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चंडिका_जयंती बैशाख शुक्ल 15(पुर्णिमा) ॥ श्री चण्डिका मालामन्त्र प्रयोगः ॥

चंडिका_जयंती बैशाख शुक्ल 15(पुर्णिमा) ॥ श्री चण्डिका मालामन्त्र प्रयोगः ॥

चंडिका_जयंती बैशाख शुक्ल 15(पुर्णिमा) को मनाई जाएगी जो कि दिनांक 23।05।2024 को हैं।
सभी गुरुभाई/बहनों को मां भगवती चंडिका महाविद्या अवतरण दिवस की शुभकामनाएं संप्रेषित हैं...

#चंडिका_सप्तशतीहृदयमस्तोत्र :-

भगवती दुर्गाजी की कृपा हेतु सप्तशती हृदय स्तोत्र का पाठ बहुत लाभदायी है और जो लोग सप्तशती का पाठ करते है वे पाठ के पहले इसे पढेंगे!

विनियोग :- ॐ अस्य श्रीचंडिका (सप्तशति ) हृदयमालामंत्रस्य त्रिगुणात्मक ब्रह्म विष्णु रुद्रा ऋषय: विराट छंद: श्रीमहाचण्डी देवता ऐं बीजं ह्रीं शक्ति: क्लीं कीलकम मम अभीष्टसिद्धर्थे पाठे विनियोग:-

मंत्र:- ॐ हां हीं हुं ऐं स्त्रीं श्रीं ॐ नमो भगवति ! जय जय ज्वालामालिनि ! चामुंडे चंडिके त्रिदश मणि मुकुटकोटि निघृष्ट चरणारविंदे ! गायत्रि सावित्रि सरस्वति महासंध्ये महाबाण कृताभरणे ! भैरवरुपधारिणि प्रकट सदंष्ट्रोग्रवदने ! घोरे घोरासने नयनोज्ज्वल ज्वाल सहस्र परिवृते ! महाट्टहासधवलीकृतदिगंतरे ! दिवाकर सहस्रपरिवृत्ते ! कामरुपधारिणि ! महामणि द्योतित शशिप्रभा भासित सकल दिगंतरे ! सर्वायुधपरिपूर्णे कपालहस्ते गजगामिन्यौत्तरिण्ये ! भूतवेतालपरिवृत्ते प्रकंपित चराचरे मधु कैटभ महिषासुर धूम्रलोचन चण्ड मुण्ड रक्तबीज निशुंभ शुंभादि दैत्य निष्कण्टिके ! कालरात्रि महामाये शिवे नित्ये त्रिभुवन धराधरे ! वामे ज्येष्ठे वरदे रौद्रि अंबिके कालि कलविकरिणि ! बल प्रमथनि सर्व भूत दमनि मनोन्मय्यधारिणि ! ब्राह्मि माहेश्वरि कौमारि वैष्णवी ! वाराहि नारसिंही इंद्राणि चामुंडे ! माहेंद्रि शिवदूति महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती च त्रिस्थिते !नाद मध्ये स्थिते महोग्र विषोरग फणा फणि मुकुट रत्न ज्वालावलि !महाहि हार भूषित पाद बाहु कण्ठोत्तमांगे मालाकुले ! नवरत्न निधिकोशे ! शब्द स्पर्श रुप रस गंध आकाश वाक पाणि पाद पायु उपस्थ श्रोत्र त्वक चक्षु जिव्हा घ्राण मध्यस्थिते ! चक्षुष्मति महाविषोपविघ्ने महाज्वालानले ! महाभैरव स्तुते सर्वसिद्धिप्रदे ! निर्मले निष्कले नाभ्याधारादि संस्थिते ! परं ज्योति: स्वरुपे सोम सूर्याग्नि मंडल परिवृत्ते ! उर्ध्व विशुद्धांतक प्रभे विनिर्गत ब्रह्म विष्णु रुद्र दैवते ! परे अपरे प्रभा भासित चराचरे पंचविशति तत्त्वावबोधिनि महाशून्यागमे ! पति बंधु संस्थिते भुक्ति मुक्तिप्रदे ! निर्गुणे ऋग्यजु: सामार्थर्वणि पठिते ! एह्येहि भगवति स्थूल सूक्ष्म परे हुंकार निरुपिते ! परमकारुणिके महाज्वालामणे महिषोपरि गंधर्व विद्याधरार्चिते ! भुजंगमहिमे जृंभिणि वशीकरिणि जृंभे मोहे क्षोभे बीजपंचक मध्यस्थिते ! महायोगिनि महाज्वर क्षेत्रनायिके यक्ष राक्षस महाज्वर क्षेत्रविषोपविघ्ने ! गंधर्व विद्याधराराधिते ॐकार श्रींकार हस्ते ! आं क्रीं अग्निपात्रे ! द्रां शोषय शोषय , प्लुं प्लावय प्लावय , क्लीं ब्रीं सुकुमारय सुकुमारय , प्लुं नाशय नाशय , सीं उन्मादय उन्मादय , ग्लौं मोहय मोहय , ह्रीं आं ह्रीं आवेशय आवेशय , श्रीं प्रवेशय प्रवेशय , स्त्रीं आकर्षय आकर्षय , हुं हुं फट अतीतानागत वर्तमानान दिशं विदिशं , ऐं ह्रीं श्रीं श्रावय श्रावय , सर्वं प्रवेशय प्रवेशय , त्रैलोक्यं वशवर्ति , ऐंकार वशी कुरुष्व , ऐं ह्रीं स्त्रीं द्रावय द्रावय , सर्वं प्रवेशय प्रवेशय , ऐंकारचितां वशं कुरु वशं कुरु , ऐं ह्रीं श्रीं हां हीं हुं है हौं ह: , ह्रीं श्रीं स्त्रां स्त्रीं स्त्रूं स्त्रैं स्त्रौं स्त्र: मम सर्वकार्याणि साधय साधय हुं फट स्वाहा !

!! इति श्रीरुद्रयामलतंत्रे चंडिका ( सप्तशति ) हृदयम !!

#श्रीचण्डिकामालामन्त्र_प्रयोगः
विनियोगः-ॐ अस्य श्रीचण्डिका माला मंत्रस्य मार्कण्डेय ऋषिः अनुष्टप् छंदः श्रीचण्डिका देवता ॐ ह्रः बीजम् ॐ सौं शक्तिः ॐ कीलकम् मम श्रीचण्डिका प्रसाद सिद्ध्यर्थं सकलजन वश्यार्थं श्रीचण्डिका मालामंत्र जपे विनियोगः।

ऋष्यादिन्यासः-
ॐ मार्कण्डेय ऋषये नमः शिरसि ॥१॥
ॐ अनुष्टप्छंदसे नमः मुखे ॥ २ ॥
ॐ श्री चण्डिका देवतायै नमः हृदि॥३॥
ॐ ह्रः बीजाय नमः गुह्ये ॥ ४ ॥
ॐ सौं शक्तये नमः पादयोः ॥ ५ ॥
ॐ ह्रौं कीलकाय नम: नाभौ ॥ ६ ॥
ॐ विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ॥ ७ ॥ इति

ऋष्यादिन्यासः ।
करन्यासः-
ॐ ह्रां फां अंगुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रीं फीं तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ ह्रूं फूं मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रैं फैं अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रौं फौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रः फः करतल करपृष्ठाभ्यां नमः ।

हृदयादिन्यासः-
ॐ ह्राँ फाँ ह्रदयाय नमः ॥ १ ॥
ॐ ह्रीं फीं शिरसे स्वाहा ॥ २ ॥
ॐ ह्रूं फूं शिखायै वषट ॥ ३ ॥
ॐ ह्रैं फैं कवचाय हुँ ॥ ४ ॥
ॐ ह्रौं फौं नेत्रत्रयाय वौषट् ॥ ५ ॥
ॐ ह्रः फः अस्त्राय फट् ॥ ६ ॥
इति हृदयादिषडंगन्यासः। एवं न्यासं कृत्वा ध्यायेत्।

॥ अथ ध्यानम् ॥
ॐ कल्याणी कमलासनस्थशुभदां गौरी घनश्याम लामाविर्भावित भूषणामभयदामार्द्रैकरक्षैः शुभैः ।
श्रीं ह्रीं क्लीं वरमंत्रराजसहितामानंद पूर्णात्मिकां श्रीशैले भ्रमराम्बिकां शिवयुतां चिन्मात्रमूर्तिं भजे ॥१॥ इति

ध्यात्वा मानसोपचारैः संपूज्य सुवासिन्याः कुमार्याः पूजां कृत्वा पश्चाज्जपं कुर्यात् । अस्य पुरश्चरणं नित्यमेकविंशत्यधिकशतम् ॥

जपेन स्त्री पुरुषो वा वश्यो भवति ।
तथा च एकविंशत्यधिकशतजाप्येन वशमानयेत् ।
स्त्री वापि पुरुषो वापि सत्यं सत्यं न संशयः ॥१॥

राजद्वारे श्मशाने च विवादे शत्रुसंकटे । शत्रोरुच्चाटने चैव सर्वकार्याणि साधयेत्।

इस प्रकार ध्यान करके मानसोपचारों से पूजन करे और सुवासिनी कुमारी की पूजा करने के बाद जप करे ।

इसका पुरश्चरण प्रतिदिन 121 होता है, इसके जप से स्त्री या पुरुष वश में होते है । यह सत्य है यह सत्य है, इसमें कोई संशय नहीं । राजद्वार में या श्मशान में, विवाद में शत्रुसंकट में तथा शत्रु के उच्चाटन में यह सब कार्यों को सिद्ध करता है ।

॥ श्री चण्डिका मालामन्त्र प्रयोगः ॥

“ॐ ह्रः ॐ सौं ॐ ह्रौं ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीर्जयजय चण्डिका चामुण्डे चण्डिके त्रिदश-मुकुट-कोटि-संघट्टित-चरणारविंदे गायत्रि सावित्रि सरस्वति अहिकृताभरणे भैरव-रूप-धारिणि प्रकटित-दंष्ट्रोग्र-वदने घोरानन-नयने ज्वलज्ज्वाला-सहस्र-परिवृते महाट्टहास-धवलीकृत-दिगन्तरे सर्वयुग-परिपूर्णे कपाल-हस्ते गजाजिनोत्तरीय भूतवेताल-परिवृते अकंपित-धराधरे मधुकैटभ महिषासुर-धूम्रलोचन चण्डमुण्ड रक्तबीज शुम्भनिशुम्भदैत्यनिकृन्ते कालरात्रि महामाये शिवे नित्ये ॐ ऐं ह्रीं ऐन्द्रि आग्नेयि याम्ये नैर्ऋति वारुणि वायवि कौबेरि ऐशानि ब्रह्मविष्णुशिव स्थिते त्रिभुवन-धराधरे वामे ज्येष्ठे रौद्रि अम्बिके ब्राह्मी-माहेश्वरी-कौमारी वैष्णवी-वाराहींद्राणी-ईशानी-महालक्ष्मीः इति स्थिते महोग्रविषमहाविषोरग फणामणि मुकुटरत्न महाज्वालामल मणिमहाहिहार बाहुकहोत्तमांग नवरत्न निधि कोटितत्व-बाहु-जिह्वा-वाणी शब्द स्पर्श रूप रस गंधात्मिके क्षितिसाहस मध्यस्थिते महोज्ज्वलमहाविषोपविष गंधर्व-विद्या-धराधिपते ॐ ऐंकारा ॐ ह्रींकारा ॐ क्लींकारा हस्ते ॐ आँ ह्रीं क्रौं अनग्नेनग्नेपाते प्रवेशय प्रवेशय ॐ द्राँ द्रीं शोषय शोषय ॐ द्राँ द्रीं मोहय मोहय ॐ क्लाँ क्लीं दीपय दीपय ॐ ब्लूं ब्लूं संतापय संतापय ॐ सौं सौं उन्मादय उन्मादय ॐ म्लैं म्लैं मोहय मोहय ॐ खाँ खाँ शोधय शोधय ॐ द्याँ द्याँ उन्मादय उन्मादय ॐ ह्रीं ह्रीं आवेशय आवेशय ॐ स्त्रीं स्त्रीं उच्छादय उच्छादय ॐ स्त्रीं स्त्रीं आकर्षय आकर्षय ॐ हुँ हुँ आस्फोटय आस्फोटय ॐ त्रूँ त्रूँ त्रोटय त्रोटय ॐ छाँ छाँ छेदय छेदय ॐ कूँ कूँ उच्चाटय उच्चाटय ॐ हूँ हूँ हन हन ॐ ह्राँ ह्राँ मारय मारय ॐ घ्रीं घ्रीं घर्षय घर्षय ॐ स्वीं स्वीं विध्वंसय विध्वंसय ॐ प्लूँ प्लूँ प्लावय प्लावय ॐ भ्रां भ्रां भ्रामय भ्रामय ॐ ॐ म्रां म्रां दर्शय दर्शय ॐ दां दां दिशां बंधय बंधय ॐ दीं दीं वर्तिनामेकाग्रचित्ता विशिकुरुतेंगये ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः ॐ फ्राँ फ्रीं फ्रूं फ्रैं फ्रौं फ्रः ॐ चामुण्डायै विच्चे स्वाहा मम सकल मनोरथं देहि सर्वोपद्रवं निवारय निवारय अमुकं वशे कुरु कुरु भूत-प्रेत पिशाच ब्रह्मपिशाच ब्रह्मराक्षस यक्ष यमदूत शाकिनी डाकिनी सर्वश्वापदतस्करादिकं नाशय नाशय मारय मारय भंजय भंजय ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वाहा”।।

॥ इत्यथर्वणागमसंहितोक्त श्री चंडिका मालामंत्रविधानम्।।

#श्रीमंगलचंडिका स्तोत्र।।
इस पाठ के प्रभाव से विवाह एवं कार्य बाधा दूर होती है। धन व्यापार की समस्या, गृह-कलेश, विद्या प्राप्ति आदि में चमत्कारिक रूप से लाभ के लिए कामना अनुसार संकल्प कर पाठ करना अत्यंत फलप्रद माना गया है।

स्वयं भगवान् शिव ने इस स्तोत्र को महिमामंडित किया है!

प्रायः मंगल दोष के कारण पुरुष एवं स्त्री दोनों के विवाह में भी अड़चन बनी रहती है । उनके लिये यह स्त्रोत अत्यंत लाभदायी है ।।

मंत्र:- ॐ ह्रीं श्रीं कलीं सर्वपूज्ये देवी मंगल चण्डिके ऐं क्रू फट् स्वाहा ।।

देवी भागवत् के अनुसार अन्य मंत्र
ॐ ह्रीं श्रीं कलीम सर्व पुज्ये देवी मंगल चण्डिके हूँ हूँ फट् स्वाहा ।।


*।। श्री मंगलचंडिकास्तोत्रम् ।।*

!!ध्यान!!
"ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सर्वपूज्ये देवी मङ्गलचण्डिके I
ऐं क्रूं फट् स्वाहेत्येवं चाप्येकविन्शाक्षरो मनुः II

पूज्यः कल्पतरुश्चैव भक्तानां सर्वकामदः।
दशलक्षजपेनैव मन्त्रसिद्धिर्भवेन्नृणाम् II

मन्त्रसिद्धिर्भवेद् यस्य स विष्णुः सर्वकामदः I
ध्यानं च श्रूयतां ब्रह्मन् वेदोक्तं सर्व सम्मतम् II

देवीं षोडशवर्षीयां शश्वत्सुस्थिर यौवनाम्।
सर्वरूपगुणाढ्यां च कोमलाङ्गीं मनोहराम् II

श्वेतचम्पकवर्णाभां चन्द्रकोटि समप्रभाम्।
वन्हिशुद्धांशुकाधानां रत्नभूषणभूषिताम् II

बिभ्रतीं कबरीभारं मल्लिकामाल्य भूषितम् I
बिम्बोष्टिं सुदतीं शुद्धां शरत्पद्म निभाननाम् II

ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां सुनीलोल्पल लोचनाम् I
जगद्धात्रीं च दात्रीं च सर्वेभ्यः सर्वसंपदाम् II

संसारसागरे घोरे पोतरुपां वरां भजे II

देव्याश्च ध्यानमित्येवं स्तवनं श्रूयतां मुने I
प्रयतः संकटग्रस्तो येन तुष्टाव शंकरः II

शंकर उवाच:-
रक्ष रक्ष जगन्मातर्देवि मङ्गलचण्डिके I
हारिके विपदां राशेर्हर्षमङ्गलकारिके II

हर्षमङ्गलदक्षे च हर्षमङ्गलचण्डिके I
शुभे मङ्गलदक्षे च शुभमङ्गलचण्डिके II

मङ्गले मङ्गलार्हे च सर्व मङ्गलमङ्गले I
सतां मन्गलदे देवि सर्वेषां मन्गलालये II

पूज्या मङ्गलवारे च मङ्गलाभीष्टदैवते I
पूज्ये मङ्गलभूपस्य मनुवंशस्य संततम् II

मङ्गलाधिष्टातृदेवि मङ्गलानां च मङ्गले I
संसार मङ्गलाधारे मोक्षमङ्गलदायिनि II

सारे च मङ्गलाधारे पारे च सर्वकर्मणाम् I
प्रतिमङ्गलवारे च पूज्ये च मङ्गलप्रदे II

स्तोत्रेणानेन शम्भुश्च स्तुत्वा मङ्गल चण्डिकाम् I
प्रतिमङ्गलवारे च पूजां कृत्वा गतः शिवः।।

देव्याश्च मङ्गलस्तोत्रं यः श्रुणोति समाहितः I
तन्मङ्गलं भवेच्छश्वन्न भवेत् तदमङ्गलम्।।

।।इतिश्री ब्रह्मवैवर्ते मङ्गलचण्डिका स्तोत्रं संपूर्णम्II

उक्त स्त्रोत को मंगलवार के दिन से शुरू करें एवं माँ मंगल चंडिका का ध्यान कर दीपक जलाकर नित्य कम से कम 5 पाठ करने से अत्यंत लाभ मिलता है।

1. उपरोक्त दोनों में से किसी एक मंत्र का मन ही मन 108 बार जप करें तथा स्त्रोत्र का 11 बार उच्च स्वर से श्रद्धा पूर्वक प्रेम सहित पाठ करें। ऐसा आठ मंगलवार को करे। आठवें मंगलवार को किसी भी सुहागिन स्त्री को लाल ब्लाउज, लाल रिब्बन, लाल चूड़ी, कुमकुम, लाल सिंदूर, पान-सुपारी, हल्दी, स्वादिष्ट फल, फूल आदि देकर संतुष्ट करें !

अगर कुंवारी कन्या या पुरुष इस प्रयोग को कर रहे हैं तो वो अंजुली भर कर चने भी सुहागिन स्त्री को दें , ऐसा करने से उनका मंगल दोष शांत हो जायेगा। इस प्रयोग में व्रत रहने की आवश्यकता नहीं है! आप पाठ सुवह या शाम कभी भी कर सकते है।

यह अनुभूत प्रयोग है और आठ सप्ताह में ही चमत्कारिक रूप से लाभ होता है।

2. *उक्त स्त्रोत को मंगलवार के दिन से शुरू करें एवं माँ मंगल चंडिका का ध्यान कर दीपक जलाकर नित्य कम से कम 5 पाठ करने से अत्यंत लाभ मिलता है ।
3. अगर इतना समय न निकल सकें, तो केवल किसी एक मंत्र का जप करें!

मंत्र:- ॐ ह्रीं श्रीं कलीं सर्व पुज्ये देवी मंगल चण्डिके ऐं क्रू फट् स्वाहा!

देवी भगवत के अनुसार अन्य मंत्र :-

ॐ ह्रीं श्रीं कलीम सर्व पुज्ये देवी मंगल चण्डिके हूँ हूँ फट् स्वाहा।

#रुद्रचंडी स्तोत्र•
भगवती दुर्गा जी की साधना मे रुद्र चंडी स्तोत्र पाठ का एक अलग महत्त्व है। यह स्तोत्र रुद्रयामल तंत्र के अंतर्गत शिव पार्वती संवाद मे आता है।
इसका प्रतिदिन पाठ साधकों को भगवती की कृपा प्राप्ती का अनुभव देता है।
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घोरचंडी महाचंडी चंडमुंडविखंडिनी
चतुर्वक्त्रा महावीर्या महादेवविभूषिता !!

रक्तदंता वरारोहा महिषासुरमर्दिनी !
तारिणी जननी दुर्गा चंडिका चंडविक्रमा !!

गुह्यकाली जगद्धात्री चंडी च यामलोद्भवा !
श्मशानवासिनी देवी घोरचंडी भयानका !!

शिवा घोरा रुद्रचंडी महेशी गणभूषिता !
जान्हवी परमा कृष्णा महात्रिपुरसुंदरी !!

श्रीविद्या परमाविद्या चंडिका वैरिमर्दिनी !
दुर्गा दुर्गशिवा घोरा चंडहस्ता प्रचंडिका !!

माहेशी बगला देवी भैरवी चंडविक्रमा !
प्रमथैर्भूषिता कृष्णा चामुंडा मुंडमर्दिनी !!

रणखंडा चंद्रघंटा रणे रामवरप्रदा !
भवानी भद्रकाली च शिवा घोरा भयानका

विष्णुप्रिया महामाया नंदगोपगृहोद्भवा !
मंगला जननी चंडी महाक्रूद्धा भयंकरी !!

विमला भैरवी निद्रा जातिरुपा मनोहरा !
तृष्णा निद्रा क्षुधा माया शक्तिर्मायामनोहरा

तस्यै देव्यै नमो या वै सर्वरुपेण संस्थिता !
प्राणप्रिया जातिमाया निद्रारुपा महेश्वरी !!

या देवि सर्वभूतेषु सर्वरुपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: !!

महाचंडी शिवा घोरा महाभीमा भयानका !
कांचनी कमला विद्या महारोगविमर्दिनी !!

गुह्यचंडी घोरचंडी चंडी त्रैलोक्यदुर्लभा !
देवानां दुर्लभा चंडी रुद्रयामलसंमता !!

अप्रकाश्या महादेवी प्रिया रावणमर्दिनी !
मत्स्यप्रिया मांसरता मत्स्यमांसबलिप्रिया !!

मदमत्ता महानित्या भूतप्रमथसंगता !
महाभागा महारामा धान्यदा धनरत्नदा !!

वस्त्रदा मणिराज्यादि सदाविषयवर्धिनी !
मुक्तिदा सर्वदा चंडी महाविपदविनाशिनी !!

रुद्रध्येया रुद्ररुपा रुद्राणी रुद्रवल्लभा !
रुद्रशक्ती रुद्ररुपा रुद्रभूषा समन्विता !!

शिवचंडी महाचंडी शिवप्रेतगणान्विता !
भैरवी परमाविद्या महाविद्या च षोडशी !!

सुंदरी परमा पूज्या महात्रिपुरसुंदरी !
गुह्यकाली भद्रकाली महाकालविमर्दिनी !!

कृष्णा कृष्णस्वरुपा सा जनसम्मोहकारिणी
अतिमात्रा महालज्जा सर्वमंगलदायिका !!

घोरतंद्रा भीमरुपा भीमा देवी मनोहरा !
मंगला बगला सिद्धीदायिनी सर्वदा शिवा !!

स्मृतिरुपा कीर्तिरुपा बुद्धिरुपा मनोहरा !
विष्णुप्रिया शक्रपूज्या योगींद्रैरपि सेविता !!

भयानका महादेवी भवदु:खविनाशिनी !
चंडिका शक्तिहस्ता च कौमारी सर्वकामदा

वाराही च वराहास्या इंद्राणी शक्रपूजिता !
माहेश्वरी महेशास्या महेश गण भूषिता !!

चामुण्डा नारसिंही च नृसिंहशत्रूनाशिनी !
सर्वशत्रूप्रशमनी सर्वारोग्यप्रदायिनी !!

!!जय सद्गुरुदेव, जय महाँकाल!! 
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