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Wednesday 11th of October 2017 10:27:16 AM


अंधकार से प्रकाश की ओर
अंधकार व्यापक है, रोशनी की अपेक्षा| क्योंकि अंधेरा अधिक काल तक रहता है, अधिक समय तक रहता है और रोशनी अधिक देर तक नहीं रहती| दिन के पीछे भी अंधेरा है रात का| दिन के आगे भी अंधेरा है रात का| माँ के गर्भ में भी अंधेरा है, जहाँ से हमारे शरीर की शुरुआत हुई और जब शरीर से प्राणपखेरू निकलते हैं तो पुन: जीव अंधकार में डूबता है| रोशनी बहुत थोड़े समय को होती है और अंधकार बहुत लम्बे समय का होता है|
अभी भी तुम्हारे जीवन में तुम्हारी आँखें खुलने की अपेक्षा बंद अधिक समय तक रहती हैं| वह कैसे? नींद में| आप जैसे अपने अकाऊंट का या घर का हिसाब-किताब करते ही हैं, उसी तरह किसी दिन बैठ कर यह हिसाब करिए कि आपकी आँखें अधिक देर तक बंद रही हैं या रहती हैं, या आपकी आँखें अधिक देर तक खुली हुई रहती हैं| जब आप सोते हो तो सात घंटे, आठ घंटे सोए रहते हो और नवजात शिशु बीस से बाईस घंटे सोता है| पाँच साल की आयु तक उसकी नींद का अनुपात दस से बारह घंटे तक आ जाता है| व्यस्क होते- होते नींद आठ या नौ घंटे तक रह जाती है| और जैसे ही आप अपनी ज़िम्मेदारियों और विकास की ओर बढ़ते है, वैसे-वैसे नींद का समय कम होने लग जाता है| पर फिर भी औसतन छ: से आठ घंटे आप सब सोते हैं|
जैसे आज आपकी आयु 40 साल की है, अब आप बताइए की 40 साल के काल में आप कितने घंटे सोए? 40 साल का हर दिन 24 घंटे का है और इन 24 घंटों में से 8 घंटे आप सोए हैं| तो हिसाब लगाकर मुझे बताइए की 40 साल के काल में आप कितने घंटे सोए? अब इन 40 वर्षों में सिर्फ़ आठ घंटे औसत होता है जब आप 13 या 14 साल के हुए| उसके पहले तुम जब नवजात शिशु रहे तो बीस-बाईस-तेईस घंटे तक भी सोए| 6 महीने का बच्चा आँख तब खोलता है जब उसका बिस्तर गीला हो, या कोई कष्ट हो, नहीं तो वह सोता रहता है| नींद में शिशु का शरीर प्रतिदिन बढ़ता है|
अब आप हिसाब लगाओ कि आप कितने घंटे सोए? बहुत लम्बा समय नींद में गया| सच तो यह है कि 40 साल के जीवन काल में कम से कम16 साल से 17 साल नींद में गुजर चुके हैं| आदमी की औसतन उमर 60 की लगाएँ तो इन 60 सालों में वह 23 या 24 साल सोता है| 8 घंटे की नींद तो चाहिए ही क्योंकि इसके बगैर तो शरीर कार्य ही नहीं कर सकता|
हाँ, अगर आप नियमित प्राणायाम, आसनों का अभ्यास करें और जैसे-जैसे आपका प्राणायाम, आसन का अभ्यास गहरा होने लग जाए, वैसे-वैसे आपके शरीर को प्रकृति से ऊर्जा लेने की और ऊर्जा को स्टोर करने की क्षमता बढ़ने लग जाती है| जिसके परिणाम स्वरूप आपकी नींद का औसत कम होने लग जाता है|
मेरा कहने का मतलब यह है कि आप अपने जीवनकाल में जागने की अपेक्षा अधिक देर तक सोए हैं| आँखें कम समय के लिए खुलती है, बंद अधिक देर तक रहती हैं| जब आँखें बंद करते हैं तो अंधकार ही दिखता है| आँखें बंद की, तो अंधकार, आँखें खोली तो कुछ देर रोशनी| रोशनी भी कब तक? जब तक दिन का सूरज है| जैसे दिन का सूरज गया, तो फिर वही अंधकार|
मनुष्य ने इस अंधकार से अपने आपको मुक्ति दिलाने के लिए पहले आग जलाई, लैम्प जलाए और बिजली के बल्ब या ट्यूब जलाते हैं| पर सोने के समय फिर रोशनी बाधा पहुँचाती है| इसलिए फिर हमें अंधकार चाहिए|
देखिए, आदमी बहुत बढ़िया घर बनाए, बेशकीमती झाड़- फानूस लगाए, कीमती लाइटें लगवाए, लेकिन नींद के समय ये सब बंद कर देता है| महँगे से महँगा सांउंड सिस्टम लेता है| कुछ समय उसका मज़ा लेता है| फिर कहता कि बंद करो इसको| अब संगीत भी शोर लगाने लगा| सब बंद, लाइट सब बंद, अब ये सब उसको शोर लग रहा है| फिर सब बंद करके मज़े से सोता है|
अंधकार पहले भी , अंधकार बाद में भी| अंधकार दिन के पहले भी, अंधकार दिन के अंत में भी| अंधकार जन्म से पहले भी, अंधकार मृत्यु की घड़ी से फिर शुरू हो जाता है| अजब बात यह है कि आप अंधकार से डरते हैं और रोशनी में आपको उत्तेजना और प्रसन्नता होती है| होना तो इसका उल्टा चाहिए क्योंकि अंधकार आपका साथी है, रोशनी एक मेहमान है जो कुछ समय के लिए आती है और फिर कुछ समय बाद चली जाती है| हमारी सारी साधना इसीलिए है कि हम इस रोशनी को अपने जीवन में चिर स्थायी कर सकें|
प्रकृति ने दिन व रात का प्रावधान दिया| किंतु मानव मस्तिष्क ने पहले अग्नि को खोजा, फिर नन्हें मिट्टी के दीये बना कर गहरी, काली अंधियारी रातों को भी उजाला कर लिया|
ठीक इसी तरह गुरु भी अपने शिष्यों के जीवन में अपने ज्ञान, करुणा व प्रेम के नन्हें-नन्हें दीयों को बड़े धैर्यपूर्वक जगा कर उनके जीवन को प्रकाश वान करता है| ज्ञान, ध्यान व स्नेह के दीयों की दीपावली नित्य ही सदशिष्यों के जीवन को सौंदर्यवान बनाती है, जो बाहरी दीयों की ख़त्म हो जाने वाली रोशनी की जगह चिर- स्थाई अंतर्जगत की दीपावली में हमारा प्रवेश कराती है| साधक के लिए ये बाहरी दीये संदेश हैं, भीतर की दीपावली की ओर अग्रसर होने का|
अंधकार से हमें प्रकाश की ओर अग्रसर होना है| परमात्मा प्रकाश स्वरूप है| लेकिन इस प्रकाश को प्रस्फुटित होने के लिए एक द्वार तो चाहिए| जैसे बल्ब, ट्यूब ये सब किसके कारण जल रहे हैं? जो पीछे से विद्‌युत आ रही है, ये उसकी वजह से जलते हैं| अब जैसे पीछे से विद्‌युत आ रहा हो , और बल्ब न हो तो रोशनी कैसे होगी? बिजली को रोशनी में बदलने के लिए एक माध्यम तो चाहिए, चाहे वह बल्ब हो, या ट्यूब हो, कुछ हो| बिजली कहाँ से बाहर निकले? आगे कोई उपकरण तो हो|
अब मान लो बल्ब फ़्यूज़ हो, पीछे से लाईट आ रही है, तो भी कमरे में अंधेरा ही होगा| तो रोशनी लाने के लिए बल्ब को बदलना ही पड़ेगा| इसी तरह से ज्ञान रूप परमात्मा है लेकिन इस ज्ञान रूप परमात्मा को भी अपना ज्ञान रूप प्रकाश देने के लिए, यह शरीर रूपी गुरु की आवश्यकता है|
यह जो मनुष्य का शरीर है, इस शरीर रूपी बल्ब की आवशयक्ता होती है| ज्ञान बिजली की तरह हो गया| परमात्मा निर्गुण है, निराकार है, सत्यस्वरूप है, आनंद स्वरूप है, व्यापक भी है, चेतना भी है, लेकिन हमको इसका प्रकाश कब मिलता है? जब गुरु रूप बल्ब बीच में आ जाए|
जो लोग यह कहते हैं कि हमें व्यक्ति रूप गुरु की ज़रूरत नहीं है, वे बहुत बड़ी भूल में हैं| बहुत से ऐसे लोग है जो कहते हैं कि हम व्यक्ति रूप गुरु के पास क्यों जाएँ, जब कि हमारे पास गीता है, गुरुबाणी है, उपनिषद् है, हमारे पास सारे ग्रंथ हैं, हम इनको पढ़ कर ज्ञान पा लेंगे| हम किसी संत के पास क्यों जाएँ? तो याद रहे, आपके पास बल्ब की फोटोग्राफ हो सकती है, बड़ी सुंदर फोटो हो, तुम उन सब को घर में लाकर चिपका दो, तो क्या रोशनी हो जाएगी?

परमात्मा ज्ञान रूप है, यह सच बात है| लेकिन इस ज्ञान रूप बिजली का प्रकाश अगर देखना है तो गुरु का वह बल्ब बीच में तुम्हें चाहिए ही चाहिए, इसके बगैर रोशनी नहीं होगी| सिर्फ़ बिजली से प्रकाश नहीं होता है, प्रकाश तो बल्ब से होता है, इसीलिए कहा-

अगर दोनो में से एक को चुनना ही पड़ जाए तो मैं गुरु को चुनूँगा क्योंकि गुरु के द्वारा ईश्वर को समझ लूँगा| अगर गुरु न रहा पास में, तो ईश्वर तो गूंगा है, वह बोल नहीं सकता है| सत्य तो गूंगा है, सत्य को ज़ुबान तो गुरु ही देता है| कैसे?

राग बाँसुरी के भीतर होते हैं क्या? राग बाँसुरी के अंदर नहीं, राग बजाने वाले के कंठ में होते हैं| बाँसुरी चुरा लेने से तुम उसके राग नहीं चुरा सकते| इसी तरह से ज्ञान, देने वाले उस व्यक्ति के हृदय में है, ज्ञान शब्दों में नहीं होता| शब्द तो सिर्फ़ बाहरी माध्यम हैं| जैसे बाँसुरी सिर्फ़ माध्यम है|
सारे ग्रंथ, सारे शब्द, उस बाँसुरी की तरह से हैं| पुस्तकों में लिखे शब्द उस बाँसुरी की तरह ही हैं| तुमने दो टके में ज्ञान की किताब तो खरीद ली, पर इस भ्रम में मत रहना कि उसमें से ज्ञान का राग भी निकलने लग जाएगा| ज्ञान का राग तो गुरु के मुखारविन्द से ही निकले तो असर करता है|
तुम सबके लिए मैं हृदय से मंगल कामना करता हूँ | तुम्हारा अंधकार दूर हो, तुम्हारा तमस दूर हो, तुम्हारा साधना का मार्ग प्रशस्त हो, तुम्हारे संकल्प बलवती हों, और तुम बंधनों से मुक्त हो जीवन के अमृत लाभ को ले सको| यह रोशनी जो अभी बाहर है, यह तो कल तक नहीं थी, आज है और फिर ख़त्म हो जाएगी| सुबह में भुवन भास्कर सूर्य देवता जब उदय होंगे तो इनकी रोशनी की चमक क्या रह जाएगी सूर्य के सामने! यह अभी इतनी प्यारी जो लग रही हैं रोशनियाँ; छोटी-छोटी टिमटिमाती पीली लाल नीली; सूरज के सामने फीकी हो जाएँगी|
तुम्हारे ये देह इन्द्रियों के छोटे-छोटे सुख, तुम्हारे अभिमान और तुम्हारे मन की ममता के सुख इन जलती हुई छोटी-छोटी बत्तियों की तरह ही हैं| तुम्हारे अंदर आनंद का जब महा सूर्य उदय हो सकता है, तो इन बुझ जाने वाली छोटी-छोटी चमकदार संसार की सुख की घड़ियों के पीछे अपने जीवन को अंधकार से क्यों भरना! जीवन को उज्जवल बनाओ| बहुत भटक लिए अंधकार में, अब तो आँखें खोलो|


Aj mata ji ham logo ko chhod kar chaali gai sidhasram 

jeevan ka ye sobhgya hai ki ham ese yug me hai jaha ham mukt ho sakte hai 


aap bhi kosis aaj hi kare kaal to kabhi aata hi nahi hai?

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