षणआत्मने सहस्रदिव्याश्र सहस्र हस्ताय सर्वतोमुख ज्वलन ज्वाला माला वृताया विस्फु लिंग स्फोट परिस्फोटित ब्रह्माण्ड भानडाय महा पराक्रमाय महोग्र विग्रहाय महावीराय महा विष्णु रुपिणे व्यतीत कालान्त काय महाभद्र रोद्रा वताराया मृत्यु स्वरूपाय किरीट-हार-केयूर-ग्रेवेयक-कटक अन्गुलयी-कटिसूत्र मजीरादी कनक मणि खचित दिव्य भूषणआय महा भीषणआय महा भिक्षया व्याहत तेजो रूप निधेय रक्त चंडआंतक मण्डितम दोरु कुंडा दूर निरिक्षणआय प्रत्यक्ष आय ब्रह्म चक्र विष्णु चक्र कल चक्र भूमि चक्र तेजोरूपाय आश्रितरक्षाय/ ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात इति स्वाहा स्वाहा ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात इति स्वाहा स्वाहा भो भो सुदर्शन नारसिंह माम रक्षय रक्षय / ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात मम शत्रून नाशय नाशय / ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल चंड चंड प्रचंड प्रचंड स्फुर प्रस्फुर घोर घोर घोरतर घोरतर चट चट प्रचटं प्रचटं प्रस्फुट दह कहर भग भिन्धि हंधी खट्ट प्रचट फट जहि जहि पय सस प्रलय वा पुरुषाय रं रं नेत्राग्नी रूपाय / ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात भो भो सुदर्शन नारसिंह माम रक्षय रक्षय / ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात एही एही आगच्छ आगच्छ भूतग्रह- प्रेतग्रह- पिशाचग्रह-दानावग्रह-कृत्रिम्ग्रह- प्रयोगग्रह-आवेशग्रह-आगतग्रह-अनागतग्रह- ब्रह्म्ग्रह-रुद्रग्रह-पतालग्रह-निराकारग्रह -आचार-अनाचार ग्रह- नन्जाती ग्रह- भूचर ग्रह- खेचर ग्रह- वृक्ष ग्रह- पिक्षी चर ग्रह- गिरी चर ग्रह- श्मशान चर ग्रह -जलचर ग्रह -कूप चर ग्रह- देगारचल ग्रह- शुन्यगार चर ग्रह- स्वप्न ग्रह- दिवामनो ग्रह- बालग्रह -मूकग्रह- मुख ग्रह -बधिर ग्रह- स्त्री ग्रह- पुरुष ग्रह- यक्ष ग्रह- राक्षस ग्रह- प्रेत ग्रह किन्नर ग्रह- साध्य चर ग्रह - सिद्ध चर ग्रह -कामिनी ग्रह- मोहनी ग्रह-पद्मिनी ग्रह- यक्षिणी ग्रह- पकषिणी ग्रह संध्या ग्रह-
उच्चाटय उच्चाटय भस्मी कुरु कुरु स्वाहा / ॐ सुदर्शन विद्महे महा ज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात ॐ सुदर्शन विद्महे महा ज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात ॐ क्षरां क्षरीं क्षरूं क्षरें क्षरों क्षर : भरां भरीं भरूं भरें भरों भर: ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रें ह्रों ह्र: घरां घरीं घरूं घरें घरों घर: श्रां श्रीं श्रुं श्रें श्रों श्र: / ॐ सुदर्शन विद्महे महा ज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात ॐ सुदर्शन विद्महे महा ज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात एही एही सालवं संहारय शरभं क्रन्दया विद्रावय विद्रावय भैरव भीषय भीषय प्रत्यांगिरी मर्दय मर्दय चिदंबरम बंधय बंधय विदम्बरम ग्रासय ग्रासय शांर्म्भ्वा निबंतय कालीं दह दह महिषासुरी छेदय छेदय दुष्ट शक्ति निर्मूलय निर्मूलय रूं रूं हूँ हूँ मुरु मुरु परमन्त्र - परयन्त्र - परतंत्र कटुपरं वादपर जपपर होमपर सहस्र दीप कोटि पुजां भेदय भेदय मारय मारय खंडय खंडय परकृतकं विषं निर्विष कुरु कुरु अग्नि मुख प्रकांड नानाविध कृतं मुख वनमुखं ग्राहान चुर्णय चुर्णय मारी विदारय कुष्मांड वैनायक मारीचगणान भेदय भेदय मन्त्रं परअस्माकं विमोचय विमोचय अक्षिशूल कुक्षीशूल गुल्मशूल पार्श्वशूल सर्वाबाधा निवारय निवारय पांडूरोगं संहारय संहारय विषम ज्वर त्रासय त्रासय एकाहिकं द्वाहिकं त्र्याहिकं चातुर्थिकं पंचाहिकं षष्टज्वर सप्तमज्वर अष्टमज्वर नवमज्वर प्रेतज्वर पिशाचज्वर दानवज्वर महाकालज्वरं दुर्गाज्वरं ब्रह्माविष्णुज्वरं माहेश्वरज्वरं चतु:षष्टि योगिनीज्वरं गन्धर्वज्वरं बेतालज्वरं एतान ज्वरान्न नाशय नाशय दोषं मंथय मंथय दुरित हर हर अन्नत वासुकी तक्षक कालौय पद्म कुलिक कर्कोटक शंख पलाद्य अष्ट नाग कुलानां विषं हन हन खं खं घं घं पाशुपतं नाशय नाशय शिखंडी खंडय खंडय प्रमुख दुष्ट तंत्र स्फोटय स्फोटय भ्रामय भ्रामय महानारायणअस्त्राय पंचाशधरणरूपाय लल लल शरणागत रक्षणाय हूँ हूँ गं वं गं वं शं शं अमृतमूर्तये तुभ्यं नम: / ॐ सुदर्शन विद्महे महा ज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात ॐ सुदर्शन विद्महे महा ज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात भो भो सुदर्शन नारसिंह माम रक्षय रक्षय / ॐ सुदर्शन विद्महे महा ज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात ॐ सुदर्शन विद्महे महा ज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात मम सर्वारिष्ट शान्तिं कुरु कुरु सर्वतो रक्ष रक्ष ॐ ह्रीं हूँ फट स्वाहा / ॐ क्ष्रोम ह्रीं श्रीं सहस्रार हूँ फट स्वाहा ।।
#प्राचीन मुख्य १०८ विज्ञान में कई ऐसे विज्ञान है, जिसके बारे में सामान्यजन को पता ही नहीं है। ऐसा ही एक विज्ञान है, जो कि प्रचलन में रहा था, वह था युद्ध विज्ञान। इस विज्ञान के अन्तर्गत व्यक्ति को अपनी शक्ति और सामर्थ्य बढ़ा कर किस प्रकार से आत्मरक्षण तथा पर-जन-रक्षण कर सके, इसकी शिक्षा दी जाती थी। साथ ही साथ शस्त्रों की तालीम भी दी जाती थी, जो कि सहायक रूप में शक्ति संचार का कार्य करते हैं। इस विज्ञान के अन्तर्गत यह भी बताया जाता था कि व्यक्ति किस प्रकार से भूमि तथा वायु में निहित शक्ति को संचारित कर के युद्ध कर सकता है।
इस विज्ञान का ही बौद्ध काल में विस्तारण हुआ, जिसमें कई प्रकार के नवीन अन्वेषण कर मार्शलआर्ट आदि विविध ज्ञान कई देशों में अमल में आया। इससे यह जाना जा सकता है कि उस समय जीव तथा भौतिक विज्ञान का विशेषतम ज्ञान हमारे ऋषियों के पास था। जब इसी विज्ञान को तन्त्र पक्ष से जोड़ा गया तो कई तन्त्र पद्धतियाँ अमल में आई, जिनका उद्देश्य युद्ध के दौरान विजयश्री के लिए किया जा सके। सैन्य स्तम्भन, सैन्य मारण, राज्य मोहिनी, राजा वशीकरण जैसे प्रयोगों को अमल में लाया गया। साथ ही साथ सबसे अत्यधिक महत्वपूर्ण, जिन साधनाओं का प्रचार हुआ, वह थी अस्त्र साधनाएँ।
हमारे शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि विविध अस्त्रों का प्रयोग युद्ध में बराबर होता था, अग्नि, पावका, वरुण, नाग, अघोर, ब्रह्मा आदि विभिन्न अस्त्रों के बारे में विवरण मिलता है। इन सभी अस्त्रों को साधनाओं के माध्यम से आज भी प्राप्त किया जा सकता है। देवी-देवताओं को सिद्ध कर उनसे अस्त्र प्राप्त करने के विवरण हमारे ग्रन्थों में मिलते है। इसी प्रकार विष्णु भगवान का अस्त्र सुदर्शन चक्र है। इन अस्त्रों को प्राप्त करने की साधना अत्यधिक कठोर तथा श्रमसाध्य है तथा इसमें कई साल का समय साधक को लग सकता है। लेकिन इन अस्त्रों से सम्बन्धित कई विविध लघु प्रयोग भी है, जिससे देवी देवता प्रसन्न होकर अपने अस्त्रों को साधक के पास भेज कर उनका रक्षण करने की आज्ञा देते हैं। लेकिन यह दुष्कर प्रयोग बहुत ही मुश्किल से प्राप्त होते हैं, यदा कदा मन्त्रों का विवरण भी मिल जाए, लेकिन सम्बन्धित प्रक्रियाएँ मिलना मुश्किल ही है।
सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु का प्रमुख शस्त्र है, इस चक्र से माध्यम से भगवान ने बहुत से दुष्टों का विनाश किया है। इस चक्र की खास बात यह है कि यह चलाने के बाद अपने लक्ष्य पर पहुंचकर वापिस आ जाता है। यह चक्र कभी भी नष्ट नहीं होता है। इस शस्त्र में अपार ऊर्जा है जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है।
इस दिव्य चक्र की उत्पत्ति को लेकर कई कथाएँ सामने आती हैं, कुछ लोगों का मानना है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश, बृहस्पति ने अपनी ऊर्जा एकत्रित कर के इसकी उत्पत्ति की है। यह भी माना जाता है कि यह चक्र भगवान विष्णु ने भगवान शिव की आराधना कर के प्राप्त किया है। लोग यह भी कहते हैं कि महाभारत काल में अग्निदेव ने श्री कृष्ण को यह चक्र दिया था जिससे अनेकों असुरों का संहार हुआ था।
सुदर्शन चक्र की सनातन हिन्दू धर्म में बहुत मान्यता है, जैसे वक़्त, सूर्य और ज़िन्दगी कभी रुकती नहीं हैं, वैसे ही इसका भी कोई अन्त नहीं कर सकता। यह परमसत्य का प्रतीक है। शिव पुराण के अनुसार साक्षात आदि शक्ति सुदर्शन चक्र में वास करती हैं।
सद्गुरुदेव ने अपने कई संन्यासी शिष्यों को इन प्रक्रियाओं का ज्ञान दिया है। यह हमारा सौभाग्य है कि हमारे वरिष्ठ भाई-बहिनों के पास इस प्रकार की साधनाएँ सुरक्षित हैं और वे इस गूढ़ ज्ञान से सम्पन्न है। सद्गुरुदेव की कृपा से एक प्रयोग जो कि सुदर्शन चक्र से सम्बन्धित है, वह में आप सब के मध्य रखना चाहूँगा।
साधना विधान :-----------
चूँकि यह साधना साधक की सुरक्षा से सम्बन्धित है। अतः आप इसे रक्षा-बन्धन (राखी) पर्व से आरम्भ करें। यदि यह सम्भव न हो तो इस साधना को किसी भी शुभ दिन से शुरू किया जा सकता है।
रात्रिकाल में ११ बजे के बाद साधक स्नान कर के सफ़ेद वस्त्रों को धारण कर सफ़ेद आसन पर बैठे और सामान्य गुरुपूजन करके गुरुमन्त्र की चार माला जाप करें। फिर सद्गुरुदेवजी से सुदर्शन चक्र साधना सम्पन्न करने हेतु मानसिक रूप से गुरु-आज्ञा लेकर उनसे साधना की सफलता के लिए निवेदन करें।
इसके बाद भगवान गणपतिजी का स्मरण कर किसी भी गणपति मन्त्र का एक माला जाप करें और उनसे साधना की निर्विघ्न पूर्णता के लिए प्रार्थना करें।
इस साधना में साधक को कुल ११,००० मन्त्र जाप करना है। साधक अपनी सामर्थ्य के अनुसार दिनों का चयन कर अपना मन्त्र जाप पूरा कर लें, लेकिन मन्त्र जाप की संख्या रोज़ एक समान और नियमित रहे। साधक चाहे तो एक दिन में भी मन्त्र जाप पूरा कर सकता है।
तत्पश्चात साधक को साधना के पहले दिन संकल्प अवश्य लेना चाहिए। दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प लें कि “मैं अमुक नाम का साधक गोत्र अमुक आज से सुदर्शन चक्र साधना शुरू कर रहा हूँ। मैं नित्य ७ दिनों तक १५ माला मन्त्र जाप सम्पन्न करूँगा। हे, सद्गुरुदेवजी! आपकी कृपा से मेरी यह साधना सफल हो, जिससे कि मुझे और मेरे परिवार को सम्पूर्ण रूप से सुरक्षा प्राप्त हो सके और जीवन पूरी तरह चिन्तामुक्त हो सके।”
आप चाहे तो ११ माला प्रतिदिन के हिसाब से इस साधना को ११ दिनों में भी सम्पन्न कर सकते हैं। लेकिन संकल्प में फिर आप वैसा ही उच्चारित करें।
इसके बाद साधक हाथ जोड़कर भगवान सुदर्शन चक्र का निम्नानुसार ध्यान करे -----
ॐ सुदर्शनं महावेगं गोविन्दस्य प्रियायुधम्‚
ज्वलत्पावकसङ्काशं सर्वशत्रुविनाशनम्।
कृष्णप्राप्तिकरं शश्वद्भक्तानां भयभञ्जनम्‚
सङ्ग्रामे जयदं तस्माद्ध्यायेद्देवं सुदर्शनम्॥
फिर रुद्राक्ष माला से साधक निम्न मन्त्र का जाप करें -----
मन्त्र :-----------
।। ॐ सुदर्शन चक्राय शीघ्र आगच्छ मम् सर्वत्र रक्षय-रक्षय स्वाहा ।।
OM SUDARSHAN CHAKRAAY SHEEGHRA AAGACHCHH MAM SARVATRA RAKSHAY-RAKSHAY SWAAHA.
मन्त्र जाप के पश्चात एक आचमनी जल भूमि पर छोड़कर समस्त जाप समर्पित कर दें।
इस प्रकार यह साधना आप नित्य ७ अथवा ११ दिनों तक सम्पन्न करें। साधना समाप्ति के बाद साधक माला को धारण किए रखे तथा आगामी दिनों में ग्रहणकाल के समय इस मन्त्र की ११ माला जाप फिर से करे और शहद से अग्नि में १००८ आहुतियाँ इसी मन्त्र से अर्पित करे।
यह साधक का सौभाग्य होता है कि उसे साधना काल के दौरान सुदर्शन चक्र के दर्शन हो जाए। यदि ऐसा होता है तो साधक को चाहिए कि वह विनीत भाव से प्रणाम कर सुदर्शन चक्र से रक्षण के लिए प्रार्थना करे।
इसके बाद सुदर्शन चक्र साधक के आसपास अप्रत्यक्ष रूप में रहता है तथा सर्व रूप से शत्रु तथा अनेक बाधाओं से व्यक्ति का रक्षण करता ही रहता है। साधक का अहित करने का सामर्थ्य उसके शत्रुओं में रहता ही नहीं है।
आपकी साधना सफल हो और आपकी मनोकामना पूर्ण हो! मैं सद्गुरुदेव भगवानजी से आप सबके लिए कल्याण कामना करता हूँ।

जीवन में समस्त बाधा शांति हेतु सुदर्शन कवच का प्रयोग किया जाता है, इसके अलावा ऊपरी बाधा अलाबला भूत, भूतिनी, यक्षिणी, प्रेतिनी या अन्य किसी भी तरह की ऊपरी विपत्ति में श्री सुदर्शन कवच रक्षा करता है।
यह अद्वितीय तांत्रिक शक्ति से युक्त है, यह सुदर्शन चक्र की भांति इसके पाठक धारणकर्ता की रक्षा करता है।
सीधे हाथ में जल लेकर विनियोग पढ़कर जल भूमि पर छोड़ दें।
ॐ अस्य श्री सुदर्शन कवच माला मंत्रस्य श्री लक्ष्मी नृसिंह: परमात्मा देवता क्षां बीजं ह्रीं शक्ति मम कार्य सिध्यर्थे जपे विनयोग:।
हृदयादि न्यास:-
ॐ क्षां अन्गुष्ठाभ्याम नम: हृदयाय नम:।
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्याम नम: शिरसे स्वाहा।
ॐ श्रीं मध्यमाभ्याम नम: शिखायै वषट।
ॐ सहस्रार अनामिकाभ्याम नम:। कवचाय हुम।
ॐ हुं फट कनिष्ठिकाभ्याम नम: नेत्रत्रयाय वौषट।
ॐ स्वाहा करतल कर प्रष्ठाभ्याम नम: अस्त्राय फट।
उपसमाहे नृसिंह आख्यम ब्रह्म वेदांत गोचरम।
भूयो-लालित संसाराच्चेद हेतुं जगत गुरुम।
पंचोपचार पूजनं:
लं पृथ्वी तत्वात्मकम गंधंम समर्पयामि
हं आकाश तत्वात्मकम पुष्पं समर्पयामि
यं वायु तत्वात्मकम धूपं समर्पयामि
रं अग्नि तत्वात्मकम दीपं समर्पयामि
वं जल तत्वात्मकम नैवेद्यं समर्पयामि
सं सर्व तत्वात्मकम ताम्बूलं समर्पयामि
ॐ सुदर्शने नम:।
ॐ आं ह्रीं क्रों नमो भगवते प्रलय काल महा ज्वाला घोर वीर सुदर्शन नृसिंहाय ॐ महाचक्र राजाय महाबले सहस्रकोटि सूर्यप्रकाशाय सहस्रशीर्षाय सहस्राक्षाय सहस्रपादाय संकर्षणात्मने सहस्रदिव्याश्र सहस्र हस्ताय सर्वतोमुख ज्वलन ज्वाला माला वृताया विस्फुलिंग स्फोट परिस्फोटित ब्रह्माण्ड भानडाय महा पराक्रमाय महोग्र विग्रहाय महावीराय महा विष्णु रुपिणे व्यतीत कालान्तकाय महाभद्र रोद्रावताराय मृत्यु स्वरूपाय किरीट हार केयूर ग्रेवेयक कटक अन्गुलयी कटिसूत्र मजीरादी कनक मणि खचित दिव्य भूषणाय महाभीषणाय महाभिक्षाय व्याहत तेजो रूप निधेय रक्त चंडआंतक मण्डितम दोरु कुंडा दूर निरीक्षणाय प्रत्यक्ष आय ब्रह्म चक्र विष्णु चक्र कल चक्र भूमि चक्र तेजो रूपाय आश्रितरक्षाय
ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात इति स्वाहा स्वाहा।
ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात इति स्वाहा स्वाहा भो भो सुदर्शन नारसिंह माम रक्षय रक्षय
ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात।
ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात मम शत्रून नाशय नाशय
ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात।
ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात! ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल चंड चंड प्रचंड प्रचंड स्फुर प्रस्फुर घोर घोर घोरतर घोरतर चट चट प्रचटं प्रचटं प्रस्फुट दह कहर भग भिन्धि हंधी खट्ट प्रचट फट जहि जहि पय सस प्रलय वा पुरुषाय रं रं नेत्राग्नी रूपाय
ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात।
ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात भो भो सुदर्शन नारसिंह माम रक्षय रक्षय
ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात।
ॐ सुदर्शनाय विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात एहि एहि आगच्छ आगच्छ भूतग्रह प्रेतग्रह पिशाचग्रह दानावग्रह कृत्रिम्ग्रह प्रयोगग्रह आवेशग्रह आगतग्रह अनागतग्रह ब्रह्मग्रह रुद्रग्रह पातालग्रह निराकारग्रह आचार अनाचार ग्रह नन्जाती ग्रह भूचरग्रह खेचर ग्रह
वृक्षग्रह पिक्षी चरग्रह गिरी चरग्रह श्मशान चरग्रह जलचर ग्रह कूप चरग्रह देगारचल ग्रह शुन्यगार चर ग्रह स्वप्न ग्रह दिवा मनोग्रह बालग्रह मूकग्रह मुख ग्रह बधिरग्रह स्त्रीग्रह पुरुषग्रह यक्ष ग्रह राक्षस ग्रह प्रेतग्रह किन्नरग्रह साध्य चर ग्रह सिद्ध चरग्रह कामिनी ग्रह मोहनी ग्रह पद्मिनीग्रह यक्षिणीग्रह पकषिणी ग्रह संध्याग्रह उच्चाटय उच्चाटय भस्मी कुरु कुरु स्वाहा।
ॐ सुदर्शन विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात।
ॐ सुदर्शन विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात।
ॐ क्ष्रां क्ष्रीं क्ष्रूं क्ष्रैं क्ष्रौं क्ष्र:।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भ्रैं भ्रौं भ्र:।
ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्र:।
घ्रां घ्रीं घ्रूं घ्रैं घ्रौं घ्र:।
श्रां श्रीं श्रूं श्रैं श्रौं श्र:।
ॐ सुदर्शन विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात।
ॐ सुदर्शन विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात। एही एही सालवं संहारय शरभं क्रन्दया विद्रावय विद्रावय भैरव भीषय भीषय प्रत्यांगिरी मर्दय मर्दय चिदंबरम बंधय बंधय विदम्बरम ग्रासय ग्रासय शांर्म्भ्वा निबंतय कालीं दह दह महिषासुरी छेदय छेदय दुष्ट शक्ति निर्मूलय निर्मूलय रूं रूं हूँ हूँ मुरु मुरु परमन्त्र परयन्त्र परतंत्र कटुपरं वादपर जपपर होमपर सहस्र दीप कोटि पुजां भेदय भेदय मारय मारय खंडय खंडय परकृतकं विषं निर्विष कुरु कुरु अग्नि मुख प्रकांड नानाविध कृतं मुख वनमुखं ग्राहान चुर्णय चुर्णय मारी विदारय कुष्मांड वैनायक मारीचगणान भेदय भेदय मन्त्रं परअस्माकं विमोचय विमोचय अक्षिशूल कुक्षीशूल गुल्मशूल पार्श्वशूल सर्वाबाधा निवारय निवारय पांडूरोगं संहारय संहारय विषम ज्वर त्रासय त्रासय एकाहिकं द्वाहिकं त्र्याहिकं चातुर्थिकं पंचाहिकं षष्टज्वर सप्तमज्वर अष्टमज्वर नवमज्वर प्रेतज्वर पिशाचज्वर दानवज्वर महाकालज्वरं दुर्गाज्वरं ब्रह्माविष्णुज्वरं माहेश्वरज्वरं चतु:षष्टि योगिनीज्वरं गन्धर्वज्वरं बेतालज्वरं एतान ज्वरान्न नाशय नाशय दोषं मंथय मंथय दुरित हर हर अन्नत वासुकी तक्षक कालौय पद्म कुलिक कर्कोटक शंख पलाद्य अष्ट नाग कुलानां विषं हन हन खं खं घं घं पाशुपतं नाशय नाशय शिखंडी खंडय खंडय प्रमुख दुष्ट तंत्र स्फोटय स्फोटय भ्रामय भ्रामय महानारायणअस्त्राय पंचाशधरणरूपाय लल लल शरणागत रक्षणाय हूँ हूँ गं वं गं वं शं शं अमृतमूर्तये तुभ्यं नम:
ॐ सुदर्शन विद्महे महा ज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात।
ॐ सुदर्शन विद्महे महा ज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात भो भो सुदर्शन नारसिंह माम रक्षय रक्षय
ॐ सुदर्शन विद्महे महा ज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात।
ॐ सुदर्शन विद्महे महाज्वालाय धीमहि तन्न: चक्र: प्रचोदयात मम सर्वारिष्ट शान्तिं कुरु कुरु सर्वतो रक्ष रक्ष ॐ ह्रीं हूँ फट स्वाहा ॐ क्ष्रोम ह्रीं श्रीं सहस्रार हूँ फट स्वाहा।
।।श्रीगणेशाय नमः! श्रीलक्ष्मीनृसिंह जयति।।
ॐ अस्य श्री सुदर्शन माला मंत्रस्य अर्हिबुधध्न्न्य ऋषि: अनुष्टुप छंद श्री नरसिंह देवता क्षौ्ं् बीजं हुं शक्ति फट् कीलकम सर्वोपद्रव नाशनार्थे जपे विनियोग:-
करन्यास
ॐ आचक्राय नमः । अंगुष्ठाभ्यां नमः
ॐ विचक्राय तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ सुचक्राय मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ असुरान्तकचक्राय अनामिकाभ्यां नमः
ॐ सर्वलोकरक्षणचक्राय कनिष्ठकाभ्यां नमः ।
ॐ सुदर्शन चक्राय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
हृदयादिन्यास
ॐ आचक्राय हृदयाय नमः ।
ॐ विचक्राय शिरसे स्वाहा।
ॐ सुचक्राय शिखायै वषट् ।
ॐ असुरान्तकचक्राय कवचाय हूँ। ॐ सर्वलोकरक्षणचक्राय नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ सुदर्शनचक्राय अस्त्राय फट् ।
दशदिग्बन्धः
ॐ आचक्राय लं ऐन्दि दिशां बन्धयामि स्वाहा।
ॐ विचक्राय रं आग्नेयीं दिशं बन्धयामि स्वाहा ।
ॐ सुचक्राय टं याम्यां दिशां बन्धयामि स्वाहा।
ॐ असुरान्तकचक्राय क्षं नैऋतीं दिशां बन्धयामि स्वाहा ।
ॐ सर्वलोकरक्षणचक्राय वं वारुणं दिशां बन्धयामि स्वाहा।
ॐ नृसिंहचक्राय अं अधरा दिशां बन्धयामि स्वाहा ।
ॐ सहस्त्रां हूं फट् स्वाहा ॐ नमो भगवते वासुदेवाय सुदर्शनाय दुखं विदारय विदारय दुरितं हन् हन् पापं मथ मथ अन्तर्भवादि ज्वर माहेश्वरज्वर,ब्रहमज्वर, विष्णुज्वर,
भूतज्वर बिषमज्वर वातज्वर श्लेष्पज्वरांश्च चक्राहि कव्यकल्पादिक चातुर्थिक पक्षमास त्रैमासिक षडमासिक संततज्वर सन्निपातकांत तापास्मरादिकान् सर्वज्वरान् छेदय छेदय छिन्धिं छिन्धिं आरोग्यं कुरू कुरू ह्मां ह्मां ह्मां ह्मीं ह्मीं ह्मीं हुं फट स्वाहा।
ॐ भगवते सुदर्शनचकाय महास्त्रराजाय, सर्वभूतेभ्यो भयं नाशय नाशय। शिरशूलाक्षिशूल कंर्णशूल कंठशूल हृदयशूल बाहुशूल कुक्षिशूल कटिशूल अंगशूल ,लिंगशूल, यौनिशूल सर्वागशूल बातशूल पित्तशूल श्लेष्मशूल आदि सर्वशूलान निर्मूलय निर्मूलय दानव दैत्य कामिनी वेताल ब्रह्मराक्षस छायाग्रहादि सर्वग्रहान छिन्धि छिन्धि भिन्धि भिन्थि भस्मीकुरु भस्मीकुरु परमंत्रा परयंत्रान परतंत्रान छेदय छेदय ह्मां फट् हुं फट् स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते महागरुडध्वजाय एतद्धि सर्वज्वरभयं चक्रेण छिन्धि भिन्धि भिन्धि शंख चक्र गदापद्मै: सर्वभयं हन हन नाशय नाशय मां रक्ष सर्वरक्षाकवचं आज्ञापय हुं फट् स्वाहा।
ॐ नमो भगवते सुदर्शनमंत्रराजाय गन्धर्वयक्षराक्षसभयं छिन्धि छिन्धि विदारय विदारय परमंत्रान ग्रासय ग्रासय परयन्त्रतन्त्राणि दुष्टचेटककरण महामारीवेतालभूतप्रेत पिशाचादीन अक्षय भक्षय आचक्राय विचक्राय सुचक्राय असुरान्तकचक्राय सर्वलोकरक्षणचक्राय सुदर्शन चक्रायास्त्रराजाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते महासुदर्शनचक्राय ज्वालादित्यरूपाय सर्वतो मां रक्ष रक्ष महाबलाय ज्वालापरिवर्तिन् क्ष्रौम सर्वग्रहान हन हन हुं फट् स्वाहा।
ॐ नमो भगवते अस्त्रराजाय क्षौं द्रीं नृसिंहाय क्षौं देवदानव दैत्यपूजिताय प्रदीप्त कोटयादित्यसहस्त्रसमतेजसे करालदंष्ट्रायुधाय विकीर्णकेसरसटाय क्षुभितमहावर्ग भेरीदुंदुभिनिर्घोषाय सर्वमन्त्रोच्चारणहृदयाय पाहि पाहि भगवन् नरसिंह पुरुषवर परब्रह्मसनातन शीघ्रं दह दह पच पच मथ मथ घोषय घोषय निकृन्तय निकृन्तय तावत्समागत पातालेभ्यः फट् असुरेभ्यः फट् जिन्वजातिभ्यः फट् मन्त्रजातिभ्यः फट् सर्वान् मन्त्रान् भक्षय भक्षय नरसिंहविष्णो सर्वपातालेभ्यः सर्वपापग्रहेभ्योपद्रवेभ्यः सर्वमन्त्रभिद्भ्यश्च रक्ष रक्ष अं आं ह्रीं क्ष्रौं हुं फट् स्वाहा।
ॐ नमो भगवते महावीर अघोर नारसिंह महाबलमहापराक्रमाय मदनहन्त्रे अघोरकालान्तक शाकिनी डाकिनी मारिमहामारिभूत प्रेतपिशाचरक्षांसि जलयक्षिणीस्थलयाक्षिणी अंतरिक्षयक्षिणी यक्षराक्षसगन्धर्व ब्रह्मराक्षसवेतालयमदूत मंत्रग्रहादि सर्वशूल रूपादिकान दूरस्थान समीपस्थान् भूतभविष्य वर्तमान दिवाचरान् मध्याचरान् रात्रिचरान् जलस्थान स्थलस्थान बालग्रहान पूतनास्फोटनग्रहान उदरस्थान ग्रहान सर्वान् नाशय नाशय दह दह हन हुन पच पच मर्दय मर्दय खादय खादय क्षोभय क्षोभय त्रोटय त्रोटय छिन्धि छिन्धि भिन्धि भिन्धि भेदय भेदय ग्रासय ग्रासय त्रासय त्रासय जृभस्व जृभस्व नुद नुद सुद सुद मोहय मोहय प्रसभावय प्रसभावय शोषय शोषय अघोरनारसिंह अघोरमूर्त अघोरभैरव महावीररहनुमन्त सर्वसत्त्वान् बंधय बंधय टं हुं फट् स्वाहा।
: ॐ नमो भगवते अघोरनारसिंह त्रिभुवनाधीश्वर महाभीमपराक्रम विधाभूत •प्रेतपिशाचशाकिनीडाकिनी यक्षराक्षस यमदूत ब्रह्म राक्षस कालभैरव कल्पान्त नानायक्षिणी कापालिकग्रहान् मर्दय मर्दय बंधय बंधय भक्षय भक्षय मारय मारय छेदय छेदय मथ मथ खादय खादय क्षोभय क्षोभय स्तम्भय स्तम्भय परकृतमंत्रयंत्रतंत्र चेंटक पुतलिजकादिकान् विध्वंसय विध्वंसय नाशय नाशय टः टः टः ट: हुं फट् स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते रामदूत महाभयनिवारक भूतप्रेतपिशाचादि ग्रहान् ब्रह्मराक्षसादि ग्रहान ग्रहस्थितान् सव्याधिस्थितान् बहिर्भूमिस्थितान् उपवेशस्थितान् अमूर्तस्थान् सूत्रकृतान् वस्त्रकृतान् अत्रकृतान् केशकृतान्मृत्तिकादिकृत्तिकादिकृतान् जीवविशेषकृतान् काष्ठकृतान् वर्मकृतान् पाषाणकृतान् रोमकृतान् जीवविशेषघटाकरान् कबंधाकारान् पीडाकारान् जलस्थान् अंतरिक्षस्थान् वृक्षावलंनमानान् औषधादिसुलभकृतान् शरीरस्थदाहशोककारकान् वायुसंज्ञकान् शूलसंज्ञकान् गतिछेदकारकानू रक्तशोषकान् मांसभक्षकान् कुण्डलाकृतकारकान् तीक्ष्णशूलकारकान् एकांगहारकान् कपिशूलकारकान् यंत्रप्रच्छेदकारकान् परस्परग्रहचमूकारान् नानावर्णान् सर्वचेतकान् नामसमाननगतान् तद्भयवेदनान् नाशय नाशय बंधय बंधय खादय खादय ग्रासय ग्रासय शोषय शोषय मथय मथय छेदय छेदय भेदय भेदय भीषण भीषण मर्दय मर्दय सेवस्व सेवस्व घातय घातय शस्त्रकीधाढलीकीरणमुदाटय मुदाटय अर्चरेण त्रासय त्रासय मोचय मोचय तान् सर्वानुद नुद सूदस्कर्थेन भस्मीकुरु कुरु भो रामदत्तवीक्ष्यं ठ ठ ठ ठ हुं फट् स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते अघोरेश्वर महाभय निवारणाय अघोरमूर्तये अघोरभैरवाय परकृत मंत्र यंत्र परतंत्र कृतचेतकं बंधय वस्त्रचेटकपुतलिका चेटक पुतनादीन हन हन भिन्धि भिन्धि छिन्धि छिन्धि उच्चाटय उच्चाटय चटकबन्धकेशचटककर्म चटकवस्त्र चटकमृत्तिका चटकगोमय चटकअन्न चेटकचेटशूलान् नाशय नाशय परदेशस्थित चेटकान् नाशय नाशय समीपस्थंचेटकान् नाशय नाशय ग्रहस्थित चेटकान् नाशय नाशय नाकान् नानाकृतिकारमारकचेटकान् शीघ्रं नाशय नाशय छेदय छेदय खादय खादय नानाबलिदान भक्षक छेदकचेटकान उद्घाटय उद्घाटय नानाछेदकारकचेटकान् भस्मीकुरु कुरु ह्रां ह्रां ह्रां हुं हुं हुं फट् स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते महागरुडाय एत्येहि आवेशय आवेशय दुष्टराक्षसान् छिन्धि छिन्धि महागरुडास्त्राय दुष्ट ज्वर भूतप्रेत पिशाच ब्रह्मराक्षसादिकृतां व्यथां छिन्धि छिन्धि महागरुडाय बंध बंध हुं फट् स्वाहा ।
'ओम नमो नारायणाय अनन्ताय वासुदेवाय
ओम नमो केशव नारायणाय पुरुषोत्तम
यह स्तोत्र सभी प्रकार से रक्षा करता है
इसके पाठ से भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र सक्रिय हो जाता है
ओम सुदर्शनाय विदमहे महाज्वालाय धीमहि तन्नो चक्र प्रचोदयात्
2. ॐ सहस्त्रार हूं फट्
3..ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय महाचक्राय महाज्वालाय दीप्तिरूपाय सर्वतो रक्ष रक्ष मां महाबलाय नमः
3..ॐ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय पराय परम पुरूषाय परमात्मने
परकर्म मंत्र यंत्र औषध अस्त्र शस्त्राणि संहर संहर
मृत्योर्मोचय मोचय ओम नमो भगवते सुदर्शनाय दीप्ते ज्वालादित्याय ,सर्वदिक् क्षोभण कराय हूं फट् ब्रहणे परं ज्योतिषे नमः।
(१) सुदर्शन चक्र में १०८ दाँतेदार ब्लेड होते हैं, और एक आँख के पलक पर कई मिलियन योजन (१ योजन = ८ किमी) की यात्रा करने की क्षमता होती है।
( २) यह किसी पर नहीं फेंका जाता है, बल्कि इच्छाशक्ति के द्वारा इसे दुश्मन के खिलाफ भेजा जाता है। इसमें हर चीज को नष्ट करने के लिए जबरदस्त मनोगत और आध्यात्मिक शक्ति है।
(३) यह चक्र जिसका नाम सुदर्शन है, दो शब्दों से जुड़ कर बना है, ‘सु’ यानि शुभ और ‘दर्शन’। चक्र शब्द ‘चरुहु’ और ‘करूहु’ शब्दों के मेल से बना है, जिसका अर्थ है गति (हमेशा चलने वाला)। यह चक्र हमेशा चलता ही रहता है।
(४) सुदर्शन चक्र की सनातन हिन्दू धर्म में बहुत मान्यता है जैसे वक़्त, सूर्य और ज़िंदगी कभी रूकती नहीं हैं वैसे ही इसका भी कोई अंत नहीं कर सकता। यह परमसत्य का प्रतीक है। शिव पुराण के अनुसार साक्षात आदि शक्ति सुदर्शन चक्र में वास करती हैं।
!!जय सद्गुरुदेव, जय महांकाल!!
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भगवान् विष्णु का प्रमुख आयुध है, जिसके माहात्म्य की कथाएँ पुराणों में स्थान-स्थान पर दिखाई देती है।
‘मत्स्य-पुराण’ के अनुसार एक दिन दिवाकर भगवान् ने विश्वकर्मा जी से निवेदन किया कि‘कृपया मेरे प्रखर तेज को कुछ कम कर दें,क्योंकि अत्यधिक उग्र तेज के कारण प्रायः सभी प्राणी सन्तप्त हो जाते हैं।’ विश्वकर्मा जी ने सूर्य को ‘चक्र-भूमि’ पर चढ़ा कर उनका तेज कम कर दिया। उस समय सूर्य से निकले हुए तेज-पुञ्जों को ब्रह्माजी ने एकत्रित कर भगवान् विष्णु के‘सुदर्शन-चक्र’ के रुप में, भगवान् शिव के ‘त्रिशूल′-रुप में तथा इन्द्र के ‘वज्र’ के रुप में परिणत कर दिया।
‘पद्म-पुराण’ के अनुसार भिन्न-भिन्न देवताओं के तेज से युक्त ‘सुदर्शन-चक्र’ को भगवान् शिव ने श्रीकृष्ण को दिया था। ‘वामन-पुराण’ के अनुसार भी इस कथा की पुष्टि होती है। ‘शिव-पुराण’ के अनुसार ‘खाण्डव-वन’ को जलाने के लिए भगवान् शंकर ने श्रीकृष्ण को ‘सुदर्शन-चक्र’ प्रदान किया था। इसके सम्मुख इन्द्र की शक्ति भी व्यर्थ थी।
‘वामन-पुराण’ के अनुसार दामासुर नामक भयंकर असुर को मारने के लिए भगवान् शंकर ने विष्णु को ‘सुदर्शन-चक्र’ प्रदान किया था। बताया है कि एक बार भगवान् विष्णु ने देवताओं से कहा था कि ‘आप लोगों के पास जो अस्त्र हैं, उनसे असुरों का वध नहीं किया जा सकता। आप सब अपना-अपना तेज दें।’ इस पर सभी देवताओं ने अपना-अपना तेज दिया। सब तेज एकत्र होने पर भगवान् विष्णु ने भी अपना तेज दिया। फिर महादेव शंकर ने इस एकत्रित तेज के द्वारा अत्युत्तम शस्त्र बनाया और उसका नाम ‘सुदर्शन-चक्र’ रखा। भगवान् शिव ने‘सुदर्शन-चक्र’ को दुष्टों का संहार करने तथा साधुओं की रक्षा करने के लिए विष्णु को प्रदान किया।
‘हरि-भक्ति-विलास’ में लिखा है कि ‘सुदर्शन-चक्र’ बहुत पुज्य है। वैष्णव लोग इसे चिह्न के रुप में धारण करें। ‘गरुड़-पुराण’ में ‘सुदर्शन-चक्र’का महत्त्व बताया गया है और इसकी पूजा-विधि दी गई है। ‘श्रीमद्-भागवत’ में ‘सुदर्शन-चक्र’ की स्तुति इस प्रकार की गई है- ‘हे सुदर्शन! आपका आकार चक्र की तरह है। आपके किनारे का भाग प्रलय-कालीन अग्नि के समान अत्यन्त तीव्र है। आप भगवान् विष्णु की प्रेरणा से सभी ओर घूमते हैं। जिस प्रकार अग्नि वायु की सहायता से शुष्क तृण को जला डालती है, उसी प्रकार आप हमारी शत्रु-सेना को तत्काल जला दीजिए।’
‘विष्णु-धर्मोत्तर-पुराण’ में ‘सुदर्शन-चक्र’ का वर्णन एक पुरुष के रुप में हुआ है। इसकी दो आँखें तथा बड़ा-सा पेट है। चक्र का यह रुप अनेक अलंकारों से सुसज्जित तथा चामर से युक्त है।
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इस विषय मे हमें धार्मिक ग्रंथों में अलग अलग जानकारी मिलती है। कई जगह ये कहा गया है कि सुदर्शन चक्र में कुल 1000 आरे थे। ऐसा इसीलिए है कि भगवान विष्णु ने इसे प्राप्त करने के लिए 1000 वर्षों तक, 1000 नील कमल के पुष्पों द्वारा भगवान शिव के 1000 नामों से स्तुति की थी। तब प्रसन्न होकर महादेव ने अपने तीसरे नेत्र से उस महान अस्त्र को उत्पन्न किया था।
शिव पुराण में वीरभद्र और श्रीहरि के युद्ध के संदर्भ में कहा गया है 👉
1000 आरों वाला वो महान अस्त्र (सुदर्शन चक्र) भयंकर प्रलयाग्नि निकालता है वीरभद्र की ओर बढ़ा किन्तु उस रुद्रावतार ने, जो बल में स्वयं रुद्र के समान ही था, उस महान अस्त्र को इस प्रकार मुख में रख लिया जैसे कोई जल को पी जाता है।
हरिवंश पुराण के अनुसार सुदर्शन चक्र में 108 आरे थे और इसे भगवान परशुराम ने श्रीकृष्ण को प्रदान किया था। 108 आरों का विवरण तब भी मिलता है जब महावीर हनुमान श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र को पकड़ कर अपने मुख में रख लेते हैं।
हालांकि इस चक्र का सबसे प्रासंगिक विवरण विष्णु पुराण में मिलता है। विष्णु पुराण के अनुसार सुदर्शन चक्र में कुल 12 आरे थे। भगवान विष्णु की तपस्या से प्रसन्न हो महादेव उन्हें सुदर्शन चक्र देते हुए कहते है -
"हे नारायण! सुदर्शन नाम का ये महान आयुध 12 आरों, 6 नाभियों एवं 2 युगों ये युक्त है। इनके 12 आरों में 12 आदित्यों का तथा 6 नाभियों में 6 ऋतुओं का वास है। अतः आप इसे लेकर निर्भय रूप से दुष्टों का संहार करें।"
वल्लभाचार्य कृत ‘सुदर्शन-कवच’
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वैष्णवानां हि रक्षार्थं, श्रीवल्लभः-निरुपितः। सुदर्शन महामन्त्रो, वैष्णवानां हितावहः।।
मन्त्रा मध्ये निरुप्यन्ते, चक्राकारं च लिख्यते। उत्तरा-गर्भ-रक्षां च, परीक्षित-हिते-रतः।।
ब्रह्मास्त्र-वारणं चैव, भक्तानां भय-भञ्जनः। वधं च सुष्ट-दैत्यानां, खण्डं-खण्डं च कारयेत्।।
वैष्णवानां हितार्थाय, चक्रं धारयते हरिः। पीताम्बरो पर-ब्रह्म, वन-माली गदाधरः।।
कोटि-कन्दर्प-लावण्यो, गोपिका-प्राण-वल्लभः। श्री-वल्लभः कृपानाथो, गिरिधरः शत्रुमर्दनः।।
दावाग्नि-दर्प-हर्ता च, गोपीनां भय-नाशनः। गोपालो गोप-कन्याभिः, समावृत्तोऽधि-तिष्ठते।।
वज्र-मण्डल-प्रकाशी च, कालिन्दी-विरहानलः। स्वरुपानन्द-दानार्थं, तापनोत्तर-भावनः।।
निकुञ्ज-विहार-भावाग्ने, देहि मे निज दर्शनम्। गो-गोपिका-श्रुताकीर्णो, वेणु-वादन-तत्परः।।
काम-रुपी कला-वांश्च, कामिन्यां कामदो विभुः। मन्मथो मथुरा-नाथो, माधवो मकर-ध्वजः।।
श्रीधरः श्रीकरश्चैव, श्री-निवासः सतां गतिः। मुक्तिदो भुक्तिदो विष्णुः, भू-धरो भुत-भावनः।।
सर्व-दुःख-हरो वीरो, दुष्ट-दानव-नाशकः। श्रीनृसिंहो महाविष्णुः, श्री-निवासः सतां गतिः।।
चिदानन्द-मयो नित्यः, पूर्ण-ब्रह्म सनातनः। कोटि-भानु-प्रकाशी च, कोटि-लीला-प्रकाशवान्।।
भक्त-प्रियः पद्म-नेत्रो, भक्तानां वाञ्छित-प्रदः। हृदि कृष्णो मुखे कृष्णो, नेत्रे कृष्णश्च कर्णयोः।।
भक्ति-प्रियश्च श्रीकृष्णः, सर्वं कृष्ण-मयं जगत्। कालं मृत्युं यमं दूतं, भूतं प्रेतं च प्रपूयते।।
“ॐ नमो भगवते महा-प्रतापाय महा-विभूति-पतये, वज्र-देह वज्र-काम वज्र-तुण्ड वज्र-नख वज्र-मुख वज्र-बाहु वज्र-नेत्र वज्र-दन्त वज्र-कर-कमठ भूमात्म-कराय, श्रीमकर-पिंगलाक्ष उग्र-प्रलय कालाग्नि-रौद्र-वीर-भद्रावतार पूर्ण-ब्रह्म परमात्मने, ऋषि-मुनि-वन्द्य-शिवास्त्र-ब्रह्मास्त्र-वैष्णवास्त्र-नारायणास्त्र-काल-शक्ति-दण्ड-कालपाश-अघोरास्त्र-निवारणाय, पाशुपातास्त्र-मृडास्त्र-सर्वशक्ति-परास्त-कराय, पर-विद्या-निवारण अग्नि-दीप्ताय, अथर्व-वेद-ऋग्वेद-साम-वेद-यजुर्वेद-सिद्धि-कराय, निराहाराय, वायु-वेग मनोवेग श्रीबाल-कृष्णः प्रतिषठानन्द-करः स्थल-जलाग्नि-गमे मतोद्-भेदि, सर्व-शत्रु छेदि-छेदि,मम बैरीन् खादयोत्खादय, सञ्जीवन-पर्वतोच्चाटय, डाकिनी-शाकिनी-विध्वंस-कराय महा-प्रतापाय निज-लीला-प्रदर्शकाय निष्कलंकृत-नन्द-कुमार-बटुक-ब्रह्मचारी-निकुञ्जस्थ-भक्त-स्नेह-कराय दुष्ट-जन-स्तम्भनाय सर्व-पाप-ग्रह-कुमार्ग-ग्रहान् छेदय छेदय, भिन्दि-भिन्दि, खादय, कण्टकान् ताडय ताडय मारय मारय, शोषय शोषय, ज्वालय-ज्वालय, संहारय-संहारय, (देवदत्तं) नाशय नाशय, अति-शोषय शोषय, मम सर्वत्र रक्ष रक्ष,महा-पुरुषाय सर्व-दुःख-विनाशनाय ग्रह-मण्डल-भूत-मण्डल-प्रेत-मण्डल-पिशाच-मण्डल उच्चाटन उच्चाटनाय अन्तर-भवादिक-ज्वर-माहेश्वर-ज्वर-वैष्णव-ज्वर-ब्रह्म-ज्वर-विषम-ज्वर-शीत-ज्वर-वात-ज्वर-कफ-ज्वर-एकाहिक-द्वाहिक-त्र्याहिक-चातुर्थिक-अर्द्ध-मासिक मासिक षाण्मासिक सम्वत्सरादि-कर भ्रमि-भ्रमि,छेदय छेदय, भिन्दि भिन्दि, महाबल-पराक्रमाय महा-विपत्ति-निवारणाय भक्र-जन-कल्पना-कल्प-द्रुमाय-दुष्ट-जन-मनोरथ-स्तम्भनाय क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपी-जन-वल्लभाय नमः।।
पिशाचान् राक्षसान् चैव, हृदि-रोगांश्च दारुणान् भूचरान् खेचरान् सर्वे, डाकिनी शाकिनी तथा।।
नाटकं चेटकं चैव, छल-छिद्रं न दृश्यते। अकाले मरणं तस्य, शोक-दोषो न लभ्यते।।
सर्व-विघ्न-क्षयं यान्ति, रक्ष मे गोपिका-प्रियः। भयं दावाग्नि-चौराणां, विग्रहे राज-संकटे।।
।।फल-श्रुति।।
व्याल-व्याघ्र-महाशत्रु-वैरि-बन्धो न लभ्यते। आधि-व्याधि-हरश्चैव, ग्रह-पीडा-विनाशने।।
संग्राम-जयदस्तस्माद्, ध्याये देवं सुदर्शनम्। सप्तादश इमे श्लोका, यन्त्र-मध्ये च लिख्यते।।
वैष्णवानां इदं यन्त्रं, अन्येभ्श्च न दीयते। वंश-वृद्धिर्भवेत् तस्य, श्रोता च फलमाप्नुयात्।।
सुदर्शन-महा-मन्त्रो, लभते जय-मंगलम्।।
सर्व-दुःख-हरश्चेदं, अंग-शूल-अक्ष-शूल-उदर-शूल-गुद-शूल-कुक्षि-शूल-जानु-शूल-जंघ-शूल-हस्त-शूल-पाद-शूल-वायु-शूल-स्तन-शूल-सर्व-शूलान् निर्मूलय, दानव-दैत्य-कामिनि वेताल-ब्रह्म-राक्षस-कालाहल-अनन्त-वासुकी-तक्षक-कर्कोट-तक्षक-कालीय-स्थल-रोग-जल-रोग-नाग-पाश-काल-पाश-विषं निर्विषं कृष्ण! त्वामहं शरणागतः। वैष्णवार्थं कृतं यत्र श्रीवल्लभ-निरुपितम्।। ॐ
इसका नित्य प्रातः और रात्री में सोते समय पांच - पांच बार पाठ करने मात्र से ही समस्त शत्रुओं का नाश होता है और शत्रु अपनी शत्रुता छोड़ कर मित्रता का व्यवहार करने लगते है.
शुभमस्तु!