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Monday 2nd of July 2018 10:14:32 AM


एक साधक और दूसरा प्रकृति ,इन दोनों का परस्पर क्या सम्बन्ध है ?
क्या प्रकृति साधक के जीवन में आवश्यक है ?

अगर तुम्हारे मानस में प्रकृति का चिंतन पेड़ -पौधे ,हरियाली ,पहाड़ नदी,समुद्र ,हिमालय है ,तो यह गलत है ,वह प्रकृति नहीं है ,वह तो एक प्राणश्चेतना है ,.....और जिस प्रकार मनुष्य की प्राणश्चेतना है उसी प्रकार उन पत्थर ,हिमालय की ,पेड़ो की पौधों की और वनस्पतियो की चेतना है i
प्रकृति का मूल तात्पर्य शंकराचार्य ने पहली बार स्पष्ट किया है और यही प्रश्न शंकराचार्य के सामने भी रखा गया था -
-क्या साधक और प्रकृति एक है ?
-क्या इन दोनों में अंतर है या पारस्परिक साहचर्य और सम्बन्ध है ?
शांकरभाष्य में उन्होंने दोनों में अंतर बताया कि प्रकृति जीवन के मूल्यों को कहा जाता है !हमारे जीवन के चिंतन,विचार,धारणाये क्या है उसको प्रकृति कहते है !हम कई बार आम बोलचाल की भाषा में कहते है कि उसकी प्रकृति अच्छी नहीं है ,तुम उस से मत मिलो !हमने कभी इस प्रकार का उत्तर देते समय इस चिंतन को मानस में नहीं रखा कि इस प्रकृति शब्द का मनुष्य के लिए क्यों प्रयोग हुआ I
मैं कहता हूँ इस व्यक्ति से मिलना चाहिए क्योकि इसकी प्रकृति ठीक है ,वह बात को समझता है ,लड़ाई झगड़ा नहीं करता ,और बाहर उस पान वाला उसकी प्रकृति बिलकुल विपरीत है !हमारी साधना के लेबल से उसकी प्रकृति बिलकुल नहीं मिलती ,....यहाँ पर प्रकृति पेड़ पौधा इस शब्दों का वनस्पति का कही उल्लेख नहीं आया है ,
प्रकृति मूल अर्थ ,जीवन को आप किस रूप में लेते है ,उसको ही प्रकृति कहते है

मनुष्य दो प्रकार के होते है -अधिकांश मनुष्य नींद लेते हुए ही जिन्दा रहते है 
तुम में से अधिकांश व्यक्ति नींद ले रहे है २४ घंटे ,और चल रहे है ,देख रहे है ,खाना खा रहे है ,मगर नींद में !क्योकि तुम्हे इस बात का कोई महत्त्व ,चिंतन ,विचार है ही नहीं जीवन में आने वाले समय में क्या करना है ?जीवन का लक्ष्य क्या है ?जीवन का प्रयोजन क्या है ?हम नहीं सोचते !इसलिए व्यक्ति चलता रहता है ,वह अपनी ही नींद लेते हुए चलता रहता है ,उसको इस बात का भी पता नहीं चलता कि पास से कौन निकल गया ,क्या निकल गया !मनुष्य इतना राक्षस वृति का हो जाता है कि उसको इस बात का होश ही नहीं रहता कि किसके साथ किस प्रकार का व्यव्हार रखु ,मेरे जीवन का चिंतन ,विचार कैसा होना चाहिए ?इस क्रिया को प्रकृति और मनुष्य को शास्त्रों में ब्रम्ह और माया कहा गया है !माया का मतलब जो सुप्त अवस्था में है माया है I
इसलिए दुर्गा सप्तशती में कहा गया है -या देवी सर्वभतेषु निद्रारूपेण संसिथा
इस सारी मनुष्य जाती को माया रुपी देवी ने एक नींद में स्थापित कर दिया है ,इसलिए वे अपने जीवन को व्यर्थ के प्रयोजन में ढ़ो रहे है !जीवन का कोई चिंतन ,कोई लक्ष ,कोई मर्म नहीं है। जिसके जीवन का कोई लक्ष्य ,कोई चिंतन क्या है ?जो इस बात को सोचता ही नहीं वह केवल माया के वशीभूत होता है ! इसलिए धन को भी माया कहा गया है और निद्रा को भी माया कहा गया है ,यहाँ व्यक्ति का चिंतन केवल अपने स्वार्थ से सम्बंधित है ,उसमे जीवन का कोई चिंतन नहीं है वह एक क्षण बैठ कर यह सोचते नहीं कि मेरे जीवन का लक्ष्य ,उद्देश्य क्या है ?

क्या हमारा लक्ष्य ,उद्देश्य इस पूरे जीवन को नींद में ही व्यतीत कर देना है ?

और इस प्रकार से बिना किसी प्रयोजन के,बिना किसी लक्ष्य के,बिना किसी विचार के ऐसे कई जीवन हम जी लेते है .मगर ज्योही हम माया को हटाते है ,स्वतः ही प्रकृति से जुड़ने की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है ,....और जितना हटते है उतना ही हम प्रकृति से जुड़ जाते है !माया का हटना और प्रकृति से जुड़ना अपने आप में एक सामानांतर कार्य है !इसलिए प्रभु को प्रकतिमय कहा गया है ,वेदो में भगवन विष्णु को प्रकृति -रूपेण कहा गया है ,क्योको वे माया से रहित है !इसका मतलब यह हुआ माया अलग चीज है और प्रकति अलग चीज है I

जहा माया है वह मीन है और मीन का तात्पर्य है अपना अहम् ,अपना घमंड ,कोई मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता ,क्या है ?मैं ऐसा कर लूंगा ,मैं धन कमा लूंगा तो इसको देख लूंगा ,....और वह कुलाचें भरता रहता है !आज नहीं तो कल का दिन ठीक हो जायेगा ,महीने भर बाद तो ऐसा हो ही जायेगा ,और नहीं तो छह महीने बाद मैं ऐसा कर लूंगा !अभी मन लो सुख नहीं मिला तो जवानी में मिल जायेगा ,इस पत्नी से सुख नहीं मिला तो पड़ोसन से मिल जायेगा ,पड़ोसन से सुख नहीं मिला तो किसी और स्त्री से मिल जायेगा Iवह अपने सुख के लिए इन सभी से सम्बन्ध स्थापित करते रहता है ,और ऐसा इसलिए करता है कि सुख का चिंतन उस नींद में करता है ,उस माया में करता है Iजब व्यक्ति के मन में यह भावना ,यह हिलोर उठे मैं कही जा कर शांति से बैठु,और सोचे मैं क्यों हूँ ?और कहा हूँ ? इतना सोचना ही उस माया से एक इंच हटना है ,क्योकि वह बिलकुल स्पष्ट उत्तर देगी ,....और ऐसा नहीं सोचना माया में लिप्त होना है !इसलिए वह साधक बन ही नहीं सकता जब तक वह प्रकृति से एकरूप नहीं हो पाता !साधक बनने की पहली शर्त ही यही है कि वह जो कुछ है वह समाप्त हो जाये ! इसलिए शास्त्रों में शिष्यत्व को मृत्यु कहा गया है I

उपनिषदों में एक ही बात ,एक ही चिंतन ,एक ही विचार यह रखा गया है जिस क्षण व्यक्ति अपने आप को पहचानने की कोशिश करता है ,....और अपने अआप को पहचानने के लिए दूसरे के सहारे की जरुरत नहीं होती और जब आदमी ऐसा चिंतन करने लग जाता है उस समय वह आदमी माया से अलग होना प्रारम्भ हो जाता है ,माया से अलग हटने की क्रिया ही प्रकति से एक रूपता स्थापित करती है !नींद और मृत्यु में बहुत ही सामंजस्य है मृत्यु चिर निद्रा है और मृत्यु के पूर्व हम जीवित निद्रा में डूबे हुए है ,हम केवल कल्पनाओ में ही डूबे हुए है कि ऐसा नहीं तो ऐसा हो जायेगा और अधिकांश व्यक्ति इन कल्पनाओ में ही जीवित है I- आदमी जीवन भर छल,झूठ ,पाप करता हुआ अंत में मृत्यु की गोद में सो जाता है ,तब सोचता है कि यह क्या हुआ ?मैंने पूरी जिंदगी इतने छल किये कष्ट उठाये ,पर कभी जीवन में अपने आप को पहचानने का प्रयास ही नहीं किया ,.....और जब वह पत्नी या पति ,बेटा या बेटी ,सारे सम्बन्धी ,मेरा धन,मकान, मेरा नहीं ,कुछ साथ नहीं जाता तो मेरा अपना क्या है ?

बिना प्रकृति के साथ मिले व्यक्ति साधक बन ही नहीं सकता ,क्योकि जब तक आप माया को छोड़ेंगे नहीं आप प्रकति के पास जा ही नहीं सकते !आदमी के पास एक कल्पना के अलावा कुछ नहीं होता ,क्योकि हम सब माया में लिप्त है ,...और हमारे जीवन का चिंतन वह माया है I
गीता ने भगवान कृष्ण ने कहा है -अर्जुन ,जब तू स्तिथप्रज्ञ हो जायेगा तब तू उनसे युद्ध कर सकेगा !स्तिथप्रज्ञ का मतलब है तू ये समझ कि ये सब कुछ नहीं है 
और तुम्हारे सामने भी एक जीवन का युद्ध है !इस जीवन के युद्ध में ९८ प्रतिशत लोग हार जाते है ,और हार इसलिए जाते है कि उनके पास कृष्ण जैसा कोई व्यक्ति नहीं है ,जो गीता का चिंतन दे सके ,और कृष्ण कह रहे है कि गांडीव उठा ,....और अर्जुन कह रहा है मैं कैसे गांडीव उठाऊ ,मैं कैसे तीर चलाऊ,सामने दादा खड़े है !जब मैं छोटा था तब इन्होने मुझे गोद में लेकर बड़ा किया है !
अरे ,बड़ा किया है पर यह तेरे दादा नहीं है ,यह तो इस से पहले पच्चीस बारे दादा बने है ,पच्चीस बार तेरे पिता बने होंगे पच्चीस बार तेरे शत्रु बने होंगे ,अगर तुम्हे जीतना है तो स्तिथप्रज्ञ बन ,....और हारना है तो ठीक है I

और मैं भी तुम्हारे प्रश्न का यही उत्तर दे रहा हूँ -यह जीवन एक महाभारत का युद्ध है ,जिसमे सहस्त्र कौरव सामने खड़े है !तुम्हारे पास केवल पांच पांडव है ,इन पांच पांडव के माध्यम से तुम्हे विजय प्राप्त करनी है ,...और तुम्हे उस चिंतन का अर्थ समझ में आ सके ,विचार समझ में आ सके कि तुम्हे इस जीवन संग्राम में सफलता प्राप्त करनी ही है ,इसी जीवन में !
जिस क्षण तुम्हारे जीवन में यह चिंतन स्पष्ट रूप धारण कर लेगा ,तब तुम निश्चित ही जीवन का महा भारत जीत लोगे

माँ-बाप ,भाई-बहन ,धन दौलत ,ऐश्यर्य ,सब तुम्हारी कल्पनाये है !प्राप्त कुछ नहीं हो रहा है पर कल्पनाये तुम्हारे पास असंख्य है !आदमी नींद में स्वप्न देखता है ,तुम सब जिन्दा स्वप्न देख रहे हो ,ऐसा हकीकत में संभव नहीं है !अगर होता तो भारत में १ अरब कारे बनती ,क्योकि १ अरब आदमी है जबकि केवल ६०-७० लाख कारे है ,जब १ अरब लोगो के पास ६०-७० लाख गाड़िया है और तुम खुद दो-तीन करे रखने का सोच रहे हो !
सलिए मैं तुमसे कह रहा हूँ तुम नींद लेते हुए जिन्दा व्यक्ति हो !समय मिलता है तुम उन सपनो को ले कर बैठ जाते हो ,.....और लाखो-करोड़ो व्यक्ति दिवा स्वप्न में ही जिंदगी काट रहे है !इसलिए माया से ग्रस्त हो कर आपकी पूरी जिंदगी ऐसे ही बीत जाती है ,इसमें कोई नै बात नहीं है ,इस माया के लिए कोई प्रयत्न करना नहीं पड़ता ,माया के लिए परिश्रम भी नहीं करना पड़ता ,माया के लिए कुछ सोचना ही नहीं पड़ता ,माया तो केवल एक कल्पना है !
मनुष्य के पुरे शरीर को जलने के बाद कुछ मुट्ठी राख बचती है ,तुम्हारे शरीर का मूल्य भी यदि है !इसलिए अभी तक का जो यह जो चिंतन तुम्हारा चला आ रहा है वह तुम्हे मृत्यु की ओर धकेल रहा है ,और जब यह चिंतन आता है कि मुझे उस रास्ते चलना है जिस पर चल कर जीवन का प्रकृति का उस ईश्वर का उस ब्रम्ह का साक्षात्कार कर सकू ,...वह से तुम माया से ऊपर उठते हो 
तुम जितना माया से काटोगे उतना ही प्रकृति से जुड़ोगे और जितना प्रकृति से जुड़ोगे उतना ही साधक बन पाओगे ,इस लिए प्रकृति को भी साधक कहा गया है 
तुम यह समझते हो मखमल के गद्दे पर माला जप लोगे ,यह संभव नहीं है जब तुम माया से हटोगे और प्रकृति से जुड़ोगे तब उस ब्रम्ह से साक्षात्कार सकोगे ,तब अहसास हो सकेगा कि जीवन क्या है I

जब बुद्ध अपनी पत्नी यशोधरा और अपने पुत्र राहुल को छोड़ चले गए तब उन्होंने ज्ञान का एक नया चिंतन चिंतन ढूंढा ,उनने यह ढूंढा कि मनुष्य अपने शरीर में पूरी प्रकृति और अपने आप को उतर सकता है !जब बुद्धत्व प्राप्त हुआ तो वह अपने राज्य में गया और सबसे पहले अपने महल में गया ,तो सामने यशोधरा और राहुल आये ,यशोधरा ने कहा आप आये सिद्धार्थ बहुत अच्छा लगा ,अंदर बैठो

कौन सिद्धार्थ ?मैं तो यहाँ भिक्षा मांगने आया हूँ ,मैं तो भिक्षुक हूँ ,.....और तुम्हारे सामने इसलिए आया हूँ हूँ कि तुम सामने खड़ी रहो उसके बावजूद भी मेरे आँखों के अंदर तुम्हारे लिए पत्नी का भाव न आ सके ,....इसलिए मैं सबसे पहले तुम्हारे पास आया हूँ ,कमैन यह अहसास करना चाहता हूँ कि क्या मैंने अपने आप को अपने आदर उतरा है ?और उतरा है तो मेरे अंदर यह भाव नहीं आएगा कि तुम मेरी पत्नी हो ,.....जब मृत्यु के बाद मेरा यह चिंतन समाप्त होना है तो मैं उस चिंतन को अभी समाप्त कर देना चाहता हूँ Iसोचता हूँ यधोधर में एक माया थी और बुद्ध में एक प्रकृति थी ,दोनों आमने सामने खड़े थे ,इतने वर्षो के बाद भी अपनी पत्नी के सामने खड़े होने के बावजूद उनकी आँखों में विकार नहीं आया !क्योकि यह होगा ही ,आज नहीं तो बीस साल बाद जब मैं मर जाऊंगा और जलाया जाऊंगा तो यशोधरा रोती हुयी महलो में ही आएगी,राहुल भी रोयेगा तो जरूर पर वापस महल में ही आएगा ,...और उस समय जो घटना घटती थी आज ही घाट गयी ,इसलिए जो घटना २० साल बाद घटनी थी आज ही अपनी आँखों से देख लेना चाहता हूँ ! 
"बुद्ध पहले व्यक्ति थे जो आँख खोल कर चले "

इसलिए जो जगा हुआ नहीं है वह पूर्ण माया के चिंतन में है ,ज्योही जागने की क्रिया प्रारम्भ करोगे ,त्योंही तुम प्रकृति के पास जाने की कोशिश करोड़ ,तुम्हारे अंदर की प्रकृति जागेगी ,उस प्रकृति पुरुष की चेतना का यदु होगा ,और वही प्रकृति पुरुष अपने आप में ब्रम्ह है ,जिसमे तुम्हे एक आनंद की ांभोत्ति एक उपलब्धि प्राप्त हो पायेगी ,तब तुम बुद्ध बन सकोगे ,पर ऐसा चिंतन,विचार के बाद में भी हो सकता है तुम शमशान में जा कर सो जाओ ,हो सकता है ,.और ऐसा हो भी रहा है ,और ऐसा होगा भी ,जो मरा हुआ है !इसमें कोई नै बात नहीं है जो मारा हुआ है,नींद में है उसका अंतिम स्थान श्मशान ही है I
इसलिए जब तुम कह रहे हो हम साधक है,हम शिष्य है ,हम योगी है ,...मैं समझता हूँ यह सब प्रवंचना है !तुम कह रहे हो हम शिष्य है तो साधक के आहे की स्थिति है शिष्यता !शिष्यता प्राप्त करने के लिए तुम्हे ठोकर लगाना अनिवार्य है क्योकि जब ठोकर लगेगी तो तो तुम मोह निद्रा से जागोगे ,और यह ठोकर तुम्हे किस क्षण लगे कहा नहीं जा सकता 
मैं समझता हूँ तुम्हारा प्रश्न तुम्हे ठोकरे मारने का प्रश्न है ,.....शायद तुम्हे जिंदगी में ठोकर लगे ,....और लगे ,मैं तो ऐसा चाहता हूँ जल्दी ही लगे 
तुम्हे अहसास हो सके की तुम्हारे जीवन का लक्ष्य ,उद्देश्य कुछ और है ,तुम उस लक्ष्य और उद्देश्य के पथ पर गतिशील हो सको ,बाकि लोग तो उस पगडण्डी पर भी नहीं है ,तुम काम से काम उस पगडण्डी पर तो खड़े हो ,उस पगड़ी पर बुढ़ापा नहीं आएगा ,कमर नहीं झुकेगी ,उस पगडण्डी पर मृत्यु नहीं होगी स्मशान में जा कर राख नहीं बनोगे ,इन साडी क्रियाओं को ही प्रकति कहते है !
और जहा प्रकृति बनती है व्यक्ति अपने आप में साधक बन जाता है ,जब साधक बन जाता है तो अपने आप में पूर्ण गुरुमय बन जाता है ,और ऐसा ही आषीर्वाद तुम्हे हूँ की आप सही अर्थो में साधक बन सके ,सही अर्थो में प्रकतिमय बन सके ,.....और आपको ठोकर लग सके ,...और बहुत जल्दी ठोकर लग सके ,मैं आपको ऐसा आशीर्वाद दे रहा हूँ

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