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Jeevan yantra जीवन यात्रा पूज्य गुरुदेव नारायण दत्त श्रीमाली जी

MTYV Sadhana Kendra -
Thursday 18th of June 2015 01:20:01 PM


।।ॐ।।

जीवन यात्रा ~भाग ~1
पूज्य गुरुदेव नारायण दत्त श्रीमाली जी


समझ में नही आ रहा कहा से प्रारम्भ करूँ उनका
जीवन आख्यान , जगमग करते ज्योति पुंज की किरणे ही जिस प्रकार उनके बारे में सब कुछ कह देती है उसी प्रकार पूज्य प्रभु के शब्द उनका ज्ञान ही उनके बारे में सब कुछ कह देती है ।जिनके पास बैटकर एक असीम शांति का अनुभव होता है जिनके स्पर्श से रोग शोक शरीर से तो क्या मन से भी दूर हो जाते है ।ऐसे है हमारे पूज्य गुरुदेव -निखिलेश्वरानन्द जी जिन्हें संसार डॉ., नारायण दत्त श्रीमाली के नाम से जानता है और इस नाम के पीछे भी उनका ही एक बड़ा रहस्य छिपा है ।

ॐ नमो नारायणाय

जन्म हुआ तो माँ ने नाम दिया "नारायण" यह प्रेरणा थी , की हे देवी ! तेरे घर चक्रवर्ती सम्राटो से भी अधिक तेज वाला पुत्र उत्पन्न होगा । माँ ने सोचा कि मेरा पुत्र बड़ा होकर धनी प्रभावशाली व्यक्ति होगा परिवार सुख वैभव से। रहेगा उसने ऐसा थोड़े ही सोचा था कि यह पुत्र तो बडा होकर साधू सन्यासी बन जायेगा और राजाओ का भी राजा होगा ।
यह अवतार ही था , तब न तो माँ ने कुछ सोचा न ही परिवार के अन्य सदस्यों ने ।
बालक नारायण जन्म से ही अन्य बालको से
बिलकुल अलग था चार साल की उम्र में मन्त्रो का , गीता का सन्ध्या का रुद्राभिषेक का इस प्रकार उच्चारण करता था मानों कोई
सिद्ध पण्डित पाठ कर रहा हो यह ज्ञान उन्हें किसी से प्राप्त करने की आवश्यकता थोड़े ही थी यह तो उनके जन्म के साथ ही जुड़ा था उनका तो जन्म ही संसार में एक विराट कार्य के लिए हुआ था , और उन्हें अपने समय में कार्य सम्पन्न करना ही था ।

घर वाले चाहते की बालक नारायण बड़ा होकर अपने पिता की तरह ज्योतिष पूजा कर्मकांड का अभ्यास कर परिवार का नाम विख्यात करे , उनके लिए अलग से अध्यापक लगाने की आवश्यकता ही कहा थी , घर में ही तो नित्य प्रति वेद मन्त्रो की ध्वनि गूंजती थी , नित्य यज्ञ होते थे सारा कुछ वैदिक वातावरण ही था , दूर दूर से बालक इनके पिता से शिक्षा लेने आते थे , ऐसे वातावरण पूज्य गुरुदेव के व्यक्तित्व का विकास हुआ , लेकिन उन्हें तो अलग मार्ग बनाना था और यह सब कुछ सही क्रम से चल रहा था , वे अपने पिता से गीता के श्लोको के बारे में बहस करते , वेदों - उपनिषदों के एक एक श्लोक ऋचाओं के सम्बन्ध में उनका तर्क चलता , आखिर को उन्हें यह कहना पड़ा कि बेटा नारायण ! मेरे पास जितना ज्ञान है , वह मैंने तुझे बता दिया है , मेरे पास तेरे सब प्रश्नो के
उत्तर नही है , और यही से बालक नारायण के मन में ज्ञान की भूख जाग्रत हुई कि जो कुछ भी सीखना है , ज्ञान प्राप्त करना है , वह पूर्णता तक होना चाहिए , अधूरा ज्ञान मन का नाश करता है ।

क्रमशः

पूरी जानकारी गुरुदेव के सत्साहित्यो पर आधारित है !



।।ॐ।।
जीवन यात्रा -भाग ~ 2

सदगुरुदेव डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली जी
(परमहंस स्वामी निखिलेश्वरा नन्द जी )

बालक नारायण बचपन से ही दयालु एवँ साधू प्रकृति के थे तथा पुरे परिवार के लाडले थे ,हमेशा पूजा पाठ करना , संध्या - वन्दनोपरांत वेदाध्ययन करना ,सस्वर तथा मधुर कन्ठ से शिव स्तुति करना उन्हें प्रिय था ।

किसी को दुःख या विपत्ति में तो वे देख ही नही सकते थे ,जब भी उन्हें ज्ञात होता की गांव (खरंटिया) में फला बीमार है या कष्ट में है ,तो स्वयम जाकर उसकी सेवा - सुश्रुषा करते , यथा सम्भव सहायता करते और सांत्वना देते । पशुओ के प्रति तो वे जरूरत से ज्यादा दयार्द्र रहते ,घर में जो 'गौ' थी, उसकी अपनी हाथो से सेवा करते , भूसा -पानी देते ; नित्य पक्षीयो को दाना , अपंग को भोजन तथा दुखियो की सेवा को उन्होंने अपना धर्म समझ लिया था ,इसिलए गांव में उनका नाम " साधु बालक " पड़ गया था ।

बारह वर्ष की आयु में ही उनका विवाह जोधपुर से सत्तर किलोमीटर दूर रोहट गांव के
"श्री प्रताप चंद " की सुलक्षणा पुत्री "भगवती देवी" से हुआ । बालिका भगवती देवी स्वयं छोटी उम्र की होते हुए भी ईश्वर पूजा , भजन स्तुति आदि में जरूरत से ज्यादा रूचि लेती और जो उम्र खेलने - खाने की होती है , उस उम्र में वे घण्टो श्रीकृष्ण की पूजा - अर्चना करती रहती तथा अपना ज्यादा से ज्यादा समय भजन पूजन में लगाती ।

विवाह के कुछ काल के अनन्तर बालक नारायण के पिताजी कुछ कारणों से 'लुनी '
में आकर बस गए । लुनी ग्राम , जोधपुर से तीस किलोमीटर दूर है और थोड़ी सी आबादी है ।यहां आने के बाद बालक नारायण की इच्छा से इन्हें स्थानीय विद्यालय में पढ़ने के लिए भर्ती कराया गया । उस समय अग्रेजी तीसरी कक्षा से शुरू होती थी । तीन वर्ष तक लुनी में , फिर फिर एक वर्ष लोर्डिया में , फिर जोधपुर की " विद्याशाला स्कुल " में एक वर्ष तथा फिर आठवी कक्षा "लूनी विद्यालय "से पास की । इसके बाद दो वर्ष का शिक्षण उन्होंने "फलौदी विद्यालय " से लिया और अच्छे अंको से परीक्षा पास की , पर इस पुरे अध्ययन काल में उनका वेदा ध्ययन , पूजा - पाठ , जप - तप निरन्तर चलता रहा ।

एक दिनों एक नई बात अनुभव हुई।
एक दिन रविवार को वे स्नान कर पूजा करने बैठे ही थे , कि उनकी समाधि लग गयी और समाधि लगभग साढे तीन घण्टे रही । इस पूरी अवधि में उन्हें अपने शरीर का कोई भान नही रहा , साथ का सहपाठी जो इनके साथ रह रहा था , इन्हें इस प्रकार निश्चल् बैठा देख घबरा गया ; जब समाधि खुली , तब उसके जान में जान आई ।

इसके बाद कई बार पूजा स्थल पर पूजा के पहले या पूजा के बाद नारायण की समाधि लग जाती और घण्टो लगी रहती । इस समाधि की अवस्था में उनका चेहरा एक अवर्णित प्रकाश से जगमगाता रहता , चेहरे के चारो ओर एक विशेष प्रकार का प्रभा मण्डल बन जाता ।

शिक्षा के बाद नारायण वापस लूनी आ गए और परिस्थितियों से विवश होकर अध्यापन कार्य प्रारम्भ कर दिया , क्योकि यह कार्य सर्वथा उनके लिए अनुकूल था । वह कोई ऐसा कार्य करना चाहते थे , जो समाजोपयोगी हो, जिससे समाज का निर्माण हो , समाज का हित हो और जिससे समाज के आधारभूत बालको का चारित्रिक और नैतिक विकास हो सके ।

परन्तु इसके साथ ही साथ उनका ध्यान , पूजा - पाठ आदि का कार्यक्रम भी चलता रहा और अध्यापन के कार्य के बाद जो भी समय बचता , वह प्रभु चरणों में ही व्यतीत होता । उनकी इस स्तिथि को देखकर घरवाले विचार करते , एक - दो बार पिता ने फटकारा भी , परन्तु इन पर कोई विशेष प्रभाव नही पड़ा , इनका कार्यक्रम इसी प्रकार से चलता रहा ।

~ क्रमशः ~

पूरा लेख गुरुदेव के सत्साहित्यों पर आधारित है ।

जय गुरुदेव , जय गुरु माँ !!!


।।ॐ।।


~ जीवन यात्रा ~ भाग - 3
सदगुरुदेव डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली जी

(परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानन्द जी )


इस अवधि में साधना क्षेत्र के साथ नारायण में ज्योतिष के प्रति भी रूचि बढ़ी और उनका मन ज्योतिष के गूढ़ प्रश्नो को को टटोलने लगा , यही नही अपितु उनको भावीकाल ज्ञान स्वतः ही होने लगा कई बार वह किसी साथी को देखकर अनायास ही बता देते , कि शाम को तुम्हारे साथ अमुक घटना घटित होने वाली है और उसी शाम को वह घटना उसी प्रकार से घटित हो जाती ।

किसी परिचित महिला को जब उसके भूतकाल के गोपनीय अंश सुनाते ,तो महिला दांतो तले उंगलिया दबा लेती , ऐसा एक बार नही सैकड़ो बार हुआ । उनकी कही हुई बाते आश्चर्य जनक रूप से सत्य सिद्ध होने लगी , ऐसा लगने लगा जैसे प्रभु का कोई विशेष आशीर्वाद उनको प्राप्त हो गया हो ।उनके आश्चर्य जनक परिवर्तन और भविष्य दर्शन को देख कर घरवाले भी आश्चर्य करते ।

धीरे - धीरे नारायण की ख्याति बढ़ने लगी और दूर -दूर से लोग अपना भविष्य पूछने के लिए आने लगे । नारायण का अध्यापन के आलावा बाकी सारा समय लोगो का भविष्य बताने और उनके दुःख दर्द को दूर करने में ही व्यतीत होने लगा ।

पर नारायण अपने आप में परेशानी महसूस करने लगे ,साधना या पूजा - पाठ में जितना समय देना चाहिए ,उतना वह नही दे पाते ।इससे उनके मन की बेचैनी बढ़ गई और वह कोई ऐसा उपाय ढूंढ़ने लगे , जिससे वह अपनी साधना में पूरा समय दे सके । उस समय की मनोदशा का जो वर्णन गुरुदेव नारायण ने अपनी डायरी में किया है वह कुछ इस प्रकार से है÷

"बहुत अधिक घुटन महसूस कर रहा हूं ...ठीक है मै खाता हूं ,पीता हूं ,विद्यालय जाता हूं और वे सभी कार्य करता हूं , जो मुझे करने चाहिए ,पर उत्साह नही है । हृदय में एक अजीब तरह की बेचैनी घुमड़ रही है , एक अजीब तड़प तन - मन में समाई हुई है , जो कि सन्यासवत जीवन के लिए प्रेरित कर रही है ।

यह भी ठीक है , कि ईश्वर कृपा से भविष्य दर्शन स्वतः ही हो गया है और व्यक्ति को देखते ही या उसका फोटो देखते ही उसके भूतकाल और भविष्यकाल के बारे में स्वतः ही मेरी आँखों के सामने चित्र तथा बिम्ब उभरने लग जाते है ...... और मै जो कुछ भी देखता हूं जो भी कहता हूं ,वही सत्य हो जाता है । इसी से भीड़ बढ़ गई है ,सुबह से ही लोग आने लग जाते है और रात गए तक लोग अपनी परेशानियो को लेकर आते रहते है ~ इससे मेरा व्यक्तिगत जीवन नष्ट सा हो गया है ,घर में भी अव्यवस्था सी हो गई है ,परिवार का व्यक्तिगत जीवन छिन्न - भिन्न सा हो रहा है .....,

~ क्या मेरे जीवन का यही चरम बिंदु है ?

~ क्या मुझे जीवन की पूर्णता यही समझ लेनी चाहिए?

~ क्या इन लोगो के भविष्य - वाचन में ही मेरे जीवन की सार्थकता हो पायेगी ?

...... नहीँ , नहीँ , यह तो कुछ भी नही ..... यह तो प्रारंभ है , इसे प्रारंभ ही समझना चाहिए ......यह
अध्यापन ..... यह गृहस्थी ..... यह प्रशंसा ..... सम्मान ..... कुछ भी तो नही ।मैं ब्राह्मण पुत्र हूं , मेरे कुल की मर्यादा अज्ञानान्धकार को हटाना है ..... लोगो को रौशनी देना है ..... उनको सतपथ पर अग्रसर करना है और भारत की लुप्त विद्याओ को खोज निकालना है । लोग आज मन्त्र - तन्त्र , ज्योतिष पर हंस रहे है , इसे पाखण्ड और ढोंग समझ रहे है ..... मुझे इस क्षेत्र में गहराई के साथ घुसना है ..... परखना है ..... देखना है , कि इस देश में मंत्र -तंत्र कुछ है भी या मात्र कल्पना ही है ?

~ क्या मंत्रो में अमोघ शक्ति है ?

~ क्या अब भी मेरे देश में ऐसे ऋषि और साधू है , जिन्हें इस विद्या का पूर्ण ज्ञान है ?
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~ क्रमशः ~

पूरी जानकारी गुरुदेव के साहित्यों पर आधारित है !

जय गुरुदेव ,
हर हर महादेव !!!



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