Gurudev Dr. Narayan Dutt Shrimali

महासरस्वती_महाविद्या Mahasaraswati Mahavidya

महासरस्वती_महाविद्या Mahasaraswati Mahavidya

॥ सरस्वती बीजमन्त्र साधना ॥
हम सदैव साधना करते रहते हैं। कोई महाविद्या की तो कोई भैरव की,परन्तु बहुत कम लोग है, जो सरस्वती माँ की साधना की ओर ध्यान देते हैं। जबकि अगर माँ सरस्वती की कृपा हमें मिल जाए तो संसार का कोई ज्ञान नहीं है, जो हमें प्राप्त न हो सके, चाहे वह तन्त्र का ज्ञान हो या कोई और ज्ञान। परन्तु कुछ लोगों के सिवा सभी साधक सरस्वती साधना को बहुत हल्के में लेते हैं और यदि करते भी हैं तो कितना ? सिर्फ एक या दो माला पर ही आकर रुक जाते हैं और समझ लेते हैं कि बस हो गयी माँ प्रसन्न। परन्तु ऐसा नहीं है, हमें सरस्वती साधना को गम्भीरता से लेना होगा, क्यूँकि संसार का हर शब्द, हर मन्त्र, हर ज्ञान सरस्वती के बिना शून्य है।
प्रस्तुत साधना माँ सरस्वती की बीजमन्त्र साधना है, जिसे बीजोक्त सरस्वती स्थापन साधना के नाम से जाना जाता है। इस साधना से माँ सरस्वती की कृपा तो प्राप्त होती ही है। साथ ही माँ के बीजमन्त्र " ऐं" में जो शक्ति विद्यमान है, वह साधक की बुद्धि में स्थापित हो जाती है। अब सोचिए जब बीज मन्त्र की शक्ति आपकी बुद्धि में समाहित हो जाए तो क्या बाकी रह जाता है। साधक ज्ञान मार्ग में निरन्तर प्रगति करता ही है। अधिक लिखने से कोई लाभ नहीं है। आप स्वयं साधना करे और लाभ प्राप्त करे।
साधना विधि :-----------
साधना वसन्त पंचमी से प्रारम्भ करे। इसके अलावा इसे किसी भी नवरात्रि के प्रथम दिवस अथवा किसी भी सोमवार से आरम्भ किया जा सकता है। समय रात्रि ९ के बाद का रहे या यह ब्रह्म मुहूर्त में भी की जा सकती है। आसन वस्त्र सफ़ेद हो तथा आपका मुख उत्तर या पूर्व की ओर हो। अपने सामने बाजोट पर एक सफ़ेद वस्त्र बिछाएं और माँ सरस्वती का कोई भी चित्र और सद्गुरुदेवजी का चित्र अथवा गुरु पादुका स्थापित कर दें।
अब सबसे पहले सामान्य गुरुपूजन सम्पन्न करके गुरुमन्त्र की चार माला जाप करें। फिर सद्गुरुदेवजी से सरस्वती बीज मन्त्र साधना सम्पन्न करने की अनुमति लें और उनसे साधना की निर्बाध पूर्णता एवं सफलता के लिए प्रार्थना करें।
इसके बाद भगवान गणपतिजी का स्मरण करके एक माला गणेश मन्त्र की जाप करें और उनसे साधना की निर्विघ्न पूर्णता एवं सफलता के लिए प्रार्थना करें।
इसके पश्चात साधक को साधना के पहले दिन संकल्प अवश्य लेना चाहिए।
इसके लिए साधक दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प करे कि “मैं अमुक पिता का नाम अमुक गोत्र अमुक परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानन्दजी गुरुजी का शिष्य होकर आज से सरस्वती बीज मन्त्र साधना का अनुष्ठान प्रारम्भ कर रहा हूँ। मैं ११ दिनों तक नित्य १०८ माला मन्त्र जाप सम्पन्न करूँगा। हे, माँ! आप मेरी इस साधना को स्वीकार कर मुझे सिद्धि प्रदान करें और इसकी ऊर्जा को आप मेरी बुद्धि में स्थापित कर दें।”
इसके बाद चित्र के ठीक सामने कुमकुम से कपड़े के ऊपर ही मैथुन चक्र का निर्माण करे, पर यह ज्यादा बड़ा न हो।
अब मैथुन चक्र पर केसर मिश्रित चावल की ढेरी बनाएं और उस ढेरी पर सरस्वती यन्त्र स्थापित करे।
अब यन्त्र के सामने ५ चावल की ढेरी बनाएं एक ही लाइन में और उन पर एक-एक सुपारी स्थापित करें। हर सुपारी पर केसर या कुमकुम की स्याही से बीजमन्त्र "ऐं" का अंकन करें। फिर माँ सरस्वती का सामान्य पूजन करें और यन्त्र का भी पूजन करें। घी का दीपक जलाएं। भोग में खीर या पञ्च मेवा अर्पण करें, जो कि साधना के बाद स्वयं खाना है।
अब निम्न मन्त्र पढ़ते हुए सुपारी पर कुमकुम अर्पण करे -----
ॐ मेधा स्वामिनी नमः।
ॐ शक्ति दात्री नमः।
ॐ बीज स्वरूपिणी नमः।
हर मन्त्र को २१ बार पढ़े और सुपारी पर कुमकुम अर्पण करें। कुमकुम अर्पण करते समय अपने बाएँ हाथ के अँगूठे से आज्ञा चक्र वाली जगह पर निरन्तर स्पर्श करते रहें। सिर्फ स्पर्श करना है, दबाना नहीं है।
इसके बाद सरस्वती के बीज मन्त्र की १०८ माला जाप करें ---
बीज मन्त्र :------------
।। ऐं ।।
AYING.
हर माला के बाद सुपारी पर चढ़ाए हुए कुमकुम को मस्तक पर लगाना है और यह क्रम हर सुपारी के साथ करना है अर्थात एक माला के बाद पहली सुपारी से कुमकुम ले, दूसरी के बाद दूसरी सुपारी से ले। इस तरह यह क्रम जारी रखे। जप के बाद सद्गुरुदेव तथा माँ से प्रार्थना करे।
इसी तरह यह साधना आपको ग्यारह दिनों तक सम्पन्न करनी है। सोमवार से शुरु करने की दशा में अगले सोमवार के पश्चात गुरुवार तक करनी होगी।
साधना समाप्ति के बाद यन्त्र पूजाघर में रख ले। अन्य सामग्री कपड़ा, चावल, सुपारी किसी देवी मन्दिर में दक्षिणा के साथ अर्पण कर दें। आप स्वयं साधना के बाद इसका प्रभाव अनुभव करने लगेंगे। तो देर कैसी? साधना कर लाभ प्राप्त करे और माँ के बीज मन्त्र की शक्ति को बुद्धि में स्थापित करे।
या कुन्देन्दु-तुषारहार-धवला या शुभ्र-वस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमन्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।
या ब्रह्माच्युत-शंकर-प्रभृतिभिर्देवैः सदा पूजिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥ १॥
दोर्भिर्युक्ता चतुर्भिः स्फटिकमणिमयीमक्षमालां दधाना
हस्तेनैकेन पद्मं सितमपि च शुकं पुस्तकं चापरेण ।
भासा कुन्देन्दु-शंखस्फटिकमणिनिभा भासमानाऽसमाना
सा मे वाग्देवतेयं निवसतु वदने सर्वदा सुप्रसन्ना ॥ २॥
आशासु राशी भवदंगवल्लि
भासैव दासीकृत-दुग्धसिन्धुम् ।
मन्दस्मितैर्निन्दित-शारदेन्दुं
वन्देऽरविन्दासन-सुन्दरि त्वाम् ॥ ३॥
शारदा शारदाम्बोजवदना वदनाम्बुजे ।
सर्वदा सर्वदास्माकं सन्निधिं सन्निधिं क्रियात् ॥ ४॥
सरस्वतीं च तां नौमि वागधिष्ठातृ-देवताम् ।
देवत्वं प्रतिपद्यन्ते यदनुग्रहतो जनाः ॥ ५॥
पातु नो निकषग्रावा मतिहेम्नः सरस्वती ।
प्राज्ञेतरपरिच्छेदं वचसैव करोति या ॥ ६॥
शुद्धां ब्रह्मविचारसारपरमा-माद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम् ।
हस्ते स्पाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ॥ ७॥
वीणाधरे विपुलमंगलदानशीले
भक्तार्तिनाशिनि विरिंचिहरीशवन्द्ये ।
कीर्तिप्रदेऽखिलमनोरथदे महार्हे
विद्याप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम् ॥ ८॥
श्वेताब्जपूर्ण-विमलासन-संस्थिते हे
श्वेताम्बरावृतमनोहरमंजुगात्रे ।
उद्यन्मनोज्ञ-सितपंकजमंजुलास्ये
विद्याप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम् ॥ ९॥
मातस्त्वदीय-पदपंकज-भक्तियुक्ता
ये त्वां भजन्ति निखिलानपरान्विहाय ।
ते निर्जरत्वमिह यान्ति कलेवरेण
भूवह्नि-वायु-गगनाम्बु-विनिर्मितेन ॥ १०॥
मोहान्धकार-भरिते हृदये मदीये
मातः सदैव कुरु वासमुदारभावे ।
स्वीयाखिलावयव-निर्मलसुप्रभाभिः
शीघ्रं विनाशय मनोगतमन्धकारम् ॥ ११॥
ब्रह्मा जगत् सृजति पालयतीन्दिरेशः
शम्भुर्विनाशयति देवि तव प्रभावैः ।
न स्यात्कृपा यदि तव प्रकटप्रभावे
न स्युः कथंचिदपि ते निजकार्यदक्षाः ॥ १२॥
लक्ष्मिर्मेधा धरा पुष्टिर्गौरी तृष्टिः प्रभा धृतिः ।
एताभिः पाहि तनुभिरष्टभिर्मां सरस्वती ॥ १३॥
सरसवत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नमः
वेद-वेदान्त-वेदांग- विद्यास्थानेभ्य एव च ॥ १४॥
सरस्वति महाभागे विद्ये कमललोचने ।
विद्यारूपे विशालाक्षि विद्यां देहि नमोस्तु ते ॥ १५॥
यदक्षर-पदभ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत् ।
तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि ॥ १६॥
॥ इति श्रीसरस्वती स्तोत्रं सम्पूर्णं॥
बसंत पंचमी भारतीय संस्कृति में एक बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाने वाला त्यौहार है जिसमे हमारी परम्परा, भौगौलिक परिवर्तन , सामाजिक कार्य तथा आध्यात्मिक पक्ष सभी का सम्मिश्रण है, हिन्दू पंचांग के अनुसार माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को बसंत पंचमी का त्यौहार मनाया जाता है वास्तव में भारतीय गणना के अनुसार वर्ष भर में पड़ने वाली छः ऋतुओं (बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर) में बसंत को ऋतुराज अर्थात सभी ऋतुओं का राजा माना गया है और बसंत पंचमी के दिन को बसंत ऋतु का आगमन माना जाता है इसलिए बसंत पंचमी ऋतू परिवर्तन का दिन भी है जिस दिन से प्राकृतिक सौन्दर्य निखारना शुरू हो जाता है पेड़ों पर नयी पत्तिया कोपले और कालिया खिलना शुरू हो जाती हैं पूरी प्रकृति एक नवीन ऊर्जा से भर उठती है।
●बसंत पंचमी को विशेष रूप से सरस्वती जयंती के रूप में मनाया जाता है यह माता सरस्वती का प्राकट्योत्सव है इसलिए इस दिन विशेष रूप से माता सरस्वती की पूजा उपासना कर उनसे विद्या बुद्धि प्राप्ति की कामना की जाती है इसी लिए विद्यार्थियों के लिए बसंत पंचमी का त्यौहार बहुत विशेष होता है।
बसंत पंचमी का त्यौहार बहुत ऊर्जामय ढंग से और विभिन्न प्रकार से पूरे भारत वर्ष में मनाया जाता है इस दिन पीले वस्त्र पहनने और खिचड़ी बनाने और बाटने की प्रथा भी प्रचलित है तो इस दिन बसंत ऋतु के आगमन होने से आकास में रंगीन पतंगे उड़ने की परम्परा भी बहुत दीर्घकाल से प्रचलन में है।
बसंत पंचमी के दिन का एक और विशेष महत्व भी है बसंत पंचमी को मुहूर्त शास्त्र के अनुसार एक स्वयं सिद्ध मुहूर्त और अनसूज साया भी माना गया है अर्थात इस दिन कोई भी शुभ मंगल कार्य करने के लिए पंचांग शुद्धि की आवश्यकता नहीं होती इस दिन नींव पूजन, गृह प्रवेश, वाहन खरीदना, व्यापार आरम्भ करना, सगाई और विवाह आदि मंगल कार्य किये जा सकते है।
माता सरस्वती को ज्ञान, सँगीत, कला, विज्ञान और शिल्प-कला की देवी माना जाता है।
भक्त लोग, ज्ञान प्राप्ति और सुस्ती, आलस्य एवं अज्ञानता से छुटकारा पाने के लिये, आज के दिन देवी सरस्वती की उपासना करते हैं। कुछ प्रदेशों में आज के दिन शिशुओं को पहला अक्षर लिखना सिखाया जाता है। दूसरे शब्दों में वसन्त पञ्चमी का दिन विद्या आरम्भ करने के लिये काफी शुभ माना जाता है इसीलिये माता-पिता आज के दिन शिशु को माता सरस्वती के आशीर्वाद के साथ विद्या आरम्भ कराते हैं। सभी विद्यालयों में आज के दिन सुबह के समय माता सरस्वती की पूजा की जाती है।
वसन्त पञ्चमी का दिन हिन्दु कैलेण्डर में पञ्चमी तिथि को मनाया जाता है। जिस दिन पञ्चमी तिथि सूर्योदय और दोपहर के बीच में व्याप्त रहती है उस दिन को सरस्वती पूजा के लिये उपयुक्त माना जाता है। हिन्दु कैलेण्डर में सूर्योदय और दोपहर के मध्य के समय को पूर्वाह्न के नाम से जाना जाता है।
ज्योतिष विद्या में पारन्गत व्यक्तियों के अनुसार वसन्त पञ्चमी का दिन सभी शुभ कार्यो के लिये उपयुक्त माना जाता है। इसी कारण से वसन्त पञ्चमी का दिन अबूझ मुहूर्त के नाम से प्रसिद्ध है और नवीन कार्यों की शुरुआत के लिये उत्तम माना जाता है।
वसन्त पञ्चमी के दिन किसी भी समय सरस्वती पूजा की जा सकती है परन्तु पूर्वाह्न का समय पूजा के लिये श्रेष्ठ माना जाता है। सभी विद्यालयों और शिक्षा केन्द्रों में पूर्वाह्न के समय ही सरस्वती पूजा कर माता सरस्वती का आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है।
नीचे सरस्वती पूजा का जो मुहूर्त दिया गया है उस समय पञ्चमी तिथि और पूर्वाह्न दोनों ही व्याप्त होते हैं। इसीलिये वसन्त पञ्चमी के दिन सरस्वती पूजा इसी समय के दौरान करना श्रेष्ठ है।
#महासरस्वती, बसंतपंचमी पूजा●
1. प्रात:काल स्नाना करके पीले वस्त्र धारण करें।
2. मां सरस्वती की प्रतिमा को सामने रखें तत्पश्चात कलश स्थापित कर प्रथम पूज्य गणेश जी का पंचोपचार विधि पूजन उपरांत सरस्वती का ध्यान करें
●ध्यान मंत्र
या कुन्देन्दु तुषारहार धवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ।।
शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद्व्यापनीं ।
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यांधकारपहाम्।।
हस्ते स्फाटिक मालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम् ।
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्।।2।।
3. मां की पूजा करते समय सबसे पहले उन्हें आचमन व स्नान कराएं।
4. माता का श्रंगार कराएं ।
5. माता श्वेत वस्त्र धारण करती हैं इसलिए उन्हें श्वेत वस्त्र पहनाएं।
6. प्रसाद के रुप में खीर अथवा दुध से बनी मिठाईयों का भोग लगाएं।
7. श्वेत फूल माता को अर्पण करें।
8. तत्पश्चात नवग्रह की विधिवत पूजा करें।
बसंत पंचमी पर मां सरस्वती की पूजा के साथ सरस्वती चालीसा पढ़ना और कुछ मंत्रों का जाप आपकी बुद्धि प्रखर करता है। अपनी सुविधानुसार आप ये मंत्र 11, 21 या 108 बार जाप कर सकते हैं।
●निम्न मंत्र या इनमें किसी भी एक मंत्र का यथा सामर्थ्य जाप करें-
1. सरस्वती महाभागे विद्ये कमललोचने
विद्यारूपा विशालाक्षि विद्यां देहि नमोस्तुते॥
2. या देवी सर्वभूतेषू, मां सरस्वती रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
3. ऐं ह्रीं श्रीं वाग्वादिनी सरस्वती देवी मम जिव्हायां।
सर्व विद्यां देही दापय-दापय स्वाहा।।
4. एकादशाक्षर सरस्वती मंत्र
ॐ ह्रीं ऐं ह्रीं सरस्वत्यै नमः।
5. वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणी विनायकौ।।
6. सरस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नम:।
वेद वेदान्त वेदांग विद्यास्थानेभ्य एव च।।
सरस्वति महाभागे विद्ये कमललोचने।
विद्यारूपे विशालाक्षी विद्यां देहि नमोस्तुते।।
7. प्रथम भारती नाम, द्वितीय च सरस्वती
तृतीय शारदा देवी, चतुर्थ हंसवाहिनी
पंचमम् जगतीख्याता, षष्ठम् वागीश्वरी तथा
सप्तमम् कुमुदीप्रोक्ता, अष्ठमम् ब्रह्मचारिणी
नवम् बुद्धिमाता च दशमम् वरदायिनी
एकादशम् चंद्रकांतिदाशां भुवनेशवरी
द्वादशेतानि नामानि त्रिसंध्य य: पठेनर:
जिह्वाग्रे वसते नित्यमं
ब्रह्मरूपा सरस्वती सरस्वती महाभागे
विद्येकमललोचने विद्यारूपा विशालाक्षि
विद्या देहि नमोस्तुते”
8. स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए।
जेहि पर कृपा करहिं जन जानि।
कवि उर अजिर नचावहिं वानी॥
मोरि सुधारहिं सो सब भांति।
जासु कृपा नहिं कृपा अघाति॥
9. गुरु गृह पढ़न गए रघुराई।
अलप काल विद्या सब पाई॥
#महासरस्वती चालीसा●
°दोहा
जनक जननि पदम दुरज, निजब मस्तक पर धारि।
बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि।।
पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनंतु।
दुष्टजनों के पाप को, मातु तुही अब हन्तु।।
•चौपाई
जय श्रीसकल बुद्धि बलरासी।जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी।।
जय जय जय वीणाकर धारी।करती सदा सुहंस सवारी।।
रूप चतुर्भुज धारी माता।सकल विश्व अन्दर विख्याता।।
जग में पाप बुद्धि जब होती।तबही धर्म की फीकी ज्योति।।
तबहि मातु का निज अवतारा।पाप हीन करती महितारा।।
बाल्मीकि जी था हत्यारा।तव प्रसाद जानै संसारा।।
रामचरित जो रचे बनाई । आदि कवि की पदवी पाई।।
कालीदास जो भये विख्याता । तेरी कृपा दृष्टि से माता।।
तुलसी सूर आदि विद्वाना । भये जो और ज्ञानी नाना।।
तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा । केवल कृपा आपकी अम्बा।।
करहु कृपा सोई मातु भवानी।दुखित दीन निज दासहि जानी।।
पुत्र करई अपराध बहूता । तेहि न धरई चित माता।।
राखु लाज जननि अब मेरी।विनय करऊ भांति बहुतेरी।।
मैं अनाथ तेरी अवलंबा । कृपा करउ जय जय जगदंबा।।
मधुकैटभ जो अति बलवाना । बाहुयुद्ध विष्णु से ठाना।।
समर हजार पांच में घोरा।फिर भी मुख उनसे नहीं मोरा।।
मातु सहाय कीन्ह तेहि काला।बुद्धि विपरीत भई खलहाला।।
तेहि ते मृत्यु भई खल केरी । पुरवहु मातु मनोरथ मेरी।।
चण्ड मुण्ड जो थे विख्याता । क्षण महु संहारे उन माता।।
रक्त बीज से समरथ पापी । सुर मुनि हृदय धरा सब कांपी।।
काटेउ सिर जिम कदली खम्बा।बार बार बिनवऊं जगदंबा।।
जगप्रसिद्ध जो शुंभ निशुंभा।क्षण में बांधे ताहि तूं अम्बा।।
भरत-मातु बुद्धि फेरेऊ जाई । रामचन्द्र बनवास कराई।।
एहि विधि रावन वध तू कीन्हा।सुर नर मुनि सबको सुख दीन्हा।।
को समरथ तव यश गुण गाना।निगम अनादि अनंत बखाना।।
विष्णु रूद्र जस कहिन मारी।जिनकी हो तुम रक्षाकारी।।
रक्त दन्तिका और शताक्षी।नाम अपार है दानव भक्षी।।
दुर्गम काज धरा पर कीन्हा।दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा।।
दुर्ग आदि हरनी तू माता । कृपा करहु जब जब सुखदाता।।
नृप कोपित को मारन चाहे । कानन में घेरे मृग नाहै।।
सागर मध्य पोत के भंजे । अति तूफान नहिं कोऊ संगे।।
भूत प्रेत बाधा या दु:ख में।हो दरिद्र अथवा संकट में।।
नाम जपे मंगल सब होई।संशय इसमें करई न कोई।।
पुत्रहीन जो आतुर भाई । सबै छांड़ि पूजें एहि भाई।।
करै पाठ नित यह चालीसा । होय पुत्र सुन्दर गुण ईसा।।
धूपादिक नैवेद्य चढ़ावै।संकट रहित अवश्य हो जावै।।
भक्ति मातु की करैं हमेशा।निकट न आवै ताहि कलेशा।।
बंदी पाठ करें सत बारा । बंदी पाश दूर हो सारा।।
रामसागर बांधि हेतु भवानी।कीजे कृपा दास निज जानी।।
°दोहा
मातु सूर्य कान्ति तव, अंधकार मम रूप।
डूबन से रक्षा कार्हु परूं न मैं भव कूप।।
बलबुद्धि विद्या देहु मोहि, सुनहु सरस्वती मातु।
रामसागर अधम को आश्रय तू ही दे दातु।।
वर दे, वीणावादिनि वर दे !
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव
भारत में भर दे !
काट अंध-उर के बंधन-स्तर
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर;
कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे !
नव गति, नव लय, ताल-छंद नव
नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव;
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर, नव स्वर दे !
वर दे, वीणावादिनि वर दे।
कुछ क्षेत्रों में देवी की पूजा कर प्रतिमा को विसर्जित भी किया जाता है। विद्यार्थी मां सरस्वती की पूजा कर गरीब बच्चों में कलम व पुस्तकों का दान करें। संगीत से जुड़े व्यक्ति अपने साज पर तिलक लगा कर मां की आराधना करें व मां को बांसुरी भेंट करें।
●पूजा समय
पंचमी तिथि अारंभ👉 06/फरवरी/2021 को प्रातः 07.07 बजे से
पंचमी तिथि समाप्त👉 07/फरवरी/2021 को प्रातः 06.40 बजे तक
सरस्वती पूजा का मुहूर्त सुबह 10:45 बजे से मध्यान 12:52 तक का है और इस मुहूर्त की अवधि 2 घंटे 07 मिनट तक रहेगी दोपहर तक इस पूजन को किया जा सकता है। बसंत पंचमी के पूरे दिन आप अपने किसी भी नए कार्य का आरम्भ कर सकते हैं ये एक स्वयं सिद्ध और श्रेष्ठ मुहूर्त होता है। हिंदू मिथिला पंचांग के अनुसार सूर्योदय तिथि को ही मूल माना जाता है इसलिए आप पूजा 06 को करें,और प्रायः विसर्जन 07 तारीख को है
◆सरस्वती स्तोत्रम्●
श्वेतपद्मासना देवि श्वेतपुष्पोपशोभिता।
श्वेताम्बरधरा नित्या श्वेतगन्धानुलेपना॥
श्वेताक्षी शुक्लवस्रा च श्वेतचन्दन चर्चिता।
वरदा सिद्धगन्धर्वैर्ऋषिभिः स्तुत्यते सदा॥
स्तोत्रेणानेन तां देवीं जगद्धात्रीं सरस्वतीम्।
ये स्तुवन्ति त्रिकालेषु सर्वविद्दां लभन्ति ते॥
या देवी स्तूत्यते नित्यं ब्रह्मेन्द्रसुरकिन्नरैः।
सा ममेवास्तु जिव्हाग्रे पद्महस्ता सरस्वती॥
॥इति श्रीसरस्वतीस्तोत्रं संपूर्णम्॥
◆बसन्त पंचमी कथा
सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य योनि की रचना की। अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे। उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहता है। विष्णु से अनुमति लेकर ब्रह्मा ने अपने कमण्डल से जल छिड़का, पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही उसमें कंपन होने लगा। इसके बाद वृक्षों के बीच से एक अद्भुत शक्ति का प्राकट्य हुआ। यह प्राकट्य एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा। सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसन्त पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है-
प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।
अर्थात ये परम चेतना हैं। सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से ख़ुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी और यूं भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी जो कि आज तक जारी है।
🙏आरती श्री सरस्वती जी 🙏
~~~~~~~~~~~~~~~
🕉जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता।
सदगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥
🕉जय सरस्वती माता॥
चन्द्रवदनि पद्मासिनि, कृति मंगलकारी।
सोहे शुभ हंस सवारी, अतुल तेजधारी॥
🕉जय सरस्वती माता॥
बाएं कर में वीणा, दाएं कर माला।
शीश मुकुट मणि सोहे, गल मोतियन माला॥
🕉जय सरस्वती माता॥
देवी शरण जो आए, उनका उद्धार किया।
बैठी मंथरा दासी, रावण संहार किया॥
🕉जय सरस्वती माता॥
विद्या दान प्रदायिनि, ज्ञान प्रकाश भरो।
मोह अज्ञान और निरखा का, जग से नाश करो॥
🕉जय सरस्वती माता॥
धूप दीप फल मेवा, माँ स्वीकार करो।
ज्ञानचक्षु दे माता, जग निस्तार करो॥
🕉जय सरस्वती माता॥
माँ सरस्वती की आरती, जो कोई जन गावे।
हितकारी सुखकारी ज्ञान भक्ति पावे॥
🕉जय सरस्वती माता॥
जय सरस्वती माता, जय जय सरस्वती माता।
सदगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥
||जय महासरस्वती,जय सद्गुरुदेव||
!!ध्यानम्!!
श्रीमच्चन्दनचर्चितोज्ज्वलवपुः शुक्लाम्बरा मल्लिका मालालालित कुन्तला प्रविलसन्मुक्तावलीशोभना।
सर्वज्ञाननिधानपुस्तकधरा रुद्राक्ष मालाङ्किता वाग्देवी वदनाम्बुजे वसतु मे त्रैलोक्यमाता शुभा॥
अथ सरस्वतीसहस्रनामावलिः ।
ॐ वाचे नमः ।
ॐ वाण्यै नमः ।
ॐ वरदायै नमः ।
ॐ वन्द्यायै नमः ।
ॐ वरारोहायै नमः ।
ॐ वरप्रदायै नमः ।
ॐ वृत्त्यै नमः ।
ॐ वागीश्वर्यै नमः ।
ॐ वार्तायै नमः ।
ॐ वरायै नमः ॥ १०॥
ॐ वागीशवल्लभायै नमः ।
ॐ विश्वेश्वर्यै नमः ।
ॐ विश्ववन्द्यायै नमः ।
ॐ विश्वेशप्रियकारिण्यै नमः ।
ॐ वाग्वादिन्यै नमः ।
ॐ वाग्देव्यै नमः ।
ॐ वृद्धिदायै नमः ।
ॐ वृद्धिकारिण्यै नमः ।
ॐ वृद्ध्यै नमः ।
ॐ वृद्धायै नमः ॥ २०॥
ॐ विषघ्न्यै नमः ।
ॐ वृष्ट्यै नमः ।
ॐ वृष्टिप्रदायिन्यै नमः ।
ॐ विश्वाराध्यायै नमः ।
ॐ विश्वमात्रे नमः ।
ॐ विश्वधात्र्यै नमः ।
ॐ विनायकायै नमः ।
ॐ विश्वशक्त्यै नमः ।
ॐ विश्वसारायै नमः ।
ॐ विश्वायै नमः ॥ ३०॥
ॐ विश्वविभावर्यै नमः ।
ॐ वेदान्तवेदिन्यै नमः ।
ॐ वेद्यायै नमः ।
ॐ वित्तायै नमः ।
ॐ वेदत्रयात्मिकायै नमः ।
ॐ वेदज्ञायै नमः ।
ॐ वेदजनन्यै नमः ।
ॐ विश्वायै नमः ।
ॐ विश्वविभावर्यै नमः ।
ॐ वरेण्यायै नमः ॥ ४०॥
ॐ वाङ्मय्यै नमः ।
ॐ वृद्धायै नमः ।
ॐ विशिष्टप्रियकारिण्यै नमः ।
ॐ विश्वतोवदनायै नमः ।
ॐ व्याप्तायै नमः ।
ॐ व्यापिन्यै नमः ।
ॐ व्यापकात्मिकायै नमः ।
ॐ व्याळ्घ्न्यै नमः ।
ॐ व्याळ्भूषाङ्ग्यै नमः ।
ॐ विरजायै नमः ॥ ५०॥
ॐ वेदनायिकायै नमः ।
ॐ वेदवेदान्तसंवेद्यायै नमः ।
ॐ वेदान्तज्ञानरूपिण्यै नमः ।
ॐ विभावर्यै नमः ।
ॐ विक्रान्तायै नमः ।
ॐ विश्वामित्रायै नमः ।
ॐ विधिप्रियायै नमः ।
ॐ वरिष्ठायै नमः ।
ॐ विप्रकृष्टायै नमः ।
ॐ विप्रवर्यप्रपूजितायै नमः ॥ ६०॥
ॐ वेदरूपायै नमः ।
ॐ वेदमय्यै नमः ।
ॐ वेदमूर्त्यै नमः ।
ॐ वल्लभायै नमः ।
ॐ गौर्यै नमः ॥ ।
ॐ गुणवत्यै नमः ।
ॐ गोप्यायै नमः ।
ॐ गन्धर्वनगरप्रियायै नमः ।
ॐ गुणमात्रे नमः ।
ॐ गुहान्तस्थायै नमः ॥ ७०॥
ॐ गुरुरूपायै नमः ।
ॐ गुरुप्रियायै नमः ।
ॐ गिरिविद्यायै नमः ।
ॐ गानतुष्टायै नमः ।
ॐ गायकप्रियकारिण्यै नमः ।
ॐ गायत्र्यै नमः ।
ॐ गिरिशाराध्यायै नमः ।
ॐ गिरे नमः ।
ॐ गिरीशप्रियङ्कर्यै नमः ।
ॐ गिरिज्ञायै नमः ॥ ८०॥
ॐ ज्ञानविद्यायै नमः ।
ॐ गिरिरूपायै नमः ।
ॐ गिरीश्वर्यै नमः ।
ॐ गीर्मात्रे नमः ।
ॐ गणसंस्तुत्यायै नमः ।
ॐ गणनीयगुणान्वितायै नमः ।
ॐ गूढरूपायै नमः ।
ॐ गुहायै नमः ।
ॐ गोप्यायै नमः ।
ॐ गोरूपायै नमः ॥ ९०॥
ॐ गवे नमः ।
ॐ गुणात्मिकायै नमः ।
ॐ गुर्व्यै नमः ।
ॐ गुर्वम्बिकायै नमः ।
ॐ गुह्यायै नमः ।
ॐ गेयजायै नमः ।
ॐ ग्रहनाशिन्यै नमः ।
ॐ गृहिण्यै नमः ।
ॐ गृहदोषघ्न्यै नमः ।
ॐ गवघ्न्यै नमः ॥ १००॥
ॐ गुरुवत्सलायै नमः ।
ॐ गृहात्मिकायै नमः ।
ॐ गृहाराध्यायै नमः ।
ॐ गृहबाधाविनाशिन्यै नमः ।
ॐ गङ्गायै नमः ।
ॐ गिरिसुतायै नमः ।
ॐ गम्यायै नमः ।
ॐ गजयानायै नमः ।
ॐ गुहस्तुतायै नमः ।
ॐ गरुडासनसंसेव्यायै नमः ॥ ११०॥
ॐ गोमत्यै नमः ।
ॐ गुणशालिन्यै नमः ।
ॐ शारदायै नमः ।
ॐ शाश्वत्यै नमः ।
ॐ शैव्यै नमः ।
ॐ शाङ्कर्यै नमः ।
ॐ शङ्करात्मिकायै नमः ।
ॐ श्रियै नमः ।
ॐ शर्वाण्यै नमः ।
ॐ शतघ्न्यै नमः ॥ १२०॥
ॐ शरच्चन्द्रनिभाननायै नमः ।
ॐ शर्मिष्ठायै नमः ।
ॐ शमनघ्न्यै नमः ।
ॐ शतसाहस्ररूपिण्यै नमः ।
ॐ शिवायै नमः ।
ॐ शम्भुप्रियायै नमः ।
ॐ श्रद्धायै नमः ।
ॐ श्रुतिरूपायै नमः ।
ॐ श्रुतिप्रियायै नमः ।
ॐ शुचिष्मत्यै नमः ॥ १३०॥
ॐ शर्मकर्यै नमः ।
ॐ शुद्धिदायै नमः ।
ॐ शुद्धिरूपिण्यै नमः ।
ॐ शिवायै नमः ।
ॐ शिवङ्कर्यै नमः ।
ॐ शुद्धायै नमः ।
ॐ शिवाराध्यायै नमः ।
ॐ शिवात्मिकायै नमः ।
ॐ श्रीमत्यै नमः ।
ॐ श्रीमय्यै नमः ॥ १४०॥
ॐ श्राव्यायै नमः ।
ॐ श्रुत्यै नमः ।
ॐ श्रवणगोचरायै नमः ।
ॐ शान्त्यै नमः ।
ॐ शान्तिकर्यै नमः ।
ॐ शान्तायै नमः ।
ॐ शान्ताचारप्रियंकर्यै नमः ।
ॐ शीललभ्यायै नमः ।
ॐ शीलवत्यै नमः ।
ॐ श्रीमात्रे नमः ॥ १५०॥
ॐ शुभकारिण्यै नमः ।
ॐ शुभवाण्यै नमः ।
ॐ शुद्धविद्यायै नमः ।
ॐ शुद्धचित्तप्रपूजितायै नमः ।
ॐ श्रीकर्यै नमः ।
ॐ श्रुतपापघ्न्यै नमः ।
ॐ शुभाक्ष्यै नमः ।
ॐ शुचिवल्लभायै नमः ।
ॐ शिवेतरघ्न्यै नमः ।
ॐ शबर्यै नमः ॥ १६०॥
ॐ श्रवणीयगुणान्वितायै नमः ।
ॐ शार्यै नमः ।
ॐ शिरीषपुष्पाभायै नमः ।
ॐ शमनिष्ठायै नमः ।
ॐ शमात्मिकायै नमः ।
ॐ शमान्वितायै नमः ।
ॐ शमाराध्यायै नमः ।
ॐ शितिकण्ठप्रपूजितायै नमः ।
ॐ शुद्ध्यै नमः ।
ॐ शुद्धिकर्यै नमः ॥ १७०॥
ॐ श्रेष्ठायै नमः ।
ॐ श्रुतानन्तायै नमः ।
ॐ शुभावहायै नमः ।
ॐ सरस्वत्यै नमः ।
ॐ सर्वज्ञायै नमः ।
ॐ सर्वसिद्धिप्रदायिन्यै नमः ।
ॐ सरस्वत्यै नमः ।
ॐ सावित्र्यै नमः ।
ॐ सन्ध्यायै नमः ।
ॐ सर्वेप्सितप्रदायै नमः ॥ १८०॥
ॐ सर्वार्तिघ्न्यै नमः ।
ॐ सर्वमय्यै नमः ।
ॐ सर्वविद्याप्रदायिन्यै नमः ।
ॐ सर्वेश्वर्यै नमः ।
ॐ सर्वपुण्यायै नमः ।
ॐ सर्गस्थित्यन्तकारिण्यै नमः ।
ॐ सर्वाराध्यायै नमः ।
ॐ सर्वमात्रे नमः ।
ॐ सर्वदेवनिषेवितायै नमः ॥ ???॥
ॐ सर्वैश्वर्यप्रदायै नमः ॥ १९०॥
ॐ सत्यायै नमः ।
ॐ सत्यै नमः ।
ॐ सत्वगुणाश्रयायै नमः ।
ॐ स्वरक्रमपदाकारायै नमः ।
ॐ सर्वदोषनिषूदिन्यै नमः ।
ॐ सहस्राक्ष्यै नमः ।
ॐ सहस्रास्यायै नमः ।
ॐ सहस्रपदसंयुतायै नमः ।
ॐ सहस्रहस्तायै नमः ।
ॐ साहस्रगुणालङ्कृतविग्रहायै नमः ॥ २००॥
ॐ सहस्रशीर्षायै नमः ।
ॐ सद्रूपायै नमः ।
ॐ स्वधायै नमः ।
ॐ स्वाहायै नमः ।
ॐ सुधामय्यै नमः ।
ॐ षड्ग्रन्थिभेदिन्यै नमः ।
ॐ सेव्यायै नमः ।
ॐ सर्वलोकैकपूजितायै नमः ।
ॐ स्तुत्यायै नमः ।
ॐ स्तुतिमय्यै नमः ॥ २१०॥
ॐ साध्यायै नमः ।
ॐ सवितृप्रियकारिण्यै नमः ।
ॐ संशयच्छेदिन्यै नमः ।
ॐ साङ्ख्यवेद्यायै नमः ।
ॐ सङ्ख्यायै नमः ।
ॐ सदीश्वर्यै नमः ।
ॐ सिद्धिदायै नमः ।
ॐ सिद्धसम्पूज्यायै नमः ।
ॐ सर्वसिद्धिप्रदायिन्यै नमः ।
ॐ सर्वज्ञायै नमः ॥ २२०॥
ॐ सर्वशक्त्यै नमः ।
ॐ सर्वसम्पत्प्रदायिन्यै नमः ।
ॐ सर्वाशुभघ्न्यै नमः ।
ॐ सुखदायै नमः ।
ॐ सुखायै नमः ।
ॐ संवित्स्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ सर्वसम्भीषण्यै नमः ।
ॐ सर्वजगत्सम्मोहिन्यै नमः ।
ॐ सर्वप्रियङ्कर्यै नमः ।
ॐ सर्वशुभदायै नमः ॥ २३०॥
ॐ सर्वमङ्गळायै नमः ।
ॐ सर्वमन्त्रमय्यै नमः ।
ॐ सर्वतीर्थपुण्यफलप्रदायै नमः ॥। ।
ॐ सर्वपुण्यमय्यै नमः ।
ॐ सर्वव्याधिघ्न्यै नमः ।
ॐ सर्वकामदायै नमः ।
ॐ सर्वविघ्नहर्यै नमः ।
ॐ सर्ववन्दितायै नमः ॥ ।
ॐ सर्वमङ्गळायै नमः ।
ॐ सर्वमन्त्रकर्यै नमः ॥ २४०॥
ॐ सर्वलक्ष्मियै नमः ।
ॐ सर्वगुणान्वितायै नमः ।
ॐ सर्वानन्दमय्यै नमः ।
ॐ सर्वज्ञानदायै नमः ।
ॐ सत्यनायिकायै नमः ।
ॐ सर्वज्ञानमय्यै नमः ।
ॐ सर्वराज्यदायै नमः ।
ॐ सर्वमुक्तिदायै नमः ।
ॐ सुप्रभायै नमः ।
ॐ सर्वदायै नमः ॥ २५०॥
ॐ सर्वायै नमः ।
ॐ सर्वलोकवशङ्कर्यै नमः ।
ॐ सुभगायै नमः ।
ॐ सुन्दर्यै नमः ।
ॐ सिद्धायै नमः ।
ॐ सिद्धाम्बायै नमः ।
ॐ सिद्धमातृकायै नमः ।
ॐ सिद्धमात्रे नमः ।
ॐ सिद्धविद्यायै नमः ।
ॐ सिद्धेश्यै नमः ॥ २६०॥
ॐ सिद्धरूपिण्यै नमः ।
ॐ सुरूपिण्यै नमः ।
ॐ सुखमय्यै नमः ।
ॐ सेवकप्रियकारिण्यै नमः ।
ॐ स्वामिन्यै नमः ।
ॐ सर्वदायै नमः ।
ॐ सेव्यायै नमः ।
ॐ स्थूलसूक्ष्मापराम्बिकायै नमः ।
ॐ साररूपायै नमः ।
ॐ सरोरूपायै नमः ॥ २७०॥
ॐ सत्यभूतायै नमः ।
ॐ समाश्रयायै नमः ।
ॐ सितासितायै नमः ।
ॐ सरोजाक्ष्यै नमः ।
ॐ सरोजासनवल्लभायै नमः ।
ॐ सरोरुहाभायै नमः ।
ॐ सर्वाङ्ग्यै नमः ।
ॐ सुरेन्द्रादिप्रपूजितायै नमः ।
ॐ महादेव्यै नमः ॥ ॥
ॐ महेशान्यै नमः ॥ २८०॥
ॐ महासारस्वतप्रदायै नमः ।
ॐ महासरस्वत्यै नमः ।
ॐ मुक्तायै नमः ।
ॐ मुक्तिदायै नमः ।
ॐ मलनाशिन्यै नमः ।
ॐ महेश्वर्यै नमः ।
ॐ महानन्दायै नमः ।
ॐ महामन्त्रमय्यै नमः ।
ॐ मह्यै नमः ।
ॐ महालक्ष्म्यै नमः ॥ २९०॥
ॐ महाविद्यायै नमः ।
ॐ मात्रे नमः ।
ॐ मन्दरवासिन्यै नमः ।
ॐ मन्त्रगम्यायै नमः ।
ॐ मन्त्रमात्रे नमः ।
ॐ महामन्त्रफलप्रदायै नमः ।
ॐ महामुक्त्यै नमः ।
ॐ महानित्यायै नमः ।
ॐ महासिद्धिप्रदायिन्यै नमः ।
ॐ महासिद्धायै नमः ॥ ३००॥
ॐ महामात्रे नमः ।
ॐ महदाकारसंयुतायै नमः ।
ॐ महायै नमः ।
ॐ महेश्वर्यै नमः ।
ॐ मूर्त्यै नमः ।
ॐ मोक्षदायै नमः ।
ॐ मणिभूषणायै नमः ।
ॐ मेनकायै नमः ।
ॐ मानिन्यै नमः ।
ॐ मान्यायै नमः ॥ ३१०॥
ॐ मृत्युघ्न्यै नमः ।
ॐ मेरुरूपिण्यै नमः ।
ॐ मदिराक्ष्यै नमः ।
ॐ मदावासायै नमः ।
ॐ मखरूपायै नमः ।
ॐ मखेश्वर्यै नमः ।
ॐ महामोहायै नमः ।
ॐ महामायायै नमः ।
ॐ मातॢणां मूर्ध्निसंस्थितायै नमः ।
ॐ महापुण्यायै नमः ॥ ३२०॥
ॐ मुदावासायै नमः ।
ॐ महासम्पत्प्रदायिन्यै नमः ।
ॐ मणिपूरैकनिलयायै नमः ।
ॐ मधुरूपायै नमः ।
ॐ महोत्कटायै नमः ।
ॐ महासूक्ष्मायै नमः ।
ॐ महाशान्तायै नमः ।
ॐ महाशान्तिप्रदायिन्यै नमः ।
ॐ मुनिस्तुतायै नमः ।
ॐ मोहहन्त्र्यै नमः ॥ ३३०॥
ॐ माधव्यै नमः ।
ॐ माधवप्रियायै नमः ।
ॐ मायै नमः ।
ॐ महादेवसंस्तुत्यायै नमः ।
ॐ महिषीगणपूजितायै नमः ।
ॐ मृष्टान्नदायै नमः ।
ॐ माहेन्द्र्यै नमः ।
ॐ महेन्द्रपददायिन्यै नमः ।
ॐ मत्यै नमः ।
ॐ मतिप्रदायै नमः ॥ ३४०॥
ॐ मेधायै नमः ।
ॐ मर्त्यलोकनिवासिन्यै नमः ।
ॐ मुख्यायै नमः ।
ॐ महानिवासायै नमः ।
ॐ महाभाग्यजनाश्रितायै नमः ।
ॐ महिळायै नमः ।
ॐ महिमायै नमः ।
ॐ मृत्युहार्यै नमः ।
ॐ मेधाप्रदायिन्यै नमः ।
ॐ मेध्यायै नमः ॥ ३५०॥
ॐ महावेगवत्यै नमः ।
ॐ महामोक्षफलप्रदायै नमः ।
ॐ महाप्रभाभायै नमः ।
ॐ महत्यै नमः ।
ॐ महादेवप्रियङ्कर्यै नमः ।
ॐ महापोषायै नमः ।
ॐ महर्द्ध्यै नमः ।
ॐ मुक्ताहारविभूषणायै नमः ।
ॐ माणिक्यभूषणायै नमः ।
ॐ मन्त्रायै नमः ॥ ३६० ???॥
ॐ मुख्यचन्द्रार्धशेखरायै नमः ।
ॐ मनोरूपायै नमः ।
ॐ मनःशुद्ध्यै नमः ।
ॐ मनःशुद्धिप्रदायिन्यै नमः ।
ॐ महाकारुण्यसम्पूर्णायै नमः ।
ॐ मनोनमनवन्दितायै नमः ।
ॐ महापातकजालघ्न्यै नमः ।
ॐ मुक्तिदायै नमः ।
ॐ मुक्तभूषणायै नमः ।
ॐ मनोन्मन्यै नमः ॥ ३७०॥
ॐ महास्थूलायै नमः ।
ॐ महाक्रतुफलप्रदायै नमः ।
ॐ महापुण्यफलप्राप्यायै नमः ।
ॐ मायात्रिपुरनाशिन्यै नमः ।
ॐ महानसायै नमः ।
ॐ महामेधायै नमः ।
ॐ महामोदायै नमः ।
ॐ महेश्वर्यै नमः ।
ॐ मालाधर्यै नमः ।
ॐ महोपायायै नमः ॥ ३८०॥
ॐ महातीर्थफलप्रदायै नमः ।
ॐ महामङ्गळ्सम्पूर्णायै नमः ।
ॐ महादारिद्र्यनाशिन्यै नमः ।
ॐ महामखायै नमः ।
ॐ महामेघायै नमः ।
ॐ महाकाळ्यै नमः ।
ॐ महाप्रियायै नमः ।
ॐ महाभूषायै नमः ।
ॐ महादेहायै नमः ।
ॐ महाराज्ञ्यै नमः ॥ ३९०॥
ॐ मुदालयायै नमः ।
ॐ भूरिदायै नमः ।
ॐ भाग्यदायै नमः ।
ॐ भोग्यायै नमः ।
ॐ भोग्यदायै नमः ।
ॐ भोगदायिन्यै नमः ।
ॐ भवान्यै नमः ।
ॐ भूतिदायै नमः ।
ॐ भूत्यै नमः ।
ॐ भूम्यै नमः ॥ ४००॥
ॐ भूमिसुनायिकायै नमः ।
ॐ भूतधात्र्यै नमः ।
ॐ भयहर्यै नमः ।
ॐ भक्तसारस्वतप्रदायै नमः ।
ॐ भुक्त्यै नमः ।
ॐ भुक्तिप्रदायै नमः ।
ॐ भेक्यै नमः ।
ॐ भक्त्यै नमः ।
ॐ भक्तिप्रदायिन्यै नमः ।
ॐ भक्तसायुज्यदायै नमः ॥ ४१०॥
ॐ भक्तस्वर्गदायै नमः ।
ॐ भक्तराज्यदायै नमः ।
ॐ भागीरथ्यै नमः ।
ॐ भवाराध्यायै नमः ।
ॐ भाग्यासज्जनपूजितायै नमः ।
ॐ भवस्तुत्यायै नमः ।
ॐ भानुमत्यै नमः ।
ॐ भवसागरतारण्यै नमः ।
ॐ भूत्यै नमः ।
ॐ भूषायै नमः ॥ ४२०॥
ॐ भूतेश्यै नमः ।
ॐ भाललोचनपूजितायै नमः ।
ॐ भूतायै नमः ।
ॐ भव्यायै नमः ।
ॐ भविष्यायै नमः ।
ॐ भवविद्यायै नमः ।
ॐ भवात्मिकायै नमः ।
ॐ बाधापहारिण्यै नमः ।
ॐ बन्धुरूपायै नमः ।
ॐ भुवनपूजितायै नमः ॥ ४३०॥
ॐ भवघ्न्यै नमः ।
ॐ भक्तिलभ्यायै नमः ।
ॐ भक्तरक्षणतत्परायै नमः ।
ॐ भक्तार्तिशमन्यै नमः ।
ॐ भाग्यायै नमः ।
ॐ भोगदानकृतोद्यमायै नमः ।
ॐ भुजङ्गभूषणायै नमः ।
ॐ भीमायै नमः ।
ॐ भीमाक्ष्यै नमः ।
ॐ भीमरूपिण्यै नमः ॥ ४४०॥
ॐ भाविन्यै नमः ।
ॐ भ्रातृरूपायै नमः ।
ॐ भारत्यै नमः ।
ॐ भवनायिकायै नमः ।
ॐ भाषायै नमः ।
ॐ भाषावत्यै नमः ।
ॐ भीष्मायै नमः ।
ॐ भैरव्यै नमः ।
ॐ भैरवप्रियायै नमः ।
ॐ भूत्यै नमः ॥ ४५०॥
ॐ भासितसर्वाङ्ग्यै नमः ।
ॐ भूतिदायै नमः ।
ॐ भूतिनायिकायै नमः ।
ॐ भास्वत्यै नमः ।
ॐ भगमालायै नमः ।
ॐ भिक्षादानकृतोद्यमायै नमः ।
ॐ भिक्षुरूपायै नमः ।
ॐ भक्तिकर्यै नमः ।
ॐ भक्तलक्ष्मीप्रदायिन्यै नमः ।
ॐ भ्रान्तिघ्नायै नमः ॥ ४६०॥
ॐ भ्रान्तिरूपायै नमः ।
ॐ भूतिदायै नमः ।
ॐ भूतिकारिण्यै नमः ।
ॐ भिक्षणीयायै नमः ।
ॐ भिक्षुमात्रे नमः ।
ॐ भाग्यवद्दृष्टिगोचरायै नमः ।
ॐ भोगवत्यै नमः ।
ॐ भोगरूपायै नमः ।
ॐ भोगमोक्षफलप्रदायै नमः ।
ॐ भोगश्रान्तायै नमः ॥ ४७०॥
ॐ भाग्यवत्यै नमः ।
ॐ भक्ताघौघविनाशिन्यै नमः ।
ॐ ब्राह्म्यै नमः ।
ॐ ब्रह्मस्वरूपायै नमः ।
ॐ बृहत्यै नमः ।
ॐ ब्रह्मवल्लभायै नमः ।
ॐ ब्रह्मदायै नमः ।
ॐ ब्रह्ममात्रे नमः ।
ॐ ब्रह्माण्यै नमः ।
ॐ ब्रह्मदायिन्यै नमः ॥ ४८०॥
ॐ ब्रह्मेश्यै नमः ।
ॐ ब्रह्मसंस्तुत्यायै नमः ।
ॐ ब्रह्मवेद्यायै नमः ।
ॐ बुधप्रियायै नमः ।
ॐ बालेन्दुशेखरायै नमः ।
ॐ बालायै नमः ।
ॐ बलिपूजाकरप्रियायै नमः ।
ॐ बलदायै नमः ।
ॐ बिन्दुरूपायै नमः ।
ॐ बालसूर्यसमप्रभायै नमः ॥ ४९०॥
ॐ ब्रह्मरूपायै नमः ।
ॐ ब्रह्ममय्यै नमः ।
ॐ ब्रध्नमण्डलमध्यगायै नमः ।
ॐ ब्रह्माण्यै नमः ।
ॐ बुद्धिदायै नमः ।
ॐ बुद्ध्यै नमः ।
ॐ बुद्धिरूपायै नमः ।
ॐ बुधेश्वर्यै नमः ।
ॐ बन्धक्षयकर्यै नमः ।
ॐ बाधनाशन्यै नमः ॥ ५००॥
ॐ बन्धुरूपिण्यै नमः ।
ॐ बिन्द्वालयायै नमः ।
ॐ बिन्दुभूषायै नमः ।
ॐ बिन्दुनादसमन्वितायै नमः ।
ॐ बीजरूपायै नमः ।
ॐ बीजमात्रे नमः ।
ॐ ब्रह्मण्यायै नमः ।
ॐ ब्रह्मकारिण्यै नमः ।
ॐ बहुरूपायै नमः ।
ॐ बलवत्यै नमः ॥ ५१०॥
ॐ ब्रह्मजायै नमः ।
ॐ ब्रह्मचारिण्यै नमः ।
ॐ ब्रह्मस्तुत्यायै नमः ।
ॐ ब्रह्मविद्यायै नमः ।
ॐ ब्रह्माण्डाधिपवल्लभायै नमः ।
ॐ ब्रह्मेशविष्णुरूपायै नमः ।
ॐ ब्रह्मविष्ण्वीशसंस्थितायै नमः ।
ॐ बुद्धिरूपायै नमः ।
ॐ बुधेशान्यै नमः ।
ॐ बन्ध्यै नमः ॥ ५२०॥
ॐ बन्धविमोचन्यै नमः ।
ॐ अक्षमालायै नमः ।
ॐ अक्षराकारायै नमः ।
ॐ अक्षरायै नमः ।
ॐ अक्षरफलप्रदायै नमः ।
ॐ अनन्तायै नमः ।
ॐ आनन्दसुखदायै नमः ।
ॐ अनन्तचन्द्रनिभाननायै नमः ।
ॐ अनन्तमहिमायै नमः ।
ॐ अघोरायै नमः ॥ ५३०॥
ॐ अनन्तगम्भीरसम्मितायै नमः ।
ॐ अदृष्टायै नमः ।
ॐ अदृष्टदायै नमः ।
ॐ अनन्तायै नमः ।
ॐ अदृष्टभाग्यफलप्रदायै नमः ।
ॐ अरुन्धत्यै नमः ।
ॐ अव्ययीनाथायै नमः ।
ॐ अनेकसद्गुणसंयुतायै नमः ।
ॐ अनेकभूषणायै नमः ।
ॐ अदृश्यायै नमः ॥ ५४०॥
ॐ अनेकलेखनिषेवितायै नमः ।
ॐ अनन्तायै नमः ।
ॐ अनन्तसुखदायै नमः ।
ॐ अघोरायै नमः ।
ॐ अघोरस्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ अशेषदेवतारूपायै नमः ।
ॐ अमृतरूपायै नमः ।
ॐ अमृतेश्वर्यै नमः ।
ॐ अनवद्यायै नमः ।
ॐ अनेकहस्तायै नमः ॥ ५५०॥
ॐ अनेकमाणिक्यभूषणायै नमः ।
ॐ अनेकविघ्नसंहर्त्र्यै नमः ।
ॐ ह्यनेकाभरणान्वितायै नमः ।
ॐ अविद्यायै नमः ।
ॐ अज्ञानसंहर्त्र्यै नमः ।
ॐ अविद्याजालनाशिन्यै नमः ।
ॐ अभिरूपायै नमः ।
ॐ अनवद्याङ्ग्यै नमः ।
ॐ अप्रतर्क्यगतिप्रदायै नमः ।
ॐ अकळ्ङ्कारूपिण्यै नमः ॥ ५६०॥
ॐ अनुग्रहपरायणायै नमः ।
ॐ अम्बरस्थायै नमः ।
ॐ अम्बरमयायै नमः ।
ॐ अम्बरमालायै नमः ।
ॐ अम्बुजेक्षणायै नमः ।
ॐ अम्बिकायै नमः ।
ॐ अब्जकरायै नमः ।
ॐ अब्जस्थायै नमः ।
ॐ अशुमत्यै नमः ।
ॐ अंशुशतान्वितायै नमः ॥ ५७०॥
ॐ अम्बुजायै नमः ।
ॐ अनवरायै नमः ।
ॐ अखण्डायै नमः ।
ॐ अम्बुजासनमहाप्रियायै नमः ।
ॐ अजरामरसंसेव्यायै नमः ।
ॐ अजरसेवितपद्युगायै नमः ।
ॐ अतुलार्थप्रदायै नमः ।
ॐ अर्थैक्यायै नमः ।
ॐ अत्युदारायै नमः ।
ॐ अभयान्वितायै नमः ॥ ५८०॥
ॐ अनाथवत्सलायै नमः ।
ॐ अनन्तप्रियायै नमः ।
ॐ अनन्तेप्सितप्रदायै नमः ।
ॐ अम्बुजाक्ष्यै नमः ।
ॐ अम्बुरूपायै नमः ।
ॐ अम्बुजातोद्भवमहाप्रियायै नमः ।
ॐ अखण्डायै नमः ।
ॐ अमरस्तुत्यायै नमः ।
ॐ अमरनायकपूजितायै नमः ।
ॐ अजेयायै नमः ॥ ५९०॥
ॐ अजसङ्काशायै नमः ।
ॐ अज्ञाननाशिन्यै नमः ।
ॐ अभीष्टदायै नमः ।
ॐ अक्तायै नमः ।
ॐ अघनेनायै नमः ।
ॐ चास्त्रेश्यै नमः ।
ॐ अलक्ष्मीनाशिन्यै नमः ।
ॐ अनन्तसारायै नमः ।
ॐ अनन्तश्रियै नमः ।
ॐ अनन्तविधिपूजितायै नमः ॥ ६००॥
ॐ अभीष्टायै नमः ।
ॐ अमर्त्यसम्पूज्यायै नमः ।
ॐ अस्तोदयविवर्जितायै नमः ।
ॐ आस्तिकस्वान्तनिलयायै नमः ।
ॐ अस्त्ररूपायै नमः ।
ॐ अस्त्रवत्यै नमः ।
ॐ अस्खलत्यै नमः ।
ॐ अस्खलद्रूपायै नमः ।
ॐ अस्खलद्विद्याप्रदायिन्यै नमः ।
ॐ अस्खलत्सिद्धिदायै नमः ॥ ६१०॥
ॐ आनन्दायै नमः ।
ॐ अम्बुजातायै नमः ।
ॐ अमरनायिकायै नमः ।
ॐ अमेयायै नमः ।
ॐ अशेषपापघ्न्यै नमः ।
ॐ अक्षयसारस्वतप्रदायै नमः ।
ॐ जयायै नमः ।
ॐ जयन्त्यै नमः ।
ॐ जयदायै नमः ।
ॐ जन्मकर्मविवर्जितायै नमः ॥ ६२०॥
ॐ जगत्प्रियायै नमः ।
ॐ जगन्मात्रे नमः ।
ॐ जगदीश्वरवल्लभायै नमः ।
ॐ जात्यै नमः ।
ॐ जयायै नमः ।
ॐ जितामित्रायै नमः ।
ॐ जप्यायै नमः ।
ॐ जपनकारिण्यै नमः ।
ॐ जीवन्यै नमः ।
ॐ जीवनिलयायै नमः ॥ ६३०॥
ॐ जीवाख्यायै नमः ।
ॐ जीवधारिण्यै नमः ।
ॐ जाह्नव्यै नमः ।
ॐ ज्यायै नमः ।
ॐ जपवत्यै नमः ।
ॐ जातिरूपायै नमः ।
ॐ जयप्रदायै नमः ।
ॐ जनार्दनप्रियकर्यै नमः ।
ॐ जोषनीयायै नमः ।
ॐ जगत्स्थितायै नमः ॥ ६४०॥
ॐ जगज्ज्येष्ठायै नमः ।
ॐ जगन्मायायै नमः ।
ॐ जीवनत्राणकारिण्यै नमः ।
ॐ जीवातुलतिकायै नमः ।
ॐ जीवजन्म्यै नमः ।
ॐ जन्मनिबर्हण्यै नमः ।
ॐ जाड्यविध्वंसनकर्यै नमः ।
ॐ जगद्योनये नमः ।
ॐ जयात्मिकायै नमः ।
ॐ जगदानन्दजनन्यै नमः ॥ ६५०॥
ॐ जम्ब्यै नमः ।
ॐ जलजेक्षणायै नमः ।
ॐ जयन्त्यै नमः ।
ॐ जङ्गपूगघ्न्यै नमः ।
ॐ जनितज्ञानविग्रहायै नमः ।
ॐ जटायै नमः ।
ॐ जटावत्यै नमः ।
ॐ जप्यायै नमः ।
ॐ जपकर्तृप्रियङ्कर्यै नमः ।
ॐ जपकृत्पापसंहर्त्र्यै नमः ॥ ६६०॥
ॐ जपकृत्फलदायिन्यै नमः ।
ॐ जपापुष्पसमप्रख्यायै नमः ।
ॐ जपाकुसुमधारिण्यै नमः ।
ॐ जनन्यै नमः ।
ॐ जन्मरहितायै नमः ।
ॐ ज्योतिर्वृत्यभिदायिन्यै नमः ।
ॐ जटाजूटनचन्द्रार्धायै नमः ।
ॐ जगत्सृष्टिकर्यै नमः ।
ॐ जगत्त्राणकर्यै नमः ।
ॐ जाड्यध्वंसकर्त्र्यै नमः ॥ ६७०॥
ॐ जयेश्वर्यै नमः ।
ॐ जगद्बीजायै नमः ।
ॐ जयावासायै नमः ।
ॐ जन्मभुवे नमः ।
ॐ जन्मनाशिन्यै नमः ।
ॐ जन्मान्त्यरहितायै नमः ।
ॐ जैत्र्यै नमः ।
ॐ जगद्योनये नमः ।
ॐ जपात्मिकायै नमः ।
ॐ जयलक्षणसम्पूर्णायै नमः ॥ ६८०॥
ॐ जयदानकृतोद्यमायै नमः ।
ॐ जम्भराद्यादिसंस्तुत्यायै नमः ।
ॐ जम्भारिफलदायिन्यै नमः ।
ॐ जगत्त्रयहितायै नमः ।
ॐ ज्येष्ठायै नमः ।
ॐ जगत्त्रयवशङ्कर्यै नमः ।
ॐ जगत्त्रयाम्बायै नमः ।
ॐ जगत्यै नमः ।
ॐ ज्वालायै नमः ।
ॐ ज्वालितलोचनायै नमः ॥ ६९०॥
ॐ ज्वालिन्यै नमः ।
ॐ ज्वलनाभासायै नमः ।
ॐ ज्वलन्त्यै नमः ।
ॐ ज्वलनात्मिकायै नमः ।
ॐ जितारातिसुरस्तुत्यायै नमः ।
ॐ जितक्रोधायै नमः ।
ॐ जितेन्द्रियायै नमः ।
ॐ जरामरणशून्यायै नमः ।
ॐ जनित्र्यै नमः ।
ॐ जन्मनाशिन्यै नमः ॥ ७००॥
ॐ जलजाभायै नमः ।
ॐ जलमय्यै नमः ।
ॐ जलजासनवल्लभायै नमः ।
ॐ जलजस्थायै नमः ।
ॐ जपाराध्यायै नमः ।
ॐ जनमङ्गळ्कारिण्यै नमः ।
ॐ कामिन्यै नमः ।
ॐ कामरूपायै नमः ।
ॐ काम्यायै नमः ।
ॐ कामप्रदायिन्यै नमः ॥ ७१०॥
ॐ कमाल्यै नमः ।
ॐ कामदायै नमः ।
ॐ कर्त्र्यै नमः ।
ॐ क्रतुकर्मफलप्रदायै नमः ।
ॐ कृतघ्नघ्न्यै नमः ।
ॐ क्रियारूपायै नमः ।
ॐ कार्यकारणरूपिण्यै नमः ।
ॐ कञ्जाक्ष्यै नमः ।
ॐ करुणारूपायै नमः ।
ॐ केवलामरसेवितायै नमः ॥ ७२०॥
ॐ कल्याणकारिण्यै नमः ।
ॐ कान्तायै नमः ।
ॐ कान्तिदायै नमः ।
ॐ कान्तिरूपिण्यै नमः ।
ॐ कमलायै नमः ।
ॐ कमलावासायै नमः ।
ॐ कमलोत्पलमालिन्यै नमः ।
ॐ कुमुद्वत्यै नमः ।
ॐ कल्याण्यै नमः ।
ॐ कान्त्यै नमः ॥ ७३०॥
ॐ कामेशवल्लभायै नमः ।
ॐ कामेश्वर्यै नमः ।
ॐ कमलिन्यै नमः ।
ॐ कामदायै नमः ।
ॐ कामबन्धिन्यै नमः ।
ॐ कामधेनवे नमः ।
ॐ काञ्चनाक्ष्यै नमः ।
ॐ काञ्चनाभायै नमः ।
ॐ कलानिध्यै नमः ।
ॐ क्रियायै नमः ॥ ७४०॥
ॐ कीर्तिकर्यै नमः ।
ॐ कीर्त्यै नमः ।
ॐ क्रतुश्रेष्ठायै नमः ।
ॐ कृतेश्वर्यै नमः ।
ॐ क्रतुसर्वक्रियास्तुत्यायै नमः ।
ॐ क्रतुकृत्प्रियकारिण्यै नमः ।
ॐ क्लेशनाशकर्यै नमः ।
ॐ कर्त्र्यै नमः ।
ॐ कर्मदायै नमः ।
ॐ कर्मबन्धिन्यै नमः ॥ ७५०॥
ॐ कर्मबन्धहर्यै नमः ।
ॐ कृष्टायै नमः ।
ॐ क्लमघ्न्यै नमः ।
ॐ कञ्जलोचनायै नमः ।
ॐ कन्दर्पजनन्यै नमः ।
ॐ कान्तायै नमः ।
ॐ करुणायै नमः ।
ॐ करुणावत्यै नमः ।
ॐ क्लीङ्कारिण्यै नमः ।
ॐ कृपाकारायै नमः ॥ ७६०॥
ॐ कृपासिन्धवे नमः ।
ॐ कृपावत्यै नमः ।
ॐ करुणार्द्रायै नमः ।
ॐ कीर्तिकर्यै नमः ।
ॐ कल्मषघ्न्यै नमः ।
ॐ क्रियाकर्यै नमः ।
ॐ क्रियाशक्त्यै नमः ।
ॐ कामरूपायै नमः ।
ॐ कमलोत्पलगन्धिन्यै नमः ।
ॐ कलायै नमः ॥ ७७०॥
ॐ कलावत्यै नमः ।
ॐ कूर्म्यै नमः ।
ॐ कूटस्थायै नमः ।
ॐ कञ्जसंस्थितायै नमः ।
ॐ काळिकायै नमः ।
ॐ कल्मषघ्न्यै नमः ।
ॐ कमनीयजटान्वितायै नमः ।
ॐ करपद्मायै नमः ।
ॐ कराभीष्टप्रदायै नमः ।
ॐ क्रतुफलप्रदायै नमः ॥ ७८०॥
ॐ कौशिक्यै नमः ।
ॐ कोशदायै नमः ।
ॐ काव्यायै नमः ।
ॐ कर्त्र्यै नमः ।
ॐ कोशेश्वर्यै नमः ।
ॐ कृशायै नमः ।
ॐ कूर्मयानायै नमः ।
ॐ कल्पलतायै नमः ।
ॐ कालकूटविनाशिन्यै नमः ।
ॐ कल्पोद्यानवत्यै नमः ॥ ७९०॥
ॐ कल्पवनस्थायै नमः ।
ॐ कल्पकारिण्यै नमः ।
ॐ कदम्बकुसुमाभासायै नमः ।
ॐ कदम्बकुसुमप्रियायै नमः ।
ॐ कदम्बोद्यानमध्यस्थायै नमः ।
ॐ कीर्तिदायै नमः ।
ॐ कीर्तिभूषणायै नमः ।
ॐ कुलमात्रे नमः ।
ॐ कुलावासायै नमः ।
ॐ कुलाचारप्रियङ्कर्यै नमः ॥ ८००॥
ॐ कुलानाथायै नमः ।
ॐ कामकलायै नमः ।
ॐ कलानाथायै नमः ।
ॐ कलेश्वर्यै नमः ।
ॐ कुन्दमन्दारपुष्पाभायै नमः ।
ॐ कपर्दस्थितचन्द्रिकायै नमः ।
ॐ कवित्वदायै नमः ।
ॐ काव्यमात्रे नमः ।
ॐ कविमात्रे नमः ।
ॐ कलाप्रदायै नमः ॥ ८१०॥
ॐ तरुण्यै नमः ।
ॐ तरुणीतातायै नमः ।
ॐ ताराधिपसमाननायै नमः ।
ॐ तृप्तये नमः ।
ॐ तृप्तिप्रदायै नमः ।
ॐ तर्क्यायै नमः ।
ॐ तपन्यै नमः ।
ॐ तापिन्यै नमः ।
ॐ तर्पण्यै नमः ।
ॐ तीर्थरूपायै नमः ॥ ८२०॥
ॐ त्रिदशायै नमः ।
ॐ त्रिदशेश्वर्यै नमः ।
ॐ त्रिदिवेश्यै नमः ।
ॐ त्रिजनन्यै नमः ।
ॐ त्रिमात्रे नमः ।
ॐ त्र्यम्बकेश्वर्यै नमः ।
ॐ त्रिपुरायै नमः ।
ॐ त्रिपुरेशान्यै नमः ।
ॐ त्र्यम्बकायै नमः ।
ॐ त्रिपुराम्बिकायै नमः ॥ ८३०॥
ॐ त्रिपुरश्रियै नमः ।
ॐ त्रयीरूपायै नमः ।
ॐ त्रयीवेद्यायै नमः ।
ॐ त्रयीश्वर्यै नमः ।
ॐ त्रय्यन्तवेदिन्यै नमः ।
ॐ ताम्रायै नमः ।
ॐ तापत्रितयहारिण्यै नमः ।
ॐ तमालसदृश्यै नमः ।
ॐ त्रात्रे नमः ।
ॐ तरुणादित्यसन्निभायै नमः ॥ ८४०॥
ॐ त्रैलोक्यव्यापिन्यै नमः ।
ॐ तृप्तायै नमः ।
ॐ तृप्तिकृते नमः ।
ॐ तत्त्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ तुर्यायै नमः ।
ॐ त्रैलोक्यसंस्तुत्यायै नमः ।
ॐ त्रिगुणायै नमः ।
ॐ त्रिगुणेश्वर्यै नमः ।
ॐ त्रिपुरघ्न्यै नमः ।
ॐ त्रिमात्रे नमः ॥ ८५०॥
ॐ त्र्यम्बकायै नमः ।
ॐ त्रिगुणान्वितायै नमः ।
ॐ तृष्णाच्छेदकर्यै नमः ।
ॐ तृप्तायै नमः ।
ॐ तीक्ष्णायै नमः ।
ॐ तीक्ष्णस्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ तुलायै नमः ।
ॐ तुलादिरहितायै नमः ।
ॐ तत्तद्ब्रह्मस्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ त्राणकर्त्र्यै नमः ॥ ८६०॥
ॐ त्रिपापघ्न्यै नमः ।
ॐ त्रिपदायै नमः ।
ॐ त्रिदशान्वितायै नमः ।
ॐ तथ्यायै नमः ।
ॐ त्रिशक्तये नमः ।
ॐ त्रिपदायै नमः ।
ॐ तुर्यायै नमः ।
ॐ त्रैलोक्यसुन्दर्यै नमः ।
ॐ तेजस्कर्यै नमः ।
ॐ त्रिमूर्त्याद्यायै नमः ॥ ८७०॥
ॐ तेजोरूपायै नमः ।
ॐ त्रिधामतायै नमः ।
ॐ त्रिचक्रकर्त्र्यै नमः ।
ॐ त्रिभगायै नमः ।
ॐ तुर्यातीतफलप्रदायै नमः ।
ॐ तेजस्विन्यै नमः ।
ॐ तापहार्यै नमः ।
ॐ तापोपप्लवनाशिन्यै नमः ।
ॐ तेजोगर्भायै नमः ।
ॐ तपःसारायै नमः ॥ ८८०॥
ॐ त्रिपुरारिप्रियङ्कर्यै नमः ।
ॐ तन्व्यै नमः ।
ॐ तापससन्तुष्टायै नमः ।
ॐ तपताङ्गजभीतिनुदे नमः ।
ॐ त्रिलोचनायै नमः ।
ॐ त्रिमार्गायै नमः ।
ॐ तृतीयायै नमः ।
ॐ त्रिदशस्तुतायै नमः ।
ॐ त्रिसुन्दर्यै नमः ।
ॐ त्रिपथगायै नमः ॥ ८९०॥
ॐ तुरीयपददायिन्यै नमः ।
ॐ शुभायै नमः ।
ॐ शुभावत्यै नमः ।
ॐ शान्तायै नमः ।
ॐ शान्तिदायै नमः ।
ॐ शुभदायिन्यै नमः ।
ॐ शीतळायै नमः ।
ॐ शूलिन्यै नमः ।
ॐ शीतायै नमः ।
ॐ श्रीमत्यै नमः ॥ ९००॥
ॐ शुभान्वितायै नमः ।
ॐ योगसिद्धिप्रदायै नमः ।
ॐ योग्यायै नमः ।
ॐ यज्ञेनपरिपूरितायै नमः ।
ॐ यज्यायै नमः ।
ॐ यज्ञमय्यै नमः ।
ॐ यक्ष्यै नमः ।
ॐ यक्षिण्यै नमः ।
ॐ यक्षिवल्लभायै नमः ।
ॐ यज्ञप्रियायै नमः ॥ ९१०॥
ॐ यज्ञपूज्यायै नमः ।
ॐ यज्ञतुष्टायै नमः ।
ॐ यमस्तुतायै नमः ।
ॐ यामिनीयप्रभायै नमः ।
ॐ याम्यायै नमः ।
ॐ यजनीयायै नमः ।
ॐ यशस्कर्यै नमः ।
ॐ यज्ञकर्त्र्यै नमः ।
ॐ यज्ञरूपायै नमः ।
ॐ यशोदायै नमः ॥ ९२०॥
ॐ यज्ञसंस्तुतायै नमः ।
ॐ यज्ञेश्यै नमः ।
ॐ यज्ञफलदायै नमः ।
ॐ योगयोनये नमः ।
ॐ यजुस्तुतायै नमः ।
ॐ यमिसेव्यायै नमः ।
ॐ यमाराध्यायै नमः ।
ॐ यमिपूज्यायै नमः ।
ॐ यमीश्वर्यै नमः ।
ॐ योगिन्यै नमः ॥ ९३०॥
ॐ योगरूपायै नमः ।
ॐ योगकर्तृप्रियङ्कर्यै नमः ।
ॐ योगयुक्तायै नमः ।
ॐ योगमय्यै नमः ।
ॐ योगयोगीश्वराम्बिकायै नमः ।
ॐ योगज्ञानमय्यै नमः ।
ॐ योनये नमः ।
ॐ यमाद्यष्टाङ्गयोगयुतायै नमः ।
ॐ यन्त्रिताघौघसंहारायै नमः ।
ॐ यमलोकनिवारिण्यै नमः ॥ ९४०॥
ॐ यष्टिव्यष्टीशसंस्तुत्यायै नमः ।
ॐ यमाद्यष्टाङ्गयोगयुजे नमः ।
ॐ योगीश्वर्यै नमः ।
ॐ योगमात्रे नमः ।
ॐ योगसिद्धायै नमः ।
ॐ योगदायै नमः ।
ॐ योगारूढायै नमः ।
ॐ योगमय्यै नमः ।
ॐ योगरूपायै नमः ।
ॐ यवीयस्यै नमः ॥ ९५०॥
ॐ यन्त्ररूपायै नमः ।
ॐ यन्त्रस्थायै नमः ।
ॐ यन्त्रपूज्यायै नमः ।
ॐ यन्त्रितायै नमः ।
ॐ युगकर्त्र्यै नमः ।
ॐ युगमय्यै नमः ।
ॐ युगधर्मविवर्जितायै नमः ।
ॐ यमुनायै नमः ।
ॐ यमिन्यै नमः ।
ॐ याम्यायै नमः ॥ ९६०॥
ॐ यमुनाजलमध्यगायै नमः ।
ॐ यातायातप्रशमन्यै नमः ।
ॐ यातनानान्निकृन्तन्यै नमः ।
ॐ योगावासायै नमः ।
ॐ योगिवन्द्यायै नमः ।
ॐ यत्तच्छब्दस्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ योगक्षेममय्यै नमः ।
ॐ यन्त्रायै नमः ।
ॐ यावदक्षरमातृकायै नमः ।
ॐ यावत्पदमय्यै नमः ॥ ९७०॥
ॐ यावच्छब्दरूपायै नमः ।
ॐ यथेश्वर्यै नमः ॥ ।
ॐ यत्तदीयायै नमः ।
ॐ यक्षवन्द्यायै नमः ।
ॐ यद्विद्यायै नमः ।
ॐ यतिसंस्तुतायै नमः ।
ॐ यावद्विद्यामय्यै नमः ।
ॐ यावद्विद्याबृन्दसुवन्दितायै नमः ।
ॐ योगिहृत्पद्मनिलयायै नमः ।
ॐ योगिवर्यप्रियङ्कर्यै नमः ॥ ९८०॥
ॐ योगिवन्द्यायै नमः ।
ॐ योगिमात्रे नमः ।
ॐ योगीशफलदायिन्यै नमः ।
ॐ यक्षवन्द्यायै नमः ।
ॐ यक्षपूज्यायै नमः ।
ॐ यक्षराजसुपूजितायै नमः ।
ॐ यज्ञरूपायै नमः ।
ॐ यज्ञतुष्टायै नमः ।
ॐ यायजूकस्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ यन्त्राराध्यायै नमः ॥ ९९०॥
ॐ यन्त्रमध्यायै नमः ।
ॐ यन्त्रकर्तृप्रियङ्कर्यै नमः ।
ॐ यन्त्रारूढायै नमः ।
ॐ यन्त्रपूज्यायै नमः ।
ॐ योगिध्यानपरायणायै नमः ।
ॐ यजनीयायै नमः ।
ॐ यमस्तुत्यायै नमः ।
ॐ योगयुक्तायै नमः ।
ॐ यशस्कर्यै नमः ।
ॐ योगबद्धायै नमः ॥ १०००॥
ॐ यतिस्तुत्यायै नमः ।
ॐ योगज्ञायै नमः ।
ॐ योगनायक्यै नमः ।
ॐ योगिज्ञानप्रदायै नमः ।
ॐ यक्ष्यै नमः ।
ॐ यमबाधाविनाशिन्यै नमः ।
ॐ योगिकाम्यप्रदात्र्यै नमः ।
ॐ योगिमोक्षप्रदायिन्यै नमः ॥ १००८॥
॥ इति श्रीस्कान्दपुराणान्तर्गता सनत्कुमारसंहितायां
नारदसनत्कुमारसंवादे सरस्वतीसहस्रनामस्तोत्रस्य
नामावली रूपान्तरं सम्पूर्णं ॥
ब्रह्माजी द्वारा रचित इसका नित्य एक पाठ या त्रयोदशी को 21 पाठ करने से वाणी सिद्धि तथा पाप मुक्त होता है।
ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार सृष्टि काल में ईश्वर की इच्छा से आद्याशक्ति ने अपने को पांच भागों में विभक्त कर लिया था ।
वे राधा, पद्मा, सावित्री, दुर्गा और सरस्वती के रूप में भगवान श्रीकृष्ण के विभिन्न अंगों से प्रकट हुई थीं ।
भगवान श्रीकृष्ण के कण्ठ से उत्पन्न होने वाली देवी का नाम 'सरस्वती' हुआ। ये ही विद्या की अधिष्ठात्री देवी हैं। पुस्तक और कलम में मां सरस्वती का निवास स्थान माना जाता है, इसलिए इनको कभी भी जूठे हाथों से नहीं छूना चाहिए और अपवित्र जगह पर नहीं रखना चाहिए ।
'श्रीदेवीभागवत' के अनुसार आद्याशक्ति ने अपने आपको तीन भागों में विभक्त किया, जो महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के नाम से जानी जाती हैं।

।।सिद्धसरस्वती_स्तोत्रं।।

दोर्भिर्युक्ताश्चतुर्भि: स्फटिकमणिमयीमक्ष मालां दधाना
हस्तेनैकेन पद्मं सितमपि च शुकं पुस्तकं चापरेण।
या सा कुन्देन्दुशंखस्फटिकमणिनिभा भासमाना समाना
सा मे वाग्देवतेयं निवसतु वदने सर्वदा सुप्रसन्ना।।1
आरूढ़ा श्वेतहंसे भ्रमति च गगने दक्षिणे चाक्षसूत्रं
वामे हस्ते च दिव्याम्बरकनकमयं पुस्तकं ज्ञानगम्या।
सा वीणां वादयन्ती स्वकरकरजपै: शास्त्रविज्ञानशब्दै:
क्रीडन्ती दिव्यरूपा करकमलधरा भारती सुप्रसन्ना।।2
श्वेतपद्मासना देवी श्वेतगन्धानुलेपना ।
अर्चिता मुनिभि: सर्वैरऋषिभि: स्तूयते सदा।।3।।
एवं ध्यात्वा सदा देवीं वांछितं लभते नर: ।।4।।
विनियोग:-ऊँ अस्य श्रीसिद्धसरस्वती स्तोत्र मन्त्रस्य मार्कण्डेय ऋषि: स्त्रग्धरा अनुष्टुप् छन्द:, मम वाग्विलाससिद्ध्यर्थं पाठे विनियोग:।
शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगव्द्यापिनीं
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्।
हस्ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्।।1।।
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा।।2।।
ह्रीं ह्रीं हृद्यैकबीजे शशिरुचिकमले कल्पविस्पष्टशोभे
भव्ये भव्यानुकूले कुमतिवनदवे विश्ववन्द्याड़्घ्रिपद्मे।
पद्मे पद्मोपविष्टे प्रणतजनमनोमोद सम्पादयित्रि
प्रोत्फुल्लज्ञानकूटे हरिनिजदयिते देवि संसारसारे।।3।।
ऎं ऎं ऎं दृष्टमन्त्रे कमलभवमुखाम्भोज भूते स्वरूपे
रूपारूपप्रकाशे सकलगुणमये निर्गुणे निर्विकारे।
न स्थूले नैव सूक्ष्मेSप्यविदितविभवे नापि विज्ञानतत्वे
विश्वे विश्वान्तरात्मे सुरवरनमिते निष्कले नित्यशुद्धे।।4।।
ह्रीं ह्रीं ह्रीं जाप्यतुष्टे हिमरुचिमुकुटे वल्लकीव्यग्रहस्ते
मातर्मातर्नमस्ते दह दह जडतां देहि बुद्धिं प्रशस्ताम्।
विद्ये वेदान्तवेद्ये परिणतपठिते मोक्षदे मुक्तिमार्गे
मार्गातीतस्वरूपे भव मम वरदा शारदे शुभ्रहारे।।5।।
धीं धीं धीं धारणाख्ये धृतिमतिनति भिर्नामभि: कीर्तनीये
नित्येऽनित्ये निमित्ते मुनिगणनमिते नूतने वै पुराणे।
पुण्ये पुण्यप्रवाहे हरिहरनमिते नित्यशुद्धे सुवर्णे
मातर्मात्रार्धतत्त्वे मतिमतिमतिदे माधवप्रीतिमोदे।।6।।
ह्रूं ह्रूं ह्रूं स्वस्वरूपे दह दह दुरितं पुस्तक व्यग्रहस्ते
संतुष्टाकारचित्ते स्मितमुखि सुभगे जृम्भिणि स्तम्भविद्ये।
मोहे मुग्धप्रवाहे कुरु मम विमतिध्वान्त विध्वंससमीडे
गीर्गौर्वाग्भारति त्वं कविवररसनासिद्धिदे सिद्धिसाध्ये।।7।।
स्तौमि त्वां त्वां च वन्दे मम खलु रसनां नो कदाचित्त्यजेथा
मा मे बुद्धिर्विरुद्धा भवतु न च मनो देवि मे यातु पापम्।
मा मे दु:खं कदाचित क्वचिदपि विषयेऽप्यस्तु मे नाकुलत्वं
शास्त्रे वादे कवित्वे प्रसरतु मम धीर्माऽस्तु कुण्ठा कदापि।।8।।
।।फलश्रुति।।
इत्येतै: श्लोकमुख्यै: प्रतिदिनमुषसि स्तौति यो भक्तिनम्रो
वाणी वाचस्पतेरप्यविदितविभवो वाक्पटुर्मुक्तकण्ठ:।
स स्यादिष्टार्थलाभै: सुतमिव सततं पाति तं सा च देवी
सौभाग्यं तस्य लोके प्रभवति कविता विघ्नमस्तं प्रयाति।।9।।
निर्विघ्नं तस्य विद्या प्रभवति सततं चाश्रुतग्रन्थबोध:
कीर्तिस्त्रैलोक्यमध्ये निवसति वदने शारदा तस्य साक्षात्।
दीर्घायुर्लोकपूज्य: सकलगुणनिधि: संततं राजमान्यो
वाग्देव्या: सम्प्रसादात् त्रिजगति विजयी जायते सत्सभासु।।10।।
ब्रह्मचारी व्रती मौनी त्रयोदश्यां निरामिष:।
सारस्वतो जन: पाठात् सकृदिष्टार्थलाभवान्।।11।।
पक्षद्वये त्रयोदश्यामेकविंशति संख्यया।
अविच्छिन्न: पठेद्धीमान् ध्यात्वा देवीं सरस्वतीम्।।12।।
सर्वपापविनिर्मुक्त: सुभगो लोकविश्रुत:।
वांछितं फलमाप्नोति लोकेऽस्मिन् नात्र संशय:।।13।।
ब्रह्मणेति स्वयं प्रोक्तं सरस्वत्या: स्तवं शुभम्।
प्रयत्नेन पठेन्नित्यं सोऽमृतत्वाय कल्पते ।।14।।
।। इति श्रीमद्ब्रह्मणा विरचितं श्रीसिद्ध सरस्वतीस्तोत्रं सम्पूर्णम्।।

Guru Sadhana News Update

Blogs Update