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चौसठ शक्ति तत्व (64 Shakti Elements), दुर्गा विस्तार स्वरूप चौसठ शक्ति तत्व विशे चौसठ शक्ति तत्व (64 Shakti Elements), दुर्गा विस्तार स्वरूप चौसठ शक्ति तत्व विशेष साधना

MTYV Sadhana Kendra -
Friday 10th of June 2016 08:09:43 AM


दुर्गा विस्तार स्वरूप
चौसठ शक्ति तत्व
विशेष साधना

शक्ति साधना के द्वारा ही इस जीवन में इन सब शक्तियों की प्राप्ति हो सकती हैै। इनमें से एक भी शक्ति की कमी रहती है तो जीवन कुछ अपूर्ण सा लगने लगता है। केवल एक ही रूप में साधना करने से शक्ति की सिद्धि सम्भव नहीं है, जीवन में रौद्रता, उग्रता के साथ-साथ शान्ति हो, शत्रुओं के लिये उग्रता, मित्रों के लिये शान्ति, परिवार के लिए लक्ष्मी, ज्ञान के लिये स्मृति, मन के लिये तुष्टि, निर्बल के लिये दया, स्वभाव में नम्रता, क्योंकि नम्र वही हो सकता है, जो शक्ति से परिपूर्ण हो। निर्बल भिक्षुक हो सकता है, याचक हो सकता है, लेकिन सबल अपने स्वभाव को सुरक्षित रखते हुए नम्रता से परिपूर्ण हो सकता है।

दुर्गा के विभिन्न रूप स्वरूप हैं – ज्ञान भी दुर्गा हैं, विज्ञान भी दुर्गा हैं, तंत्र भी दुर्गा हैं। साथ ही जहां पर भी सात्विक शक्तियां हैं, वे दुर्गा के ही रूप हैं और दुर्गा के राजसिक स्वरूप भी हैं – चंचलता, कला, नृत्य, संगीत, चित्रकारी। ये भी दुर्गा शक्ति के प्रतिबिम्बित स्वरूप हैं।

तंत्र की परंपरा में देवी के हजारों रूप हैं, धारणा है। जिनका पूजन और स्मरण किया जाता है। दुर्गा अपने विभिन्न स्वरूपों में संकटों की निवारक हैं। काली के रूप में वह काल और अहंकार को मारती हैं। सरस्वती के रूप में वह देवी ज्ञान-विज्ञान की दात्री हैं, लक्ष्मी के स्वरूप में वही देवी धन का वरदान देती हैं, सम्पदा और समृद्धि का वरदान देती हैं। इन सभी रूपों में दया, क्षमा, करुणा, वीरता जैसी शक्तिशाली स्पंदनकारी शक्तियों का आह्वान किया जाता है।
तंत्र कहता है मातृ शक्ति ही इस जगत की जननी है। वही देवी शक्ति या पराशक्ति के नाम से जानी जाती हैं। शास्त्रों में ऐसा माना गया कि सभी पदार्थों के मूल रूप में शक्ति ही विराजमान हैं। यह शक्ति हम सब के भीतर है। न केवल हमारी देह बल्कि हमारे मन, हमारी आत्मा में भी विराजमान हैंं। शक्ति का कोई अपना निश्‍चित रूप-स्वरूप नहीं है। यह शक्ति विभिन्न रूपों में प्रकट होती है और यही शक्ति विभिन्न तरंगों में भी प्रतीत होती है। वह निराकार भी है, साकार भी है अर्थात वह पदार्थ भी है, वह ऊर्जा भी है। इसी शक्ति के परिणाम स्वरूप चांद, सूरज हैं। मनुष्यों, पक्षियों, पशुओं, वृक्षों, पत्थरों, पृथ्वी, स्वर्ण, चांदी, पानी, चांद, तारों, ग्रहों आदि सब ओर उसी शक्ति का प्रताप दिखाई देता है।
हम सब उसी शक्ति के ही व्यक्त रूप हैं। वह स्वयं अव्यक्त रूप हैं। यह शक्ति समूल जगत की मूल हैं और मनुष्य की देह में मूलाधार चक्र में स्थापित हैं और यही शक्ति इस सारे जगत की सृष्टिकर्ता भी हैं।
सौंदर्य लहरी की प्रथम पंक्ति में देवी की स्तुति की गई है। जिसमें कहा गया है कि – बिना शक्ति के शिव भी अप्रभावकारी होते हैं। ऋषियों ने भी पहले ‘त्वमेव माता’ कहा , फिर कहा ‘च पिता त्वमेव’।
देवी के यह तीन स्वरूप सृष्टि कर्त्ता, पालन कर्त्ता और संहारक हैं और इन्हीं तीन रूपों की विशिष्टता से नवरात्रि के दिनों में पूजन किया जाता है।
जब मनुष्य के मन में धारणा , एकाग्रता की शक्ति पूर्ण हो जाती है, तो यही आगे जाकर ध्यान में परिवर्तित हो जाती है और ध्यान की ऊंची अवस्था को ही समाधि कहा जाता है।
मूल प्रकृति जिससे यह मन, पदार्थ और भौतिक जगत उत्पन्न हुआ है। उस मूल शक्ति की ओर अपनी अंतर्यात्रा को बढ़ाने का पर्व ही गुप्त नवरात्रि का आध्यात्मिक लक्ष्य है।
गुप्त नवरात्रि वह पर्व है, जिस पर्व में साधक अपने अंदर उस पराशक्ति के साथ एकाकार होने का परिश्रम करता है। गुप्त नवरात्रि देवी शक्ति के चौसठ स्वरूपों से एकाकार होने का श्रेष्ठतम काल है।
दुर्गा शक्ति स्वरूप
ॐ कालारभ्राभां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेनदुरेखां,
शंख चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम्।
सिंहस्कन्धाधिरुढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं,
ध्यायेद्दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धिकामः।
हे देवी दुर्गा! आप समस्त राक्षसी वृत्तियों पर जयी होने के कारण जया हैं। आप ॠषि, मुनियों, योगियों, देवगणों एवं सिद्धि प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले साधक वृन्दों द्वारा पूजनीय एवं वन्दनीय हैं। आपके शरीर की आभा काले मेघ के समान शान्तिदायक है। आपकी क्रोध दृष्टि शत्रुओं को भयभीत कर देती हैं, श्रीमस्तक पर चन्द्ररेखा एवं चारों हाथों में शंख,चक्र, कृपाण और त्रिशूल हैं। सिंह पर आरूढ़ आपके ही तेज से तीनों लोक परिपूर्ण होते हैं।
मां भगवती दुर्गा का यह स्वरूप शक्ति का साकार स्वरूप है। जहां मां भगवती की आराधना होती है, वहां शक्ति चैतन्य रूप से स्थायी रहती हैं।
शक्ति का तात्पर्य केवल बल नहीं है, शक्ति की जो व्याख्या मार्कण्डेय ॠषि ने दी है, वह शक्ति का पूर्ण स्वरूप है। शक्ति का तात्पर्य है – वृद्धि, सिद्धि, सौम्यता, रौद्रता, जगतप्रतिष्ठा, चैतन्यता, बुद्धि, तृष्णा, नम्रता, शान्ति, श्रद्धा, कान्ति, लक्ष्मी, स्मृति, दया, तुष्टि एवं इच्छा हैं।
शक्ति साधना के द्वारा ही इस जीवन में इन सब शक्तियों की प्राप्ति हो सकती हैै। इनमें से एक भी शक्ति की कमी रहती है तो जीवन कुछ अपूर्ण सा लगने लगता है। केवल एक ही रूप में साधना करने से शक्ति की सिद्धि सम्भव नहीं है, जीवन में रौद्रता, उग्रता के साथ-साथ शान्ति हो, शत्रुओं के लिये उग्रता, मित्रों के लिये शान्ति, परिवार के लिए लक्ष्मी, ज्ञान के लिये स्मृति, मन के लिये तुष्टि, निर्बल के लिये दया, स्वभाव में नम्रता, क्योंकि नम्र वही हो सकता है, जो शक्ति से परिपूर्ण हो। निर्बल भिक्षुक हो सकता है, याचक हो सकता है, लेकिन सबल अपने स्वभाव को सुरक्षित रखते हुए नम्रता से परिपूर्ण हो सकता है।

नवरात्रि ही नहीं जीवन का प्रत्येक दिन साधनाओ के लिये विशेष सिद्धिदायक माना गया है। शक्ति के इन हजारों स्वरूपों में प्रमुख हैं – जीवन में अभय शक्ति, शत्रु बाधा अर्थात् विवाद, मुकदमा षड्यंत्र इत्यादि में विजय और जीवन में प्रेम और रस में निरन्तर अभिवृद्धि। इन शक्तियों का जीवन में पूर्ण समावेश होना आवश्यक है।


शक्ति प्रमोद में विवरण है, कि एक बार कार्तिकेय जी कैलाश पर्वत पर शिव की स्तुति करते हुये बोले – हे देवाधिदेव! तुम्ही परमात्मा हो, शिव हो, तुम्ही सभी प्राणियों की गति हों, तुम्ही जगत के आधार हो और विश्‍व के कारण हो, तुम्ही सबके पूज्य हो, तुम्हारे बिना मेेरी कोई गति नहीं है। कृपा कर मेरे संशय का निवारण करें। कार्तिकेय ने भगवान शिव से कहा –

किं गुह्यं परमं लोके किमेकंं सर्व सिद्धिम्।
किमेकं परमं श्रेष्ठं को योगः स्वर्ग मोक्षदः।
बिना तीर्थेन तपसा बिना दानैर्विना मखैः।
कस्मादुत्पद्यते सृष्टिः कस्मिंश्च प्रलयो भवेत।


कौन सी वस्तु संसार में समस्त सिद्धियों को देने वाली है? वह कौन सा योग है जो परमश्रेष्ठ है? कौनसा योग है जो स्वर्ग और मोक्ष दोनों देने वाला है? बिना तीर्थ, बिना दान, बिना यज्ञ, लय या ध्यान के मनुष्य किस उपाय से सिद्धि को प्राप्त कर सकता है? यह सृष्टि किससे उत्पन्न हुई? किसमें इसका लय होता है? हे देव! किस उपाय से मनुष्य संसार रूपी सागर को पार उतर सकता है? कृपा कर बतायें।
इसके उत्तर में भगवान शिव बोले कि इस जगत के सभी पदार्थ, जड़-चेतन, सजीव-निर्जीव मात्र तीन गुणों के संयोजन से ही गतिशील होते हैं। मनुष्य की समस्त गतिविधियां, मनुष्य की जीवन शैली, जीवन में उतार चढ़ाव, गुण-दोष, स्वभाव मात्र इन तीन गुणों अर्थात् सत्य, रज एवं तम से ही बनते हैं। इन तीनों गुणों का जिस पराशक्ति से प्रादुर्भाव होता है वही भगवती आद्याशक्ति है।
शक्ति के अनेकानेक रूप हैं और शक्ति का प्रत्येक स्वरूप अपनी विविधता से युक्त मानव के लिये आवश्यक हैं। एक बार एक शिष्य ने सद्गुरुदेव से प्रश्‍न किया कि क्या ऐसा सम्भव नहीं है, शक्ति के बहु आयामी स्वरूप की साधना एक साथ कर सकें।
गुरुदेव ने एक प्रकार शक्ति के बारे में बताते हुए कहा कि – हमारे समक्ष शक्ति के तीन स्वरूप हैं। महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती। इनकी नवरात्रि में विशेष पूजना की जाती है। यह सर्वविदित है लेकिन इन शक्तियों का विस्तार स्वरूप क्या है? दुर्गा शक्ति का विस्तार स्वरूप तो चौसठ कलाएं हैं। जीवन के प्रत्येक पक्ष से सम्बन्धित एक-एक कला है। इन सब कलाओं का पूर्ण स्वरूप दुर्गा है। इसलिये साधक को इन चौसठ शक्ति स्वरूपों की साधना करनी चाहिये, जिससे शरीर और मन का प्रत्येक पक्ष जाग्रत हो सके, यही दुर्गा का आधारभूत स्वरूप है।
सद्गुरुदेव ने अपने शिष्य को आशीर्वाद देते हुए कहा कि – शक्ति की श्रेष्ठ साधना चौसठ शक्ति साधना है, जिसमें बीज मंत्र सहित चौसठ रूप में ध्यान किया जाये तो शक्ति को साधक का वरण करना ही पड़ता है।
साधना सामग्री
इस साधना से लिये निम्न सामग्री की आवश्यकता होती है- तांत्रोक्त नारियल, चौसठ शक्ति दुर्गा यंत्र तथा विशेष मंत्रों से सिद्ध की गई शक्ति माला। इसके अतिरिक्त कुंकुम, अक्षत, पुष्प, लौंग, दीपक इत्यादि की व्यवस्था पहले से करके रख देनी चाहिए।
गुप्त नवरात्रि चैतन्य शक्ति पर्व शक्ति साधना का श्रेष्ठतम् काल होता है। इसके अतिरिक्त इस साधना को किसी भी माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को सम्पन्न किया जा सकता है।
साधना विधान
साधना वाले दिवस साधक स्नान कर उत्तर दिशा की ओर मुंह करके लाल आसन पर बैठ जाये और स्वयं लाल धोती धारण कर लें। अपने सामने लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछायें। उस पर गुरु चित्र/विग्रह/ गुरु यंत्र/ गुरु पादुका स्थापित कर साधना में सफलता हेतु दोनों हाथ जोड़कर गुरुदेव निखिल का ध्यान करें –

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्‍वरः।
गुरुः साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

निखिल ध्यान के पश्‍चात् गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका को जल से स्नान करावें –

ॐ निखिलम् स्नानम् समर्पयामि॥

इसके पश्‍चात् स्वच्छ वस्त्र से पौंछ लें निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुए कुंकुम, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, धूप-दीप से पंचोपचार पूजन करें –

ॐ निखिलम् कुंकुम समर्पयामि।
ॐ निखिलम् अक्षतान् समर्पयामि।
ॐ निखिलम् पुष्पम् समर्पयामि।
ॐ निखिलम् नैवेद्यम् निवेदयामि।
ॐ निखिलम् धूपम् आघ्रापयामि, दीपम् दर्शयामि।

(धूप, दीप दिखाएं)
अब तीन आचमनी जल गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका पर घुमाकर छोड़ दें। इसके पश्‍चात् गुरु माला से गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें –

ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः

गुरु पूजन के पश्‍चात् गुरु चित्र के सम्मुख ही चावल की ढेरी बनाकर कर, उस पर तांत्रोक्त नारियल तथा सामने ही किसी प्लेट या थाली में पुष्पों का आसन देकर चौसठ शक्ति यंत्र स्थापित कर दें। यंत्र के चारों और तेल के नौ दीपक लगा दें। तांत्रोक्त नारियल का अक्षत, पुष्प आदि से पंचोपचार पूजन करें। इसके पश्‍चात् चौसठ शक्तियों का पूजन किया जाता है, निम्न प्रत्येक मंत्र जप के पश्‍चात् यंत्र पर कुंकुम, अक्षत और एक लौंग चढ़ाएं –


चौसठ शक्तियों के मंत्र –


ॐपिं पिगलाक्ष्यै नमः ॐविं विडालाक्ष्यै नमः
ॐसं समृद्धयै नमः ॐवृं वृद्धयै नमः
ॐश्रं श्रद्धायै नमः ॐस्वं स्वाहायै नमः
ॐस्वं स्वधायै नमः ॐमं मातृकायै नमः
ॐवं वसुंधरायै नमः ॐत्रिं त्रिलोकरात्र्यै नमः
ॐसं सवित्र्यै नमः ॐगं गायत्र्यै नमः
ॐत्रिं त्रिदशेश्‍वर्यै नमः ॐसुं सुरुपायै नमः
ॐबं बहुरुपायै नमः ॐसकं स्कन्दायै नमः
ॐअं अच्युतप्रियायै नमः ॐविं विमलायै नमः
ॐअं अमलायै नमः ॐअं अरुणायै नमः
ॐआं आरुण्यै नमः ॐप्रं प्रकृत्यै नमः
ॐविं विकृत्यै नमः ॐसृं सृत्यै नमः
ॐस्थिं स्थित्यै नमः ॐसं सहृत्यै नमः
ॐसं सन्धायै नमः ॐमं मात्र्यै नमः
ॐसं सत्यै नमः ॐहं हंस्यै नमः
ॐमं मर्दिन्यै नमः ॐरें रंजिकायै नमः
ॐपं परायै नमः ॐदं देवमात्र्यै नमः
ॐभं भगवत्यै नमः ॐदं देवक्यै नमः
ॐकं कमलासनायै नमः ॐत्रिं त्रिमुख्यै नमः
ॐसं सप्तमुख्यै नमः ॐसुं सुरायै नमः
ॐअं असुरमर्दिन्यै नमः ॐलं लम्बोष्ठयै नमः
ॐऊं ऊर्ध्वकेशिन्यै नमः ॐबं बहुशिखायै नमः
ॐवृं वृकोदरायै नमः ॐरं रथरेखायै नमः
ॐ शं शशिरेखायै नमः ॐअं अपरायै नमः
ॐगं गगनवेगायै नमः ॐपं पवनवेगायै नमः
ॐभुं भुवनमालायै नमः ॐमं मदनातुरायै नमः
ॐअं अनंगायै नमः ॐअं अनंगमदनायै नमः
ॐअं अनंगमेखलायै नमः ॐअं अनंग कुसुमायै नमः
ॐविं विश्‍वरुपायै नमः ॐअं असुरायै नमः
ॐअं अपंगसिद्धयै नमः ॐसं सत्यवादिन्यै नमः
ॐवं वज्ररुपायै नमः ॐशं शुचिवृत्तायै नमः
ॐवं वरदायै नमः ॐवं वागीश्‍वर्यै नमः
शक्ति के चौसठ स्वरूपों के आह्वान के पश्‍चात् साधक एकाग्र मन से निम्न मंत्र की ग्यारह माला मंत्र जप करें। यह मंत्र जप सिद्धि माला से ही सम्पन्न करें।
मंत्र

॥ ॐ ह्रीं क्रीं पूर्ण शक्ति स्वरुपायै क्रीं ह्रीं ॐ फट् ॥


मंत्र जप समाप्ति के बाद माला को गले में धारण कर लें तथा यंत्र को अपने पूजा स्थान में स्थापित कर दें। सवा माह तक माला को धारण करके रखें। सवा महीने बाद माला और यंत्र को नदी में प्रवाहित कर दें।


साधक द्वारा एकाग्र मन से यह साधना करने पर एक विशेष अनुभूति प्राप्त होती है। उसके मन के द्वार खुलने लगते है। शक्ति का प्रवाह रोम-रोम में होने लगता है, जब शक्ति का प्रवाह होता है तभी साधक के अपने कर्म द्वारा कार्य पूर्ण होते हैं।


साधना सामग्री – 1490/-

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