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निखिलेश्‍वरानंद दस दिशा चैतन्य महापूजन (Nikhileshwaranand Das Disha Mahapujan)

MTYV Sadhana Kendra -
Friday 10th of June 2016 08:06:10 AM


निखिलेश्‍वरानंद दस दिशा चैतन्य महापूजन (Nikhileshwaranand Das Disha Mahapujan)


सिद्धाश्रम सिद्धि दिवस पर विशेष


सद्गुरु निखिल आह्वान पूजन
निखिलेश्‍वरानंद दस दिशा चैतन्य महापूजन
सिद्धाश्रम योग निखिल जागरण


साधक को कई बार प्रयत्न करने पर भी साधनाओं सफलता नहीं मिल पाती, इसका एक मात्र कारण साधक के दोष-विकार और मलिनताएं है। इन दोषों का शमन केवल और केवल गुरु कृपा, गुरु भक्ति द्वारा ही संभव है। गुरु भक्ति द्वारा ही मन-वचन और कर्म में शुद्धता स्थापित की जा सकती है जो कि साधना के क्षेत्र में पूर्णता प्राप्त करने के लिये एक अनिवार्य तत्व है।

सद्गुरुदेव अपनी कृपा दृष्टि एवं दिव्यपात द्वारा शिष्य के दोषों का हरण कर उसे पूर्णता प्रदान करते हैं। इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में मात्र गुरु ही ऐसी शक्ति है जो शिष्य का कल्याण कर उसके जीवन को सार्थक कर सकते हैं। गुरु से दिव्यपात प्राप्त करने हेतु शिष्य को सुपात्रता सिद्ध करनी होती है।


जब तक शिष्य अपनी सुपात्रता सिद्ध न कर दे, उसे शिष्य रूप में मानना न तो उचित है और न तर्क संगत ही। शिष्य के लिये ‘शारदा तिलक’ में स्पष्ट कहा है –


शिष्यः कुलीनः शुद्धात्मा पुरुषार्थ परायणः।
अधीतवेदः कुशलो दूर मुक्त मनोभवः।
हितैषी प्राणिनां नित्य मस्तिकस्त्यक्त नास्तिकः।
स्वधर्म निरतो भक्त्या पितृमातृ हितोद्यतः।
वाङ्मनः कायवसुर्भिगुरुशुश्रूवणे रतः।
त्यक्ताभिमानो गुरुषु जाति विद्या धनादिभिः।
गुर्वाज्ञा पालनार्थं हि प्राण व्यय रतोद्यतः।
विहत्य च स्वकार्याणि गुरुः कार्य रतः सदा।
दासवन्निवसेद्यस्तु गुरौ भक्त्या सदाशिशुः।
कुर्वन्नाज्ञां दिवारात्रौ गुरु भक्ति परायणः।
आज्ञाकारी गुरोः शिष्यो मनोवाक्काय कर्मभिः।
यो भवेत्स तदा ग्राह्यो नेतरः शुभकांक्षया।
मंत्र पूजा रहस्यानि यो गोपयति सर्वदा।
त्रिकालं यो नमस्कुर्यादागमाचारतत्ववित॥
स एव शिष्य कर्तव्यो नेतरः स्वल्प जीवनः।
एतादृशगुणोपेतः शिष्यों भवति नापरः॥
शिष्य में ये गुण होने आवश्यक है


जो कुलीन वंश का हो, सदाचारी हो, पुरुषार्थ करने वाला हो, वेदों में आस्था रखने वाला हो, चतुर हो तथा काम वासना से रहित हो।


जो आस्तिक होकर समस्त प्राणियों का हित चिन्तन करता हो, नास्तिक का साथ नहीं देता हो, स्वधर्म रत हो, माता-पिता का भक्त हो तथा तन-मन-धन से गुरु के सामने जाति-पद-धन का अहंकार न करता हो तथा गुरु आज्ञा पालन में प्राणों को न्यौछावर करने में भी नहीं हिचकिचाता हो।


जो गुरु के पास दास की तरह लगा हो तथा अपना काम छोड़कर भी गुरु के कार्य में रत हो, शिशुवत् अहर्निश गुरु भक्ति में लीन हो तथा मन, वाणी व शक्ति से गुरु आज्ञा पालन में तत्पर रहता हो। ऐसा व्यक्ति शिष्य कहलाने का अधिकारी है।


जो मंत्र तथा रहस्यों को गुप्त रखता हो, शास्त्रीय आचार तत्त्व को जानता हो तथा विवेकवान हो, वही शिष्य कहलाने का अधिकारी है और ऐसे व्यक्ति को ही शिष्य बनाना चाहिए।
यही नहीं, शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि गुरु के सामने शिष्य को कैसे रहना चाहिए –


प्रणम्योपविशेत्पार्श्‍वे तथा गच्छेदनुज्ञया।
मुखावलोका सेवेत कुर्यादादिष्ट मादरात्।
असत्यं न वदेदग्रे न बहु प्रलपेदपि।
कामं क्रोधं तथा लोभं मानं प्रहसनं स्तुतिम्।
चापलानि च जिह्वानि कार्याणि परिदेवनम्।
ॠणदानं तथा दानं वस्तूनां क्रय विक्रयम्।
न कुर्याद् गुरुणं सार्द्धं शिष्यो भूष्णुः कदाचन।


आते ही प्रणाम करके गुरु के पास बैठे; जाना हो, तो आज्ञा लेकर जाय; उनकी आज्ञा की प्रतीक्षा अधीरता से करे, आदर से उनकी आज्ञा का पालन करे, न झूठ बोले, न जरूरत से ज्यादा बोले। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मान, हंसी, स्तुति, कुटिलता न करे, न रोवे और न चिल्लावे। गुरु से न ॠण की याचना करे और न क्रय-विक्रय करे।


साधक को कई बार प्रयत्न करने पर भी साधनाओं सफलता नहीं मिल पाती, इसके कई कारणों में से एक कारण साधक शिष्य द्वारा मन, वचन एवं कर्म द्वारा ऐसे कार्यों को सम्पन्न करना हो जो न्याय संगत नहीं हो, जो धर्म के अनुसार नहीं हो। उन कर्मों का प्रभाव चाहे-अनचाहे भी जीवन पर निरन्तर पड़ता रहता है। इन दोषों का शमन केवल और केवल गुरु कृपा, गुरु भक्ति द्वारा ही संभव है। गुरु भक्ति द्वारा ही मन-वचन और कर्म में शुद्धता स्थापित की जा सकती है जो कि साधना के क्षेत्र में पूर्णता प्राप्त करने के लिये एक अनिवार्य तत्व है। शुद्ध भाव एवं शुद्ध क्रिया द्वारा ही श्रेष्ठ जीवन प्राप्त किया जा सकता है।


साधना कब करें –
शिष्य के दोषों का शमन केवल और केवल गुरु कृपा द्वारा ही संभव है और गुरुदेव तो शिष्य पर हर क्षण कृपा दृष्टि बनाए रखते हैं। इस विशिष्ट साधना को शिष्य-साधक किसी भी शुभ मुहूर्त अथवा किसी भी गुरुवार को सम्पन्न कर सकते हैं। आगे आने वाले दिनों में सिद्धाश्रम सिद्धि दिवस (29 जून 2016) एक ऐसा ही अद्वितीय अवसर है, जब शिष्य अपनी साधना, भक्ति द्वारा गुरु कृपा प्राप्त कर सकता है। इस विशिष्ट दिवस पर निश्‍चित ही शिष्यों-साधकों द्वारा गुरु कृपा प्राप्ति हेतु ‘निखिलेश्‍वरानन्द दस दिशा महापूजन’ सम्पन्न करना चाहिए।


पूजन हेतु प्राण प्रतिष्ठित सामग्री


इस साधना में ‘रुद्र मंत्रों से प्राण प्रतिष्ठा युक्त निखिलेश्‍वर यंत्र’ तथा ‘गुरु तत्वाभिषेक रुद्राक्ष माला’ आवश्यक है।


अन्य सामग्री
गुरु चित्र, धूप, दीप, अगरबत्ती, पुष्प, माला, नैवेद्य, कुंकुम, अक्षत इत्यादि।


साधना विधान
इस साधना को सम्पन्न करने में समय की बाध्यता नहीं है। अतः साधक अपनी सुविधानुसार दिन अथवा रात में इस साधना को सम्पन्न कर सकता है। साधक स्नान कर पीली धोती धारण कर पूर्व की ओर मुंह कर बैठ जाए, सामने पूज्य गुरुदेव का अत्यन्त आकर्षक और सुन्दर चित्र स्थापित करे तथा उनकी भक्तिभाव से पूजा करे। उन्हें नैवेद्य समर्पित करे, सुगन्धित अगरबत्ती प्रज्वलित करे, घी का दीपक लगावें।
सर्वप्रथम आचमन हेतु साधक तीन बार दाहिने हाथ में जल लेकर पी लें और उसके बाद हाथ धोकर गुरुदेव को प्रणाम करें। आचमन के पश्‍चात् दाहिने हाथ में जल कुंकुम, पुष्प लेकर निम्न संकल्प मंत्र का उच्चारण करें –


ॐ विष्णु र्विष्णु र्विष्णु देश कालौ संकीर्त्य अमुक गौत्रस्य उमक शर्माऽहम् ममोपरि इह जन्म गत जनम स्वकृत परकृत-कारित क्रियमाण कार-यिष्यमाण-भूत-प्रेत पिशाचादि मन्त्र-तन्त्र-यन्त्र त्रोटकादिजन्यसकलदोष बाधा निवृत्ति पूर्वक पूर्ण सिद्धि दीर्घायुआरोग्यैश्‍वर्यादि-प्राप्त्यर्थं शमन साधना प्रयोग करिष्ये।


संकल्प मंत्र उच्चारण के पश्‍चात् जल भूमि पर छोड़ दें और रुद्राक्ष माला से गुरु मंत्र की एक माला जप करें –
ॐ परमतत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नम:
मंत्र जप करने के बाद रुद्राक्ष माला को गले में धारण कर लें। इस साधना में दसों दिशाओं में गुरुदेव संकल्प, मंत्र जप सम्पन्न किया जाता है। दस दिशाएं – पूर्व, अग्नि (पूर्व और दक्षिण के मध्य),दक्षिण, नैॠत्य (दक्षिण और पश्‍चिम के मध्य), पश्‍चिम, वायव्य(पश्‍चिम और उत्तर के मध्य), उतर, ईशान (उत्तर और पूर्व के बीच), उर्ध्व और पाताल दिशा में क्रमबद्ध रूप से पूजन मंत्र जप सम्पन्न किया जाता है।
प्रत्येक दिशा में मंत्र जप सम्पन्न करने के पश्‍चात् रुद्राक्ष माला को पुनः गले में धारण कर लें।


पूर्व दिशा
पूर्व दिशा की ओर ही मुख किए हुए ही हाथ में जल लेकर संकल्प करें –
ॐ मे पूर्वंवत इह गत: पाप्मा पापकेनिह कर्मणा इन्द्र साक्षी भूतं निखिलेश्‍वरानंदम् मम समस्त दोष पाप भंजयतु भंजयतु मोहयतु नाशयतु भारयत कलिं तस्मै प्रयच्छतु कृतं मम (अपना नाम उच्चारण करें) गुरु शान्ति: स्वस्त्ययनंचास्तु।
जल भूमि पर छोड़ दें तथा गले में पहनी हुई रुद्राक्ष माला से निम्न पूर्व दिशाकृत गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें –


पूर्वदिशाकृत गुरु मंत्र
॥ॐ श्रीं निखिलेश्‍वराय श्रीं ॐ॥
अग्नि दिशा
साधक अपने आसन पर ही अग्निकोण की ओर मुंह कर बैठ जाए और पुनः हाथ में जल लेकर संकल्प करें –
ॐ योमे पूर्वंगत इह गत पाप्मा पापकेनेह कर्मणा अग्नि साक्षी भूतं निखिलेश्‍वरानंदम् मम समस्त दोष पाप भंजयतु मोहयतु नाशयतु मारयतु कलिं तस्मै प्रयच्छतु कृतं मम (अपना नाम उच्चारण करें) गुरु शांति: स्वस्त्ययनचास्तु।
अग्निकोण दिशा में संकल्प के पश्‍चात् निम्न अग्नि दिशा कृत गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करे और मंत्र जप के पश्‍चात् माला पुनः गले में धारण कर लें।
अग्नि दिशा कृत गुरु मंत्र
॥ ॐ ऐं ऐं निखिलेश्‍वराय ऐं ऐं नम:॥


दक्षिण दिशा
दक्षिण दिशा की ओर मुंह कर बैठ जाएं और हाथ में जल लेकर संकल्प करें –
ॐ योमे पूर्वंगत इह गत पाप्मा पापकेनेह कर्मणा दक्षिण यमदेव साक्षी भूतं निखिलेश्‍वरानंदम् मम समस्त दोष पाप भंजयतु भंजयतु मोहयतु नाशयतु भारयतु कलिं तस्मै प्रयच्छतु कृतं मम(अपना नाम उच्चारण करें) गुरु शान्ति – स्वस्तयनंचास्तु।
दक्षिण दिशा में संकल्प के पश्‍चात् जल भूमि पर छोड़ दें तथा गले में धारण की हुई रुद्राक्ष माला गले से निकाल कर, उस रुद्राक्ष माला से निम्न दक्षिण दिशा कृत गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें और मंत्र जप की पूर्णता के पश्‍चात् माला को पुनः गले में धारण कर लें –
दक्षिण दिशा कृत गुरु मंत्र
॥ ॐ ह्रीं परमतत्वाय निखिलेश्‍वराय ह्रीं नम:॥


नैॠत्य दिशा
इसके बाद नैऋत्य दिशा की ओर मुंह कर संकल्प करें-
ॐ योमे पूर्वंगत इह गत पाप्मा पापकेनेह कर्मणा नैऋत्य रक्षराज साक्षी भूतं निखिलेश्‍वरानंदम् मम समस्त दोष पाप भंजयतु भंजयतु मोहयतु नाशयतु मारयतु कलिं तस्मै प्रयच्छतु कृतं मम(अपना नाम उच्चारण करें) गुरुं शान्ति स्वस्त्ययनंचास्तु।
संकल्प के पश्‍चात् नैऋत्य दिशा मंत्र का रुद्राक्ष माला से एक माला मंत्र जप करें और मंत्र जप के पश्‍चात् माला गले में धारण कर लें –
नैऋत्य दिशा कृत गुरु मंत्र
ॐ क्लीं क्लीं निखिलेश्‍वराय क्लीं क्लीं नम:॥


पश्‍चिम दिशा
नैॠत्य दिशा के पश्‍चात् पश्‍चिम दिशा की ओर मुंह करें और हाथ में जल लेकर संकल्प करें –
ॐ योमे पूर्वंगत इह गत पाप्मा पापकेनेह कर्मणा पश्‍चिम सोम वरुण विप्रराज साक्षी भूतं निखिलेश्‍वरानंदम् मम समस्त दोष पाप भंजयतु भंजयतु मोहयतु नाशयतु मारयतु कलिं तस्मै प्रयच्छतु कृतं मम (अपना नाम उच्चारण करें) गुरुं शांति:स्वस्त्ययनंचास्तु।
पश्‍चिम दिशा की ओर मुंह किये हुए ही रुद्राक्ष माला से निम्न गुरु मंत्र की एक माला से मंत्र जप करें।
पश्‍चिमी दिशा कृत गुरु मंत्र
॥ॐ क्रीं निखिलेश्‍वराय क्रीं ॐ॥


वायव्य दिशा –
इसके बाद वायव्य दिशा की ओर मुंह कर संकल्प करें-
ॐ योमे पूर्वंगत इह गत पाप्मा पापकेनेह कर्मणा वायव्य वायु यक्षराज साक्षी भूतं निखिलेश्‍वरानंदम् मम समस्त दोष पाप भंजयतु भंजयतु मोहयतु नाशयतु मारयतु कलिं तस्मै प्रयच्छतु कृतं मम (अपना नाम उच्चारण करें) गुरु शान्ति: स्वस्त्ययनंचास्तु।
संकल्प के पश्‍चात् रुद्राक्ष माला से निम्न गुरु मंत्र जप करें और मंत्र जप के पश्‍चात् माला गले में धारण कर लें।
वायव्य दिशा कृत गुरु मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं निखिलेश्‍वराय श्रीं ह्रीं ऐं ॐ॥


उतर दिशा
इसके बाद साधक उत्तर दिशा की ओर मुंह कर लें और हाथ में जल लेकर संकल्प करें –
ॐ योमे पूर्वंगत इह गत पाप्मा पापकेनेह कर्मणा उत्तर दिशा कुबेर साक्षी भूतं निखिलेश्‍वरानंदम् मम समस्त दोष पाप भंजयतु भंजयतु मोहयतु नाशयतु मारयतु कलिं तस्मै प्रयच्छतु कृत मम(अपना नाम उच्चारण करें) गुरु शान्ति: स्वस्त्ययनचास्तु।
संकल्प के पश्‍चात् रुद्राक्ष माला से निम्न गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें-
उत्तर दिशाकृत गुरु मंत्र
ॐ श्रीं श्रीं श्रीं निखिलेश्‍वराय श्रीं श्रीं श्रीं नम:॥


ईशान दिशा –
उतर दिशा में मंत्र जप के पश्‍चात् उसी क्रम में ईशान दिशा की ओर मुंह कर हाथ में जल लेकर संकल्प करें-
ॐ योमे पूर्वंगत इहगत पाप्मा पापकेनेह कर्मणा ईशान पृथुरत्न ईश साक्षी भूतं निखिलेश्‍वरानंदम् मम समस्त दोष पाप भंजयतु भंजयतु मोहयतु नाशयतु मारयतु कलिं तस्मै प्रयच्छतु कृतं मम(अपना नाम उच्चारण करें) गुरु शान्ति: स्वस्त्ययनंचास्तु।
इसके बाद ईशान कोण की ओर मुख किये हुए ही रुद्राक्ष माला से निम्न गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें-
ईशान दिशा कृत गुरु मंत्र
ॐ ह्रीं निखिलेश्‍वराय ह्रीं नम:॥


उर्ध्व दिशा –
ईशान कोण में गुरु मंत्र जप के पश्‍चात् पूर्व दिशा की ओर मुंह कर आकाश से गुरु कृपा प्राप्ति हेतु ऊपर उर्ध्व (आकाश) दिशा की ओर मुंह कर हाथ में जल लेकर संकल्प करें –
ॐ योमे मपूर्वंगत इह गत पाप्मा पापकेनेह। कर्मणा ब्रह्मा सृष्टिराज साक्षी भूतं निखिलेश्‍वरानंदम मम समस्त दोष पाप भंजयतु भंजयतु मोहयतु नाशयतु मारयतु कलिं तस्मै प्रयच्छतु, कृतं मम (अपना नाम उच्चारण करें) गुरु शान्ति स्वस्त्ययनंचास्तु।
उर्ध्व (आकाश) दिशा में गुरु पूजन हेतु साधक ऊपर आकाश की ओर मुंह किये किये हुए ही रुद्राक्ष माला से निम्न गुरु मंत्र की एक माला से मंत्र जप करें, मंत्र जप के पश्‍चात् माला गले में धारण कर लें।
उर्ध्व (आकाश) दिशा कृत गुरु मंत्र
॥ ॐ ‘‘निं’’ निखिलेश्‍वर्यै ‘‘निं’’ नम:॥


पाताल दिशा –
उर्ध्व दिशा में गुरु पूजन के पश्‍चात् भूमि की ओर अर्थात् सिर झुका कर हाथ में जल लेकर संकल्प करें-
ॐ योमे पूर्वंगत इह गत पाप्मा पापकेनेह कर्मणा अध: नागराजो सह अनन्त साक्षी भूतं निखिलेश्‍वरानंदम् मम समस्त दोष पाप भंजयतु भंजयतु, मोहयतु नाशयतु मारयतु कलिं तस्मै प्रयच्छतु, कृतं मम (अपना नाम उच्चारण करें) गुरु शान्ति स्वस्त्ययनंचास्तु।
इसके बाद साधक भूमि की ओर मुंह किये किये ही अपने गले में पहनी रुद्राक्ष माला से निम्न गुरु मंत्र जप करें-
अध: (भूमि) दिशाकृत गुरु मंत्र
ॐ निखिलं निखिलेश्‍वर्यै निखिलं नम:।
इस प्रकार दसों दिशााओं में गुरुदेव निखिल का पूजन करने के पश्‍चात् साधक पुनः रुद्राक्ष माला को हाथ में लेकर एक माला गुरु मंत्र का जप करें –


ॐ परमत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नम:
दसों दिशाओं में गुरुदेव का पूजन सम्पन्न कर, गुरु आरती सम्पन्न करें तथा गुरुदेव को अर्पित नैवेद्य स्वयं ग्रहण कर, परिवार के सदस्यों में भी बांट दें।
इस प्रकार यह दुर्लभ और अद्वितीय पूजन-साधना सम्पन्न हो जाती है और इसके बाद साधक पूर्णत: पवित्र, दिव्य, तेजस्वी, प्राणश्‍चेतना युक्त एवं सिद्धाश्रम का अधिकारी होता हुआ, गुरु का अत्यन्त प्रिय शिष्य हो जाता है, और साथ ही साथ उसके पिछले जीवन और इस जीवन के सभी प्रकार के पाप दोष समाप्त हो जाते हैं।
यह दुर्लभ साधना अपने आप में अद्वितीय है और सभी साधकों को इस का अवश्य ही लाभ उठाना चाहिए।


साधना सामग्री – ₹480/-


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