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Friday 6th of April 2018 10:27:53 PM


साधना व मंत्र सिद्धि में ध्यान देने योग्य जरुरी बातें

Necessary to pay attention to meditation and mantra in fulfillment

साधना की आवश्यकता क्यों ? :-

साधना की क्या आवश्यकता है ?
साधना क्यों करें ?
वस्तुतः साधना ‘ ईश्वरत्व ‘ का बोध कराती है | आंतरिक सुप्त शक्तियों को जाग्रत करती है | जिनका सम्बन्ध अंडज (ब्रम्हांड ) से है | साधना करते समय साधक अपने अंदर स्थित जीव (सूक्ष्म तत्व ) को ‘ब्रह्म -रंध्र ‘ में स्थित कर लगभग शरीर से नाता तोड़ लेता है | यह लिखना उत्तम होगा कि साधक अपने प्राण को तीसरे नेत्र (दोनों नेत्रों के ऊपर मध्य भाग -ललाट ) में स्थित करके ध्यान करता है | और ईश्वरत्व की ओर अग्रसर होता है | साधनाहीन प्राणी का सम्पूर्ण समय क्लेशों , इन्द्रियों की चंचलता में व्यतीत होता है | साधना से एकाग्रता और आत्मिक शांति प्राप्त होती है | और इससे उसकी निकटता भी प्राप्त होती है | जिसकी वह साधना कर रहा होता है |

साधना में द्रढ़ निश्चय , श्रद्धा और विश्वास का महत्व : –
मात्र परिक्षण के उद्देश्य से साधना में अमूल्य समय नष्ट नहीं करना चाहिए | जिस साधना से सिद्धि प्राप्त करने जा रहे है उस साधना को आरंभ करने से पुर्व द्रढ़ निश्चय कर लें कि मुझे साधना से निश्चित -रूपेण सिद्धि प्राप्त करनी है | ऐसा विश्वास बनाकर साधना आरम्भ करें | साधना में सफलता प्राप्त करने के लिए बहुत बड़ी लगन की आवश्यकता होती है | साधक को कठिन तप एवम साधना करनी होती है तभी सफलता अर्जित होती है | पूर्ण विश्वास , श्रद्धा एवम प्रदायक सिद्ध होती है | साधक के मन में अपने गुरु /इष्ट के चरणों से पूर्ण श्रद्धा हो और यह विश्वास हो कि मेरी तपस्या , मेरी साधना से अपने गुरु /इष्ट शीघ्र ही प्रसन्न होकर मनोवांछित फल प्रदान करेगी |
द्रढ़ निश्चय अथवा संकल्प से साधक की सुप्त ज्ञानेन्द्रियाँ जाग्रत होकर उस ओर अग्रसर होने लगती है | जिसकी साधना कर रहे हो | ‘ लगन ‘ का तात्पर्य होता है ‘अथक प्रयास ‘ अर्थात् सिद्धि प्राप्ति हेतु किया जाने वाला अथक प्रयास ही ‘लगन ‘ कहलाता है | ‘सिद्धि ‘ वह परम आनंद है जिसके लिए प्राचीन काल से साधु , संत , महात्मा सतत् प्रयत्नशील रहे और आज भी |

एकाग्रता है , साधना की महतवपूर्ण कड़ी :-
साधना की मूल कड़ी एकाग्रता है | एकाग्रता के बिना साधना कर पाना असंभव है अतः साधक को चाहिए कि सर्वप्रथम वह अपने चंचल मन को एकाग्र करें , केन्द्रित करें | यदि बार -बार प्रयास करने पर भी मन स्थिर नहीं हो पा रहा है तो आसन की मुद्रा में बैठकर साधक अपने तीसरे नेत्र ( दोनों आँखों के मध्य -ललाट ) को देखने का प्रयास करें | ऐसा बार -बार करें | अथवा स्थापित अपने गुरु /इष्ट चित्र को देखें | इधर -उधर भागने का प्रयास करते मन को बार -बार उसी स्थान पर ले आयें | धीरे -धीरे निरंतर प्रयास से एकाग्रता आने लगेगी और आप अपनी साधना में सफल होंगें |

साधना और भक्ति का प्रदर्शन न करें : –
साधक को अपनी साधना का प्रदर्शन (दिखावा ) कदापि नहीं करना चाहिए , क्योंकि प्रदर्शन सफलता में बाधक सिद्ध होता है | अपने गुरु /इष्ट की उपासना , आराधना अथवा साधना सदैव गुप्त रीति से करें | प्रदर्शन से पूण्य फल में कमी आती है | प्रदर्शन आपको मिथ्या (झूठा ) सम्मान दे सकता है | किन्तु वास्तव में आप जिस लक्ष्य की प्राप्ति चाहते है, उससे दूर हो जायेंगे | साधना अथवा भक्ति का प्रदर्शन न करें | साधना सिद्धि हेतु मन में सदैव कल्याण की भावना रखें | मन निश्छल हो , मन में श्रद्धा हो , विनम्र रहकर साधना करें |

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