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  • Mantra Tantra Yantra Vigyan Gurudev Dr. Narayan Dutt Shrimaliji

MTYV Sadhana Kendra -
Monday 30th of July 2018 09:29:28 PM



सिद्धाश्रम का मंत्री मंडल  Cabinet of Siddhashram - षोडश गुरु मंडल  दादा गुरुदेव परमहंस स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज

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हम जब भी सदगुरुदेव निखिल को स्मरण करते है....उसी छण में सिद्धाश्रम का स्वमेव ही अनुभव होता है.....क्यों कभी सोचा है.....कभी विचार किया है.......क्योकि जो ही हमारे हृदय कमल में निखिल नाम का गुंजरण हुआ ....आज्ञा चक्र में स्वम ही निखिल बिम्ब उपस्थित हुआ....उसी छण में हमें सिद्धाश्रम का आभास हुआ.....इसिलीये हुआ ....निखिल ही शिव है...शिव ही निखिल है.....निखिल ही सिद्धाश्रम है......समस्त सिद्धाश्रम निखिल में ही अवस्थित है......सिद्वाश्रम के कण कण में निखिल नाम का गुंजरण है........

यह सिद्धाश्रम अनंत कोटि ब्रहमांडो की आध्यात्मिक चेतना का केंद्र है.....कभी सोचा है सिद्धाश्रम की क्या कार्य प्रणाली है........

क्योकि जब हम कहते है की......गुरुवर ले चल परली पार.......जहाँ विराजे सत चित आनंद योगेश्वर सरकार.....निखिल सरकार...

१. दादा गुरुदेव परमहंस स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज......जो सिद्धाश्रम के प्राणाधार है.....

२. परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद जी महाराज.....जो सिद्धाश्रम के संचालक है...सदगुरुदेव निखिल के निर्देशन में ही सिद्धाश्रम में योजनाए बनती है.....कार्यान्वित की जाती है....षोडश गुरु मंडल उन्ही की आज्ञा से अपने अपने विभागों के कार्यो को करते है.....

३. षोडश गुरु मंडल......सदगुरुदेव ने कई बार षोडश गुरु मंडल का जिक्र किया था....शिविरों में दादा गुरुदेव के पूजन के साथ साथ उनका भी पूजन करवाया था......सप्तऋषि के नाम तो सबको स्मरण है ही......वे सप्तऋषि भी इस षोडस गुरूमंडल में उपस्थित है......जो सिद्धाश्रम का मंत्रिमंडल है........जिनका कार्य अनंत कोटि ब्रहमाण्डो के बिच में सामजस्य स्थापित करना है......आध्यात्मिक चेतना ...ज्ञान विज्ञानं का विस्तार करना है.......आपको आश्चर्य होगा.....इस पृथ्वी लोक में जितनी तरक्की साइंस ने की है......सिद्धाश्रम का साइंस उस से कई पीढ़ी आगे है......हज़ारो गुना ज्यादा डेवलप्ड है......

आइंस्टीन ने कणाद की अणु थ्योरी पर काम करना शुरू किया....जिसमे दो परमाणु मिलकर एक अणु का निर्माण करते हैं...वास्तव में उसका उद्देश्य कुछ और ही था....अंग्रेज भारत के प्राचीन विज्ञानं के ग्रंथो को यहाँ से चुरा कर ले गए...उसी में नागार्जुन के "लोह शास्त्र" ग्रन्थ का अध्ययन आइंस्टीन ने किया .इस ग्रन्थ में पारद विज्ञानं के एक से बढ़कर एक सूत्र दिए गए है...पारद बंधन के साथ साथ इसमें देह बंधन की प्रक्रिया भी बताई गयी है...और विस्तार से समझाया गया है की...पारद और लोहे के अणुओ को यदि एकीक्रत कर दिया जाये....तो स्वर्ण निर्माण की पर्किर्या पूर्ण हो जाती है...लेकिन आइंस्टीन अणुओ को एकीक्रत करने के बजाये उनके विखंडन की प्रक्रिया में लिप्त हो गया....जिसका परिणाम दुनिया के सामने परमाणु बम के रूप में आया....हिरोशिमा एंड नागाशाकी के लाखो करोडो लोगो के जान चली गयी...इस सनकी वैज्ञानिक की वजह से....आज भी दुनिया के बहुत से देश इस महाविनाशक शक्ति के के घमंड में बाकी छोटे देशो को डरते रहते है...

आइंस्टीन ने अपने जीवन के आखरी समय में लिखा था की काश कुछ जीवन और मिल जाता तो में भारत के उन ऋषियों से सूर्य विज्ञानं सिख पाता....जो सूर्य के सात किरणों में से ११२ परमाणुओं को पहचान सकते है.....अलग कर सकते है.....पदार्थ परिवर्तन कर सकते है.....

फिर भी इस अननत कोटि ब्रह्मांडो में से पृथ्वी लोक में परमहंस स्वामी निखिलेश्वर......हमारे पूज्य सदगुरुदेव डॉ...नारयण दत्त श्रीमाली के रूम में अवतरित हुए,...सीधे साधे गृहस्थ में रहते हुए .....जो उन्होंने ज्ञान की ज्योति जलाई .....अपनी प्राणश्चेतना को शिष्यों में प्रवाहित कर के......जो निखिल शिष्य तैयार किए है....वह आने वाले हज़ारो लाखो सालो तक निखिल नाम की पवन ज्योति इस पृथ्वी लोक पर प्रज्वलित रखेंगे.......

कृष्ण वासुदेव जगद्गुरु कहलाये....कृष्ण वन्दे जगद्गुरु......
हमारे सदगुरुदेव तो गुरुवो के भी गुरु है.....ब्रह्माण्ड गुरु है.....निखिल वन्दे ब्रह्माण्डगुरु......
आपके श्री चरणों में कोटि कोटि प्रणाम.....

असित गिरि सममस्याद कज्जलम सिन्धु पात्रे ,
सुरतरुवर शाखा लेखनी पत्र मुर्वी |
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालम,
तदपि तव गुणानाम ईश पारम न याति ||

अर्थात हे गुरुदेव ...
यदि इस सृष्टि के समस्त पर्वतों को पीसकर उन्हें समस्त समुद्रों के जल में घोलकर स्याही बना दी जाये और सम्पूर्ण वृक्षों को काटकर उनकी लेखनी बना दी जाये और स्वयं साक्षात् शारदा देवी , (जो विद्या की अधिष्टात्री देवी हैं) अनन्त काल तक आपके गुणों का वर्णन करती रहे ..... वह लेखनी घिस जाएगी...... वह स्याही कम पड जाएगी............
मगर आपके गुणों का वर्णन पूर्ण नहीं हो पायेगा........

और अंत में मेरे प्रिय वरिष्ठ गुरुभाई स्वामी प्रेम आनंद जी.....सदगुरुदेव निखिल के बहुत ही आत्मीय है.....उनका प्रिय भजन ..सिद्धाश्रम वासी आ जाओ......

सदगुरुदेव निखिलेश्वर की जय हो....
गुरु की दृष्टि तो साधक की ओर अखण्ड रुप से है ,
किन्तु साधक ही गुरु की ओर दृष्टि नहीँ करता है ।
गुरु तो जीव को अपनाने हेतु तत्पर हैँ किन्तु
...अभागा साधक उनसे मिलने को आतुर कहाँ है ?
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चलो दुनिया आपस में बाँट लेते है…समंदर तुम्हारा, लहेरे तुम्हारी…
सुरज तुम्हारा, रोशनी तुम्हारी…आसमान तुम्हारा, सितारे तुम्हारे…
चाँद तुम्हारा, चाँदनी तुम्हारी…हाँ… *गुरुदेव*…सब कुछ तुम्हारा…
और..सिर्फ“एक तुम हमारे”
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गुरु अपने आप में महामाया की सर्वश्रेष्ठ कृति है.
गुरुत्व साधनाओं से, पराविद्याओं की कृपा और सानिध्य से आता है.
वह एक विशेष उद्देश्य के साथ धरा पर आता है और अपना कार्य करके वापस महामाया के पास लौट जाता है.
बिना योग्यता के शिष्य को कभी गुरु बनने की कोशिश नही करनी चाहिये.
गुरु का अनुकरण यानी गुरु के पहनावे की नकल करने से या उनके अंदाज से बात कर लेने से कोई गुरु के समान नही बन सकता.
गुरु का अनुसरण करना चाहिये उनके बताये हुए मार्ग पर चलना चाहिये, इसीसे साधनाओं में सफ़लता मिलती है.
शिष्य बने रहने में लाभ ही लाभ हैं जबकि गुरु के मार्ग में परेशानियां ही परेशानियां हैं, जिन्हे संभालने के लिये प्रचंड साधक होना जरूरी होता है, अखंड गुरु कृपा होनी जरूरी होती है.
बेवजह गुरु बनने का ढोंग करने से साधक साधनात्मक रूप से नीचे गिरता जाता है और एक दिन अभिशप्त जीवन जीने को विवश हो जाता है .
गुरु भी सदैव अपने गुरु के प्रति नतमस्तक ही रहता है इसलिए साधकों को अपने गुरुत्व के प्रदर्शन में अपने गुरु के सम्मान को ध्यान रखना चाहिए .


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