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क्या आप ऐसे शिष्य हैं? kay aap ese shisya hai क्या आप ऐसे शिष्य हैं? kay aap ese shisya hai

MTYV Sadhana Kendra -
Sunday 28th of June 2015 02:31:54 PM


क्या आप ऐसे शिष्य हैं?

शिष्य द्वारा अपने हृदय में गुरु को धारण करना ही पर्याप्त नहीं हैं, अपितु यह तो प्रारंभ मात्र हैं –
“यह उतना महत्वपूर्ण नहीं हैं, कि गुरु को कितने शिष्य याद करते हैं? यह भी उतना महत्वपूर्ण नहीं हैं,  कि “गुरु” शब्द को कितने शिष्यों ने अपने हृदय पटल पर अंकित किया हैं?
"यह भी उतना महत्वपूर्ण नहीं हैं, कि कितने शिष्य गुरु सेवा करने की कामना अपने दिल में रखते हैं?
"यह भी उतना महत्वपूर्ण नहीं हैं, कि कितने शिष्य गुरु की प्रसन्नता हेतु सचेष्ठ हैं?”
“-अपितु अत्यधिक महत्वपूर्ण यह हैं, कि गुरु कितने शिष्यों को याद करता हैं!”
“-अपितु अत्यधिक महत्वपूर्ण यह हैं, कि गुरु के होंठों पर कितने शिष्यों का नाम आता हैं!”
“-अपितु अत्यधिक महत्वपूर्ण यह हैं, कि कितने शिष्यों के नाम गुरु के हृदय पटल पर खुदे होते हैं!”
“-अपितु अत्यधिक महत्वपूर्ण यह हैं, कि गुरु ने किस शिष्य की सेवा स्वीकार की हैं!”
“-अपितु अत्यधिक महत्वपूर्ण यह हैं, कि गुरु किस शिष्य पर प्रसन्न हुआ हैं!”
और गुरु के होंठों पर शिष्य का नाम उच्चारित हो, गुरु के हृदय पटल पर शिष्य का नाम अंकित हो, गुरु सेवा का अवसर प्राप्त हो तथा शिष्य के कार्यों से गुरु प्रसन्न हो, यह शिष्य जीवन का परम सौभाग्य हैं  तथा  प्रत्येक शिष्य की यही प्राथमिक इच्छा होती हैं! जिस शिष्य को ऐसा दुर्लभ सौभाग्य प्राप्त होता हैं, वह देव तुल्य हो जाता हैं, उसके जीवन से सभी पाप, दुःख, पीड़ा, समस्याएं आदि दूर हो  जाती हैं, अणिमादि सिद्धियाँ उसके सामने नृत्य करती हैं, उसका व्यक्तित्व करोड़ों सूर्य से भी ज्यादा तेजस्वी हो जाता हैं! गुरु सेवा कोई आवश्यक नहीं हैं, की शारीरिक रूप से गुरु गृह में रहकर ही सम्पन्न की जायें, अपितु महत्वपूर्ण गुरु सेवा यह हैं, कि शिष्य कितना अधिक गुरु द्वारा प्राप्त ज्ञान के द्वारा लोगों को लाभान्वित करता हैं तथा कितने अधिक लोगों को गुरु से जोड़ने का कार्य करता हैं, निःस्वार्थ, निष्कपट भाव से!


जब गुरुदेव जन्मे, धरती बन गयी गोद,
हो उठा पवन चंचल झूलना झूलाने कोl
भौरों ने दिशि दिशि गूँज बजायी शहनाई
आई सुहागिनी कोयल सोहर गाने कोl
करुणा ने चूमा भाल, दिया आशीर्वाद,
पीड़ा ने शोधी राशि, प्रेम ने धरा नामl
जय हो रूपा के पुत्र - घोष कर उठी बीन,
अम्बर उतरा आँगन में करने को प्रणामll
दर्शन ने भेंटी दृष्टि, भावना ने भाषा,
सूरज ने आभा-ओज, नदी ने गति प्रवाहl
सुन्दरता ने दर्पण, पूजाओं ने अर्चन,
बन गया हृदय आकर खुद ही सागर अथाहll
कल्पना पकड़ कर साथ खेलने लगी,
होने लगे उन्मुक्त लगे रहस्य के दृढ कपाटl
कांपने लगा अपवर्ग, सिहरने लगा स्वर्ग,
न्यौछावर हो हो गयी मनुज संस्कृति विराटll
मिल गयी राग को देह, आंसुओं को वाणी,
पा गया सत्य आकर, हो गया असत क्षीणl
निर्गुण बन गया सगुन, स्वरवती हुयी वसुधा,
हंस उठी प्रकृति ज्यों दीपक में बाती नवीनll
फिर एक दिवस सोलह रत्नों का हार पहन,
बांसुरी बजाता निकला जब वह सिरजनहारl
प्रकृति ठगी रह गयी, चकित भय गगन,
ज्यों बूँद बहक जायें छू पुरवाई बयारll
राधा सी जग की गली गली झूमने लगी,
तन्मय हो गया विश्व सारा ज्यों वृन्दावनl
तट-पनघट सब बन गए एक नव बंशीवट,
गूंजे गीत हवा में, खिले कुसुम उपवन उपवन ll
बालक दौड़ने लगे पीछे होकर विमुग्ध,
रवि का अनुमान जिस तरह करता हैं प्रकाशl
वृद्धों ने उठकर शिर मंगल तिलक दिया,
सावन का वन्दन करता हैं ज्यों जेठ मॉसll
संतों ने गीत सुना मन में सोचने लगे,
यह गीत कि या कोई नवयुग की गीता हैंl
हैं शब्द शब्द उपनिषद और श्रुति तान तान,
दर्शन तो जैसे उज्जवल गंग पुनीत हैंll
सब और हर्ष ही हर्ष, विमर्श न रहा शेष,
हो गए अस्त दुःख-दैन्य-दाह-तन-रोग-शोकl
पर देख धरा का यह उत्कर्ष-कीर्ति-वैभव,

जल उठा ईर्ष्या से सबका सब देवलोकll


 साधना की सफलता का पूरा श्रेय अपने गुरू की कृपा पर ही है , क्योंकि साधना वही बतलाते और वही पूरी भी कराते है ।
साधना में अपना बल तो इतना समझो कि जहाँ तक हो सके , उनकी आज्ञा का पालन हो जाय , इससे अधिक अपने हाथ की कोई बात नहीं ।
संसार से भागने का प्रयत्न न करो , क्योंकि संसार तुम्हारे भीतर भी है । बाहर के संसार से तो तुम भाग भी सकते हो परन्तु अन्तर के संसार से कहाँ भागोगे इस गुरू की शरण जाओ , वहाँ ऐसा द्वन्द नहीं है ।

आत्मा पर जब वह वस्त्र (कोश) चढ़ जाते हैं, जीव इन्हें धारण कर लेता है, तो फिर उन्हें उतारना भी नहीं चाहता। बस माँ को जब दया आती है, उन वस्त्रों से जीव घबरा जाता है तो माँ उतार भी अवश्य देती है। वही तो गुरू हैं। उनसे कहो, प्रार्थना करो कि- हे नाथ! एक बार तो मुझे इन आवरणों से मुक्त कर दो एक अवसर तो ऐसा हो कि मैं अपने उस सत्य-स्वरूप को देक पाउँ। कभी यह आवरण समाप्त ही नहीं हुए। एक फटा तुरन्त दूसरा पहिना दिया। एक-दो नहीं, लाखों ही वस्त्र पहिने, कभी ऐसा अवसर ही नहीं आया कि मैं कुछ देर निरावरण (त्रिगुणातीत) हो जाता।

इसलिए यह अज्ञान छूटेगा नहीं। जब प्रभु (गुरू) से अत्यन्त स्नेह करोगे, तो फिर वह तुम्हारे न चाहते हुए भी ऐसा उपकार तुम्हारे साथ कर देंगे। क्या आश्चर्य नहीं है कि शरीर से भी अधिक मोह हमें शरीर के वस्त्रों से हो गया है।
इस मोह को प्रभु तभी छुड़ाते हैं, जब साधक (जीव) सब कुछ त्याग कर प्रभु से मिलने को ललचाता है परन्तु नहीं मिल पाता, तो गुरू जानबूझकर इस अन्तिम आवरण को दूर कर अपने में मिला लेते हैं। उनके लिए भले ही एक खिलवाड़ हो, परन्तु जीव को तो महान् कष्ट का सामना होता है। कैसे अपने अहम् को सौंपे? अरे यह सौंपते ही तो अपना सब कुछ चला जाता है, कुछ रहता ही नहीं। कितने युगों से कमाया था, कितने युगों से पोषा था, जीव कैसे त्याग दे। परन्तु वह होते हैं, जो प्यार ही प्यार में उसका सब कुछ छीनकर, फिर उसे अपनासब कुछ दे देते हैं। ऐसे गुरू भगवान की जय हो, जय हो।

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