Saturday 2nd of September 2017 02:57:29 PM



प्रेम होता है इसके आगे स्वर्ग की सम्पदा भी फीकी है प्रत्येक 
शिष्य को हर हाल में गुरु को प्रसन्न रखना चाहिए क्योकि 
हरी रूठे तो ठौर है गुरु रूठे नहीं ठौर अगर हरी रूठ जाते है तो
गुरु हरी को मना सकता है मगर गुरु नाराज हो जाने पर हरि 
भी गुरु को नहीं मना सकते इसलिए शिष्य को हर हाल में 
गुरु को प्रसन्न रखना आना चाहिए ।
जो गुरु कहे वह करे जो गुरु करे उस बात पर ध्यान न दे क्योकि
वे किस क्षण क्या करते है शिष्य अगर यह समझ ले तो वह 
स्वयं ही गुरु बन जाता ।
शिष्य के लिए गुरु ही माता और पिता, बंधू सखा होते है 
अतएव उसे अपनी समस्त चेतना गुरु चरणो में ही लगाये 
रखनी चाहिए
शिष्य वह है जो नित्य गुरु मन्त्र का जप, उठते, बैठते, सोते, 
जागते करता रहे शिष्य को गुरु के सोने के बाद ही सोना 
चाहिए और गुरु के उठने से पहले उठ जाना चाहिए ।
चाहे गुरु कितना भी कठिन एवं असंभव कार्य सौपे , तब भी 
शिष्य का एक मात्र कर्तव्य बिना न नुकुर किये उस काम में लग
जाना चाहिए और उस काम को पूरा भी करना चाहिए ।
गुरु ,शिष्य की बाधाओ को अपने ऊपर ले लेते है अतएव शिष्य 
का भी धर्म है कि वह गुरु का की चिन्ताओ एवं परेशानियों 
को अपने ऊपर लेकर गुरु को चिंता मुक्त करे ।
शिष्य का मात्र एक ही कर्तव्य होता है और वह यह है कि 
अपने हृदय में स्थायी रूप से गुरु को स्थापित करना चाहिए आगे चलकर ऐसा ही शिष्य गुरु के हृदय में स्थापित हो 
जाता है ।
जब होठो से गुरु शब्द उच्चारण होते ही गला अवरूद्ध व् 
आँखों से अश्रु प्रवाहित होने लग जाए तो समझो कि शिष्यता 
का पहला कदम उठ गया है ।
जब 24 घंटे गुरु का अहसास हो ,भोजन करते ,उठते ,बैठते,
हसते , गाते हर समय ऐसा लगे कि वे मेरे साथ है तब 
समझे कि आप शिष्य कहलाने के योग्य है ।
Note :- bahut logo ko es ka matlab nahi samjh aata hai ki ye itana asan hote hoye bhi kyon nahi kar pate hai ? es jawab hai aap ne kai kai janm me guru ka hanth chhod diya aur us ki baate nahi mani jis aap es yug me bhi aap un ke sath to hai par aaj bhi aap wahi kar rahe hai us pichhle kai janmo me kiya guru ki seva nahi karna un ki aagya ka palan nahi karana ye baate siddh karti hai aap fir hanth chhooda kar aalag ho jaye ?

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