Thursday 3rd of August 2017 12:16:23 PM


गुरु की दृष्टि तो साधक की ओर अखण्ड रुप से है ,
किन्तु साधक ही गुरु की ओर दृष्टि नहीँ करता है ।
गुरु तो जीव को अपनाने हेतु तत्पर हैँ किन्तु

...अभागा साधक उनसे मिलने को आतुर कहाँ है ?

गूरूमंत्र की महिमा


गुरुमंत्रो मुखे यस्य तस्य सिद्धयन्ति नान्यथा | 
दीक्षया सर्वकर्मणी सिद्धयन्ति गुरुपुत्रके ||


" जिसके मुख में गुरुमंत्र है उसके सब कर्म सिद्ध होते है | दूसरे के नहीं | दीक्षा के कारण शिस्य के सर्व कार्य सिद्ध हो जाते है "
गुरु दीक्षा लेना आध्यात्मिक जीवन का श्री गणेश करना है । और इसका दो मार्ग है एक तो गुरु मंत्र के अनुष्ठान से दूसरा त्रिमूर्ति गुरुदेव से ।
गुरु त्रिमूर्ति से दीक्षा लेकर गुरु परिवार को उचित निर्धारित दक्षिणा देना सर्वाधिक श्रेयस्कर है। गुरु दीक्षा के उपरांत जो यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है।
उसको जीवन पर्यन्त निभाना चाहिए। गुरु मंत्र का नित्य जप निर्देशानुसार करना चाहिए। और स्वयं की वैचारिक शुद्धि करना चाहिए। समाज की क्रूर कुटिल वासनात्मक मानसिकता से स्वयं को अलग करके क्षमाशील, दयाशील, सरल और सौंदर्यमय बनाएं।
गुरु मन्त्र की जितनी महिमा की जाये उतनी कम है | इस परम मंत्र का गूढ़ अर्थ को समझाना अंत्यंत कठिन है ,|
गुरु मंत्र का प्रत्यक अक्षर अपने आप में बीजाक्षर है ,प्रत्येक अक्षर का कुण्डलिनी के षट्चक्रों पर ध्यान करने से जपकाल में ही 
विलक्षण एवम आशचर्यजनक उपलब्धि अनुभूति होने लगती है , साथ ही साथ इस प्रकार कुण्डलनी के चर्को पर गुरु और मंत्रो का जप करने से निश्चय ही कुण्डलनी जाग्रत होती है | और ऐसे साधक को जप काल के बीच में त्रिकालदर्शता प्राप्त हो जाती है | उसका शहस्त्रहार चक्र विकशित हो जाता है ,और साधक निस्चय ही शास्त्रहर भेदन में पूर्ण सफलता प्राप्त कर लेता है |
जो गुरु मंत्र की सिद्धि प्राप्त कर लेता है ,उसके जीवन में समस्त ऐश्वर्य स्वतः ही प्राप्त हो जाता है
सद्गुरुदेव यही कहते थे की साधना में सफलता के मात्र एक ही आधार हे इसमें आपको पूर्ण श्रद्धा और विश्वास होना चाहिए तभी आपको भौतिक और आध्यात्मिक सफलता प्राप्त होगी ही।

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