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मानस सिद्धि : दिव्य चेतना का प्रथम द्वार

MTYV Sadhana Kendra -
Friday 17th of April 2015 02:59:13 PM


मानस सिद्धि : दिव्य चेतना का प्रथम द्वार

 

तत् सृष्टित्व तद् इव नु प्रविश्तात् 

“ ब्रह्मांड की रचना करने के पश्चात ब्रहमा जी इसी में समा गए “

हम ही ब्रह्म है और हमें स्वयं को समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त समझते हुए स्वयं के निर्माण का कार्य करना है “

कुछ दिन पूर्व मानस सिद्धि लेख में हमने साधना करते समय हमारे मानस में उठने वाले विचारों के विषय में पढा था कि कैसे साधना करते समय हमें उन चीजों अथवा विचारों का आभास होने लगता है जिनके विषय में हमने ना तो कभी चिंतन किया होता है और ना ही कभी ऐसी स्थिति से हमारा सामना हुआ होता है जिससे ऐसे विचार हमारे मन में उभरे.....पर ऐसे विचार ना केवल हमारे दिल दिमाग में उभरते है बल्कि यथा संभव हम उनसे प्रभावित भी होते हैं और उसी लेख में ही इस समस्या के समाधान हेतु अपने मास्टर द्वारा समझाया एक सरल पर बेहद उपयोगी विचार भी मैंने आपके समक्ष ज़ाहिर किया था कि “ यदि भ्रम से बचना है तो भ्रम से होने वाले फायदों और नुक्सान को तिलांजली दे दो “ . 

आज यहाँ मैं उस विधान को, उस प्रक्रिया को आपके समक्ष रखने जा रही हूँ जो बेहद गोपनीय और रहस्यमय है क्योंकि अपने विचारों को अपने बस में कर लेने का अर्थ है तंत्र के क्षेत्र में अपनी गति को अपने हाथ में ले लेना क्योंकि मन को या मन में उठने वाले विचारों पर नियंत्रण का अर्थ ही यही है की अब विचार हमारी गति से चलेंगे जो अपने आप में एक अतुलनीय उपलब्धि है क्योंकि “ जो ज्ञानी होते है वो जानते हैं की मन ना तो भरोसेमंद मित्र है और ना ही आज्ञाकारी सेवक, हम इसे निर्देशित तो कर सकते हैं पर नियंत्रित कदापि नहीं “ पर तंत्र एक  ऐसा विज्ञान हैं जिसमें असंभव जैसे शब्द के लिए कोई स्थान नहीं पर जैसे की मैं पहले ही आपसे इस कथन पर चर्चा कर चुकी हूँ की “ तंत्र मूर्खों की अपेक्षाओं पर नहीं चलता क्योंकि इसमें भावना का कोई स्थान नहीं है.....”

 सिद्ध मंडल के उच्चकोटि के साधक विरूपाक्ष जी ने एक बार तंत्र और साधनाओं के विषय में समझाते हुए कहा था “ THERE IS ONLY ONE RULE THAT THERE IS NO RULE”  यह शब्द उन्ही के कहे हुए हैं जिन्हें मास्टर ने समझाते हुए बताया था की सिद्धि उसी का वरण करती है जो खुद के लिए उतना ही निर्दयी है जितना वो किसी और के लिए हो सकता है पर यहाँ निर्दयी होने का अर्थ खुद के साथ मार काट करने से कदापि नहीं है, इसका अर्थ है अपने किये हुए संकल्प पर दृढ़ता से टिके रहना.....पर बंधु मन ऐसा होने दे तब ना....पर कैसा हो यदि हम शिवोहं ! शिवोहं ! यानी मैं शिव हूँ.....वही मैं हूँ कथन को आत्मसात कर लें. साधना करना भी कर्म है जो हमें अकर्म तक की स्थिति तक ले जाने का एक माध्यम है क्योंकि असंतुलन पैदा करने वाली क्रियाएँ जीवन चक्र को निरंतर कर देती है पर इसका प्रभाव उसी पर होता है जो खुद को अद्वैत से अलग मानता है पर उसका क्या जिसके मन, वचन और कर्म उसी के अनुसार चलते हैं.....ऐसा मनुष्य अपना निर्णय स्वयं करता है बिलकुल वैसे जैसे दंड ना हो तो झूठ भी नहीं होगा ठीक उसी तरह यदि विचार भ्रम पैदा नहीं करेंगे तो भटकने का सवाल ही नहीं उठता......और जिस दिन यह भटकना खत्म हो जाएगी उस दिन हम में और दैवी शक्तियों में कोई भेद नहीं होगा....वो हम और हम वो हो जायेंगी... उस दिन शिवोहं ! शिवोहं ! का कथन भी सार्थक हो जाएगा.

 

पिछले लेख में हमने इस बात को समझा था की साधना करते समय मन में उठने वाले विचारों पर हमें कोई प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिए, अपनी दृष्टि को एकाग्र रखते हुए उन्हें केवल एक मूक दर्शक की तरह देखना चाहिए क्योकि यदि ऐसा करने में आपको सफलता मिलती है तो समझ लेना विचारों को वश में करने की साधना के संदर्भ में सदगुरुदेव ने आपको पहली सफलता प्रदान कर दी क्योकि विचारों में घटित होने वाली घटनाओं में अपनी सहभागिता को एक क्षण के लिए भी ना देखना अर्थात उन्होंने ( सदगुरुदेव ने ) आपको (साधक को) उसके स्वयं को अवलोकन करने दिया....मतलब अब तुम एकाग्रता के बारे में सीख रहे हो..... क्योंकि ऐसी स्थिति तब ही उत्पन्न होती है जब हम विचार विहीन होते हैं, हमें खुद को नहीं मालुम होता कि अब हम क्या करेंगे या कहेंगे? हम इसके बारे में सोचते भी नहीं लेकिन स्पष्टत: इस अनदेखी विचारधारा के सूत्रधार होते तो हम स्वयं ही है. विषय थोडा सा कठिन प्रतीत होता है पर असल में है नहीं सब “ मैं और मेरे “ का खेल है जिससे हमें मुक्त होना है.

 यदि सामने कोई लक्ष्य ना हो तो उसे पाने का सरोकार भी नहीं होता और जिसकी अनुभूति होता है अस्तित्व भी उसी का ही होता है...इसीलिए आपको उस विश्व को जिसमें यह विचार घटित होते हैं उसकी सीमा बाँध देनी है और खुद को किसी भी एक बिंदु या इंद्री पर केंद्रित कर देना होता है ताकि वास्तविकता की सही समीक्षा हो सके और वास्तविकता यह है कि विचार तब तक ही आपको भ्रमित करेंगे जब तक आप अपने आसन पर हो....साधना रोक देने पर इनका प्रवाह भी रुक जाएगा. पर हमारा उदेश्य विचार मुक्त होते हुए आसन पर स्थिर रहते हुए साधना करना है.

साधना करते समय अपने विचारों पर नियंत्रण स्थापित करने हेतु आपको मन: शक्ति साधना की तरह इस साधना में भी एक अति सरल किन्तु गोपनीय विधान का अनुसरण करना है. गोपनीय इसलिए क्योंकि इतनी शीघ्र फलदायक साधनाएं इतनी सहजता से उपलब्ध नहीं होती. इस साधना को आप किसी भी सोमवार की सुबह को कर सकते हो क्योकि यह रात कालीन साधना नहीं है. दिए गए मंत्र का आपको ११ माला मंत्र जाप करना है. साधना करते समय आपकी दिशा उत्तर होगी और वस्त्र सफेद. यदि मास्टर द्वारा बताए विधान के अनुसार आपने कोई माला और विरूपाक्ष आसन सिद्धि साधना में आपने कोई आसन सिद्ध किया हो तो आप उनका ही उपयोग करें क्योकि सिद्ध सामग्री साधना के फल को कई गुणा बढा देती है......पर यदि आपने ऐसा कुछ नहीं किया है तो आप अपने दैनिक विधान में उपयोग की जाने वाली माला और आसन का उपयोग कर सकते हैं.

 मूल साधना आरंभ करने से पूर्व गुरु मंत्र की कम से कम ११ माला मात्र जाप जरूर करें क्योकि केवल वो ही हैं जिनके आशीर्वाद से किसी भी साधना में सफलता प्राप्त की जा सकती है और साधना निर्विघ्न सम्पन्न हो इसके लिए भगवान गणपति का आशीर्वाद लें. साधना के पश्चात सामर्थ्य अनुसार सदगुरुदेव को किसी भी मीठे पदार्थ से भोग लगायें और अपना जप उनके श्री चरणों में समर्पित कर दें.

मंत्र-

 ॐ ऐं ह्रीं मनस चेतना साधय साधय ह्रीं ऐं ॐ 

 OM AING HREENG MANAS CHETNA SAADHAY  SAADHAY HREENG AING OM

यह साधना दिखने में जितनी सरल है उतनी ही गोपनीय भी है इसलिए इसे करने के पश्चात अपने अनुभव जरूर सब के साथ बांटे और जैसे की मैं मेरे मास्टर की एक बात हमेशा दोहराती हूँ की किसी भी साधना को करने के पश्चात उसे प्रतिदिन कम से कम एक माला या कुछ दिनों के अंतराल से फिर से कर लेना चाहिए जिससे की वो मंत्र हमेशा- हमेशा के लिए आपको सिद्ध हो जाए.

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