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Friday 30th of June 2017 12:56:22 PM


सिद्धाश्रम पञ्चक गुरूत्वम् सदैवम् पुर्णा तदैवम्। भाग्येन् देवो भवदेव नित्यम्।। अहो भवाम् परीपूर्ण सिन्धुम्। गुरूत्वम् शरण्यम् गुरुत्वम शरण्यम्।। त्वमेव माता च पिता त्वमेव.......... त्वम् मातृ रुपम् पितृ स्वरुपम्। बन्धु स्वरुपम् आत्म स्वरुपम्।। चैतन्य रुपम् पूर्णत्व रुपम्। गुरूत्वम् शरण्यम् गुरुत्वम् शरण्यम्।। त्वमेव माता च पिता त्वमेव......... न तातो न माता न बन्धुर्न भ्राता। न पुत्रो न पुत्री न भृत्योर्न भर्ता।। न जाया न वित्तम न वृत्तिर्ममेवम्। गतिस्त्वम् मतिस्त्वम् गुरूत्वम् शरण्यम्।। त्वमेव माता च पिता त्वमेव......... अनाथो दरिद्रो जरा रोग युक्तो। महाक्षीण दीन सदा जाड्यवक्ता।। विपत्ती प्रविष्ट सदाहम् भजामी। गुरूत्वम् शरण्यम् गुरूत्वम् शरण्यम्।। त्वमेव माता च पिता त्वमेव......... त्वम् मातृ रुपम् त्वम् पितृ रुपम्। सदैवम् सदैवम् कृपा सिन्धु रुपम्।। त्वमेवम् शरण्यम् त्वमेवम् शरण्यम्। गुरूत्वम् सदैवम् गुरूत्वम् शरण्यम्।। त्वमेव माता च पिता त्वमेव......... न जानामी मन्त्रम् न जानामी तन्त्रम्। न योगम् न पूजा न ध्यानम् वदामी।। न जानामी चैतन्य ज्ञानम् स्वरुपम्। एकोही रुपम् गुरूत्वम् शरण्यम्।। त्वमेव माता च पिता त्वमेव......... एकोही नामम् एकोही कार्यम्। एकोही ध्यानम् एकोही ज्ञानम्।। आज्ञा सदैवम् परिपाल्यन्तिम्। त्वमेवम् शरण्यम् त्वमेवम् शरण्यम्।। त्वमेव माता च पिता त्वमेव......... त्वम् ज्ञात रुपम् त्वम् अज्ञात रुपम्। मम देह रुपम् मम प्राण रुपम्।। पूर्णत्व देहम मम प्राण सदेवम्। त्वमेवम् शरण्यम् गुरूत्वम् शरण्यम्।। त्वमेव माता च पिता त्वमेव.........
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