Friday 30th of June 2017 01:17:11 PM


मानसिक–गुरु पूजन

मानसिक–गुरु पूजन

सद्गुरुदेव रचित ‘तान्त्रोक्त गुरुपूजन’ ग्रन्थ से प्रचारार्थ साभार

इस मानसिक पूजन में अन्य विशिष्ट पूजनों की अपेक्षा किसी प्रकार की न्यूनता या कम लाभ होगा, ऐसा नहीं सोचना चाहिए, क्योंकि इस पूजन में भी वैसा ही लाभ एवं प्र भाव होता ही है । इस पूजन में विशेष विधि–नियम की आवश्यकता नहीं है, बिना स्नानादि के भी हाथ–पैर धोकर, शुद्ध होकर किया जा सकता है । घर–बाहर में, बाग–बगीचे में या यात्रा करते समय ट्रेन अथवा बस में तथा होटल आदि में भी समयानुकूल, बिना किसी को कष्ट पहुंचाए चुपचाप, शान्त भाव से यह पूजन सम्पन्न किया जा सकता है ।

आज का युग विज्ञान का है, हर बात को, प्रत्येक कार्य को विचारों से, बुद्धि से और तर्क से परखने की कोशिश करते हैं ...और उसे ‘क्यों’ का उत्तर मिलना ही चाहिए । प्रत्येक युवा वर्ग और बुद्धिजीवी वर्ग के मन में पहले यही चिन्तन उभरता है, कि हम साधना या पूजन आदि क्यों करें, इनकी हमारे जीवन में क्या उपयोगिता है, ये सभी आडम्बर मात्र हैं— जो बेकार है । यह उन लोगों का काम है । हमारे पास धन–धान्य, मान–सम्मान, ऐश्वर्य–प्रतिष्ठा सब कुछ है, और भौतिक सुखों की भी कोई कमी नहीं है, तो फिर पूजा–आराधना आदि के पिछे क्यों समय नष्ट करें ।
ऐसा सोचने बाले लोगों की यह धारणा नितान्त भ्रम मूलक है । गम्भीरता से विचार करने पर पता चलता है, कि हमें जिस तरह स्थूल देह की सुरक्षा एवं तुष्टि–पुष्टि के लिए भोजन वस्त्रादि की आवश्यकता है, वैसे ही आभ्यन्तर शरीर (मन आदि) के लिए, उनको समुचित परिशुद्ध करने के लिए पूजा एवं साधना की आवश्यकता भोजन से भी अधिक है । अच्छा भोजन करने से, अच्छे–अच्छे वस्त्र पहनने और अन्य सुखोपभोग करने से स्थूल शरीर की पुष्टि सम्भव है, यह देह अवश्य सबल होगी, किन्तु अन्तर्मन आदि में जो मल तथा पाप आदि जमा हैं, उनकी शुद्धि के लिए पूजा–आराधना अपेक्षित है । हमारे सूक्ष्म शरीर में (मन में) अशान्ति, कुविचार, कुबुद्धि तथा कामादि विचार होते ही हैं, जिनके निराकरण के लिए तथा परमानन्द की प्राप्ति के लिए ही हमें पूजा–आराधना की आवश्यकता है ।
जैसे पति के बिना पत्नी आश्रयहीन और अनाथ होती है, वैसे ही जीव को ब्रह्मत्व की पिपासा सदैव बनी रहती है, ब्रह्म की उपासना–साधना के बिना कर्म दोष से, कर्म बन्धन से उसे छुटकारा मिल ही नहीं सकता । अन्तर्मन के लिए पूजन एवं आराधना उसके उद्धारक तत्त्व हैं, जिसके द्वारा साधक कामना के प्रभुत्व को घटाकर उसके स्थान पर उस महान ऊर्जा को प्रतिष्ठित करता है, अहम्परक भोगों को त्याग कर उस दिव्य आनन्द का आस्वादन करता है ।
आज की इस अत्यधिक युगीय व्यस्तता के कारण कई लोगों के लिए आसन आदि पर बैठ कर साधनात्मक पद्धति से पूजा विधान में समय देना कठिन है । जीवन में इतनी अधिक भाग–दौड़ है, कि दो समय के भोजन की चिन्ता एवं जीवनोपयोगी आवश्यकता को पूरा करने में ही सारा समय निकल जाता है, चाहते हुए भी पूजन के लिए समय नहीं निकाल पाते या शहर में रहने के लिए पूरी आवासीय व्यवस्था सम्भव नहीं है, मुश्किल से एक ही कमरे में, थोड़ी जगह में रहते हैं, इसलिए पूजन की व्यवस्था नहीं हो पाती ।
उस स्थिति के लिए यह मानसिक–गुरु पूजन की प्रक्रिया यहां अपेक्षित है, क्योंकि युगानुकूल प्रत्येक व्यवस्था में, प्रक्रिया में परिवर्तन की आवश्यकता महसूस की जाती है, और होनी भी चाहिए । इस मानसिक पूजन में अन्य विशिष्ट पूजनों की अपेक्षा किसी प्रकार की न्यूनता या कम लाभ होगा, ऐसा नहीं सोचना चाहिए, क्योंकि इस पूजन में भी वैसा ही लाभ एवं प्रभाव होता ही है ।
इस पूजन में विशेष विधि–नियम की आवश्यकता नहीं है, बिना स्नानादि के भी हाथ–पैर धोकर, शुद्ध होकर किया जा सकता है । घर–बाहर में, बाग–बगीचे में या यात्रा करते समय ट्रेन अथवा बस में तथा होटल आदि में भी समयानुकूल, बिना किसी को कष्ट पहुंचाए चुपचाप, शान्त भाव से यह पूजन सम्पन्न किया जा सकता है ।
मन की गति अबाध है, यह पूरे ब्रह्माण्ड का क्षण में ही परिभ्रमण कर सकता है, क्षण में ही ब्रह्माण्ड की समस्त व्यवस्था में हस्तक्षेप करने की क्षमता उसे प्राप्त है, शरीर के भीतर मन का ही कार्य है, मन ही सभी प्रकार की पूजन–पद्धतियों में सक्रियता से कार्य करता है । यह पूजा शान्त भाव से की जाती है, आंखे खुली रखें या बन्द रखें, यह आप पर निर्भर है, सभी बन्धनों से यह विधि मुक्त है, सामने बैठा हुआ व्यक्ति भी यह नहीं जान पायेगा कि आप मानसिक पूजन में संलग्न हैं । यह तांत्रोक्त मानसिक–गुरु पूजन सर्वथा गोपनीय, दुर्लभ और विलक्षण है, सुबह उठते ही शय्या पर बैठे–बैठे भी इसे सम्पन्न कर सकते हैं ।
इसके आश्चर्यजनक परिणाम देखने को मिले हैं, मानसिक पूजन करने से शिष्य को स्वतः ही गुरु की सारी सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं, वह सिद्ध बन कर, गुरु का अत्यन्त प्रिय पात्र होकर सिद्धाश्रम प्रवेश कर लेता है ।

पद्धति

भूत शुद्धि

इस पूजन को प्रारम्भ करने से पूर्व शरीर और मन को शुद्ध करने के लिए पहले भूत शुद्धि करें —

“ॐ ह्रौंं”

इस मंत्र का एक सौ आठ (१०८) बार जप करने से भूत शुद्धि हो जाती है ।

चौर न्यास

भूत शुद्धि के बाद चौर मंत्र से न्यास करें । शरीर के दस द्वारों पर क्रमशः ध्यान एकाग्र करते हुए निम्न निर्दिष्ट बीज मंत्र का यथा संख्यानुसार जप करें —

  • हृदय क्रों १० बार
  • दोनों नेत्र ह्रां ह्रां २०          बार (१०+१०)
  • दोनों कान ह्रीं ह्रीं २० बार (१०+१०)
  • दोनों नाक हुं हुं २० बार (१०+१०)
  • मुख स्त्रीं स्त्रीं १० बार
  • नाभि क्लीं १० बार
  • लिंग मूल ह्रसौः १० बार
  • गुह्य (गुदा) ब्लूं १० बार
  • भ्रूमध्य हूं १० बार
  • सिर ह्रीं स्त्रीं क्लीं १० बार

ध्यान

इस चौर न्यास के बाद गुरुदेव का ध्यान करें—


स्वनाभौ दक्षिणे हस्ते वामहस्तं निधाय च ।
भावयेत् तु सहस्रारे  श्री गुरुं शक्तिसंयुतम् ।।

अपनी नाभि पर दाहिने हाथ को स्थापित करें, फिर दाहिने हाथ के ऊपर बायें हाथ को रखकर ध्यान करें—


वराभय करं शान्तं शुक्लवर्ण सशक्तिकं ।
ज्ञानानन्द मयं साक्षात् सर्व ब्रह्म स्वरूपकम् ।।

“गौर वर्ण युक्त गुरुदेव साक्षात् ब्रह्म स्वरूप और ज्ञानमूर्ति हैं, वे अपनी शक्ति के साथ साधक के सहस्रार में स्थित होकर साधक को एक हाथ से वर तथा दूसरे हाथ से अभय प्रदान कर रहे हैं ।”
–––––

ध्यायेच्छिरसि शुक्लाबजे द्विनेत्रं द्विभुजं गुरुं,
श्वेताम्बर परिधानं श्वेत माल्यानुलेपनं ।
वराभयकरं शान्तं करुणामय विग्रहं,
वामेनोत्पल धारिण्या शक्त्यालिंगित विग्रहं ।
स्मेराननं सुप्रसन्नं साधकाभीष्टदायकम् ।।

“सहस्रार स्थित श्वेत कमल पर दो नेत्र व दो भुजा वाले श्वेत वस्त्र धारण किये हुए, श्वेत पुष्प हार पहने हुए, वर एवं अभय प्रदान करते हुए, शान्तमूर्ति, करुणा से परिपूर्ण, अति प्रसन्न एवं साधकों को अभीष्ट प्रदान करने वाले; जिनके बायें भाग में शक्तिमयी भगवती विराजमान हैं, उनका मैं श्रद्धामय होकर ध्यान करता हूं।”

कर न्यास

  • श्रीं अंगुष्ठाभ्यां   नमः ।
  • गुं  तर्जनीभ्यां  स्वाहा ।
  • रं मध्यमाभ्यां  वषट् ।
  • वें अनामिकाभ्यां  हुम् ।
  • नं कनिष्ठिकाभ्यां  वौषट् ।
  • मः अस्त्राय   फट्

अंग न्यास

  • श्रीं  हृदयाय  नमः । (दायें हाथ की उंगलियों से हृदय को स्पर्श करें)
  • गुं  शिरसे   स्वाहा । (सिर को स्पर्श करें )
  • रं  शिखायै  वषट् । (शिखा को स्पर्श करें)
  • वें  कवचाय  हुम् । (दोनो भुजाओं को स्पर्श करें (मानसिक))
  • नं नेत्रत्रयाय  वौषट् । (दोनो नेत्रों को स्पर्श करें)
  • मः  करतलकर  पृष्ठाभ्यां फट्

इसी प्रकार गुरु शब्द के गकार से भी दोनों न्यास करें —

कर न्यास

  • गां अंगुष्ठाभ्यां   नमः ।
  • गीं  तर्जनीभ्यां  स्वाहा ।
  • गुं मध्यमाभ्यां  वषट् ।
  • गैं अनामिकाभ्यां  हुम् ।
  • गौं कनिष्ठिकाभ्यां  वौषट् ।
  • गः अस्त्राय   फट् ।

अंग न्यास

  • गां  हृदयाय  नमः ।
  • गीं  शिरसे   स्वाहा ।
  • गुं  शिखायै  वषट् ।
  • गैं  कवचाय  हुम् ।
  • गौं नेत्रत्रयाय  वौषट् ।
  • गः  करतलकर पृष्ठाभ्यां फट्

इन दोनों न्यासों से साधक में साधना सम्बन्धी शीघ्र लाभ का सम्भावना स्वतः बलवती होने लगती है ।

पूजा विधि

ॐ ऐं कनिष्ठिकाभ्यां “लं” पृथिव्यात्मकं गन्धं सशक्तिकं श्री गुरवे समर्पयामि नमः । गन्ध समर्पित करें ।
ऐं अंगुष्ठाभ्यां “हं” आकाशात्मकं पुष्पं सशक्तिकं श्री गुरवे समर्पयामि नमः । पुष्प समर्पित करें ।
ऐं तर्जनीभ्यां “यं” वागात्मकं धूपं सशक्तिकं श्री गुरवे समर्पयामि नमः । धूप समर्पित करें ।
ऐं अनामिकाभ्यां “वं” अमृतात्मकं नैवेद्यं सशक्तिकं श्री गुरवे समर्पयामि नमः । नैवेद्य समर्पित करें ।
ऐं मध्यमाभ्यां “रं” हृदयात्मकं दीपं सशक्तिकं श्री गुरवे समर्पयामि नमः । दीप समर्पित करें ।
ऐं करतलकर पृष्ठाभ्यां सर्वात्मकं ताम्बुलं सशक्तिकं श्री गुरवे समर्पयामि नमः । ताम्बुल समर्पित करें ।

मूल मंत्र

।। ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः ।।

इसके बाद स्फटिक माला या उंगलियों से गणना करते हुए एक सौ आठ बार गुरु मंत्र का उच्चारण करें ।

नमस्कार

फिर हाथ जोड़ कर गुरु पंक्ति को नमस्कार करें ।

ॐ गुरुभ्यो नमः ।  ॐ परम गुरुभ्यो नम ः
ॐ परात्पर गुरुभ्यो नमः ॐ पारमेष्ठि गुरुभ्यो नमः


‘ऐं’ बीज मंत्र जप

इसके बाद ‘ऐं’ इस बीज मंत्र को एक सौ आठ बार जप करें ।

जप समर्पण


ॐ गुह्याति गुह्यगोप्ता त्वं गृहाणाऽस्मत कृतं जपं ।
सिद्धि र्भवतु मे देव त्वत्प्रसादान्महेश्वर ।।

प्राणायाम

इसके बाद ‘ऐं’ बीज से तीन बार प्राणायाम करके गुरुदेव को नमस्कार करें ।

पूर्ण मंत्र


ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्ण मेवावशिष्यते ।।
ॐ शान्तिः । शान्तिः ।। शान्तिः ।।।
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