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सन्यास क्या है ? एक मानसिक भाव है

MTYV Sadhana Kendra -
Friday 12th of June 2015 07:03:24 AM


सन्यास क्या है?

सन्यास लेने या देने की चीज नहीं है| यह एक मानसिक भाव है, जिसके प्रति आकर्षण परमात्मा की कृपा से ही प्राप्त होता है| दीक्षा, आचरण के नियम, वेशभूषा, विधि आदि सम्प्रदाय या आश्रम विशेष या गुरु विशेष के होते है; पर संन्यास में इसकी कोई उपयोगिता नहीं है|
जब किसी भावनात्मक चोट से या स्वयं की विचार शक्ति से भौतिक जगत से मोह टूटता है, तो व्यक्ति स्वयं और स्वयं के जीवन का कारण तलाशने लगता है| सन्यास का प्रारंभ यहाँ से होता है| इसके लिए कोई नियम नहीं है| विधियाँ और नियम भौतिक साधनाओं के लिए होते है| सन्यास पूर्णतया भावनात्मक ज्ञानमार्ग है, जो विचार शक्ति, तर्क शक्ति, मनन शक्ति के द्वारा भौतिकता का बेध कर अंतिम सत्य तक पहुँचाता है|
श्री कृष्ण ने इसका एक सरल मार्ग बताया है| सब कुछ करो, पर उससे ‘राग’ मत रखो| स्वतंत्र होकर अपने और जगत के सत्य को जानने का प्रयत्न करो| गुरु का मार्ग निर्देशन और उपदेश सन्यास रुपी उपलब्धि का ईंधन होता है| पर यह सभी भाव प्रधान तर्क प्रधान होते है| विधि प्रधान नहीं|
इस संसार में कोई किसी के लिए प्रिय नहीं होता| सभी अपने ही लिए प्रिय होते है| यहाँ कुछ भी शाश्वत नहीं| न तो जीवन, न ही जीवन के सुख| हम नहीं जानते कि हम क्या है? कहाँ से आते है, कहाँ चले जाते है| इस सत्य को जानने के लिए प्रयत्नशील होना ही सन्यास धारण करना है| न तो कपिल को किसी ने दीक्षा दी थी, न ह आदिनाथ को| जो आचरण, नियम, व्रत के कठोर बन्धनों में बंधा है, वह सन्यासी कैसा? वह तो पाशबद्ध अज्ञानी है| स्मरण रखे| श्री कृष्ण से बड़ा सन्यासी कोई नहीं था और राजा जनक जैसे लोगों को भी महान सन्यासी कहा जाता है|

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