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Saturday 9th of June 2018 03:22:56 AM


पूज्यपाद सद्गुरुदेव डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली जी-:निखिलम शरणम :-
डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली जी (परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद जी)


हम सन्यासी शिष्यों में इतने वर्षों तक साथ रहने के बावजूद भी इतनी हिम्मत नहीं कि आपके सामने रहने के बावजूद भी इतनी हिम्मत नहीं कि आपके सामने खड़े होकर, सामने देखकर कुछ बोल सकें... पर यहाँ तो गृहस्थ शिष्यों के साथ आप बैठते हैं हंसी-मजाक करते हैं, और वे आपके सामने बैठकर बतियाने लगते हैं, और आप हैं कि सुनते रहते हैं.... इतना समय हैं क्या आपके पास?

ये कैसे शिष्य हैं, कि सामने देखकर बतियाते रहे... यह सब क्या हैं? - पूंछ रहे थे सनाय्सी गुरुभाई रविन्द्र स्वामी, गुरूजी से.

"तुम नहीं समझते रविन्द्र. यह गृहस्थ संसार हैं, जंगल और हिमालय का प्रांतर नहीं..... ये गृहस्थ शिष्य हैं, इनकी दृष्टि स्थूल हैं ये धन, पुत्र, सुख मांगकर ही प्रसन्न ही जाते हैं, शिष्यत्व क्या हैं? इसे पहिचानने और समझने के लिए बहुत बड़े त्याग कि जरूरत हैं और जहाँ तक मेरा प्रश्न हैं मैं इन पर आवरण डाले रखता हूँ, जो इस आवरण को भेदकर मुझ तक पहुंचता हैं, अपने "स्व" ko मिटाकर लीन होता हैं, वही शिष्य बन सकता हैं वही बनता हैं."

-समाधान किया गुरुदेव ने.

डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली
जन्म : 21 अप्रैल 1933
नाम : डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली
सन्यासी नाम : श्री स्वामी निखिलेश्वरानंद जी महाराज
जन्म स्थान : खरन्टिया (वर्तमान में पाकिस्तान में)
पिता : पंडित मुल्तान चन्द्र श्रीमाली
शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी) राजस्थान विश्वविद्यालय 1963.
पी.एच.डी. (हिन्दी) जोधपुर विश्वविद्यालय 1965

योग्यता क्षेत्र :
आपने प्राच्य विद्याओं दर्शन, मनोविज्ञान, परामनोविज्ञान, आयुर्वेद, योग, ध्यान, सम्मोहन विज्ञानं एवं अन्य रहस्यमयी विद्याओं के क्षेत्र में विशेष रूचि रखते हुए उनके पुनर्स्थापन में विशेष कार्य किया हैं. आपने लगभग सौ से ज्यादा ग्रन्थ - मन्त्र - तंत्र, सम्मोहन, योग, आयुर्वेद,
ज्योतिष एवं अन्य विधाओं पर लिखे हैं.

चर्चित कृतियाँ : प्रैक्टिकल हिप्नोटिज्म, मन्त्र रहस्य, तांत्रिक सिद्धियाँ, वृहद हस्तरेखा शास्त्र, श्मशान भैरवी (उपन्यास), हिमालय के योगियों की गुप्त सिद्धियाँ, गोपनीय दुर्लभ मंत्रों के रहस्य, तंत्र साधनायें.

अन्य : कुण्डलिनी नाद ब्रह्म, फिर दूर कहीं पायल खनकी, ध्यान, धरना और समाधी, क्रिया योग, हिमालय का सिद्धयोगी, गुरु रहस्य, सूर्य सिद्धांत, स्वर्ण तन्त्रं आदि.

सम्मान एवं पारितोषिक : भारतीय प्राच्य विद्याओं मन्त्र, तंत्र, यंत्र, योग और आयुर्वेद के क्षेत्र में अनेक उपाधि एवं अलंकारों से आपका सम्मान हुआ हैं. पराविज्ञान परिषद् वाराणसी में सन् 1987 में आपको “तंत्र – शिरोमणि” उपाधि से विभूषित किया हैं. मन्त्र - संसथान उज्जैन में 1988 में आपको मन्त्र - शिरोमणि उपाधि से अलंकृत किया हैं. भूतपूर्व उपराष्ट्रपति डॉ. बी.डी. जत्ती ने सन् 1982 में आपको महा महोपाध्याय की उपाधि से सम्मानित किया हैं.

उपराष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने 1989 में समाज शिरोमणि की उपाधि प्रदान कर उपराष्ट्रपति भवन में डॉ. श्रीमाली का सम्मान कर गौरवान्वित किया हैं. नेपाल के भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री भट्टराई ने 1991 में उनके सामाजिक एवं धार्मिक कार्यों में विशेष योगदान के लिए नेपाल में आपको सम्मानित किया हैं.

अध्यक्षता : भारत की राजधानी दिल्ली में आयोजित होने वाली विश्व ज्योतिष सम्मलेन 1971 में आपने कई देशों के प्रतिनिधियों के बीच अध्यक्ष पद सुशोभित किया. सन् 1981 से अब तक अधिकांश अखिल भारतीय ज्योतिष सम्मेलनों के अध्यक्ष रहे.

संस्थापक एवं संरक्षक – अखिल भारतीय सिद्धाश्रम साधक परिवार. संस्थापक एवं संरक्षक – डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली फौंडेशन चेरिटेबल ट्रस्ट सोसायटी.

विशेष योगदान : सम्मलेन, सेमिनार एवं अभिभाषणों के सन्दर्भ में आप विश्व के लगभग सभी देशों की यात्रा कर चुके हैं. आपने तीर्थ स्थानों एवं भारत के विशिष्ट पूजा स्थलों पर आध्यात्मिक एवं धार्मिक द्रष्टिकोण से विशेष कार्य संपन्न किये हैं. उनके एतिहासिक एवं धार्मिक महत्वपूर्ण द्रष्टिकोण को प्रामाणिकता के साथ पुनर्स्थापित किया हैं. सभी 108 उपनिषदों पर आपने कार्य किया हैं, उनके गहन दर्शन एवं ज्ञान को सरल भाषा में प्रस्तुत कर जन सामान्य के लिए विशेष योगदान दिया हैं. अब 23 उपनिषदों का प्रकाशन हो रहा हैं. मन्त्र के क्षेत्र में आप एक स्तम्भ के रूप में जाने जाते हैं, तंत्र जैसी लुप्त हुयी गोपनीय विद्याओं को डॉ. श्रीमाली जी ने सर्वग्राह्य बनाया हैं. आपने अपने जीवन में कई तांत्रिक, मान्त्रिक सम्मेलनों की अध्यक्षता की हैं. भारत की प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में 40 से भी अधिक शोध लेख मंत्रों के प्रभाव एवं प्रामाणिकता पर प्रकाशित कर चुके हैं.

आप पुरे विश्व में अभी तक कई स्थानों पर यज्ञ करा चुके हैं, जो विश्व बंधुत्व एवं विश्व शांति की दिशा में अद्वितीय कार्य हैं. योग, मन्त्र, तंत्र, यंत्र, आयुर्वेद विद्याओं के नाम से अभी तक सैकडो साधना शिविर आपके दिशा निर्देश में संपन्न हो चुके हैं.

सिद्धाश्रम :
डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली फौंडेशन इंटरनॅशनल चेरिटेबल ट्रस्ट सोसायटी द्वारा निर्मित एक भव्य, जिवंत, जाग्रत, शिक्षा, संस्कृति व अध्यात्म का विशालतम केंद्र सिद्धाश्रम. न केवल भारतवर्ष अपितु विदेशों में उपरोक्त विद्याओं का विस्तार, साधना शिविरों की देशव्यापी श्र्रंखला. प्राकृतिक चिकित्सा व आयुर्वेद अनुसन्धान व उत्थान केंद्र. मानवतावादी अध्यात्मिक चेतना का विस्तार.

तन्त्र, मन्त्र, यन्त्र के सिद्धहस्त आचार्य, ज्योतिष के प्रकांड विद्वान, कर्मकांड के पुरोधा, प्राच्य विद्याओं के विश्वविख्यात पुनरुद्धारक,अनगिनत ग्रन्थों के रचयिता तथा पूरे विश्व में फ़ैले हुए करोडों शिष्यों को साधना पथ पर उंगली पकडकर चलाने वाले मेरे परम आदरणीय गुरुवर.....
जिनके लिये सिर्फ़ यही कहा जा सकता है कि....

असित गिरि सममस्याद कज्जलम सिन्धु पात्रे ,
सुरतरुवर शाखा लेखनी पत्र मुर्वी |
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालम,
तदपि तव गुणानाम ईश पारम न याति ||

डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली
त्वदीयं वस्तु गोविन्दं

परमहंस स्वामी सच्चिदानंद जी से दीक्षा के कई वर्षों बाद जब निखिलेश्वरानंद की सेवा, एक निष्ठता एवं पूर्ण शिष्यत्व से स्वामीजी प्रभावित हुए, तो एक दिन पूछा –

“निखिल! मैं तुम्हारी सेवा से अत्यंत प्रसन्न हूँ, तुम जो कुछ भी चाहो, मांग सकते हो, असंभव मांग भी पूरी कर सकूँगा, मांगों?”

निखिलेश्वरानंद एक क्षण तक गुरु चरणों को निहारते रहे, बोले –

“त्वदीयं वस्तु गोविन्दं तुभ्यमेवम समर्पयेत”

जब ‘मेरा’ कहने लायक मेरे पास कुछ हैं ही नहीं, तो मैं क्या मांगूं, किसके लिए मांगू, मेरा मन, प्राण रोम प्रतिरोम तो आपका हैं, आपका ही तो आपको समर्पित हैं, मेरा अस्तित्व ही कहाँ हैं?

उत्तर सुनकर कठोर चट्टान सद्दश गुरु की आँखें डबडबा आई और शिष्य को अपने हांथों से उठाकर सीने से चिपका दिया, एकाकार कर दिया, पूर्णत्व दे दिया.
कुण्डलिनी - दर्शन** उस दिन रविवार था, हम सब शिष्य गुरुदेव (डॉ. नारायण दत्त श्रीमालीजी) के सामने गंगोत्री के तट पर बैठे हुए थे, सामने चट्टान पर अधलेटे से स्वामी जी (गुरुदेव डॉ. नारायण दत्त श्रीमालीजी) प्रश्नों का उत्तर दे रहे थे.

बात चल पड़ी कुण्डलिनी पर. गुरुभाई कार्तिकेय ने पूछा –
"गुरुवर कुण्डलिनी से सम्बंधित चक्र, दल आदि का विवरण हैं, यही नहीं अपितु दल की पंखुडियां और रंग तक बताया गया हैं, क्या यह सब ठीक हैं?"

गुरुदेव मुस्कुराये, बोले - देखना चाहते हो, और वे सामने सीधे बैठ गए, श्वासोत्थान कर उन्होंने ज्योहीं प्राणों को सहस्त्रार में स्थित किया, की हम लोगों ने कमल मूलाधार से लगाकर आज्ञाचक्र तक के सभी चक्र, कमल और प्रस्फुटन साफ - साफ देखे, सभी कमल विकसित थे और योग ग्रंथों में जिस प्रकार से इन चक्रों और कमलों के रंग, बीज ब्रह्म आदि वर्णित हैं, उन्हीं रंगों में वे उत्थित चक्र देखकर आश्चर्यचकित रह गए... सब कुछ साफ - साफ शीशे की तरह दिखाई दे रहा था.

पूज्य गुरुदेव डॉ. नारायण दत्त श्रीमालीजी के इस कुण्डलिनी दिग्दर्शन पर हम सब आश्चर्य के साथ - साथ श्रद्धानत थे
मेरे गुरुदेव के शारीर से महकता हैं चन्दन

हिमालय के समस्त सन्यासियों की दबी – ढकी वह इच्छा बराबर रहती हैं की वे योगिराज निखिलेश्वरानंद जी (डॉ. नारायण दत्त श्रीमालीजी) के साथ कुछ क्षण रहे, बातचीत करें, आशीर्वाद प्राप्त करें, पर ऐसा सौभाग्य तो तब मिलता हैं, जब सात जन्म के पुन्य उदय हो.

मेरा सौभाग्य हैं की मैं उनका शिष्य हूँ और उनके द्वारा “लोकोत्तर साधना” में सफलता प्राप्त कर सका, उनके साथ मनोवेग से कई बार अन्य ग्रहों की यात्रा कर देखने – जानने का अवसर मिला.

“लोकोत्तर - साधना” के अद्वितीय योगी निखिलेश्वरानंद जी के पास क्षण भर बैठने से ही चन्दन की महक सी अनुभव होती हैं, उनके शरीर से चन्दन महकता रहता हैं, वे सही अर्थों में आज के युग के अद्वितीय तपोपुन्ज हैं.


मेरे गुरुदेव क्यों छिपाएं रखते हैं अपने आपको?
मुझे यह फक्र हैं की मेरे गुरु पूज्य श्रीमालीजी (डॉ. नायारण दत्त श्रीमालीजी) हैं, मुझे उनके चरणों में बैठने का मौका मिला हैं, और यथा संभव उन्हें निकट से देखने का प्रयास किया हैं.

उस दिन वे अपने अंडर ग्राउंड में स्थित साधना स्थल पर बैठे हुए थे, अचानक निचे चला गया और मैंने देखा उनका विरत व्यक्तित्व, साधनामय तेजस्वी शरीर और शरीर से झरता हुआ प्रकाश.... ललाट से निकलता हुआ ज्योति पुंज और साधना की तेजस्विता से ओतप्रोत उस समय का वह साधना कक्ष.... जब की उस साधनात्मक विद्युत् प्रवाह से पूरा कक्ष चार्ज था, ऊष्णता से दाहक रहा था और मात्र एक मिनट खडा रहने पर मेरा शरीर फूंक सा रहा था, कैसे बैठे रहते हैं, गुरुदेव घंटों इस कक्ष में?

बाहर जन सामान्य में गुरुदेव कितने सरल और सामान्य दिखाई देते हैं, कब पहिचानेंगे हम सब लोग उन्हें? उस अथाह समुद्र में से हम क्या ले पाएं हैं अब तक...... क्यों छिपाएं रखते हैं, वे अपने आपको?

-सेवानंद ज्ञानी १९८४ जन. - फर.

कहाँ आपका सन्यासी प्रचंड उद्वर्ष रूप, कि ऊंचे से ऊंचा योगी भी कुछ क्षण पास बैठने के लिए तरसता हैं, हम इतने वर्षों से आपके सन्यासी शिष्य हैं आपके साथ रहे हैं, आपका क्रोध देखा हैं, प्रचंड उग्र रूप देखा हैं और यहाँ आपका गृहस्थ रूप देख रहे हैं, आश्चर्य होता हैं, आपकर इन दोनों रूपों को देखकर.

हम सन्यासी शिष्यों में इतने वर्षों तक साथ रहने के बावजूद भी इतनी हिम्मत नहीं कि आपके सामने रहने के बावजूद भी इतनी हिम्मत नहीं कि आपके सामने खड़े होकर, सामने देखकर कुछ बोल सकें... पर यहाँ तो गृहस्थ शिष्यों के साथ आप बैठते हैं हंसी-मजाक करते हैं, और वे आपके सामने बैठकर बतियाने लगते हैं, और आप हैं कि सुनते रहते हैं.... इतना समय हैं क्या आपके पास?

ये कैसे शिष्य हैं, कि सामने देखकर बतियाते रहे... यह सब क्या हैं? - पूंछ रहे थे सनाय्सी गुरुभाई रविन्द्र स्वामी, गुरूजी से.

"तुम नहीं समझते रविन्द्र. यह गृहस्थ संसार हैं, जंगल और हिमालय का प्रांतर नहीं..... ये गृहस्थ शिष्य हैं, इनकी दृष्टि स्थूल हैं ये धन, पुत्र, सुख मांगकर ही प्रसन्न ही जाते हैं, शिष्यत्व क्या हैं? इसे पहिचानने और समझने के लिए बहुत बड़े त्याग कि जरूरत हैं और जहाँ तक मेरा प्रश्न हैं मैं इन पर आवरण डाले रखता हूँ, जो इस आवरण को भेदकर मुझ तक पहुंचता हैं, अपने "स्व" ko मिटाकर लीन होता हैं, वही शिष्य बन सकता हैं वही बनता हैं."

-समाधान किया गुरुदेव ने.
अर्थात हे गुरुदेव ...
यदि इस सृष्टि के समस्त पर्वतों को पीसकर उन्हें समस्त समुद्रों के जल में घोलकर स्याही बना दी जाये और सम्पूर्ण वृक्षों को काटकर उनकी लेखनी बना दी जाये और स्वयं साक्षात् शारदा देवी , (जो विद्या की अधिष्टात्री देवी हैं) अनन्त काल तक आपके गुणों का वर्णन करती रहे .....
वह लेखनी घिस जाएगी......
वह स्याही कम पड जाएगी............
मगर आपके गुणों का वर्णन पूर्ण नहीं हो पायेगा........

परमारथ के कारणे साधू धरियो शरीर.
बात उस समय की हैं, जब पूज्यपाद सदगुरुदेव अपने संन्यास जीवन से संकल्पबद्ध होकर वापस अपने गृहस्थ संसार में लौटे थे. जब वे सन्यास जीवन के लिए ईश्वरीय प्रेरणा से घर से निकले थे, तो उनके पास तन ढकने के लिए एक धोती, एक कुरता और एक गमछा था. साथ में एक छोटे से झोले में एक धोती और कुरता अतिरिक्त रूप से था. इसके अलावा उनके पास और कुछ भी नहीं था. न ही कोई दिशा स्पष्ट थी और न ही कोई मंजिल स्पष्ट थी, केवल उनके हौसले बुलंद थे और ईश्वर में आस्था थी. यही उनकी कुल पूंजी थी, जिसके सहारे संघर्स्मय एवं इतने लम्बे जीवन की यात्रा पूरी करनी थी.

जब वे कुछ समय सन्यास जीवन में बिताकर वापस अपने गाँव लौटे, तो गाँव वाले, परिवार के लोग एवं क्षेत्र के सभी गणमान्य व्यक्ति उपस्थित हुए. सभी ने उनका सहर्ष स्वागत सत्कार किया, लेकिन सभी के मनोमस्तिष्क में यही गूंज रहा था कि इन्हें क्या मिला? हमें भी कुछ दिखाएं.

जब यह प्रश्न सदगुरुदेव जी तक पहुंचा, तो वे बड़े ही प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा कि हमारी भी यही इच्छा हैं कि जो कुछ भी हमारे पास हैं वह मैं सभी को दिखाऊं.

गुरुदेव जी सभी के मध्य में खड़े हुए और अपना एक हाथ फैलाया और बताया कि जब मैं यहाँ से गया था तो मेरे पास यह था और हाथ की बंधी मुट्ठी को खोला तो उसमें कुछ कंकण निकले. उन्होंने बताया कि यही मेरे पास थे, जिन्हें मैं लेकर अपने साथ गया था और जो कुछ मैं लेकर लौटा हूँ, वह मेरी हाथ की दूसरी मुट्ठी में हैं. सभी लोग दूसरी मुट्ठी को देखने के लिए आतुर हो उठे. लेकिन गुरुदेव जी ने जब दूसरी मुट्ठी खोली तो सभी हैरत में पड गए. क्योंकि वह मुट्ठी बिलकुल ही खाली थी. सभी को आशा था कि इसमें कुछ अजूबा होगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

गुरुदेव जी ने बताया कि जो कुछ मेरे पास था वह भी मैं गँवा कर आ रहा हूँ. मैं बिलकुल ही खाली होकर आ रहा हूँ. बिलकुल खाली हूँ, इसलिए अब जीवन में कुछ कर सकता हूँ. मैं अपने सन्यास जीवन में कोई जादू टोने टोटके सीखने नहीं गया था, हाथ सफाई की ये क्रियाएं यहाँ रहकर भी सीख सकता था, लेकिन मैं अपने जीवन में पूर्ण अष्टांग योग, सहित यम, नियम, आहार, प्रत्याहार, ……धारणा, ध्यान, समाधि, के पूर्णत्व स्तर पर पहुँचाने के लिए ही यह सन्यास मार्ग चुना. अब मुझे इन कंकनो पत्थरों के भार को ढोना नहीं पड़ेगा, अगर ढोना नहीं पड़ेगा तो मैं स्वतंत्र होकर बहुत कुछ कर सकता हूँ. क्योंकि ज्ञान को धोने की जरुरत नहीं पड़ेगी, वह स्वयं ही उत्पन्न होता रहता हैं. स्वतः ही उसमें सुगंध आने लगती हैं. उसमें आनंद के अमृत की वर्ष होने लगती हैं और वह तब तक नहीं प्राप्त हो सकता, जब तक हम इन कंकनों एवं पत्थरों को ढोते रहेंगे. अपने इस हाड-मांस को ढोने से कुछ नहीं होने वाला हैं, जब तक इसमें चेतना नहीं होगी. चेतना को पाने के लिए एकदम से खाली होना पड़ता हैं, सब कुछ गंवाना पड़ता हैं, सब कुछ दांव पर लगाना पड़ता हैं. तब जाकर चेतना प्रस्फुटित होती हैं और तब उस प्रस्फुटित चेतना को दिखाने की आवश्यकता नहीं पड़ती हैं, बल्कि दुनिया उसे स्वयं देखती हैं, बार-बार देखती हैं, घुर-घूरकर देखती हैं. क्योंकि उसे इस हाड मांस में कुछ और ही दिखाई देता हैं, जिसे चैतन्यता कहते हैं. चेतना कहते हैं, ज्ञान कहते हैं. और उसे उस मुट्ठी में देखने की जरुरत नहीं हैं, क्योंकि वह मुट्ठी में समाने वाली चीज नहीं हैं, वह इस समस्त संसार में समाया हैं, जो सब कुछ सबको दिखाई दे रहा हैं.

मैं हूँ उनके साथ
मैं हूँ उनके साथ जो सीधी रखते अपनी रीढ़ l
मैं हूँ उनके साथ जो सीधी रखते अपनी रीढ़ ll
कभी नहीं जो तज सकते हैं अपना न्यायोचित अधिकार l
कभी नहीं जो सह सकते हैं, शीश नवाकर अत्याचार ll
एक अकेले हो या उनके साथ खड़ी हो भरी भीड़ l
मैं हूँ उनके साथ जो सीधी रखते अपनी रीढ़ ll

निर्भय होकर घोषित करते जो अपने उदगार विचार l
जिनकी जिह्वा पर होता हैं, उनके अंतर का अंगार ll
नहीं जिन्हें चुक कर सकती हैं आतताइयों की शमशीर l
मैं हूँ उनके साथ जो सीधी रखते अपनी रीढ़ ll

नहीं झुका करते जो दुनिया से करने को समझौता l
ऊँचे से ऊँचे सपने को देते रहते जो न्यौता ll
दूर देखती जिनकी पैनी आंख भविष्य का तम चीर l
मैं हूँ उनके साथ जो सीधी रखते अपनी रीढ़ ll

जो अपने कन्धों से पर्वत से अड़ टक्कर लेते हैं l
पथ की बाधाओं को जिनके पांव चुनौती देते हैं ll
जिनको बांध नहीं सकती हैं लोहे की बेडी जंजीर l
मैं हूँ उनके साथ जो सीधी रखते अपनी रीढ़ ll

जो चलते हैं अपने छप्पर के ऊपर लुका धर कर l
हार जीत का सौदा करते जो प्राणों की बाजी पर ll
कूद उदधि में नहीं पलट फिर ताका करते तीर l
मैं हूँ उनके साथ जो सीधी रखते अपनी रीढ़ ll

जिनको यह अवकाश नहीं हैं, देखे कब तारे अनुकूल l
जिनको यह परवाह नहीं हैं कब तक भद्रा कब दिक्शुल ll
जिनके हांथों की चाबुक से चलती हैं उनकी तक़दीर l
मैं हूँ उनके साथ जो सीधी रखते अपनी रीढ़ ll

नोट : यह कविता एक बार गुरूजी ने शिष्यों को सुनाई थी l इसमें साफ बताया गया हैं कि वे किस तरह के लोगों का साथ देते हैं l

गुरु प्रसंग - श्री राम दर्शन
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उन दिनों हम चित्रकूट में थे और गंगा के किनारे शाम को कुछ समय तक बिताया करते थे

यहाँ पर एक वृद्धा मां गुरुदेव से मिलने आया करती थी, नित्य जब तक वह यहाँ पर रहती यहाँ की सफाई करती रहती , सेवा में उसका बहुत मन लगता था. उसके मुख से प्रतिक्षण "श्रीराम श्रीराम " निकलता रहता था.

एक उसने कहा की "मेरे तो इष्ट श्रीराम हे और चित्रकूट में ही मेने पूरा जीवन बिता दिया हे पर कभी भी राम ने दर्शन नहीं दिए, जबकि में रोज शाम को उनके लिए गुड डालकर चूरमा बना कर रखती हूँ , रोज सुबह में उदास हो जाती हूँ की विश्वामित्र के साथ घुमने वाले मेरे छोटे छोटे राम लक्ष्मण तो आये ही नहीं "

गुरुदेव ने वृद्धा को अपने पास बैठाया और उसके दोनों भोंहो के बीच में रूप चिंतन करने की विधि सिखाई और साथ ही अपने एक हाथ के अंगूठे से उसके भ्रूमध्य को खोल दिया. एक ही क्षण उसे लगा जेसे की अन्दर प्रकाश ही प्रकाश भर गया हो. गुरुदेव ने उसे एक विशिष्ट राम मंत्र देते हुए कहा " आज रात्रि को तू इस मंत्र का जाप बराबर करती रहना और अपनी आँखे बंद रखना "

वृद्धा गुरुदेव के पास से चली गयी और इसके बाद लगभग आठ दस दिन बीत गए वह पुनः आई ही नहीं. हम सब उत्सुक थे की उसका और उसके श्रीराम का क्या हुआ ?

एक दिन गुरुदेव की आज्ञा लेकर हमने उस वृद्धा को ढूंढ़ निकाला और गुरुदेव के पास ले आये.

गुरुदेव ने कहा " क्या बात हे उसके बाद तू आई नहीं ?

वृद्धा ने जवाब दिया " मैं क्या आती , मुझे तो एक क्षण का समय भी नहीं मिला, उस रात्रि को जब आपने जाप करने लिए कहा था तो में बराबर मंत्र जाप कर रही थी तभी मेने देखा की थके हुए राम और लक्ष्मण आ रहे हे .उनके कंधो पर धनुष लटका हुआ हे , पैर थके हुए हे और चेहरा कुम्भ्लाया हुआ हे.

" उस दिन मेने जल से दोनों के पैर धोये, पैरो में कुछ कांटे गढ़ गए थे उन्हें निकाला और खाना खिलाया, फिर मेने दोनों तरफ रुई की बने हुई गद्दिया बिछा दी और वो उस पर सो गए "

आज आपका ये शिष्य बुलाने आया तो में सब काम छोड़कर आपके पास आई हूँ , देखो दोपहर ढल रही हे अभी रात को राम लक्ष्मण आते ही होंगे, पूरी तयारी भी नहीं हुई हे वे क्या सोचेंगे !

हम सब उस वृद्धा के ममत्व से अभिभूत हो रहे थे और उसके सोभाग्य पर इर्ष्या कर रहे थे. यह वृद्धा कितनी सोभाग्यशाली हे की इसने अपने जीवन में ही भगवान राम और लक्ष्मण के सर्षण कर लिए उनके पैर धुलाये उन्हें अपने हाथो से भोजन करवाया.

गुरुदेव ने उसे विदा कर दिया इसके बाद भी जब तक हम वह रहे वह दो तीन दिन में आ ही जाती थी. कभी कहती लक्ष्मण से झगडा हो गया वह बहुत गुस्सा करता हे मैं तो आज उससे बात ही नहीं करुँगी वह अपने आप को समझता क्या हे कभी वह श्री राम से हुई बातचीत सुनती जब तक वह हमारे पास रहती सिर्फ उन्ही की चर्चा करती रहती थी

गुरुदेव ने इसकी व्यांखा करते हुए बताया की " साधना में एक विशिष्ट क्रम रूप दर्शन हे , जिसे भ्रूमध्य में स्थापित करना पड़ता हे , जिन्होंने योग साधना संपन्न की हे वे अपने इष्ट के रूप को भ्रूमध्य में स्थापित कर सकते हे या कोई योगी भी किसी के भ्रूमध्य में उसके इष्ट को स्थापित कर सकता हे, मेने भी ऐसा ही किया था और इसे इसके इष्ट के साक्षात्कार दर्शन हो सके. यह अध्यात्मिक साधना हे, इसमें गुरु साधक को ब्रह्य संसार की अपेक्षा अंतर में जाग्रत कर भ्रूमध्य में दर्शन स्थापित कर देते हे

वास्तव में यह साधना जीवन की एक महत्वपूर्ण साधना हे और भक्त और भगवान का पूर्णः तादाम्य बन सकता हे

जय सदगुरुदेव
सोजन्य से
हिमालय के योगियों की गुप्त सिद्धिया

Swami Tirjata Aghori*****
(सदगुरुदेव जी से जुड़े उनके कुछ जाने - अनजाने प्रसंग )
पथपर आगे बड़ते हुए सदगुरुदेव जी ने पीछे मुड कर देखा तो वे अश्रुपूरित नेत्रों से उन्हें अभी भी वही पर खड़े हुए एकटक देख रहे थे,अभी कुछ देर पहले ही अपने जीवन की सर्वोपरि ,अलभ्य बस्तु रति राज गुटिका सदगुरुदेव जी को देते हुए बे कह रहे थे की नारायण आप ने मुझ जैसे चट्टान ह्रदय को भी ममता सिखा ही दी , अब मेरा भी कोई भाई हैं इस जगत में , .
सदगुरुदेव जी के नेत्रों में भी उन्हें याद करते हुए अश्रु छलक उठे की सही अर्थो में वह मेरे अग्रज कि तरह उसने मेरा पथ प्रदर्शक बना इस तंत्र क्षेत्र में , लगातार २५ दिनों तक वे सदगुरुदेव जी को निद्रा स्तंभन करके ,यक्षि णी साधना , पूर्ण काया कल्प साधना ,ब्रम्हांड निर्माण तक साधना , यक्षिणी चेटक, ब्रम्हांड चेटक , रूप परिवर्तन चेटक जैसे उच्च कोटि के अनगिनत दुर्लभ साधनाए , अद्रश्य गमन साधना ,प्रेत साधना से लेकर, वार्ताली स्तभ्न साधना ,घोर शमशान साधना से लेकर अघोर पथ की दुर्लभ आगे साधना भी उन्हें लगातार सिखा रहे हैं , और आज अब सदगुरुदेव की आगे जाने की वेला आई तो उसी समय एक बकरे को एक हाँथ से उठा कर सैकड़ो फीट उछल दिया , फिर उसी अज की गर्दन एक झटके से तोड़ कर उसका पूरा खून पी रहे हैं,
सदगुरुदेव व्यथित हो कर बोल उठे , इतनी निर्दयता क्यों... क्या बिगाड़ा था उसने .
वे मुस्कुरा के बोले , बोल नारायण कहे तो इसे अभी जिन्दा कर दूं,
कैसे ये संभव हैं ..
क्यों नहीं महाकाल रौद्र भैरव के लिए क्या असंभव हैं ..
वे आसनस्थ होकर मत्रजाप में लग गए , मात्र कुछ ही क्षणों में पूर्ण तयः मृत प्राय बकरा जीवित हो कर चल पड़ा ,
ये कैसे संभव हुआ
शुक्रो पासित मृत संजीवनी विद्या से ,
तो मुझे अभी तक सिखाया क्यों नहीं .
सारे गुर बिल्ली से सिखने के बाद शेर ने बिल्ली पर ही हमला कर दिया , बिल्ली पेड़ पर चढ़ गयी , शेर ने कहा की ये तो मुझे नहीं सिखाया था , बिल्ली ने कहा यही सीखा देती तो आज जान कैसे बच पाती इसलिए तो ये तुम्हे अभी तक नहीं बताया था.
सदगुरुदेव जी बोले मेरी मौसी मुझे भी अब तो सिखा दो .
(सदगुरुदेव मन ही मन उस करुणा और स्नेह से भींग गए समझ गए कि उन्हें कुछ दिन ओर अपने साथ रोकने के लिए ये खेल रचा गया था उनके द्वारा )
कौन हैं ये जिन्हें सदगुरुदेव इतना चाहते रहे हैं ?

ये हैं ....
विश्व बंदनीय, अप्रितम , साक्षात सदेह तंत्राव्तार , अदिव्तीय योगियो में भी श्रेष्ठ , पुराणिक युग कालीन सर्वथा अलभ्य मृत संजीवनी विद्या के एक मात्र साधक , ऐसे अलौकिक व्यक्तिव धारी परमहंस स्वामी त्रिजटा अघोरी जीके बारे में तो तंत्र जगत ही नहीं साधना जगत का हर व्यक्ति चाहे वह आज इस क्षेत्र में आया हो या हज़ार साल का ही क्यों न हो उनके दर्शन की कामना तो मन में हमेशा से लिए हुए ही रहता हैं. एक ऐसा व्यक्तिव जिन्होंने अंत्यंत कठिन , अभावग्रस्त से निकल कर वो उचाईयां प्राप्त की हैं जिसके आगे पूरा विश्व भी नत मस्तक हैं ही . कहते हैं कि तंत्र क्षेत्र में कठोर से कठोर उच्च , और अगेय साधना फिर चाहे वह शमशान हो या अघोर पथ कि इनका सामना पूरे विश्व में कोई नहीं कर सकता .
उच्च ललाट पर सुशोभित लाल सिंदूर का तिलक ,कमर के नीचे तक झूलती लम्बी लम्बी तप कि गरिमा से युक्त तीन जटाये के कारण ये साधक / साधना जगत में त्रि जटा के नाम से विख्यात हैं .भगवान् काल भैरव के अदिव्तीय साधक ओर मृत संजीवनी विद्या के एक मात्र साधक जो आज भी सदेह ,सिद्धाश्रम के ९ सर्वोच्च परम योगियों के मध्य में से एक आज भी उत्तरांचल कि घनघोर दुर्गम पर्वत श्रंखला भैरव पहाड़ी में स्थित महाकाल रौद्र भैरव के मदिर के पास में गुप्त रूप से निवास रत हैं .
पूज्य सदगुरुदेव जी कहते थे कि केबल मात्र तंत्र के बल पर सिद्धाश्रम पहुँचने वाला ये एक मात्र व्यक्तिव हैं . साधना जगत में उनकी उच्र्य बताना मानो सूर्य को दीपक दिखाना हैं ,एक ही आसन पर २० से २५ दिनों तक स्थिर एकाग्र रूप से बैठकर ये साधना पूरी करके ही उठते हैं . इनका भौतिक कद लगभग सवा सात फीट का हैं अत्यंत बलिष्ठ ,सौष्ठव युक्त शरीर के साथ घन के सामान घनघोर ,ह्रदय को कम्पायमान कर देने वाली आवाज के स्वामी हैं . कोई भी साधक ऐसा नहीं रहा जो इनका साक्षात् महाकाल रूपी रूप देख कर सर्व प्रथम दर्शन में स्थिर रह पाया हो . पर भौतिक शरीर कि महत्ता के सामान ही ह्रदय से उतने ही प्रेम मय ,प्रेम परिपूर्ण हैं . कुछ काल उपरान्त सदगुरुदेव जी के निखिलेश्वरानद स्वरुप को जानने के बाद सदगुरुदेव जी की लीला से आश्चर्य चकित हो कर से उन्होंने भी दीक्षा ली ओर उनसे तंत्र क्षेत्र कि अगम्य साधनाए प्राप्त की .
एक बार अपने अग्रज गुरु भाइयों से सुनने में आया था कि एक पूर्ण बड़ी पुस्तक सदगुरुदेव जी ने इनके जीवन पर लिख कर छपने को देने जा रहे थे , तभी रात्रि काल मैं प्रेस में ही सदेह से आकर इन्होने वह किताब ही टुकड़े टुकड़े कर दी ,सदगुरुदेव जी से कह उठे “जब ये नासमझ , लोग अपनी स्वार्थपरता को शिष्य रूप की आड़ मैं छुपा कर आपसे ही छल करते रहते हैं और लेश मात्र भी शर्म सार नहीं हैं अपने कृत्यों पर और अपनी मक्कारी , चापलूसी को शिष्यता का नाम देते रहते हैं तब ये न जाने मेरे बारे में क्या क्या अनर्गल प्रलाप कर लोगों को मुर्ख बना कर अपना स्वार्थ सिद्ध करेंगे इसलिए ये किताब को ही में नष्ट कर दे रहा हूँ. , सदगुरुदेव जी ने कहा कि . आखिर वे अघोरी हैं अभी गुस्से में हैं
तंत्र क्षेत्र के साधक कोकैसा होना चाहिए , जो निश्चय ता , साहस ,एक आसन निष्ठता , और अपने इष्ट के सामान तेज धारण करे हो ये तो इनके व्यक्तिव को देख करही सिखा जा सकता हैं.

एक साधक गुरु भाई प्रणम्य हो कर जिज्ञासा रख रहे हैं उनसे कह रहे हैं की क्या हैं आखिर इस गुरु मन्त्र में , ऐसा क्या विशेष हैं जो आप इसे सर्वश्रेठ मंत्र कहते हैं ब्रह्माण्ड का ,ये तो हर गुरु की तरह सिर्फ गुरु मंत्र ही तो हैं ..
महायोगी कह रहे हैं वत्स धन मांग लो आयु मांग लो सुदर स्त्रियाँ मांग लो पर ये न पूछो ,...

आप सेज्यादा ब्रह्माण्ड में इसके बारे में कौन बता सकता हैं देना हैं तो ये दीजिये या फिर मना कर दे.

hain
वे कह रहे हैं कभी सोचा हैं की सदगुरुदेव का नाम अखिल क्यों नहीं रखा गया , क्यों निखिल कहते हैं उन्हें ........." वे बोलते जा रहे हैं पूरी प्रकति मौन हो कर एक एक अमृत बूँद पी रही हैं फिर जो उन्होंने प्रत्येक अक्षर की व्याख्या करी मानो ब्रह्माड का सारा ज्ञान हि नहि बल्कि स्वयं ब्रम्हांड ही उतर आया हो उस समय सुनने के लिए ,sabhi maun

सारा विश्व की ज्ञान धरोहर ही नहीं विश्व के अन्दर क्या, परे क्या , सब हैं समाया हुए इस महा मंत्र में , एक एक अक्षर की व्याख्या करने में साक्षात् ब्रम्हा भी असमर्थ हैं ...वे भाव बिहोर होकर बोलते जा रहे हैं .... तुम तो अपना गुरु मन्त्र जानते ही हो उसका पहला अक्षर हैं ...

प् का ये अर्थ हैं ....
र का ये अर्थ हैं.......
म का ये अर्थ हैं, ....
.......
......
क्या क्या नहीं समाया हैं सारी अखिल ही नहीं निखिल सम्पदा हैं सिद्धियाँ हैं उच्चता हैं श्रेष्ठता हैं एक एक अक्षर में ... और तुम लोग हो की यहाँ वहां भटकते रहते हो ....

किंचित क्रोध रोष में बोले .......अरे ये गली बाज़ार के भिखारी जादूगरी दिखा कर अपना अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं, तुम लोग समझते क्यों नहीं, ये धोखे बाज़ तुम्हे क्या दे देंगे,.... क्या दे सकते हैं ये...... ये गुरु रूप की आड़ में बैठे ठग तो खुद भिखारी हैं .आखिर कब समझोगे तुम उन्हें (सदगुरुदेव) ... पर तुम लोग समझ भी कैसे सकते हो ..उन्होंने ही तो ये माया फेलाई हैं भला नारायण हो माया नहो कैसे न हो ये .. कुछ ही पहचान पाए हैं उन्हें , शेष के आंखोंमें आसूं ही रहेगे जब वे यहाँ से सिद्धाश्रम चल देंगे,,,.....और तब तुम जब समझोगे ...... तब तक सिर्फ आंसूं ही होंगे ..... तुम्हारे पास... वे नहीं ......

सदगुरुदेव भगवान् , अब आप ही बताये की मैं कैसे गुरु बचन को पूर्ण करूँ ,आपने जो अति प्राचीन तंत्र ग्रन्थ आसुरी कल्प खोजने की आज्ञा दी थी , मैं हार गया अब आप ही मार्ग बताये ,सदगुरुदेव बोले तुम त्रिजटा अघोरी जी के पास जाओ उनसे मिलो मैंने उन्हें संकेत दे दिया हैं ,( गुरु भाई ,सदगुरुदेव जी से पूछ रहे थे )
लगतार कठिन पहाड़ियों को पार करते हुए मानसरोवर के पास में हिरण्याक्ष पहाड़ी की ऊपर पहुँच के देखता हूँ तो सामने त्रिजटा अघोरी जी पर्वतासन पर विराजमान हैं ,जैसे हि मैने उनके चरण स्पर्श कर परिचय दिया ,उन्होंने ह्रदय से आशीर्वाद प्रदान किया . सदगुरुदेव की कुशलता के बारेमें पूछा,. पिछले कई महीनो से समाज में उनके विरुद्ध चलाये जा रहे झूंठे प्रचार ,अपमान जनित बाते , ओर पत्र पत्रिकाओं में अनर्गल प्रलाप केबारेमें बताया ,
मेरे द्वारा बताने पर , मानो साक्षात् महाकाल ही उनके रूप में उतर आये हो.

अब में सिद्धाश्रम की भी परवाह नहीं करूँगा , इस पात कियों को तो दंड देना हो होगा . ये दुष्ट ऐसे नहीं मानेगे , वे वहां आग में साक्षात् तिल तिल कर जल रहे हैं ओर में यहाँ बैठा उन्हें देखता रहूँ , ये नहीं हो सकता , अब बहुत हो गया ." घनघोर ध्वनि चारों और गुंजायमान हो रही थी ."
किसी तरह अपने को नियत्रित कर अश्रु प्रवाह रोकते हुए बोले " केबल और केबल उनमें ही ये सामर्थ्य हैं जो इतना विष पिने के बाद भी अपना तिल तिल खून जला कर भी समाज को अमृत दे र

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