Wednesday 30th of August 2017 05:43:59 PM


प्रेम क्या है ?
प्रेम ताे जीवन है, सम्पूर्ण हृदय है, पूर्णतः समाधि है, प्रेम ताे पृथ्वी है, झिलमिलाता हुवा सत्य का सूत्र है, मानसराेवर कि अथाह गहराइ है, हिमालयका सर्वाेच्च शिखर "गाैरि शंकर "है ।
पर नहीं , ईन सब उपमाअाैं से प्रेम काे परिभाषित नहीं किया जा सकता है, जीवन ताे चुक जाता है , पर प्रेम कि समाप्ति हाे हि नहीं सकती , न इसका अाेर है, न छाेर है, यह हृदय भी नहीं है, क्याेकि वह ताे प्रेमका एक छाेटा सा अंश है, अाैर समाधि में भी प्रेम की पूर्णत्व कहां है ? हम प्रेम काे पृथ्वी कह कर 'प्रेम' की संकीर्णता काे ही स्पष्ट कर पाते हैं , क्याेकिं धरती काे नापा जा सकता है , पर प्रेम काे नापना कहां सम्भव है , मानसराेवर की जांची जा सकती है, हिमालयके सर्वाेच्च शिखर पर मानव पांव रखकर खडा हाे सकता है, पर प्रेम .....प्रेम ताे इन सब से परे है, इन सब से उंचा है , वह ताे अाकाश है, जिसकी न उचांई नापी जा सकती है , न जिसका अाेर- छाेर अांका जा सकता है, ईसीलिए ताे प्रेम काे अनन्त अाकाश कहा है , कबीर ने " गगन मण्डल बिच डेरा" कहा है सूर ने "लाली" कहा है , ताे मीरा ने "अलख अगाेचर ईसर कहा है ....
इसीलिये मै कहता हूं कि प्रेम की परिभाषा काे भली प्रकार से जान लेना चाहिये , यह ताे जीवन की तीर्थ यात्रा है , जिसके भाग्य में है, वही इस पगडंडी पर पांव वढा सकता है , वही अपने-अाप में प्रार्थनामय बन सकता है, वही अपने- अाप काे खाे सकता है , प्रभु काे पा सकता है, ईश्वर से एकाकार कर सकता है, जिसने प्रेम काे समझा ही नहीं पह ईश्वर तक पहुंच भी कैसे सकेगा , गुरु काे पूर्णता के साथ पा भी कैसे सकेगा ?
क्याेंकि प्रेम में दाे छाेर हैं ही नहीं, एक ही छाेर है, एक ही किनारा है, प्रेम में द्वैत हाे भी नहीं सकता .....जाे ये कह रहा है-- मैं प्रेम करता हूं, वह झूट है, जाे यह कह रही है -- मैं प्रेम करती हूं , वह असत्य उच्चारण कर रही है....क्याेकिं "करने का" मतलव काेई अाैर भी है.....अाैर जहां "काेई अाैर" भी है , वहां प्रेम हाे ही नहीं सकता , प्रेम ताे सम्पूर्ण समर्पण है , अपने- अाप काे मिटा देने की क्रिया है, अपने "अहं" काे गला देने की प्रक्रिया है, अाैर जहां ये प्रक्रिया समाप्त हाेती है , वहीं से प्रेम का प्रारम्भ हाेता है ।
अाैर जब मैं "प्रेम" शब्द का प्रयाेग करता हूं, ताे लाेग चाैकन्ने हाेकर देखने लग जाते हैं , कि गुरूदेव ने यह क्या कह दिया , क्याेंकि उनका दिमाग संकीर्ण है, छाेटी सी तंग काेठरी में बन्द है, उनके दिमाग में प्रेम का तात्पर्य वासना है, प्रेम का मतलव शरीर है , प्रेम मतलव गिद्ध दृष्टि है , ईन्द्रिय लाेलुपता है, स्वार्थ है, नारी शरीर काे निगलने की कुत्सित भावना है, अाैर चालाकी मक्कारी पर चढा‌ हुवा नकली प्यार का झीना सा अावरण है ।
प्रेम शब्द बना है "प्र" से ..."प्र" जाे अद्वैत है, द्वैत है हि नहि.....जहां दाे की भावना हाेती है , वहां प्रेम नहीं हाे सकता, इसिलीये पति, पत्नी से प्रेम कर ही नहीं सकता क्याेंकि उसमें अहंकार है, कि वह पति है, वह कुछ अाैर है, कुछ ऊंचा है..... अाैर जब यह है ताे वहां समर्पण कहां है, प्रेम कहां है ? वहां ताे पति- पत्नी केवल सामाजिकता की दृष्टि से दिखावा करते है,... नाटक करते है, वह उसकाे मेरी "प्राण-प्रिया" कहकर धाेखा देता है, वह मैं 'अापके चरणाे की दासी' कह कर छलावा करती है --लाेगाें काे दिखाने के लिए, समाज काे समझाने के लिये , एक-दुसरे से स्वार्थ पुर्ति के लिए स्वांग करते है, इसमे प्रेम कहा है, दिखावा ताे है , स्वार्थ ताे है, पर प्रेम कहा है ?
प्रेम ताे अपने-अाप काे गलाकर मिटा देने की क्रिया है, जहां "प्रेमी "अाैर "प्रेमिका" दाे शब्द हैं, वहां भी प्रेम नहीं है, क्याेंकि प्रेम में दाे का अस्तित्व हाेता ही नहीं, जब प्रेमिका अपने-अाप काे गला देती है, मिटा देती है, तब वहां प्रेम का प्रस्फुरण है, वहां प्रणय की सुवास है, वहां प्रीत की सुगंध है ।
प्रेम ताे बीज है ईश्वर का , जब मिट जाता है, तब ईश्वर की प्राप्ति हाे जाती है, प्रेम ताे प्रार्थना है, समर्पण है, पूर्णता के साथ मिटा देने की प्रक्रिया है, प्रेम ताे पीडा है, सुखद अाैर अानन्ददायक पीडा.......
-- प्रेम हृदय का उच्छवास है , जाे हृदय काे चीरकर पुरे बह्माण्ड में समा जाता है ।
-- प्रेम अांसू की बून्द है, जाे अांख ताे ढुलकाती है , पर पलक उस अांसू की बूंद काे अपने पास राेक लेती है, क्याेंकि उसमें उसे प्रियतम का बिम्ब दिखाइ देता है ।
-- प्रेम निरहंकारिता है, सम्पूर्ण जीवन का गाैरव है, जाे दाेनाें बांहें पसार कर पूरे ब्रह्माण्ड काे भर लेता है अपने-अाप में.......
-- प्रेम प्राणत्व है, क्याेंकिं इसी के माध्यम से अाकाश में, ऊंचाई की अाैर उठा जा सकता है, सुदूर ऊंचाईयाे में पहुंचा जा सकता है, अनन्त अाकाश में उडा जा सकता है, सम्पुर्णता के साथ ईश्वर से एकाकार हाेकर पूर्णत्व पाया जा सकता है ।
वे साैभाग्यशाली हैं, जिन्हाेंने प्रेम किया है, लाखाें- कराेडाें में से काेई एक अाध ही भाग्यशाली हाेता है , जिनके नसीब में प्रेम हाेता है......जिन्हाेंने प्रेम किया ही नहीं , वे जीवन काे उत्सव बना ही नहीं सकते, वे ध्यानावस्थित हाे ही नहीं सकते, वे डूब कर अखण्ड समाधि में लीन हाे ही नहीं सकते, वे सही अर्थाें में गुरुत्व प्राप्त कर ही नहीं सकते, ईश्वर काे प्राप्त कर ही नहीं सकते ।
इसीलिये ताे मैं कहता हूं कि जीवन का श्रेष्ठ तत्व "प्रेम" है, सम्पूर्ण मनुष्यता का मूल उत्स 'प्रेम' है, हृदय काे हिलाेराें अालाेडित कर देने की क्रिया 'प्रेम' है, प्रेम ताे वसन्त है, फाल्गुन मास की पुरवाई है, अन्दर उतर कर ब्रह्म काे चीन्हने का राजपथ है, प्रेम ताे अनुग्रह है, प्रार्थना है, त्याग है, समर्पण की सम्पूर्णता है, "पूर्णमद: पूर्णमिदं" की सही अर्थाें में व्याख्या है, मेरी दृष्टि में प्रेम नृत्य है, जीवन की सम्पूर्ण पूर्णता है, साेने की कलम से लिखा हुअा साैभाग्य है, जीवन के अानन्द का उत्सव है, ईश्वर मैं लिन हाेने की प्रक्रिया है, ब्रह्म से साक्षात्कार करने का सुगम-सहज मार्ग है ।
" ब्रह्म " पर बाेलना अासान है , ईश्वर पर ग्रंथ लिख देना सहज-सुगम है, वेदाें की व्याख्या करना सरल है, उपनिषदाें काे परिभाषित करना सुविधा जनक है , पर ......"प्रेम" पर बाेलना , लिखना, या समझाना दुष्कर है, कठिन है, फिर भी मैंने इस ग्रंथ में प्रेम काे समझाने का सफल प्रयास किया है, अाकाश की ऊंचाइयां नापने की सफल प्रयास की है, मानसराेवर के अथाह जल में सुखद डुबकी लगाने की, तैरने की क्रिया समझाने की अानन्ददायक उपलब्धि प्रदान की है ।
यह पुस्तक प्रेम का जीवन्त नृत्य है, जीवन का सम्पूर्ण महारास है, अानन्द का सही अर्थाें में महाेत्सव है, उमंग है, उत्साह है, डुबने की सम्पूर्ण प्रक्रिया है , ईश्वरत्व काे पूर्णता के साथ प्राप्त करने की कुन्जी है, समाधि का प्रारंभिक अाैर अंतिम द्वार है, ध्यान कि सम्पूर्ण क्रिया है, धारणा का अाधार है , जीवन अानन्दमय जीवन जीने का महाद्वार है, जिसमें प्रवेश के लिये अाप सब काे निमन्त्रण है, .....स्वागत है ।
"फिर दुर कहीं पायल खनकी "

गुरु शब्द में बहुत सारी आशा और सकारात्मकता है, ऐसा कहा भी जाता है कि जिसके सिर पर उसके गुरु का हाथ है उसको भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है | गुरु होने पर व्यक्ति को लगता है कि उसके सिर पर ऐसी छत्रछाया है जिसके कारण वह सभी प्रकार की समस्याओं और अनहोनियों से सुरक्षित है, उसके सभी कार्य निर्विघ्न(बिना रूकावट) हो जायेंगे और उसके द्वारा जाने-अनजाने हो गए सभी पापों को गुरु क्षमा करेंगे और उसे बुरे कर्मों के दंड का सामना नहीं करना पड़ेगा | गुरु पर विश्वास करने वाले व्यक्ति की श्रद्धा देवी देवताओं पर होने वाली श्रद्धा से अधिक होती है क्योंकि उसके अंतर्मन में यह निश्चित होता है कि जो कार्य देवी देवता भी नहीं कर सकते वह मेरा गुरु कर सकता है इसका एक कारण यह भी है कि देवी देवता उसके सामने नहीं है जबकि गुरु से वह अपने मन की बात करके अपनी इच्छा या समस्या का समाधान पा सकता है | प्रत्येक व्यक्ति की अपनी श्रद्धा और विश्वास पर निर्भर करता है कि उसके मन में उसके गुरु का क्या स्तर है | जब व्यक्ति की श्रद्धा, विश्वास और उसके गुरु का स्तर तीनो मिल जाते है तो संसार का हर असंभव कार्य बड़ी सरलता से हो जाता है |
केवल गुरु की शरण में रह कर ही यह सीखा जा सकता है कि धर्म की बैसाखी का सहारा लेकर निराकार को समझना असंभव है क्योकि धर्म का त्याग करके ही आध्यात्मिक बना जा सकता है ।
ऐसा ज्ञान एक सच्चे गुरु द्वारा ही मिलता है कि कर्मों की पूँजी केवल आत्मा बनती है शरीर से कोई कर्म नहीं बनता और उनके फल शरीर द्वारा भोगे जाते है, वह शरीर मनुष्य का हो या किसी जीव जंतु का हो शरीर भोगने के लिए है जबकि प्राय: यह कहा जाता है कि व्यक्ति शरीर से जो भी करता है उसी का फल भुगतना पड़ता है | धार्मिक स्थान पर जाकर भी व्यक्ति की आत्मा (ध्यान/विचार) घर पर है तो वहां जाने का कोई लाभ नहीं है बिना आत्मा के कर्म करना शरीर को कष्ट देना है | पिछले मनुष्य जन्म के पाप भी व्यक्ति ने चौरासी लाख प्रकार के जन्म लेकर ही भोगे थे तो आज व्यक्ति किस बात से डरता है । आज प्रत्येक व्यकि अपनी क्षमता और उपलब्धता के अनुसार भ्रम और भय से मुक्ति की खोज में लगा हुआ है परन्तु भ्रम और भय से मुक्ति तभी हो सकती है जब व्यक्ति के पास ऐसा गुरु हो जो उसे सही ज्ञान द्वारा अन्धविश्वास और सुविधा या दूसरों से लाभ लेने के लिए बनी मान्यताओं से मुक्त कर सके |
गुरु की पहचान का पहला लक्षण यह है कि गुरु किसी वेशभूषा या ढोंग के अधीन नहीं है और उसके चेहरे पर सूर्य के सामान तेज दिखता है और उसकी छठी इंद्री पूर्णत: विकसित होती है जिसके द्वारा वह भूत, वर्तमान और भविष्य को देख पाता है | सच्चा गुरु ज्ञान देने में प्रसन्न होता है ज्ञान को छुपाने वाला या भ्रमित करने वाला सच्चा गुरु नहीं होता | यह बात भी सभी जानते है कि संसार में जीवित रहने के लिए धन की आवश्यकता है, अकारण आवश्यकता से अधिक धन का मांगना गुरु के लालची और स्वार्थी होने का चिन्ह है , गुरु को स्वार्थी होने का अधिकार नहीं है स्वार्थ संसार के लिए है अध्यात्म में स्वार्थ का त्याग होना अति आवश्यक है जिसका सही ज्ञान सच्चे गुरु द्वारा ही मिलता है |
गुरु केवल देने(दूसरो) के लिए है गुरु द्वारा वचन और कर्म व्यक्ति के कल्याण में काम आते है, अपने लिए लेने वाला गुरु नहीं होता, गुरु जिसे सांसारिक वस्तुओं की चाह नहीं होती, गुरु का सम्बन्ध आत्मा से है शरीर से नहीं, जो धन और जाति के कारण भेदभाव नहीं करता | गुरु जो प्रत्येक शिष्य की प्रेम, विश्वास और लगन के अनुसार उसके अध्यात्मिक स्तर को बढाने में सही मार्गदर्शन करता है | गुरु शिष्य के लिए जो कुछ भी करता है उसे कभी भी जतलाता नहीं है, ना ही अपने शिष्य द्वारा प्राप्त किए धन, मन-सम्मान, अध्यात्मिक स्तर का श्रेय लेता है | गुरु अपने शिष्य से ऐसे कर्म करवाता है जो केवल शिष्य हित में होते है, गुरु काअपने शिष्य के कर्म निजी लाभ के लिए प्रयोग करना वर्जित है | गुरु की महिमा देवी देवताओं से अधिक है क्योंकि देवी देवता सीमित शक्ति/ कला के मालिक है, जिस व्यक्ति को जैसा चाहिए वह उस शक्ति/ वस्तु के मालिक देवी देवता की उपासना करके अर्जित कर लेता है जबकि गुरु सीधा निराकार से जुड़ा होने के कारण सभी कुछ ठीक प्राप्त करने में सहायक बनता है |
गुरु के पास इच्छा, आवश्यकता या विवशता के समय कर्मों की पूँजी को देने या लेने का अधिकार होता है । किसी व्यक्ति की भक्ति, प्यार, नम्रता, समर्पण इत्यादि से प्रसन्न हो कर भाग्य द्वारा ना मिलने वाली वस्तु को दे देना गुरु की इच्छा पर निर्भर है । सालों बाद किसी गुरु के आशीर्वाद से संतान हो जाना या बीमारी ठीक हो जाना गुरु द्वारा ऐसे कर्म दे देना होता है जो उस व्यक्ति के भाग्य में नहीं होता । किसी व्यक्ति द्वारा अपनी वाणी, भाव इत्यादि द्वारा अपने शुभ कर्मों का दुरूपयोग करने पर गुरु को उसके शुभ कर्मो को लेकर किसी और को देने का अधिकार होता है । सम्पूर्ण गुरु की कृपा या आशीर्वाद से सांसारिक और आध्यात्मिक सभी प्रकार की इच्छाओं को पूर्ण किया जा सकता है । व्यक्ति को समय समय पर गुरु की आवश्यकता इसलिए भी होती है कि गुरु ऐसे गुर सिखाता और बताता है जो पुस्तकों में नहीं मिलते ।
ज्ञान की प्राप्ति से केवल ज्ञानी बना जा सकता है जबकि गुरु के पास आध्यात्मिक ज्ञान होने के साथ साथ देवी देवताओं का साथ और निराकार की कृपा भी होती है | सांसारिक ज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान में बहुत बड़ा अंतर है, ज्ञानी को आध्यात्म का ज्ञान हो यह आवश्यक नहीं है और गुरु को सांसारिक ज्ञान हो यह भी आवश्यक नहीं है | सांसारिक उन्नति के लिए सांसारिक ज्ञान का होना आवश्यक है और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अध्यात्मिक ज्ञान होना चाहिए | कभी कभी ज्ञानी केवल ज्ञान तक सीमित रह जाते है क्योंकि उनके पास वो कृपा नहीं होती जिससे वो निराकार के रहस्य को समझ सके | आवश्यकता से अधिक ज्ञान भ्रम का कार्य करता है जो व्यक्ति को निराकार और उसकी कृपा से वंचित रखता है | गुरु के पास कृपा नामक वो चाबी होती है जिससे कोई भी सांसारिक या अध्यात्मिक ताला खुल सकता है | यदि गुरु चाहे तो अपने शिष्य को वह दिव्य चाबी पाने के योग्य बनने का मार्ग बता सकता है | समस्या तब आती है जब व्यक्ति स्वयं ही वह चाबी खोजने या बनाने का प्रयत्न करता है क्योंकि निराकार का नियम है कि कृपा रूपी चाबी केवल गुरु के द्वारा ही मिलती है | आधा अधूरा ज्ञान अंधकार के सामान है जो व्यक्ति को और भ्रमित करता है, ऐसे में कृपा और आशीर्वाद प्रकाश का कार्य करते है | गुरु कितना भी ज्ञान दे वो कम समझना चाहिए क्योंकि जो इतना दे सकता है उसके स्वयं पर कितनी और अधिक ईश्वरीय कृपा होगी | कभी भी यह नहीं समझना चाहिए कि मुझे गुरु ने सारा ज्ञान दे दिया और मुझ पर भी गुरु जितनी ही कृपा हो गयी है |
गुरु द्वारा एक गुप्त ज्ञान यह भी दिया जाता है कि निराकार की कृपा कभी भी दो लोगो पर एक सामान नहीं होती, संसार में दिखने वाला सभी कुछ एक दुसरे से भिन्न है जैसे पहाड़, नदिया, पेड़ पौडे, जीव जंतु इत्यादि | निराकार के स्वभाव में नक़ल करना नहीं है, एक बार जो बन गया वह दोबारा नहीं बनता, मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो दूसरों को देख कर आकर्षित होता है और नक़ल करने को विवश हो जाता है |
गुरु और शिष्य का अटूट सम्बन्ध है जो एक बार स्थापित हो जाये तो फिर कई जन्मों तक चलता है, जिस शिष्य के कर्म बहुत अधिक बलवान हों और उन कर्मो का फल अपने आप मिलना हो तो ऐसे शिष्य को ज्ञान देने गुरु स्वयं शिष्य के पास जाते है, जबकि साधारण कर्मों वाले शिष्यों को गुरु की खोज करनी पड़ती है | शिष्य कई प्रकार के होते है इनमे भक्त शिष्य होते है जो गुरु से दूर रहे या पास रहे इनके मन में गुरु के लिए श्रद्धा और भक्ति होती है, ये गुरु के वचनों पर चलना और गुरु की सेवा करके अपना जीवन बिताने को ही सब कुछ मानते है और अपना तन, मन, धन गुरु के लिए लगा देते है, गुरु के साथ या पास रहकर इन्हें अलौकिक आनंद की अनुभूति होती है | ऐसे शिष्यों से गुरु को आत्मिक प्रेम होता है I
मोक्ष प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को निराकार का ज्ञान होना आवश्यक है और निराकार का ज्ञान होने के लिए व्यक्ति का अध्यात्मिक होना आवश्यक है, आध्यात्मिक होने के लिए पूर्ण गुरु का आशीर्वाद और कृपा होनी अति आवश्यक है |
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