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  • Mantra Tantra Yantra Vigyan Gurudev Dr. Narayan Dutt Shrimaliji

जीवन मेँ गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण

जीवन मेँ गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण

गतांक से आगे:-
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अंखियन की करि कोठरी पुतली पलंग बिछाय ,
पलकन की चिक डारि कै पिउ कौ लिया रिझाय ।
ना मैं देखूँ और को ना तौहे देखन देहूँ ।

-मेने तो आखों की कोठरी बना करके पुतली का पलंग बिछाया है, क्योकि मुझे तो उसे बैठाना हे, और फिर उस को कोई देखे नहीं इसलिए मैंने पलकों की चिक डाल दी हे . . . पिउ को लिया रिझाय . . . जो मेरा ईश्वर है, जो मेरा भगवान हे, जो मेरा प्रेमी हे, जो मेरे गुरु हैं, मैं उनको रिझाने की कोशिश कर रहीँ दूं . . . लेकिन मैँ रिझाने' की क्रिया पूरी तरह से" नहीं जानती, मुझें केवल इतना ही आता है कि मै उनको केवल आंखो मे बिठा लू', आंखें बन्द कर लू' । आखें इसलिए बन्द कर लूं… ना मैं देखूं और को ना तोहे देखन देहुँ .अब मैं दूसरे को देखना ही नहीं चाहती, क्योंकि दूसरे को देखने की क्रिया हे ही नहीँ, जहां दूसरा शब्द आया वहां प्रेम खत्म हो जाता हे 1
कबीर साफ कह रहा हे प्रेम गली अति सांकरी . . . बहुत संकरी हे यहां पर तुम और हम, अहंकार और प्रेमी दो रह ही नहीं सकते, यहां तुम रह सकते" ही या फिर अहंकार रह सकता है, या फिर रूप रह सकता है या फिर प्रेमी रह सकता है ।

अगर तुम्हें यह घमण्ड हे कि तुम योवनवान हो, तुम रूपवान हो, तुम सौन्दर्यवान हों, तुम में कुछ क्षमता, कुछ पौरुषतां हे तो वह सब कुछ एक तरफ रह जाएगा वह प्रेम नहीं बन सकता । प्रेम मेँ तो विसर्जन होता है, अपने-आप को मिटा देना हे, समाप्त कर देना हे और इसके लिए ज़रूरी हे कि हम मन के उन पर्दों को खोल सकें, पूरी तरह से उसमें समर्पित हो सकें ।

प्रेम करने की कला प्रत्येक को नहीँ आती । प्रेम वह कर सकता हे जिसका हृदय खुला है, प्रेम वह कर सकता हे जिसको ह्रदय को खोलने की कला का ज्ञान हे । पत्थर प्रेम नहीँ कर सकते, दीवारें प्रेम नहीं कर सकतीं, मरे हुए इन्सान प्रेम नहीँ कर सकते और तुम चलते-फिरते एक मुर्दा शरीर हो, इसलिए कि तुम्हें इस बात का अहसास नहीँ हे किं प्रेम शब्द क्या हे?

प्रेम कहते ही तुम्हारा नाक, मुह सिकुड़ने लग जाता हे, आंखें फैल जाती हैं, ऐसे चौंकते हो जैसे बिच्छु ने डंक मार दिया हो । तुम्हारे अनुसार प्रेम शब्द का अर्थ हे कि बहुत कुछ दुनिया अस्त व्यस्त हो गई, बहुत कुछ घटना घटित हो गई, बहुत कुछ गड़बढ़ हो गया, बहुत कुछ बरबाद हो गया . . . इतना संकीर्ण जहां बिचार हे वहां प्रेम जैसा देवता स्थापित नहीँ हो सकता . . . जहां पर इतनी ओछी मनोवृत्ति हे वहां पर ईश्वर नहीं बैठ सकते, गुरु स्थापित नहीं हो सकते । गुरु के लिए तो पूर्ण विस्तृत स्थान चाहिए, एक फैला हुआ कमल चाहिए, जिससे प्रेम की सूगन्ध भीनी भीनी आ रही हो . . . और अगर भीनी भीनी खुशबू आएगी नहीँ तो भ्रमर गुज़रण होगा नहीं, तितलियां उसके ऊपर नाचेंगी नहीं, मेघ आकाश मेँ छायेँगे नहीं, छोटी छोटी बूदों की बरसात होगी नहीं, यह सारा तन मन भीगेगा नहीँ । इसके लिए बहुत जरूरी हे कि हदय के अन्दर प्रेम का अंकुरण फूटे, इसके लिए यह जरूरी हे कि हदय मेँ एक चिनगारी सी जाग्रत हो ।

यह जागरण, यह चैतन्यता तब पेदा हो सकती हे, जब हम किसी क्रो अपने अन्दर उतारने का प्रयास करें, हम समर्पित. हों, हम पूरी तरह से उसमें डूबें, हम प्यार कर सकें, प्रेम कर सकें । हम सब कुछ दे सकें, अपने आप क्रो मिटा सकें . . . लेने की तो भावना हे ही नहीं . . . प्रेम लेना जानता ही नहीं . . . प्रेम में "ल और प' दोनों मिल ही नहीं सकते, क्योंकि प्रेम केवल देना जानता है ! जहाँभी स्वार्थ की भावना आएगी, जहां भी संग्रह की वृति आएगी वहां प्रेम नहीं रह सकता, प्रेम समाप्त हो जाएगा ।

इसलिए मैंने कहा कि बुद्धि केवल संग्रह करना जानती है, और व्यक्ति जितना संग्रह करता रहेगा उतना ही संकीर्ण होता रहेगा, उतना ही वह ओछा बन जाएगा, एक स्थान पर सिमट कर के रह जाएगा . . . और सिमटा हुआ व्यक्ति एक सूखे वृक्ष की ठूंठ की तरह होता हे . . . एक सूखे हुए ठूंठ के अन्दर कोंपलें नहीँ फूट सकतीं, उसके ऊपर चाहे कितनी ही बरसात ही जाए, उसके अन्दर हरी भरीं हरियाली युक्त पत्ते नहीँ जाग्रत्त हो सकते, उसके ऊपर कोई पक्षी बैठकर गुजरण नहीँ कर सकता, उसके ऊपर कोयल बैठकर कुहू कुहू की आवाज नहीं कर सकती क्योंकि वह ठूँठ हे, ठूंठ बन गया हे, ठूंठ बना दिया हे उस की बुद्धि ने, क्योकि उसके बाहर का चित्त तो जाग्रत है और बाहर का चित्त तो कह रहा है तुम्हें संग्रह करना है . . . और वह संग्रह करने में पागल हो गया है 1 वह धन के पीछे दीवाना हे और जितना ही वह धन ज्यादा एकत्र करने की कोशिश करता हे, धन की सुरक्षा की चिन्ता करता हे, रूप, योवन की चिन्ता करता हे, उतना ही प्रेम उससे दूर हटता जाता हे ।

यह तुम्हारा सोन्दर्य, यह तुम्हारा रूप, योवन रखने के लिए नहीँ हे, क्योंकि अगर गुलाब के पुष्प को ज्यों का त्यों रहने दिया जाए तो वह मुरझा करके गिर जाएगा । गुलाब के पुष्प को सही ढंग से विकसित होने के लिए आवश्यक है कि सही समय पर वर्षा की रिमझिम फुहार उस पर पडे और वह भीगे. . . फिर जब वह पुष्प विकसित हो तब उसक गुजरण को सुनने की जरूरत हे । ठीक समय पर जब, हृदय कमल विकसित हो तब प्रेम का अकूँर फौड़ने की जरूरत है, और ज्यों ही प्रेम का अकूर फूटता है त्यों ही तन मन एक अजीब से आनन्द में भीग जाता हे . . . अहसास होता है कि कोई हे, कोई मेरा है जिसकी याद में वह खोई हुई रहती हे हर क्षण । पानी भी पीती है तो उसको ऐसा अहसास होता है कि पैं पानी भी उसको पिला रही दूं खाना खाती है तो ऐसा लगता हे कि वह उसको खाना खिला रही है, मैँ कुछ नहीँ हू, मेरा कुछ है ही नहीं ।

मीरा तू का देखियो तू चंचल चित चौर,
खाऊँ पिऊं नाचूं और मान करुं तोहि ओर ।

मीरा कह रही है मैं क्या कर रहीँ हू? में तो कुछ करती ही नहीं हू तुम मेरे अन्दर बैठे हो और मुझे नचा रहे हो, मैँ तो हर क्षण एक उन्मुक्त अवस्था में दूं, ऐसी अवस्था मेँ हू जिसका आनन्द मैं ही अनुभव कर रही हू । मेरे चारों तरफ सुन्दर गुलाब के पुष्प विकसित हैँ, मेरे चारों तरफ एक अजीब सा आनन्द है, क्योंकि मुझमें तुम स्थापित हुए हो, मुझमें प्रेम का अंकुर फूटा हे . . . और जिसक अन्दर प्रेम का, अकूर फूट जाता हे, जिसके अन्दर प्रेम की चिनगारी फूट जाती हे उसक लिए सब कुछ बेमानी हो जाता हे । उसके लिए मां बाप, भाई, बहिन कोई अर्थ नहीं रखते । नदी को तो कोई रोक नहीं पाता, और नदी रुक गई तो वह नदी नहीं है । प्रेम रुक नहीं सकता, प्रेमी से मिलना और प्रेमी से ' साक्षात्कार करना ही उसकी नियति रही हे, जो बीच में सूख जाती है उसको नदी नहीं कहते, ओर जो व्यक्ति जीवन के इस रास्ते में बीच में रुक जाता हे उसकी जिन्दगी, जिन्दगी नहीं हे । कोई प्राण का नाद नहीं है, कोई संगीत नहीँ हे । प्रेम के संगीत को वेदों ने' "जिन्दगी का संगीत" कहा हे.. और यह संगीत, होठों का तरन्तुम, आखों मेँ मस्ती, जिन्दगी की धड़कन तब बनती हे जब मन मेँ प्रेम का अंकुर फूटता हे । हम किसी क
के होते हैं, जब कोई हमारी याद करता हे, जब हम किसी
की आंखों में खोये हुए रहते हैं, जब हम किसी के चिन्तन मे'" डूबे हुए रहते हैँ . . . और ऐसी क्रिया सौभाग्यशाली व्यक्तियों को ही प्राप्त हो सकती है, कायर और बुज़दिलों को नहीँ । वह जीवन ही क्या जो बांटने की क्रिया जानता ही नहीं । उस जीवन का अर्थ ही क्या है जहां प्राणों की लहर बनी ही नहीं? उस जीवन का मतलब ही क्या है जब हमने किसी को अपना बनाया ही नहीँ?

और अपना बना लेने की क्रिया के लिए अपने-आप को मिटा देना जरूरी हे, क्योंकि नदी अपने-आप को मिटा देती हे समुद्र मेँ, और वह स्वयं को धन्य मान लेती है, पूर्ण हो जाती हे, पूरी तरह से उसमें निमग्न हो जाती है ।समुद्र बांहें फैलाए खडा रहता है . . . नदी वेग से आती हे . . . लहराती हुई . . . पहाडों से पछाड़ खाती हुई . . . भागती हुईं . . . दोढ़ती हुई . . . और बीच में कोई भी रुकावट आती हे, पर वह नदी नहीँ रुकती . . . नदी रुक नहीं सकती . . . पहाढ़ आते हैँ तो वह पहाडों को तोढ़ देती है . . . गांव आते हैँ तो गांव को बडा देती है . . . समाज किनारों के अन्दर नदीं को बांधने की कोशिश करता हे तो नदी उन किनारों क्रो तोढ़ देती हे । नदी तो तेजी से भागती है . . . दौढ़ती है . . . प्रियतम से मिलने के लिए . . . और जिस क्षण नदी समुद्र में लीन हो जाती हे, एकाकार हो जाती है, बिलकुल शांत हो जाती हे, उसकी लहरों में संगीत फूट पढ़ता हे, जो जीवन का संगीत हे … और इसी संगीत को "ब्रह्यानन्द" कहा गया हे, इसी संगीत को "साधना की पूर्णता" कहा गया हे । इस संगीत को, इस सिमट जाने की किया को, इस अपने -आप को समर्पित कर देने की क्रिया को ' "ब्रह्म की पूर्ण उपलब्धि" कहा हे ।

इसलिए तो अपने-आप क्रो समर्पित कर देना नारी बनकर के, प्रेमिका बनकर के उस प्रभु में, उस प्रेमी मेँ, उस गुरु मेँ लीन हो जाने की क्रिया ही ब्रह्म से साक्षात्कार करना है, साधना और सिद्धि की उपलब्धि हे ।

उपनिषदों में एक बहुत महत्वपूर्ण बात कहीँ हे . . . एक सो आठ उपनिषदों के सारभूत तथ्यों को, एक वाक्य मेँ कहा जाए तो सारे उपनिषदों का एक ही सार हे और वह सार हैं… "जीवन मेँ गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण ।" हमने ईश्वर को, ब्रह्म को नहीं देखा, हम यह भी नहीं जानते कि साधना की सीढियां कैसी हैं, कितनी हैं और कैसे चढ़नी हैँ । हमेँ तो केवल इतना ही भान हे कि यह जो सामने खडा हे वह गुरु हे । यह मेरे जैसा हे, इसके दिल में भी एक हृदय धडकता है
क्रमशः




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*दुर्लभ तंत्र बाधा निवारण प्रयोग जिसमे दीक्षा, शक्ति पात, यंत्र और गुटिका वगैरह की आवश्यकता नहीं है।।*
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*दुर्लभ तंत्र बाधा निवारण प्रयोग जिसमे दीक्षा, शक्ति पात, यंत्र और गुटिका वगैरह की आवश्यकता नहीं है।।*
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